50 Short Stories With Moral Values In Hindi | नैतिक कहानियाँ

50 Short Stories With Moral Values In Hindi | नैतिक कहानियाँ


इस Blog में आपको 50 Short Stories With Moral Values In Hindi में पढ़ने को मिलेंगी जो आपने अपने दादा दादी से सुनी होंगी। ये hindi stories बहुत ही प्रेरक है। ऐसे  किस्से तो आपने अपने बचपन मे बहुत सुने होंगे पर ये किस्से कुछ अलग हौ। हमने भी इस ब्लॉग में 50 Short Stories With Moral Values In Hindi में लिखा है जिसको पढ़कर आपको बहुत ही ज्यादा आनंद मिलेगा और आपका मनोरंजन भी होगा। इसमे कुछ 50 Short Stories With Moral Values In Hindi 2021 दी गयी है। जिसमे आपको नयापन अनुभव होगा। यदि आप पुरानी कहानियाँ पढ़कर बोर हो गए है तो यहाँ 50 Short Stories With Moral Values In Hindi  पर हम आपको 50 Short Stories With Moral Values In Hindi दे रहे है जिसको पढ़कर आपको बहुत ही ज्यादा मज़ा आने वाला है।


50 Short Stories With Moral Values In Hindi
50 Short Stories With Moral Values In Hindi


1) मुर्गे की अकल ठिकाने

(Short Stories With Moral Values In Hindi)


एक समय की बात है , एक गांव में ढेर सारे मुर्गा रहते थे। गांव के बच्चे ने किसी एक मुर्गे को तंग कर दिया था। मुर्गा परेशान हो गया , उसने सोचा अगले दिन सुबह मैं आवाज नहीं करूंगा। सब सोते रहेंगे तब मेरी अहमियत सबको समझ में आएगी , और मुझे तंग नहीं करेंगे। मुर्गा अगली सुबह कुछ नहीं बोला। सभी लोग समय पर उठ कर अपने-अपने काम में लग गए इस पर मुर्गे को समझ में आ गया कि किसी के बिना कोई काम नहीं रुकता। सबका काम चलता रहता है।


2) बिल्ली बच गयी

(Short Stories With Moral Values In Hindi)


ढोलू – मोलू दो भाई थे। दोनों खूब खेलते , पढ़ाई करते और कभी-कभी खूब लड़ाई भी करते थे। एक दिन दोनों अपने घर के पीछे खेल रहे थे। वहां एक कमरे में बिल्ली के दो छोटे-छोटे बच्चे थे। बिल्ली की मां कहीं गई हुई थी , दोनों बच्चे अकेले थे। उन्हें भूख लगी हुई थी इसलिए खूब रो रहे थे। ढोलू – मोलू ने दोनों बिल्ली के बच्चों की आवाज सुनी और अपने दादाजी को बुला कर लाए।

दादा जी ने देखा दोनों बिल्ली के बच्चे भूखे थे। दादा जी ने उन दोनों बिल्ली के बच्चों को खाना खिलाया और एक एक कटोरी दूध पिलाई। अब बिल्ली की भूख शांत हो गई। वह दोनों आपस में खेलने लगे। इसे देखकर ढोलू – मोलू बोले बिल्ली बच गई दादाजी ने ढोलू – मोलू को शाबाशी दी।


3) असली इनाम

(Short Stories With Moral Values In Hindi)


सड़क के इस पार 5 कुत्ते के पिल्ले झुंड में एक-दूसरे से सटे हुए बड़ी ही गुमसुम मुखमुद्रा में बैठे थे। आखिर वजह भी तो वैसी ही थी ना! बात यूं थी कि सड़क के उस पार एक बहुत बड़ा विद्यालय था। बड़ा-सा अहाता था, जो ऊंची-ऊंची दीवारों से घिरा हुआ था। पाठशाला के प्रवेश द्वार पर भव्य लोहे का दरवाजा बना हुआ था।

एक चौकीदार बड़ी-बड़ी मूंछों वाला, हट्टा-कट्टा कद्दावर, हाथ में मोटी-सी लाठी लिए दरवाजे पर खड़ा पहरेदारी करता था। कभी जब चौकीदार की नजर बचाकर वे पिल्ले लोहे के दरवाजे में बनी जाली से अहाते के अंदर झांककर देखते तो उनका दिल उछलने लगता था। मैदान में लगे हुए झूले पर बच्चे शोर मचाते हुए झूलते थे, कभी फिसलपट्टी पर किलकारी भरते हुए फिसलते थे, तो कभी गोल वाली चकरी पर बैठकर गोल-गोल घूमते हुए हंस-हंसकर दोहरे हो जाते थे।

बच्चों की ऐसी उधमकूद देखकर वे पिल्ले सोचा करते थे कि काश! ऐसी मस्ती हम भी कर पाते, लेकिन दरवाजे पर खड़ा चौकीदार तो उन्हें पास भी नहीं फटकने देता था। वो ऐसी लाठी घुमाता कि वे 'क्याऔं क्याऔं' करते हुए भाग खड़े होते थे।

एक दिन की बात है। रात के समय पिल्लों ने विद्यालय अहाते में चीं-चीं की आवाजें सुनीं। उन सबने हौले से जाकर दरवाजे की जाली में झांककर देखा और एक अलग ही नजारा पाया। उन्होंने देखा कि छ:-सात बंदरों का झुंड अहाते में घुस आया था। दीवार से सटकर लगे हुए बड़े-बड़े पेड़ों पर से छलांग लगाते हुए वे सब अंदर आ पहुंचे थे। उनमें से कोई झूले पर झूल रहा था, कोई फिसलपट्टी का मजा ले रहा था, कोई चकरी पर घूमते हुए, कुछ सी-सा पर बैठे खुशी के मारे अपने दांत दिखा रहे थे।

यही सब देखकर तो सब पिल्ले मायूस हो गए थे। वे जानते थे कि अहाते की इतनी ऊंची दीवारें लांघना उनके बस की बात नहीं थी। फिर एक दिन पिल्लों को अहाते के अंदर से ठक्-ठक् की आवाजें आती सुनाई दीं। रात का समय था। पूरा मोहल्ला खामोश था, ध्यान से देखा तो पाया ‍कि लोहे के दरवाजे का ताला टूटा हुआ था। चौकीदार को शायद गहरी झपकी लग गई थी। वे सब पिल्ले हिम्मत करके अंदर घुसे। उन्हें तीन-चार नकाबपोश विद्यालय के कार्यालय का ताला तोड़ते दिखाई दिए।

पिल्ले समझ गए कि विद्यालय में चोर घुस आए हैं। उन्होंने एक स्वर में जोर-जोर से भौंकना शुरू कर दिया। कुछ अपने मुंह से सोए हुए चौकीदार की पेंट पकड़कर खींचने लगे। चौकीदार जाग गया। उसने भी विद्यालय के अंदर से आती आवाज सुनी। वो 'चोर-चोर' का शोर मचाता कार्यालय की ओर दौड़ा, उसने जोर-जोर से लाठी बजाई। चोर बाहर की तरफ भागने लगे, लेकिन दरवाजे पर पहरेदारी करते वे सारे पिल्ले डटे हुए थे। तभी चौकीदार ने आकर उन चोरों को धरदबोचा। लाठी से उनकी पिटाई की और पुलिस के हवाले कर दिया।

