05 Best Panchtantra Stories in Hindi 2021 | 05 लोकप्रिय पंचतन्त्र कहानियाँ हिंदी में

05 Best Panchtantra Stories in Hindi 2021


इस Blog में आपको 05 best panchtantra stories hindi में पढ़ने को मिलेंगी जो आपने अपने दादा दादी से सुनी होंगी। ये hindi stories बहुत ही ज्ञानवर्धक है। पंचतन्त्र की कहानियाँ तो आपने अपने बचपन मे बहुत सुने होंगे। हमने भी इस ब्लॉग में 05 best panchtantra stories hindi में लिखा है जिसको पढ़कर आपको बहुत ही ज्यादा ज्ञान मिलेगा और आपका मनोरंजन भी होगा। इसमे कुछ 05 best Panchtantra Stories In Hindi 2021 दी गयी है। जिसमे आपको नयापन अनुभव होगा। यदि आप पुरानी कहानियाँ पढ़कर बोर हो गए है तो यहाँ पर हम आपको 05 best Panchtantra stories hindi दे रहे है जिसको पढ़कर आपको बहुत ही ज्यादा मज़ा आने वाला है।


05 best Panchtantra Stories In Hindi 2020
05 best Panchtantra Stories In Hindi 2020


1) एकता का बल


बहुत समय पहले की बात है, कबूतरों का एक झुंड खाने की तलाश में आसमान में उड़ता हुआ जा रहा था. कुछ दूर जाने के बाद ग़लती से भटककर ये झुंड ऐसे प्रदेश के ऊपर से गुजरा, जहां भयंकर अकाल पड़ा था. कबूतरों का सरदार चिंतित हो गया. कबूतरों के शरीर की शक्ति समाप्त होती जा रही थी. जल्द ही कुछ दाना मिलना ज़रूरी था. झुंड का युवा कबूतर सबसे नीचे उड़ रहा था. भोजन नज़र आने पर उसे ही बाकी दल को सूचित करना था. बहुत देर उड़ने के बाद वो लोग सूखाग्रस्त क्षेत्र से बाहर निकल आए. वहां उन्हें नीचे हरियाली नज़र आने लगी. ये देखकर उन्हें लगा कि अब भोजन मिल जाएगा. दल का युवा कबूतर और नीचे उड़ान भरने लगा. तभी उसे नीचे खेत में बहुत सारा अन्न बिखरा नज़र आया. वह बोला, “चाचा, नीचे एक खेत में बहुत सारा दाना बिखरा हुआ है. हम सबका पेट भर जाएगा.”


सरदार ने सूचना पाते ही कबूतरों को नीचे उतरकर खेत में बिखरा दाना चुनने का आदेश दिया. सारा दल नीचे उतरा और दाना चुनने लगा. दरअसल, वह दाना एक बहेलिए ने बिखेर रखा था ताकि वो पक्षियों का शिकार कर सके. नीचे दाना डालने के साथ ही उसने ऊपर पेड़ पर जाल डाला हुआ था. जैसे ही कबूतरों का झुंड दाना चुगने लगा, जाल उनपर आ गिरा. सारे कबूतर फंस गए.


कबूतरों के सरदार ने माथा पीटा, ‘ओह! यह तो हमें फंसाने के लिए फैलाया गया जाल था. भूख ने मेरी अक्ल पर पर्दा डाल दिया था. मुझे सोचना चाहिए था कि इतना अन्न बिखरे होने के पीछे कोई वजह ज़रूर होगी, मगर अब पछताए होत क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत?”


एक कबूतर रोने लगा, “अब हम सब मारे जाएंगे.”


बाकी कबूतर तो हिम्मत हार बैठे थे, पर सरदार गहरी सोच में डूबा था. एकाएक उसने कहा, “सुनो, जाल मज़बूत ज़रूरी है, लेकिन इसमें इतनी भी शक्ति नहीं कि एकता की शक्ति को हरा सके. हम अपनी सारी शक्ति को जोड़े तो मौत के मुंह में जाने से बच सकते हैं.”


युवा कबूतर फड़फड़ाया, “चाचा! साफ़-साफ़ बताओ तुम क्या कहना चाहते हो. जाल में फंसकर हम असहाय हो गए हैं, शक्ति कैसे जोडे?”


सरदार बोला, “तुम सब चोंच से जाल को पकडो, फिर जब मैं फुर्र कहूं तो एक साथ ज़ोर लगाकर उड़ना.”


सबने ऐसा ही किया. तभी जाल बिछाने वाला बहेलियां आता नज़र आया. जाल में कबूतरों को फंसा देखकर वह बहुत ख़ुश हुआ. उपने डंडे को मज़बूती से पकड़े वह जाल की ओर दौड़ा.