चौकीदार पूरा घटनाक्रम समझ गया था कि उन पिल्लों की वजह से ही चोर पकड़ में आए हैं और वह ये भी जान गया था कि उसकी नौकरी भी इन्हीं पिल्लों के कारण बच गई थी। उस घटना के बाद से सब पिल्ले विद्यालय के उस चौकीदार के मित्र बन गए।

अब चौकीदार उन्हें लाठी से भगाता नहीं था ‍बल्कि प्यार से सहलाता था और उनके लिए अपने घर से रोटी भी लाता था और पिल्लों के लिए सबसे ज्यादा खुशी की बात तो ये हुई थी कि अब विद्यालय के बच्चों की छुट्टी होने के बाद वे बेखौफ होकर मैदान में लगे झूले, फिसलपट्टी और चकरी का मजा लेते थे।

उन्हें समझ में आ गया था कि चोरी से प्राप्त की हुई चीज की बजाए इनाम में मिली वस्तु का आनंद कहीं अधिक होता है। उन्होंने चौकीदार की मदद की थी और बदले में उनके मन की इच्छा पूरी हो गई थी। यही उनका इनाम था।


4) शेर और खरगोश

(Short Stories With Moral Values In Hindi)


एक जंगल में सभी जानवर शेर के आतंक से परेशां थे. शेर हर रोज़ एक जानवर को खा जाता था. एक दिन सभी जानवरो ने सभा बुलाई और विचार किया कि शेर के आतंक से कैसे बचा जाए.

इतने में एक खरगोश आगे आया और कहा “मैं इस समस्या का हल ढूंढ लूंगा, मुझे एक मौका दीजिये”

अगले ही दिन खरगोश शेर के पास गया और उसे कहा “महाराज….सभी जानवर आपको इस जंगल का राजा मानते है लेकिन एक समस्या उत्पन्न हो गयी है.

शेर ने पुछा कि क्या हुआ तो खरगोश ने कहा “महाराज…जंगल में एक और शेर आ गया है और वो कहता है कि आपको मार देगा”

शेर गुस्से में लाल हो गया और खरगोश को कहा “मुझे लेकर चलो उस शेर के पास, मैं आज ही उसे मार दूंगा”

खरगोश गुस्से में लाल उस शेर को एक कुएं के पास ले गया और कहा “महाराज…वो शेर इस कुएं में है”

जैसे ही शेर ने कुएं में झाँका उसे उसकी परछाई दिखी. गुस्से में शेर ने दहाड़ लगायी और कुएं में कूद गया और अपनी जान गवा बैठा।

जंगल के सभी जानवरो ने खरगोश का धन्यवाद किया और फिर सभी शांति से रहने लगे.


5) साधु की साधुता

(Short Stories With Moral Values In Hindi)


पुराने समय की बात है। संत रामदास चाफल से सातारा जा रहे थे। साथ में दत्तूबुवा भी थे।

रास्ते में जाते समय दहेगांव आने पर दत्तूबुवा बोले - महाराज, कुछ खाने की व्यवस्था करने जा रहा हूं।

रास्ते में उन्होंने सोचा कि लौटने में देर हो सकती है, इस कारण वे समीप के खेत से ज्वार के चार भुट्टे तोड़ लाए।

जब उन्होंने भुट्टों को भूंजना शुरू किया तो धुआं निकलता देख खेत का मालिक वहां आ पहुंचा। उसे गुस्सा आया और उसने हाथ के डंडे से रामदास स्वामी को मारना शुरू किया।

दत्तूबुवा के मन में विचार आया कि वे प्रतिकार करें, किंतु रामदासजी ने वैसा न करने का इशारा किया। थोड़ी देर बाद उन्हें गालियां देता हुआ पाटिल लौट गया।

दूसरे दिन वे लोग सातारा पहुंचे। समर्थ रामदास जी की पीठ पर डंडे के निशान देख लोगों में काना-फूसी होनी लगी।

छत्रपति शिवाजी ने जब इस संबंध में स्वामीजी से पूछा, तो उन्होंने पाटिल को बुलवाने को कहा। पाटिल वहां उपस्थित हुआ और जब उसे मालूम हुआ कि जिसे उसने कल पीटा था, वह तो राजा शिवाजी के गुरु थे, तब वह बेहद डर गया कि पता नहीं उसे कौन-सा दंड मिलेगा।

शिवाजी बोले - महाराज, इसे क्या दंड दूं?

तब पाटिल स्वामीजी के चरणों में गिर पड़ा और उसने क्षमा मांगी।

रामदास बोले - राजा, इसने कोई गलत काम नहीं किया है। हमारी मानसिक शांति की परीक्षा पाटिल के अलावा और कोई नहीं कर पाया, इस कारण इसे कीमती वस्त्र देकर इसका सम्मान करना चाहिए। इसका दंड यही है।

शिवाजी को समझते देर नहीं लगी कि साधु और आम आदमी में क्या फर्क होता है। इसीलिए तो कहा जाता है कि साधु अगर अपनी साधुता छोड़ दे तो वह साधु नहीं रह जाता।

अपने गुरु पर शिवाजी को बहुत गर्व हुआ।


6) चमत्कारी थाली

(Short Stories With Moral Values In Hindi)


किसी गांव में साईराम नाम का एक साधु रहा करता था। बड़ा ही भला आदमी था। अपने साथ बुराई करने वालों के साथ भी वो हमेशा भलाई ही करता था। गांव के किनारे एक छोटी सी कुटिया में अकेला ही रहता, अपने घर आने वालों की खूब खातिरदारी करता, ध्यान रखता और अच्छा अच्छा खाना खिलाता था।

गर्मियों के दिन थे, खूब गर्मी पड़ रही थी और लू चल रही थी। एक आदमी दोपहर में कहीं जा रहा था लेकिन ज्यादा गर्मी होने और लू लगने से वह साईराम की कुटिया के बाहर ही बेहोश होकर गिर पड़ा। साईराम ने जैसे ही देखा कि उस की कुटिया के बाहर कोई बेहोश पड़ा है तो वो उसे तुरंत अंदर ले गया और उसकी सेवा में लग गया। पानी पिलाया, सर पर गीला कपड़ा रखा और हाथ के पंखे से काफी देर तक हवा की, तब जाकर उसे होश आया।

होश आने पर उस आदमी ने साईराम से कहा की मैं बहुत भूखा हूँ, कृपया करके कुछ खाने को दे दीजिए। साईराम ने कहा ठीक है मुझे थोड़ा सा समय दीजिए। कुछ ही मिनट में साईराम ने बहुत बढ़िया बढ़िया ताजे पकवान खाने के लिए परोस दिए। उसने ताबड़तोड़ खाना खाया और फटाफट सारे पर पकवान चट कर गया। वह आदमी एक चोर था जो दोपहर में सुनसान देखकर चोरी करने के लिए निकला था। खाना खाने के बाद चोर को इस बात की हैरानी हुई कि साईराम ने इतनी जल्दी खाना कैसे तैयार कर लिया।

उसने साईराम से पूछा – महाराज जी यह बताइए आपने इतने कम समय में खाना कैसे तैयार कर लिया? साईराम ने चोर को बताया कि मेरे पास एक चमत्कारी थाली है। इस थाली की मदद से मैं पल भर में जो भी जी चाहे खाने के लिए बना सकता हूँ। चोर ने हैरान होकर पूछा – क्या आप मुझे वह थाली दिखा सकते हैं? मैं यह सब अपनी आंखों से देखना चाहता हूँ। साईराम अंदर गया, एक थाली लाकर चोर के आगे रखी और कहा – मुझे कैले चाहियें । थाली तुरंत केलों से भर गई। चोर हैरान रह गया और उसके मन में थाली के लिए लालच पैदा हो गया। उसने साधु से पूछा – मान्यवर क्या मैं आज रात आपकी कुटिया में रुक सकता हूं? साधु एकदम से राजी हो गया। जब साधु गहरी नींद में सो रहा था तो चोर ने थाली उठाई और वहां से चंपत हो गया।

थाली चुराकर चोर सोच रहा था कि अब तो मेरी मौज ही मौज है, जो भी जी चाहे थाली से मांग लूंगा। उसने थाली अपने घर में रखी और थाली से कहा मुझे टंगड़ी कबाब चाहिए। मगर थाली में कुछ नहीं आया। फिर उसने कहा मुझे मलाई चाप चाहिए। थाली अभी खाली थी। चोर ने कहा सेब ला के दो। थाली में फिर भी कुछ नहीं आया। चोर को जितनी भी खाने की चीजों के नाम याद थे उसने सब बोल डालें लेकिन थाली खाली की खाली ही रही। चोर तुरंत भागता हुआ थाली लेकर साधु के पास गया और बोला – महात्मा, भूल से मैं आपका बर्तन अपने साथ ले गया। मुझे माफ कीजिए अपना बर्तन वापस ले लीजिए। साईराम बिल्कुल नाराज नहीं हुआ। बर्तन लेकर साईराम ने उसी समय कई अच्छे पकवान बर्तन से देने को कहा और बर्तन में तुरंत वह आ गए। साईराम ने चोर को एक बार फिर बढ़िया खाना खिलाया। चोर फिर हैरान हो गया और अपनी उत्सुकता को रोक नहीं पाया। उसने साधु से पूछा- महाराज जब यह बर्तन मेरे पास था तब इसने कोई काम नहीं किया। मैंने इससे बहुत सारे पकवान मांगे मगर इसने मुझे कुछ नहीं दिया। साधु ने कहा – भाई देखो जब तक मैं जिंदा हूं तब तक यह बर्तन किसी और के काम नहीं आ सकता, मेरे मरने के बाद ही कोई और इसे उपयोग कर पाएगा। बर्तन के चमत्कार का भेद पाकर चोर मन ही मन बहुत खुश हुआ, सोच रहा था कि अब तो मैं इस महात्मा का खात्मा करके बर्तन का फायदा उठाऊंगा।

अगले दिन चोर फिर साधु के घर आया और साथ में घर से खीर बनाकर लाया। वह बोला – महाराज आपने मेरी इतनी सेवा की है। मुझे दो बार बहुत लाजवाब स्वादिष्ट पकवान खिलाए हैं इसलिए मैं भी आपकी कुछ सेवा करना चाहता हूँ।

मैं आपके लिए खीर लाया हूँ। कृपया आप स्वीकार कर लीजिए। साधु ने बिना किसी संकोच के चोर की दी हुई खीर खाई और चोर को धन्यवाद किया। कहा – तुम्हारी खीर बहुत ही स्वादिष्ट बनी है। चोर खीर में जहर मिला कर लाया था। खीर खिलाकर चोर वापस अपने घर चला गया। रात होने पर वापस साधु की कुटिया में आया, थाली को फिर से चुराने के लिए। उसे पक्का यकीन था की जहर से अब तक तो साधु का काम तमाम हो चुका होगा। चोर जैसे ही थाली की ओर बढ़ा तो उसे किसी चीज से ठोकर लगी। आवाज सुनकर साईराम ने आंखें खोली और उठकर चारपाई पर बैठ गया। बोला – कौन है भाई? चोर की हैरानी का तो ठिकाना ही नहीं रहा। वह बड़ी हैरानी से बोला – महाराज आप अभी तक जीवित हैं? साधु बोला – क्यों भाई तुमने यह कैसे सोच लिया कि मैं जीवित नहीं हूँ? चोर ने कहा – मैंने दोपहर में आपको जो खीर खिलाई थी उसमें बहुत तेज जहर मिला हुआ था। मैं तो यही सोच रहा था कि ज़हर के असर से आप मर चुके होंगे। साधु ने कहा – देखो भाई मैं निस्वार्थ भाव से लोगों की खूब सेवा करता हूँ और सच्ची निष्ठा से भगवान का जप भी करता हूँ, साथ ही योगाभ्यास भी करता हूँ। इसलिए मुझे यह आशीर्वाद प्राप्त है की कितना भी तेज जहर क्यों ना हो मैं उसे आसानी से पचा सकता हूँ।

किसी भी जहर का मुझ पर कोई असर नहीं होगा। चोर ने निराश होकर कहा – महाराज मैं तो आपको मार कर आप के पतीले का लाभ लेना चाहता था लेकिन मेरी यह इच्छा पूरी नहीं हुई। संत ने कहा – भाई मैं इसमें क्या कर सकता हूँ, तुम्हारी किस्मत ही अच्छी नहीं है। बोलो अगर भूख लगी हो तो खाने का प्रबंध करूँ? चोर बड़ा शर्मिंदा हुआ, बोला – महाराज मैं तो आपको धोखे से मारना चाहता था मगर फिर भी आपने मुझसे नफरत नहीं की। उल्टा आप तो मेरे साथ बहुत अच्छा व्यवहार कर रहे हैं। यह बात मुझे बहुत ही अजीब सी लग रही है। साधु ने कहा – भाई इसमें क्या अजीब बात है, अच्छाई करना मेरी आदत है बुराई करना तुम्हारी आदत है। तुम बुराई करना नहीं छोड़ पा रहे मैं अच्छाई करना नहीं छोड़ सकता। तुम अपनी आदत से लाचार हो मैं अपनी आदत से लाचार हूँ।


7) भिखारी राजा

(Short Stories With Moral Values In Hindi)


एक राजा था, उसका खज़ाना धन दौलत से भरा हुआ था मगर फिर भी उसका दिल करता था कि उसके पास और भी ज्यादा धन दौलत हो। राजा को शिकार करने का भी बहुत शौक था।

एक दिन राजा अपने सिपाहियों को साथ लेकर जंगल में शिकार करने गया। जंगल बहुत बड़ा था। शिकार करते करते राजा जंगल में बहुत अंदर चला गया। वहाँ उसने एक हिरन देखा। राजा ने अपने घोड़े को हिरन के पीछे दौड़ाया । राजा हिरन का शिकार करना चाहता था। हिरन के पीछे पीछे राजा बहुत दूर निकल गया लेकिन हिरन उसके हाथ नहीं लगा।