बहेलिया जाल से कुछ ही दूरी पर था कि कबूतरों का सरदार बोला, “फुर्रर्रर्र!”


सारे कबूतर एकसाथ ज़ोर लगाकर उड़े, तो पूरा जाल हवा में ऊपर उठा और सारे कबूतर जाल को लेकर ही उड़ने लगे. कबूतरों को जाल सहित उड़ते देखकर बहेलिया हैरान रह गया. कुछ देर बाद संभला, तो जाल के पीछे दौड़ने लगा. कबूतरों के सरदार ने बहेलिए को नीचे जाल के पीछे दौड़ते देखा, तो उसका इरादा समझ गया. सरदार भी जानता था कि कबूतरों के लिए जाल सहित ज़्यादा देर उड़ते रहना संभव नहीं होगा, पर सरदार के पास इसका उपाय था. पास ही एक पहाड़ी पर बिल बनाकर उसका एक चूहा मित्र रहता था. सरदार ने कबूतरों को तेज़ी से पहाड़ी की ओर उड़ने का आदेश दिया. पहाड़ी पर पहुंचते ही सरदार का संकेत पाकर जाल समेत कबूतर चूहे के बिल के निकट उतर गए.


सरदार ने मित्र चूहे को आवाज़ दी. सरदार ने संक्षेप में चूहे को सारी घटना बताई और जाल काटकर उन्हें आज़ाद करने के लिए कहा. कुछ ही देर में चूहे ने वह जाल काट दिया. सरदार ने अपने मित्र चूहे को धन्यवाद दिया और सारा कबूतर दल आकाश की ओर आज़ादी की उड़ान भरने लगा.



2) कौआ और उल्लू


बहूत समय पहले की बात हैं, एक जंगल में विशाल बरगद का पेड़ कौओं की राजधानी थी. हजारों कौए उस पर रहते थे. उसी पेड़ पर कौओं का राजा मेघवर्ण भी रहता था. बरगद के पेड़ के पास ही एक पहाड़ी थी, जिसमें कई गुफाएं थीं. उन गुफाओं में उल्लू रहते थे, उनका राजा अरिमर्दन था. अरिमर्दन बहुत पराक्रमी था. कौओं को तो उसने उल्लुओं का दुश्मन नम्बर एक घोषित कर रखा था. उसे कौओं से इतनी नफरत थी कि किसी कौए को मारे बिना वह भोजन नहीं करता था. जब बहुत ज़्यादा कौए मारे जाने लगे तो उनके राजा मेघवर्ण को बहुत चिंता हुई. उसने इस समस्या पर विचार करने के लिए सभा बुलाई.

मेघवर्ण बोला, “मेरे प्यारे कौओं, आपको तो पता ही हैं कि उल्लुओं के आक्रमण के कारण हमारा जीवन असुरक्षित हो गया है. हमारा शत्रु शक्तिशाली हैं और अहंकारी भी. हम पर रात को हमले किए जाते हैं. हम रात को देख नहीं पाते. हम दिन में जवाबी हमला नहीं कर पाते, क्योंकि वे गुफा के अंधेरे में सुरक्षित बैठे रहते है.”

फिर मेघवर्ण ने स्याने और बुद्धिमान कौओं से अपने सुझाव देने को कहा.

एक डरपोक कौआ बोला, “हमें उल्लुओं से समझौता कर लेना चाहिए. वह जो शर्त रखें, हमें स्वीकार कर लेना चाहिए. अपने से ताकतवर दुश्मन से पिटते रहने का भला क्या मतलब है?”

बहुत-से कौओं ने इस बात का विरोध किया. एक गर्म दिमाग़ का कौआ चीखा, “हमें उन दुष्टों से बात नहीं करनी चाहिए. सब उठो और उन पर आक्रमण कर दो.”

एक निराशावादी कौआ बोला, “शत्रु बलवान है हमें यह स्थान छोडकर चले जाना चाहिए.”

स्याने कौए ने सलाह दी, “अपना घर छोड़ना ठीक नहीं होगा. हम यहां से गए तो बिल्कुल ही टूट जाएंगे. हमें यहीं रहकर और पक्षियों से मदद लेनी चाहिए.”

कौओं में सबसे चतुर व बुद्धिमान स्थिरजीवी नामक कौआ था, जो चुपचाप बैठा सबकी दलीलें सुन रहा था. राजा मेघवर्ण उसकी ओर मुड़े, “महाशय, आप चुप हैं, मैं आपकी राय जानना चाहता हूं.”

स्थिरजीवी बोला, “महाराज, शत्रु अधिक शक्तिशाली हो तो छलनीति से काम लेना चाहिए.”

“कैसी छलनीति? ज़रा साफ़-साफ़ बताइए,

स्थिरजीवी.” राजा ने कहा.

स्थिरजीवी बोला, “आप मुझे भला-बुरा कहिए और मुझ पर जानलेवा हमला कीजिए.”

मेघवर्ण चौंका, “यह आप क्या कह रहे हैं स्थिरजीवी?”

स्थिरजीवी राजा मेघवर्ण वाली डाली पर जाकर कान में बोला, “छलनीति के लिए हमें यह नाटक करना पडेगा. हमारे आसपास के पेड़ों पर उल्लू जासूस हमारी इस सभा की सारी कार्यवाही देख रहे हैं. उन्हे दिखाकर हमें फूट और झगड़े का नाटक करना होगा. इसके बाद आप सारे कौओं को लेकर ॠष्यमूक पर्वत पर जाकर मेरी प्रतीक्षा करें. मैं उल्लुओं के दल में शामिल होकर उनके विनाश का सामान जुटाऊंगा. घर का भेदी बनकर उनकी लंका ढाएगा.”

फिर नाटक शुरू हुआ. स्थिरजीवी चिल्लाकर बोला, “मैं जैसा कहता हूं, वैसा कर राजा के बच्चे. क्यों हमें मरवाने पर तुला हैं?”

मेघवर्ण चीख उठा, “गद्दार, राजा से ऐसी बदतमीजी से बोलने की तेरी हिम्मत कैसे हुई?” कई कौए एकसाथ चिल्ला उठे, “इस गद्दार को मार दो.”

राजा मेघवर्ण ने अपने पंख से स्थिरजीवी को ज़ोरदार झापड़ मारकर तने से गिरा दिया और घोषणा की, “मैं गद्दार स्थिरजीवी को कौआ समाज से निकाल रहा हूं. अब से कोई कौआ इस नीच से संबध नहीं रखेगा.”

आसपास के पेड़ों पर छिपे बैठे उल्लू जासूसों की आंखे चमक उठी. उल्लुओं के राजा को जासूसों ने सूचना दी कि कौओं में फूट पड़ गई है. मार-पीट और गाली-गलौच हो रही है. इतना सुनते ही उल्लुओं के सेनापति ने राजा से कहा, “महाराज, यही मौक़ा है कौओं पर आक्रमण करने का. इस समय हम उन्हें आसानी से हरा देंगे.”

उल्लुओं के राजा अरिमर्दन को सेनापति की बात सही लगी. उसने तुरंत आक्रमण का आदेश दे दिया. बस फिर क्या था उल्लुओं की सेना बरगद के पेड़ पर आक्रमण करने चल पड़ी, परंतु वहां एक भी कौआ नहीं मिला.

मिलता भी कैसे? योजना के अनुसार मेघवर्ण सारे कौओं को लेकर ॠष्यमूक पर्वत की ओर कूच कर गया था. पेड़ ख़ाली पाकर उल्लुओं के राजा ने थूका, “कौए हमारा सामना करने की बजाय भाग गए. ऐसे कायरों पर हज़ार थू.” सारे उल्लू “हू-हू” की आवाज़ निकालकर अपनी जीत की घोषणा करने लगे. नीचे झाड़ियों में गिरा पड़ा स्थिरजीवी कौआ यह सब देख रहा था. स्थिरजीवी ने कां-कां की आवाज़ निकाली. उसे देखकर जासूस उल्लू बोला, “अरे, यह तो वही कौआ है, जिसे इनका राजा धक्का देकर गिरा रहा था और अपमानित कर रहा था.”

उल्लुओं का राजा भी आया. उसने पूछा, “तुम्हारी यह दुर्दशा कैसे हुई?” स्थिरजीवी बोला, “मैं राजा मेघवर्ण का नीतिमंत्री था. मैंने उनको नेक सलाह दी कि उल्लुओं का नेतृत्व इस समय एक पराक्रमी राजा कर रहे हैं, इसलिए हमें उल्लुओं की अधीनता स्वीकार कर लेनी चाहिए. मेरी बात सुनकर मेघवर्ण क्रोधित हो गया और मुझे फटकार कर कौओं की जाति से बाहर कर दिया. मुझे अपनी शरण में ले लीजिए.”