कुछ देर बाद राजा रास्ता भटक गया। वो अपने सिपाहियों से भी बिछड़ गया और जंगल में अकेला रह गया। रास्ता ढूंढते ढूंढते रात हो गई। राजा को कुछ भी समझ नहीं आ रहा था कि वो किधर जाए। जंगल में यहाँ-वहाँ भटकते हुए राजा को एक झोपड़ी दिखाई दी। राजा बहुत प्यासा था और उसको बहुत भूख भी लगी थी। वो उस झोपडी की ओर चला, पास जाकर राजा ने देखा की वहाँ एक छोटा सा गाँव था। राजा ने गाँव के किनारे की सबसे पहली झोपड़ी का दरवाजा खटखटाया। अंदर से आवाज आई – “कौन है?” राजा बोला “मैं एक यात्री हूँ और मैं रास्ता भटक गया हूँ, मुझे आज रात के लिए आश्रय चाहिए।” झोपड़ी के अंदर से एक गरीब आदमी बाहर निकला। वो झोपड़ी एक गरीब किसान की थी। किसान की पत्नी ने राजा का स्वागत किया, उसने सोचा की यह कोई रस्ते से भटका हुआ यात्री है और सिर्फ रात बिताने के लिए यहाँ पर रुकना चाहता है। किसान की पत्नी ने राजा को बहुत अच्छे तरीके से ठहराया और खाना खिलाया। किसान और उसकी पत्नी का इतना अच्छा व्यवहार देख कर राजा उनसे बहुत खुश हुआ।

अगले दिन राजा जाने के लिए तैयार हुआ। उसने कहा कि मैं एक राजमहल में काम करने वाला कर्मचारी हूँ। अगर तुम्हे महल में कोई भी काम हो तो ये कागज़ लेलो, इसे जब भी तुम महल में दिखाओगे तो इस कागज़ को देख कर सिपाही तुम्हे राजा से मिलने देंगे और इस देश का राजा तुम्हारी जरूर सहायता करेगा। किसान ने सोचा कि यह जरूर राजमहल में काम करने वाला कोई बड़ा कर्मचारी है। किसान ने कहा “मेरे पास भगवान का दिया बहुत कुछ है, मुझे इस से ज्यादा कुछ नहीं चाहिये।” लेकिन राजा ने फिर भी कहा कि कभी भी तुम्हे जरूरत हो तो तुम राजमहल में जरूर आना।

कुछ सालों के बाद उस गाँव में सूखा पड़ गया, अकाल छा गया और बारिश ना होने के कारण सभी किसानों की फसल सूख गई। किसान भूख प्यास से मरने लगे। संकट के इन दिनों में राजा ने किसानों की कोई मदद नही की। एक दिन बहुत अधिक परेशान हो कर किसान की पत्नी ने किसान को वो कागज़ देकर कहा कि राजा के पास जाओ और कुछ मदद मांगो। किसान जाना नही चाहता था लेकिन गाँव के और लोगों ने भी कहा कि तुम्हे जाना चाहिए और अपने गाँव के लोगों के लिए राजा से मदद मांगनी चाहिए। सब के कहने पर किसान मान गया और राजा के महल पर पहुंचा। महल के बाहर सिपाहियों को किसान ने वो कागज दिखाया, उस कागज़ को देखते ही सिपाहियों ने कहा “आओ भाई आओ आप अंदर आओ”। सिपाहियों ने एकदम से किसान को राजमहल में भेज दिया।

किसान राजमहल के अंदर गया। उस समय राजा राजमहल के मंदिर में था, राजा के सिपाही किसान को वहीं ले गए। मंदिर में किसान ने देखा की राजा झुक कर भगवान् की मूर्ति के आगे पूजा कर रहा था। किसान बड़ा हैरान हुआ की यह तो वही आदमी है जो उसकी झोपडी में एक रात के लिए ठहरा था। किसान सोच रहा था कि अरे ये तो सचमुच राजा ही मेरी झोपडी में आकर ठहरे थे। किसान को तब और भी ज्यादा हैरानी हुई जब उसने देखा कि राजा भगवान् से गिड़गिड़ा कर धन और दौलत की भीख मांग रहा था। राजा भगवान से और भी ज्यादा धन दौलत मांग रहा था। किसान तो वहाँ रुका ही नहीं और एकदम से वापिस लौट गया। राजा प्रार्थना में व्यस्त था। राजा के सिपाहियों ने किसान को रोकने की कोशिश की लेकिन वो नहीं रुका।

राजा को बाद में पता लगा कि वही किसान महल में आया था जिसके घर राजा रात में रुक था लेकिन वो राजा से मिले बिना ही वापिस चला गया। राजा इस बात से बहुत दुखी हुआ और तुरंत रथ में बैठकर किसान के गांव की ओर चल पड़ा। आधे रस्ते में ही राजा को किसान जाता हुआ मिल गया। राजा ने किसान को रोक कर पूछा कि भाई तुम महल से इस तरह मुझ से मिले बिना ही वापिस क्यों लौट आये? किसान ने कहा “महाराज मेरे गांव में अकाल पड़ा हुआ है, गांव के लोग भूखे मर रहे हैं। मैं तो आपसे अपने गांव के लिए मदद मांगने आया था लेकिन मैंने देखा कि आप तो भगवान से और भी धन दौलत मांगने के लिए प्रार्थना कर रहे थे, आप तो खुद भगवान से धन की भीख मांग रहे थे। मैंने सोचा आप तो खुद बहुत बड़े भिखारी हैं, आप मुझे क्या देंगे” यह सुन कर राजा बहुत शर्मिंदा हुआ। राजा को यह भी अहसास हुआ कि वो कितना लालची है, उसकी प्रजा अकाल और भूख से मर रही है और वो उनकी सहायता करने के बजाय भगवान से और भी धन दौलत मांग रहा है। उसने किसान से माफ़ी मांगी और कहा की मैं तुम्हारे गांव के लोगों की सहायता करूँगा और भगवान् से भी धन दौलत मांगने के बजाय अपनी प्रजा के लिए सुख और समृद्धि की प्रार्थना करूँगा।


8) जैसा को तैसा

(Short Stories With Moral Values In Hindi)


एक जंगल में दो दोस्त रहते थे। एक था बगुला और एक थी लोमड़ी।

एक बार लोमड़ी ने बगुले से कहा ” क्यों न हम अपनी दोस्ती को और पक्का करें। चलो आज तुम मेरे घर दावत पर आओ। हम दोनों मिल कर खाना खाएँगे।” बगुला मान गया।

बगुला शाम को लोमड़ी के घर पहुँचा और उसने देखा, मेज पर बड़ी सी प्लेट में खीर रखी हुई है।

लोमड़ी ने उस से कहा ” आओ, मिलकर खीर खाते हैं। ” दोनों ने खाना शुरु किया। लोमड़ी ने झट से सारी खीर खत्म कर दी और बगुला देखता ही रह गया क्योंकि चोंच के कारण वो प्लेट से कुछ भी नहीं खा सका। बगुले को बहुत बुरा लगा लेकिन उसने कुछ नहीं कहा और चुपचाप चला गया।

लोमड़ी सबक सिखाने के लिए बगुले ने अगले दिन लोमड़ी को अपने घर दावत पर बुलाया। लोमड़ी ने भी खुशी खुशी दावत पर आना मान लिया।

और शाम को लोमड़ी पहुँच गयी बगुले के घर दावत खाने। घर में खाने की बहुत ही बढ़िया खुशबू आ रही थी। उसे सूंघ कर तो लोमड़ी के मुँह में पानी आ गया। उसने बगुले से कहा ” दोस्त, बहुत भूख है। चलो खाना खाते हैं। ” बगुला बोला ” हाँ, हाँ ! चलो। “

जब दोनों खाने के लिए बैठे, तो लोमड़ी ने देखा कि खाना तो एक सुराही में है, जिसका मुँह ऊपर से छोटा होता है। बगुले और लोमड़ी ने खाना शुरु किया मगर सुराही के छोटे मुँह के कारण बगुले ने अपनी चोंच से सारा खाना खा लिया और लोमड़ी देखती ही रह गई।