उल्लुओं का राजा अरिमर्दन सोच में पड़ गया. उसके स्याने नीति सलाहकार ने कान में कहा, “राजन, शत्रु की बात का विश्‍वास नहीं करना चाहिए. यह हमारा शत्रु है. इसे मार दो.” एक चापलूस मंत्री बोला, “नहीं महाराज! इस कौए को अपने साथ मिलाने से बहुत लाभ होगा. यह कौओं के घर के भेद हमें बताएगा.”

राजा को भी स्थिरजीवी को अपने साथ मिलाने में लाभ नज़र आया और उल्लू स्थिरजीवी कौए को अपने साथ ले गए. वहां अरिमर्दन ने उल्लू सेवकों से कहा, “स्थिरजीवी को गुफा के शाही मेहमान कक्ष में ठहराओ, इन्हें कोई कष्ट नहीं होना चाहिए.”

स्थिरजीवी हाथ जोड़कर बोला, “महाराज, आपने मुझे शरण दी, यही बहुत है. मुझे अपनी शाही गुफा के बाहर एक पत्थर पर सेवक की तरह ही रहने दीजिए. वहां बैठकर आपके गुण गाते रहने की ही मेरी इच्छा है.” इस प्रकार स्थिरजीवी शाही गुफा के बाहर डेरा जमाकर बैठ गया.

गुफा में नीति सलाहकार ने राजा से फिर से कहा,“महाराज! शत्रु पर विश्‍वास मत करो. उसे अपने घर में स्थान देना तो आत्महत्या करने समान है.” अरिमर्दन ने उसे क्रोध से देखा, “तुम मुझे ज़्यादा नीति समझाने की कोशिश मत करो. चाहो तो तुम यहां से जा सकते हो.” नीति सलाहकार उल्लू अपने दो-तीन मित्रों के साथ वहां से सदा के लिए यह कहता हुआ चला गया, “विनाशकाले विपरीत बुद्धि.”

कुछ दिनों बाद स्थिरजीवी लकड़ियां लाकर गुफा के द्वार के पास रखने लगा, “सरकार, सर्दियां आनेवाली हैं. मैं लकड़ियों की झोपड़ी बनाना चाहता हूं ताकि ठंड से बचाव हो.” धीरे-धीरे लकड़ियों का काफ़ी ढेर जमा हो गया. एक दिन जब सारे उल्लू सो रहे थे, तो स्थिरजीवी वहां से उड़कर सीधे ॠष्यमूक पर्वत पहुंचा, जहां मेघवर्ण और अन्य कौए उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे. स्थिरजीवी ने कहा, “अब आप सब निकट के जंगल से जहां आग लगी है एक-एक जलती लकड़ी चोंच में उठाकर मेरे पीछे आइए.”

कौओं की सेना चोंच में जलती लकड़ियां पकड़ स्थिरजीवी के साथ उल्लुओं की गुफाओं में आ पहुंची. स्थिरजीवी द्वारा ढेर लगाई लकड़ियों में आग लगा दी गई. सभी उल्लू जलने या दम घुटने से मर गए. राजा मेघवर्ण ने स्थिरजीवी को कौआ रत्न की उपाधि दी.


3) चतुर खरगोश और शेर


किसी घने जंगल में एक बहुत बड़ा शेर रहता था. वह रोज़ शिकार पर निकलता और एक-दो नहीं, कई-कई जानवरों का काम तमाम देता. जंगल के जानवर डरने लगे कि अगर शेर इसी तरह शिकार करता रहा, तो एक दिन ऐसा आएगा कि जंगल में कोई जानवर ही नहीं बचेगा.

सारे जंगल में सनसनी फैल गई. शेर को रोकने के लिये कोई न कोई उपाय करना ज़रूरी था. एक दिन जंगल के सारे जानवर इकट्ठा हुए और इस प्रश्‍न पर विचार करने लगे. अंत में उन्होंने तय किया कि वे सब शेर के पास जाकर उनसे इस बारे में बात करेंगे. दूसरे दिन जानवरों का एक दल शेर के पास पहुंचा. उनको अपनी ओर आते देख शेर घबरा गया और उसने गरजकर पूछा, “क्या बात है? तुम सब यहां क्यों आए हो?”