उसे अब यह बात समझ आ गई कि बगुले ने ठीक वैसे ही किया जैसे उसने किया था। लोमड़ी शर्मिन्दा हुई और चुपचाप चली गई।


9) चिड़िया का घोसला

(Short Stories With Moral Values In Hindi)


सर्दियाँ आने को थीं और चिंकी चिड़िया का घोंसला पुराना हो चुका था। उसने सोचा चलो एक नया घोंसला बनाते हैं ताकि ठण्ड के दिनों में कोई दिक्कत न हो।

अगली सुबह वो उठी और पास के एक खेत से चुन-चुन कर तिनके लाने लगी। सुबह से शाम तक वो इसी काम में लगी और अंततः एक शानदार घोंसला तैयार कर लिया। पर पुराने घोंसले से अत्यधिक लगाव होने के कारण उसने सोचा चलो आज एक आखिरी रात उसी में सो लेते हैं और कल से नए घोंसले में अपना आशियाना बनायेंगे। रात में चिंकी चिड़िया वहीँ सो गयी।

अगली सुबह उठते ही वो अपने नए घोंसले की तरफ उड़ी, पर जैसे ही वो वहां पहुंची उसकी आँखें फटी की फटी रही गयीं; किसी और चिड़िया ने उसका घोंसला तहस-नहस कर दिया था। चिंकी की आँखें भर आयीं, वो मायूस हो गयी, आखिर उसने बड़े मेहनत और लगन से अपना घोंसला बनाया था और किसी ने रातों-रात उसे तबाह कर दिया था।

पर अगले ही पल कुछ अजीब हुआ, उसने गहरी सांस ली, हल्का सा मुस्कुराई और एक बार फिर उस खेत से जाकर तिनके चुनने लगी। उस दिन की तरह आज भी उसने सुबह से शाम तक मेहनत की और एक बार फिर एक नया और बेहतर घोंसला तैयार कर लिया।

जब हमारी मेहनत पर पानी फिर जाता है तो हम क्या करते हैं – शिकायत करते हैं, दुनिया से इसका रोना रोते हैं, लोगों को कोसते हैं और अपनी frustration निकालने के लिए न जाने क्या-क्या करते हैं पर हम एक चीज नहीं करते – हम फ़ौरन उस बिगड़े हुए काम को दुबारा सही करने का प्रयास नहीं करते। और चिंकी चिड़िया की ये छोटी सी कहानी हमें ठीक यही करने की सीख देती है।

घोंसला उजड़ जाने के बाद वो चाहती तो अपनी सारी उर्जा औरों से लड़ने, शिकायत करने और बदला लेने का सोचने में लगा देती। पर उसने ऐसा नहीं किया, बल्कि उसी उर्जा से फिर से एक नया घोंसला तैयार कर लिया।

दोस्तों, जब हमारे साथ कुछ बहुत बुरा हो तो हम न्याय पाने का प्रयास ज़रुरु करें, पर साथ ही ध्यान रखें कि कहीं हम अपनी सारी energy; frustration, गुस्से और शिकायत में ही न गँवा दें। ऐसा करना हमें हमारे original loss से कहीं ज्यादा नुक्सान पहुंचा सकता है। और मैं तो ये भी कहूँगा कि अगर कोई बहुत बड़ी बात न हुई हो तो उसे अनदेखा करते हुए अपने काम में पुन: लग जाएं। क्योंकि बड़े काम करने के लिए ये ज़िन्दगी छोटी है, इसे बेकार की चीजों में नहीं गंवाया जाना चाहिए।


10) बदला

(Short Stories With Moral Values In Hindi)


मच्छर परिवार बहुत परेशान था। दिन पर दिन महंगाई बढ़ती जा रही थी और परिवार के सब प्राणी अब तक बेरोजगार थे। आखिर मांग-मांग कर कब तक गाड़ी खिचती। फिर कोई कब तक किसी को देता रहेगा।

मच्छरी ने अपने पति को सलाह दी कि 'क्यों न कोई धंधा चालू कर दिया जाए, बैठे-बैठे कौन खिलाएगा। बच्चे भी बड़े हो रहे हैं। दस बच्चों को मिलाकर हम लोग बारह लोग हैं, धंधा करेंगे तो घर के सब लोग ही व्यापार संभाल लेंगे और नौकरों की भी जरूरत नहीं पड़ेगी।'

'सलाह तो तुम्हारी उचित है परंतु कौन-सा धंधा करें, धंधे में पूंजी लगती है जो हमारे पास है नहीं - मच्छर बोला।

'ऐसे बहुत से धंधे हैं जिसमें थोड़े-सी पूंजी में ही काम चल जाता है। क्यों न हम पान की दुकान खोल लें। पूंजी भी नहीं लगेगी। सुबह थोक सामान ले आएंगे और शाम को बिक्री में से उधारी चुका देंगे।' - मच्छरी ने तरीका सुझाया।

'मगर क्या गारंटी की दुकान चल ही जाएगी?' - मच्छर बोला।

हम लोग पान के साथ तंबाकू, गुटका किमाम इत्यादि सब सामान रखेंगे, इन वस्तुओं की बहुत डिमांड है, बिक्री तो होगी ही।' - मच्छरी बोली।'

'बात तो सही कह रही हो। कल से दुकान प्रारंभ कर देते हैं।' इतना कहकर वह बाजार से दुकान का सब सामान आवश्यकतानुसार ले आया। दुकान चालू कर दी गई। वह और उसकी पत्नी दुकान पर बैठते। बच्चे भी बैठने लगे। बढ़िया पान लगते, तंबाकू और गुटखों के पैकेट बनते और देखते ही देखते दुकान का सारा सामान बिक जाता। मजे से खर्च चलने लगा।

एक दिन मच्छर ने महसूस किया कि उसके बच्चे दिन भर खांसते रहते हैं और कमजोर होते जा रहे हैं। उसने कारण जानने कि कोशिश की तो मालूम पड़ा कि बच्चे जब भी दुकान पर बैठते हैं, लगातार तंबाकू और गुटखा खाते रहते हैं। मच्छर परेशान हो गया। बच्चों को समझाया कि बेटे यह तंबाकू बहुत हानिकारक होती है, अधिक खाने से जान भी जा सकती है। किंतु बच्चे नहीं माने।

'मगर क्या गारंटी की दुकान चल ही जाएगी?' - मच्छर बोला। 
हम लोग पान के साथ तंबाकू, गुटका किमाम इत्यादि सब सामान रखेंगे, इन वस्तुओं की बहुत डिमांड है, बिक्री तो होगी ही।' - मच्छरी बोली।'

'बात तो सही कह रही हो। कल से दुकान प्रारंभ कर देते हैं।' इतना कहकर वह बाजार से दुकान का सब सामान आवश्यकतानुसार ले आया। दुकान चालू कर दी गई। वह और उसकी पत्नी दुकान पर बैठते। बच्चे भी बैठने लगे। बढ़िया पान लगते, तंबाकू और गुटखों के पैकेट बनते और देखते ही देखते दुकान का सारा सामान बिक जाता। मजे से खर्च चलने लगा।