जानवर दल के नेता ने कहा, “महाराज, हम आपके पास निवेदन करने आए हैं. आप राजा हैं और हम आपकी प्रजा. जब आप शिकार करने निकलते हैं, तो बहुत जानवर मार डालते हैं. आप सबको खा भी नहीं पाते. इस तरह से हमारी संख्या कम होती जा रही है. अगर ऐसा ही चलता रहा, तो कुछ ही दिनों में जंगल में आपके सिवाय और कोई नहीं बचेगा. प्रजा के बिना राजा भी कैसे रह सकता है? यदि हम सभी मर जाएंगे, तो आप भी राजा नहीं रहेंगे. हम चाहते हैं कि आप सदा हमारे राजा बने रहें. आपसे हमारी विनती है कि आप अपने घर पर ही रहा करें. हम हर रोज़ स्वयं आपके खाने के लिए एक जानवर भेज दिया करेंगे. इस तरह से राजा और प्रजा दोनो ही चैन से रह सकेंगे.” शेर को लगा कि जानवरों की बात में सच्चाई है. उसने पलभर सोचा फिर बोला, “अच्छी बात है, मैं तुम्हारे सुझाव को मान लेता हूं, लेकिन याद रखना, अगर किसी भी दिन तुमने मेरे खाने के लिए पूरा भोजन नहीं भेजा, तो मैं जितने जानवर चाहूंगा, मार डालूंगा.” जानवरों के पास और कोई चारा तो था नहीं, इसलिए उन्होंने शेर की शर्त मान ली और अपने-अपने घर चले गए.

उस दिन से हर रोज़ शेर के खाने के लिये एक जानवर भेजा जाने लगा. इसके लिये जंगल में रहने वाले सब जानवरों में से एक-एक जानवर, बारी-बारी से चुना जाता था. कुछ दिन बाद खरगोशों की बारी भी आ गई. शेर के भोजन के लिए एक नन्हें से खरगोश को चुना गया. वह खरगोश जितना छोटा था, उतना ही चतुर भी था. उसने सोचा, बेकार में शेर के हाथों मरना मूर्खता है. अपनी जान बचाने का कोई न कोई उपाय अवश्य करना चाहिए, और हो सके तो कोई ऐसी तरक़ीब ढूंढ़नी चाहिए जिससे सभी को इस मुसीबत से सदा के लिए छुटकारा मिल जाए. आख़िर उसने एक तरक़ीब सोच ही ली.

खरगोश धीरे-धीरे आराम से शेर के घर की ओर चल पड़ा. जब वह शेर के पास पहुंचा तो बहुत देर हो चुकी थी.

भूख के मारे शेर का बुरा हाल हो रहा था. जब उसने स़िर्फ एक छोटे-से खरगोश को अपनी ओर आते देखा, तो ग़ुस्से से बौखला उठा और गरजकर बोला, “किसने तुम्हें भेजा है? एक तो पिद्दी जैसे हो, दूसरे इतनी देर से आ रहे हो. जिन बेवकूफों ने तुम्हें भेजा है मैं उन सबको ठीक करूंगा. एक-एक का काम तमाम न किया, तो मेरा नाम भी शेर नहीं.”

नन्हे खरगोश ने आदर से ज़मीन तक झुककर कहा, “महाराज, अगर आप कृपा करके मेरी बात सुन लें, तो मुझे या और जानवरों को दोष नहीं देंगे. वे तो जानते थे कि एक छोटा-सा खरगोश आपके भोजन के लिए पूरा नहीं पड़ेगा, इसलिए उन्होंने छह खरगोश भेजे थे, लेकिन रास्ते में हमें एक और शेर मिल गया. उसने पांच खरगोशों को मारकर खा लिया.”

यह सुनते ही शेर दहाड़कर बोला, “क्या कहा? दूसरा शेर? कौन है वह? तुमने उसे कहां देखा?”

“महाराज, वह तो बहुत ही बड़ा शेर है.” खरगोश ने कहा, “वह ज़मीन के अंदर बनी एक बड़ी गुफा में से निकला था. वह तो मुझे ही मारने जा रहा था. पर मैंने उससे कहा, सरकार, आपको पता नहीं कि आपने क्या अंधेर कर दिया है. हम सब अपने महाराज के भोजन के लिए जा रहे थे, लेकिन आपने उनका सारा खाना खा लिया है. हमारे महाराज ऐसी बातें सहन नहीं करेंगे. वे ज़रूर यहां आकर आपको मार डालेंगे.”

इसपर उसने पूछा, “कौन है तुम्हारा राजा?” मैंने जवाब दिया, “हमारा राजा जंगल का सबसे बड़ा शेर है.”

“महाराज, मेरे ऐसा कहते ही वह ग़ुस्से से लाल-पीला होकर बोला बेवकूफ इस जंगल का राजा स़िर्फ मैं हूं. यहां सब जानवर मेरी प्रजा हैं. मैं उनके साथ जैसा चाहूं वैसा कर सकता हूंं. जिस मूर्ख को तुम अपना राजा कहते हो उस चोर को मेरे सामने हाजिर करो. मैं उसे बताऊंगा कि असली राजा कौन है. महाराज इतना कहकर उस शेर ने आपको लिवाने के लिए मुझे यहां भेज दिया.”