एक दिन मच्छर ने महसूस किया कि उसके बच्चे दिन भर खांसते रहते हैं और कमजोर होते जा रहे हैं। उसने कारण जानने कि कोशिश की तो मालूम पड़ा कि बच्चे जब भी दुकान पर बैठते हैं, लगातार तंबाकू और गुटखा खाते रहते हैं। मच्छर परेशान हो गया। बच्चों को समझाया कि बेटे यह तंबाकू बहुत हानिकारक होती है, अधिक खाने से जान भी जा सकती है। किंतु बच्चे नहीं माने।

11) बेईमानी का फल

(Short Stories With Moral Values In Hindi)


नंदनवन में एक दम सन्‍नाटा और उदासी छाई हुई थी। इस वन को किसी अज्ञात बीमारी ने घेर लिया था। वन के सभी जानवर इससे परेशान हो गए थे। इस बीमारी ने लगभग सभी जानवर को अपनी चपेट में ले लिया था।

एक दिन वन का राजा शेरसिंह ने एक बैठक बुलाई। उस बैठक में वन के सभी जानवरों ने हिस्‍सा लिया। राजा शेरसिंह एक बड़े से पत्थर पर बैठ गया और जंगलवासियों को संबोधित करने लगा। शेरसिंह ने सभी जंगलवासियों को सुझाव दिया कि हमें इस बीमारी से बचने के लिए एक अस्‍पताल खोलना चाहिए। ताकि बीमार जानवरों का इलाज किया जा सके।

इतने में हाथी ने पूछा, अस्‍पताल के लिए पैसा कहां से लाएंगे और इसमें तो डॉक्‍टरों की जरूरत भी पड़ेगी? तभी शेरसिंह ने कहा, पैसा हम सब मिलकर इकटठा करेंगे।

शेरसिंह की बात सुन टींकू बंदर खड़ा हो गया और बोला, महाराज! राजवन के अस्‍पताल में मेरे दो दोस्‍त डॉक्‍टर हैं, मैं उन्‍हें अपने अस्‍पताल में बुला लूगां। टींकू की बात से वन की सभी सदस्‍य खुश हो गए। दूसरे दिन से ही चीनी बिल्‍ली और सोनू सियार ने अस्‍पताल के लिए पैसा इकटठा करना शुरू किया।

सभी जंगलवासियों की मेहनत सफल हुई और जल्द ही वन में अस्पताल बन गया और चलने लगा। टींकू बंदर के दोनों डॉक्टर अस्पताल में आने वाले मरीजों का इलाज करते और मरीज भी ठीक होकर डॉक्टरों को दुआएं देते हुए जाते।

कुछ महीनों तक तो सब कुछ ठीक चलता रहा। परंतु कुछ समय के बाद टीपू खरगोश के मन में लालच आ गया। टीपू ने बंटी खरगोश को बुलाया और कहा यदि हम अस्‍पताल की दवाइयां पास वाले जंगल में बेच देते हैं। जिससे हम दोनों खूब कमाई कर सकते हैं। लेकिन बंटी खरगोश ईमानदार था, उसे टीपू की बात पसंद नहीं आई। बंटी ने उसे सुझाव भी दिया, लेकिन टीपू को तो लालच का भूत सवार था।

टीपू ने कुछ समय तक ईमानदारी से काम करने का नाटक किया। परंतु धीरे-धीरे उसकी बेईमानी बढ़ती जा रही थी। वह अब नंदनवन के मरीजों को कम और दूसरे वन के मरीजों का ज्‍यादा देखता था।

एक दिन टीपू की शिकायत लेकर सभी जानवर राजा शेरसिंह के पास गए। शेरसिंह ने सभी की बात ध्‍यान से सुनी और कहा कि जब तक मैं अपनी आंखों से नहीं देखूंगा, तब तक कोई फैसला नहीं लूंगा। शेरसिंह ने जांच का पूरा काम चालाक लोमड़ी का सौंपा।

दूसरे दिन से ही चालाक लोमड़ी टीपू पर नजर रखने लगी। टीपू लोमड़ी को नहीं जानता था। कुछ दिनों तक लोमड़ी ने नजर रखने के बाद उसे रंगे हाथों पकड़ने की योजना बनाई। लोमड़ी ने इस बात की जानकारी शेरसिंह को दी, ताकि शेरसिंह अपनी आंखों से टीपू को पकड़ सके।

लोमड़ी डॉक्‍टर टीपू के कमरे में गई और बोली, मैं पास वाले जंगल से आई हूं। वहां के राजा की तबीयत काफी खराब है। यदि आपकी दवाई से वह ठीक हो गए तो आपको मालामाल कर देंगे। टीपू को लोमड़ी की बात सुन लालच आ गया। उसने लोमड़ी के साथ अपना सारा सामान उठाया और वन की तरफ निकल गया।

टीपू और लोमड़ी की बात चुपके से राजा शेरसिंह सुन रहे थे। शेरसिंह टीपू से पहले पास वाले जंगल में पहुंच कर लेट गए। वहां पर जैसे ही टीपू खरगोश और लोमड़ी पहुंचे शेरसिंह को देखकर डर गए। टीपू डर के मारे कांपने लगा। क्‍योंकि उसकी लालच का भेद खुल चुका था। टीपू रोते हुए शेरसिंह से माफी मांगने लगा।

राजा शेरसिंह ने गुस्‍से में आदेश सुनाया और कहा कि टीपू की सारी रकम अस्‍पताल में मिला ली जाए और उसे जंगल से मारकर निकाला जाए। शेरसिंह की बात सुन सभी जानवरों ने सोचा कि ईमानदारी में ही जीत है और बेईमानी करने वाले टीपू को अपनी लालच का फल भी मिल गया।


12) ब्राह्मण और साँप

(Short Stories With Moral Values In Hindi)


किसी गाँव में एक ब्राह्मण रहता था। वह आस पास के गाँवों में बीख मांगकर अपना और अपने परिवार का पेट पालता था। एक बार ब्राह्मण को लगने लगा कि उसे बहुत कम भीख मिलती है जिससे उसके परिवार का गुजारा चलना मुश्किल हो रहा है इसलिए उसने सोचा कि उसे राजा से मदद लेनी चाहिए। वो राजदरबार जाने के लिए घर से निकल पड़ा।

जब वो जंगल में से गुजर रहा था तो उसे एक पेड़ के पास एक साँप दिखाई दिया। साँप ब्राह्मण को प्रणाम करके बोला – “हे ब्राह्मण महाराज, आज सुबह सुबह कहां जाने के लिए निकल पड़े?” ब्राह्मण ने अपनी समस्या साँप को बताई और कहा कि मैं राजा से सहायता लेने के लिए जा रहा हूँ। साँप बोला – “हे ब्राह्मण महाराज, मैं तुम्हे एक भविष्यवाणी सुनाता हूँ तुम वो राजा को बता सकते हो, लेकिन मेरी यह शर्त है कि राजा से मिलने वाले धन में से आधा धन तुम मुझे दोगे।” ब्राह्मण ने शर्त मान ली तो साँप ने कहा – “राजा से कहना कि इस साल अकाल पड़ेगा इसलिए प्रजा को बचाने के लिए जो भी उपाय करने हो कर लेना।” ब्राह्मण ने साँप को धन्यवाद दिया और राजदरबार के लिए रवाना हो गया।