खरगोश की बात सुनकर शेर को बड़ा ग़ुस्सा आया और वह बार-बार गरजने लगा. उसकी भयानक गरज से सारा जंगल दहलने लगा. “मुझे फौरन उस मूर्ख का पता बताओ.” शेर ने दहाड़कर कहा, “जब तक मैं उसे जान से नहीं मार दूंगा, मुझे चैन नहीं मिलेगा.” “बहुत अच्छा महाराज,” खरगोश ने कहा, “मौत ही उस दुष्ट की सज़ा है. अगर मैं और बड़ा और मज़बूत होता, तो मैं ख़ुद ही उसके टुकड़े-टुकड़े कर देता.”

“चलो, रास्ता दिखाओ” शेर ने कहा, “फौरन बताओ किधर चलना है?”

“इधर आइये महाराज, इधर,” खरगोश रास्ता दिखाते हुआ शेर को एक कुएं के पास ले गया और बोला, “महाराज, वह दुष्ट शेर ज़मीन के नीचे किले में रहता है. जरा सावधान रहिएगा. किले में छुपा दुश्मन ख़तरनाक होता है.”

“मैं उससे निपट लूंगा.” शेर ने कहा, “तुम यह बताओ कि वह है कहां?”

“पहले जब मैंने उसे देखा था तब तो वह यहीं बाहर खड़ा था. लगता है आपको आता देखकर वह किले में घुस गया है. आइए मैं आपको दिखाता हूं.”

खरगोश ने कुएं के नज़दीक आकर शेर से अंदर झांकने के लिए कहा. शेर ने कुएं के अंदर झांका, तो उसे कुएं के पानी में अपनी परछाईं दिखाई दी.

परछाईं को देखकर शेर ज़ोर से दहाड़ा. कुएं के अंदर से आती हुई अपनी ही दहाड़ने की गूंज सुनकर उसने समझा कि दूसरा शेर भी दहाड़ रहा है. दुश्मन को तुरंत मार डालने के इरादे से वह फौरन कुएं में कूद पड़ा.

कूदते ही पहले तो वह कुएं की दीवार से टकराया फिर धड़ाम से पानी में गिरा और डूबकर मर गया. इस तरह चतुराई से शेर से छुट्टी पाकर नन्हा खरगोश घर लौटा. उसने जंगल के जानवरों को शेर के मारे जाने की कहानी सुनाई. दुश्मन के मारे जाने की ख़बर से सारे जंगल में ख़ुशी फैल गई. जंगल के सभी जानवर खरगोश की जय-जयकार करने लगे.


4) चापलूस मण्डली



जंगल में एक शेर रहता था. उसके चार सेवक थे चील, भेड़िया, लोमड़ी और चीता. चील दूर-दूर तक उड़कर समाचार लाती. चीता राजा का अंगरक्षक था. सदा उसके पीछे चलता. लोमडी शेर की सेक्रेटरी थी. भेड़िया गृहमंत्री था. उनका असली काम तो शेर की चापलूसी करना था. इस काम में चारों माहिर थे. इसलिए जंगल के दूसरे जानवर उन्हें चापलूस मंडली कहकर पुकारते थे. शेर शिकार करता. जितना खा सकता वह खाकर बाकी अपने सेवकों के लिए छोड़ जाया करता था. उससे मज़े में चारों का पेट भर जाता. एक दिन चील ने आकर चापलूस मंडली को सूचना दी “भाईयों! सड़क के किनारे एक ऊंट बैठा है.”

भेड़िया चौंका “ऊंट! किसी काफिले से बिछड़ गया होगा.”

चीते ने जीभ चटकाई और कहा “हम शेर को उसका शिकार करने को राज़ी कर लें तो कई दिन दावत उड़ा सकते हैं.”

लोमड़ी ने घोषणा की “ शेर को राज़ी करना मेरा काम रहा.”

लोमड़ी शेर राजा के पास गई और अपनी ज़ुबान में मिठास घोलकर बोली “महाराज, दूत ने ख़बर दी है कि एक ऊंट सड़क किनारे बैठा है. मैंने सुना है कि मनुष्य के पाले जानवर के मांस का स्वाद ही कुछ और होता है. बिल्कुल राजा-महाराजाओं के काबिल. आप आज्ञा दें तो आपके शिकार का ऐलान कर दूं?”

शेर लोमड़ी की मीठी बातों में आ गया और चापलूस मंडली के साथ चील द्वारा बताई जगह जा पहुंचा. वहां एक कमज़ोर-सा ऊंट सड़क किनारे निढ़ाल बैठा था. उसकी आंखें पीली पड़ चुकी थीं. उसकी हालत देखकर शेर ने पूछा “क्यों भाई तुम्हारी यह हालात कैसे हुई?”

ऊंट कराहता हुआ बोला “जंगल के राजा! आपको नहीं पता इंसान कितना निर्दयी होता हैं. मैं एक ऊंटों के काफिले में एक व्यापार का माल ढो रहा था. रास्ते में मैं बीमार हो गया. माल ढोने लायक नहीं रहा, तो उसने मुझे यहां मरने के लिए छोड़ दिया. आप ही मेरा शिकार कर मुझे मुक्ति दीजिए.”

ऊंट की कहानी सुनकर शेर को दुख हुआ. अचानक उसके दिल में राजाओं जैसी उदारता दिखाने की ज़ोरदार इच्छा हुई. शेर ने कहा “ऊंट, तुम्हें कोई जंगली जानवर नहीं मारेगा. मैं तुम्हें अभय देता हूं. तुम हमारे साथ चलोगे और उसके बाद हमारे साथ ही रहोगे.”

चापलूस मंडली के चेहरे लटक गए. भेड़िया फुसफुसाया “ठीक है. हम बाद में इसे मरवाने की कोई तरक़ीब निकाल लेंगे. फिलहाल शेर का आदेश मानने में ही भलाई है.”

इस तरह ऊंट उनके साथ जंगल में आया. कुछ ही दिनों में हरी घास खाने व आराम करने से वह स्वस्थ हो गया. शेर राजा के प्रति ऊंट बहुत कृतज्ञ हुआ. शेर को भी ऊंट का निस्वार्थ प्रेम और भोलापन भाने लगा. ऊंट के स्वस्थ होने पर शेर की शाही सवारी ऊंट के ही आग्रह पर उसकी पीठ पर निकलने लगी. वह चारों को पीठ पर बिठाकर चलता.

एक दिन चापलूस मंडली के आग्रह पर शेर ने हाथी पर हमला कर दिया. दुर्भाग्य से हाथी पागल निकला. शेर को उसने सूंड से उठाकर पटक दिया. शेर उठकर बच निकलने में सफल तो हो गया, पर उसे बहुत चोट लगी.

शेर लाचार होकर बैठ गया. शिकार कौन करता? कई दिन न शेर ने कुछ खाया और न सेवकों ने. कितने दिन भूखे रहा जा सकता हैं? लोमड़ी बोली “हद हो गई. हमारे पास एक मोटा ताज़ा ऊंट है और हम भूखे मर रहे हैं.”

चीते ने ठंडी सांस भरी “क्या करें? शेर ने उसे अभयदान जो दे रखा है. देखो तो ऊंट की पीठ का कूबड़ कितना बड़ा हो गया है. चर्बी ही चर्बी भरी है इसमें.”

भेड़िए के मुंह से लार टपकने लगी “ऊंट को मरवाने का यही मौक़ा है दिमाग़ लड़ाकर कोई तरक़ीब सोचो.”

लोमड़ी ने धूर्त स्वर में सूचना दी “तरक़ीब तो मैंने सोच रखी है. हमें एक नाटक करना पड़ेगा.”

सब लोमड़ी की तरक़ीब सुनने लगे. योजना के अनुसार चापलूस मंडली शेर के पास गई. सबसे पहले चील बोली “महाराज, आपका भूखे पेट रहकर इस तरह मरना मुझसे नहीं देखा जाता. आप मुझे खाकर भूख मिटाइए.”

लोमड़ी ने उसे धक्का दिया “चल हट! तेरा मांस तो महाराज के दांतों में फंसकर रह

जाएगा. महाराज, आप मुझे खाइए.”

भेड़िया बीच में कूदा “तेरे शरीर में बालों के सिवा है ही क्या? महाराज! मुझे अपना भोजन बनाएंगे.”

अब चीता बोला “नहीं! भेड़िए का मांस खाने लायक़ नहीं होता. मालिक, आप मुझे खाकर अपनी भूख शांत कीजिए.”

चापलूस मंडली का नाटक अच्छा था. अब ऊंट को तो कहना ही पड़ा “नहीं महाराज, आप मुझे मारकर खा जाइए. मेरा तो जीवन ही आपका दान दिया हुआ है. मेरे रहते आप भूखों मरें, यह नहीं होगा.”

चापलूस मंडली यही तो चाहती थी. सभी एक स्वर में बोले “यही ठीक रहेगा, महाराज! अब तो ऊंट ख़ुद ही कह रहा है.”

चीता बोला “महाराज! आपको संकोच हो तो हम इसे मार दें?”