अगले दिन ब्राह्मण राजमहल पहुंच गया। दरबान से ब्राह्मण ने कहा कि राजा से कहो एक ब्राह्मण आया है जो भविष्यवाणी करता है। राजा ने ब्राह्मण को राजदरबार में बुलाकर पूछा कि बताओ तुम भविष्य के बारे में क्या जानते हो। ब्राह्मण ने साँप द्वारा की गई भविष्यवाणी राजा को सुना दी। राजा ने भविष्यवाणी सुनी और कुछ धन देकर ब्राह्मण को विदा कर दिया। वापस लौटते हुए ब्राह्मण ने सोचा कि यदि साँप को आधा धन दिया तो उसका धन जल्दी समाप्त हो जाएगा। इसलिए ब्राह्मण रास्ता बदलकर अपने गाँव चला गया। भविष्यवाणी के अनुसार अकाल पड़ा लेकिन राजा ने पहले से ही जानकारी होने के कारण बहुत से इंतेज़ाम कर दिए थे इसलिए प्रजा को कोई समस्या नहीं हुई।

एक साल बीत गया। ब्राह्मण का धन धीरे धीरे खत्म हो गया तो ब्राह्मण पुनः राजा से मदद लेने के लिए चल दिया। रास्ते में उसे फिर वही साँप मिला। अभिवादन करने के बाद साँप ने फिर से ब्राह्मण से कहा कि आधा धन देने की शर्त पर मैं तुम्हे एक भविष्यवाणी सुनाऊँगा, तुम मेरी भविष्यवाणी राजा को बता देना। साँप ने इस बार ब्राह्मण को बताया कि राजा से कहना इस साल भयंकर युद्ध होगा, जो भी तैयारी करनी है कर लो। आधा धन देने का वादा कर साँप से विदा लेकर ब्राह्मण राजदरबार पहुँचा। राजा ने बहुत सम्मान के साथ ब्राह्मण का स्वागत किया और एक और भविष्यवाणी करने के लिए कहा। ब्राह्मण ने कहा कि महाराज इस साल एक बहुत भयंकर युद्ध होगा, जो भी तैयारी करनी हो तो करलो। इस बार राजा ने ब्राह्मण को पहले से भी अधिक धन देकर विदा किया। रास्ते में ब्राह्मण ने सोचा कि यदि साँप मिला तो आधा धन मांगेगा,

इतने सारे धन का आधा मैं उसे क्यों दूँ, क्यों ना साँप को लाठी से मार दिया जाए। हाथ में लाठी लिए ब्राह्मण जब साँप के पास पहुँचा तो साँप खतरा भाँप कर बिल में जाने लगा। ब्राह्मण ने साँप पर पीछे से लाठी का वार किया जिस से साँप की पूँछ कट गई लेकिन साँप जीवित बच गया। साँप की भविष्यवाणी के अनुसार इस साल राजा का पड़ोसी राज्य से भयंकर युद्ध हुआ लेकिन पहले से ही बहुत अच्छी तैयारी होने के कारण राजा युद्ध जीत गया।

डेढ़ दो साल में ब्राह्मण का धन धीरे धीरे खत्म हो गया और उसके सामने फिर धन का संकट खड़ा हो गया। उसने एक बार फिर राजा से मदद लेने की सोची। एक दिन सुबह सुबह राजदरबार जाने के लिए नगर की ओर प्रस्थान किया। जंगल में पहुंचा तो ब्राह्मण साँप के आगे से नजरे झुका कर निकलने लगा। साँप ब्राह्मण से बोला कि हे ब्राह्मण महाराज इस बार मिलकर नही जाओगे? ब्राह्मण कुछ न बोल सका और नजरें नीची करके खड़ा रहा। साँप बोला – “राजा से कहना इस बार राज्य में धर्म की स्थापना होगी, सब अच्छे काम होंगे, राजा और प्रजा सब सुख से रहेंगे। ध्यान रखना जो भी धन मिले उसका आधा मुजे देकर जाना।” ब्राह्मण ने आधा धन देने का वचन दिया और राजदरबार की ओर रवाना होगया।

राजदरबार में पहुंचने पर ब्राह्मण का विशेष स्वागत किया गया। राजा ने पिछली दो भविष्यवाणियों के लिए ब्राह्मण को बहुत बहुत धन्यवाद किया और आने वाले समय के बारे में पूछा। ब्राह्मण बोला – “महाराज इस बार राज्य में धर्म की स्थापना होगी, राजा तथा प्रजा सुख और चैन की ज़िंदगी बिताएंगे, सब लोग अच्छा सोचेंगे और अच्छे काम करेंगे।” राजा ने ब्राह्मण को बहुत सारा धन देकर विदा किया।

गाँव वापस लौटते हुए ब्राह्मण ने सोचा कि जब राजा ने थोड़ा धन दिया तो वो एक साल में समाप्त हो गया, जब ज्यादा धन दिया तो वो डेढ़ दो साल में समाप्त हो गया, साँप से गद्दारी की वो अलग, इस बार मैं साँप का सारा हिसाब कर दूंगा। साँप के पास पहुंच कर ब्राह्मण ने सारा धन वहाँ रख दिया और साँप से तीनों बार का धन लेने के लिए कहा। साँप ने कहा – “ब्राह्मण महाराज जब अकाल पड़ा तो तुम रास्ता बदल कर निकल गए, जब युद्ध हुआ तो तुमने मेरी पूंछ काट दी जिससे मेरा बहुत मजाक उड़ाया गया। अब राज्य में धर्म की स्थापना हो गई है। मैंने भविष्यवाणी की थी कि लोग अच्छे काम करेंगे। तुम भी धर्म के रास्ते पर आगये हो। हम जंगली जानवरों को धन की क्या जरूरत, इस सारे धन को तुम ले जाओ, खुशी से जीवन बिताओ और किसी के साथ कभी भी धोखा मत करो।” साँप को धन्यवाद देकर ब्राह्मण गांव आगया और उसने निर्णय लिया की कभी किसी को धोखा नही देगा।


13) टोटके का इलाज

(Short Stories With Moral Values In Hindi)


एक समय की बात है एक गावो में शादी होकर नयी बहु आई | चारो तरफ ख़ुशी का माहौल था |अब समय था बहु के ग्रहप्रवेश का | उसी समय सास देखती है की एक बिल्ली घर में घुस आई है वो बहु का रास्ता काटने ही बाली थी |

सास थी थोड़े पुराने विचार की उसने एक टोकरी उठाई और उस बिल्ली के उपार डाल दी ताकि बिल्ली बहु का रास्ता न काट सके | बहु ने सास को बिल्ली के उपर टोकरी रखते हुए देख लिया था | समय बीता कुछ समय बाद सास मार गयी | बहु के एक लड़का हुआ | वह अब विवाह लायक होगया | लड़के की शादी की गयी | बहु के ग्रहप्रवेश की बारी आयी | सास ने कहा हमारे यहं रिवाज है जब कोई नयी बहु आती है तो बिल्ली को टोकरी से ढककर बहु का ग्रहप्रवेश होता है | और यह प्रथा बन गई |


14) बन्दर और सुगरी

(Short Stories With Moral Values In Hindi)


सुन्दर वन में ठण्ड दस्तक दे रही थी , सभी जानवर आने वाले कठिन मौसम के लिए तैयारी करने में लगे हुए थे . सुगरी चिड़िया भी उनमे से एक थी , हर साल की तरह उसने अपने लिए एक शानदार घोंसला तैयार किया था और अचानक होने वाली बारिश और ठण्ड से बचने के लिए उसे चारो तरफ से घांस -फूंस से ढक दिया था .