चीता व भेड़िया एकसाथ ऊंट पर टूट पड़ें और ऊंट मारा गया.


5) अक्लमंद हंस


एक बहुत विशाल पेड़ था. उस पर वहुत सारे हंस रहते थे. उनमें एक बहुत स्याना हंस था, बुद्धिमान और बहुत दूरदर्शी. सब उसका आदर करके ‘ताऊ’ कहकर बुलाते थे. एक दिन उसने एक नन्ही-सी बेल को पेड़ के तने पर बहुत नीचे लिपटते पाया. ताऊ ने दूसरे हंसों को बुलाकर कहा “देखो, इस बेल को नष्ट कर दो. एक दिन यह बेल हम सबको मौत के मुंह में ले जाएगी.”


एक युवा हंस हंसते हुए बोला “ताऊ, यह छोटी-सी बेल हमें कैसे मौत के मुंह में ले जाएगी?”


स्याने हंस ने समझाया “आज यह तुम्हें छोटी-सी लग रही हैं. धीरे-धीरे यह पेड़ के सारे तने को लपेटा मारकर ऊपर तक आएगी. फिर बेल का तना मोटा होने लगेगा और पेड़ से चिपक जाएगा, तब नीचे से ऊपर तक पेड़ पर चढ़ने के लिए सीढ़ी बन जाएगी. कोई भी शिकारी सीढ़ी के सहारे चढ़कर हम तक पहुंच जाएगा और हम मारे जाएंगे.”


दूसरे हंस को यक़ीन न आया “एक छोटी-सी बेल कैसे सीढ़ी बनेगी?”


तीसरा हंस बोला “ताऊ, तुम तो एक छोटी-सी बेल को खींचकर ज़्यादा ही लंबा कर रहे हो.”


एक हंस बड़बड़ाया “यह ताऊ अपनी अक्ल का रौब डालने के लिए अंट-शंट कहानी बना रहा है.”


इस प्रकार किसी दूसरे हंस ने ताऊ की बात को गंभीरता से नहीं लिया. इतनी दूर तक देख पाने की उनमें अक्ल कहां थी?


समय बीतता रहा. बेल लिपटते-लिपटते ऊपर शाखों तक पहुंच गई. बेल का तना मोटा होना शुरू हुआ और सचमुच ही पेड़ के तने पर सीढ़ी बन गई. जिस पर आसानी से चढ़ा जा सकता था. सबको ताऊ की बात की सच्चाई सामने नज़र आने लगी. पर अब कुछ नहीं किया जा सकता था क्योंकि बेल इतनी मज़बूत हो गई थी कि उसे नष्ट करना हंसों के बस की बात नहीं थी. एक दिन जब सब हंस दाना चुगने बाहर गए हुए थे तब एक बहेलिआ उधर आ निकला. पेड़ पर बनी सीढ़ी को देखते ही उसने पेड़ पर चढ़कर जाल बिछाया और चला गया. सांझ को सारे हंस लौट आए पेड़ पर उतरे तो बहेलिए के जाल में बुरी तरह फंस गए. जब वे जाल में फंस गए और फड़फड़ाने लगे, तब उन्हें ताऊ की बुद्धिमानी और दूरदर्शिता का पता लगा. सब ताऊ की बात न मानने के लिए लज्जित थे और अपने आपको कोस रहे थे. ताऊ सबसे रुष्ट था और चुप बैठा था.


एक हंस ने हिम्मत करके कहा “ताऊ, हम मूर्ख हैं, लेकिन अब हमसे मुंह मत फेरो.”


दूसरा हंस बोला “इस संकट से निकालने की तरक़ीब तू ही हमें बता सकता है. आगे हम तेरी कोई बात नहीं टालेंगे.” सभी हंसों ने हामी भरी तब ताऊ ने उन्हें बताया “मेरी बात ध्यान से सुनो. सुबह जब बहेलिया आएगा, तब मुर्दा होने का नाटक करना. बहेलिया तुम्हें मुर्दा समझकर जाल से निकालकर ज़मीन पर रखता जाएगा. वहां भी मरे समान पड़े रहना. जैसे ही वह अन्तिम हंस को नीचे रखेगा, मैं सीटी बजाऊंगा. मेरी सीटी सुनते ही सब उड़ जाना.”


सुबह बहेलिया आया. हंसों ने वैसा ही किया, जैसा ताऊ ने समझाया था. सचमुच बहेलिया हंसों को मुर्दा समझकर ज़मीन पर पटकता गया. सीटी की आवाज़ के साथ ही सारे हंस उड गए. बहेलिया अवाक् होकर देखता रह गया.

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