सब कुछ ठीक चल रहा था कि एक दिन अचानक ही बिजली कड़कने लगी और देखते – देखते घनघोर वर्षा होने लगी , बेमौसम आई बारिश से ठण्ड भी बढ़ गयी और सभी जानवर अपने -अपने घरों की तरफ भागने लगे . सुगरी भी तेजी दिखाते हुए अपने घोंसले में वापस आ गई , और आराम करने लगी . उसे आये अभी कुछ ही वक़्त बीता था कि एक बन्दर खुद को बचाने के लिए पेड़ के नीचे आ पहुंचा .

सुगरी ने बन्दर को देखते ही कहा – “ तुम इतने होशियार बने फिरते हो तो भला ऐसे मौसम से बचने के लिए घर क्यों नहीं बनाया ?” यह सुनकर बन्दर को गुस्सा आया लेकिन वह चुप ही रहा और पेड़ की आड़ में खुद को बचाने का प्रयास करने लगा

थोड़ी देर शांत रहने के बाद सुगरी फिर बोली, ” पूरी गर्मी इधर उधर आलस में बिता दी…अच्छा होता अपने लिए एक घर बना लेते!!!” यह सुन बन्दर ने गुस्से में कहा, ” तुम अपने से मतलब रखो , मेरी चिंता छोड़ दो .”

सुगरी शांत हो गयी.

बारिश रुकने का नाम नहीं ले रही थी और हवाएं भी तेज चल रही थीं, बेचारा बन्दर ठण्ड से काँप रहा था, और खुद को ढंकने की भरसक कोशिश कर रहा था.पर सुगरी ने तो मानो उसे छेड़ने की कसम खा रखी थी, वह फिर बोली, ” काश कि तुमने थोड़ी अकल दिखाई होती तो आज इस हालत”

सुगरी ने अभी अपनी बात ख़तम भी नहीं की थी कि बन्दर बौखलाते हुए बोला, ” एक दम चुप, अपना ये बार-बार फुसफुसाना बंद करो ….. ये ज्ञान की बाते अपने पास रखो और पंडित बनने की कोशिश मत करो.” सुगरी चुप हो गयी.

अब तक काफी पानी गिर चुका था , बन्दर बिलकुल भीग गया था और बुरी तरह काँप रहा था. इतने में सुगरी से रहा नहीं गया और वो फिर बोली , ” कम से कम अब घर बनाना सीख लेना.” इतना सुनते ही बन्दर तुरंत पेड़ पर चढ़ने लगा , “भले मैं घर बनाना नहीं जानता लेकिन मुझे तोडना अच्छे से आता है”, और ये कहते हुए उसने सुगरी का घोंसला तहस नहस कर दिया. अब सुगरी भी बन्दर की तरह बेघर हो चुकी थी और ठण्ड से काँप रही थी.


15) यह कैसी मित्रता

(Short Stories With Moral Values In Hindi)


गणेशी के खेत में बने तीन कमरों के घर में चिंकू चूहे ने अपना निवास बना लिया था। घर के ठीक सामने दो-ढाई सौ फुट की दूरी पर एक नीली नदी बहती थी। नदी थी तो पहाड़ी, परंतु मार्च महीने तक उसमें भरपूर पानी रहता था।

बरसात में तो पानी खेत की मेढ़ तक ठहाके लगाकर खेत के घुसने की धमकी देता रहता। चिंकू जब घर में धमा-चौकड़ी करते-करते उकता जाता तो नदी की तरफ दौड़ जाता और किनारे पर बैठकर कल-कल छल-छल करते जल को निहारता रहता। उसे नदी में बहता नीला जल बहुत अच्छा लगता। किनारे पर लगे पेड़ों के वह चक्कर लगाने लगता तो उसे बहुत मजा आता। बरसात के दिनों को छोड़कर रोज वह खाना खा-पीकर नदी के तट पर चला आता।

चूंकि गणेशी बड़ा किसान था। कमरों में गेहूं, चना, चावल जैसे अनाज भरे पड़े रहते। चिंकू छककर भोजन करता, इस कारण उसका स्वास्थ्‍य बहुत अच्छा था।

गणेशी के मुंह से वह अक्सर सुनता रहता था कि यह चूहा अपना माल खा-खाकर कितना मुटा गया है।

यह सुनकर उसकी पत्नी कहती- 'मालिक ने जब हमें दिया है, सब जीवों को खाने दो। खुले रखो दरवाजे घर के, खूब दुआएं आने दो।'

चूहा ये बातें सुनता तो खूब दुआएं देता कि भगवान इनका घर धन-धान्य से सदा भरा रहे। वह सोचता था कि इनका घर भरा रहा तो उसे कभी भूखा नहीं रहना पड़ेगा।

नदी किनारे रेत पर कभी-कभी एक मेंढक मिन्दू धूप सेंकने पानी से बाहर आ जाता था। कुछ दिनों की मेल-मुलाकात से दोनों की पक्की दोस्ती हो गई। अब रोज ही पानी से बाहर आकर मिन्दू चिंकू के साथ रेत में खेलता।

मिन्दू उचक-उचककर कूदता और टर्र-टर्र करता तो चिंकू ताली बजा-बजाकर हंसता। चिंकू जब चिक-चिक की आवाज लगाकर मिन्दू के चक्कर लगाता तो मिन्दू खुशी के मारे चार फुट तक ऊंचा कूद जाता।

वहीं एक पेड़ पर रहने वाला बंदर इन दोनों की मित्रता देखकर बहुत आश्चर्य करता। यह कैसी दोस्ती एक जलचर एक थलचर!

एक दिन वह पेड़ से उतरकर नीचे आया और बोला- 'तुम लोगों की यह बेमेल मित्रता मुझे समझ में नहीं आई।'

चिंकू बोला- 'क्यों बेमेल कैसी? हम लोग मित्र हैं, भाई-भाई जैसे हैं, साथ-साथ रहते हैं, साथ-साथ खाते-पीते हैं, तुम्हें क्या? क्यों जलते हो?'

यह सुनकर बंदर फिर बोला- 'यह कैसी बेमेल मित्रता? मुझको समझ न आई। चूहा और मेंढक कैसे हो सकते हैं भाई-भाई?'

उसकी बातें सुनकर दोनों को बहुत गुस्सा आया।

'जा-जा अपना काम कर। हम लोगों की दोस्ती पक्की है और पक्की ही रहेगी।' चिंकू झल्लाकर बोला।

'अरे भाई तुम ठहरे जाति के चूहे, घर के बिलों में रहने वाले और यह तुम्हारा मित्र पानी में रहने वाला, कीड़े-मकोड़े खाने वाला', बंदर चिढ़कर चिंकू पर जैसे टूट पड़ा।

'अरे जाति और खाने-पीने की वस्तुओं से क्या फर्क पड़ता? दिल मिलना चाहिए बस', मिन्दू ने चिल्लाकर जवाब दिया।

हम दोनों दो शरीर एक जान हैं। क्या इतना काफी नहीं है? सही दोस्ती तो दिल से होती है मेरे भाई। चूहा-मेंढक दोस्त बने तो बोलो क्या कठिनाई?'

'इसका क्या प्रमाण है कि तुम दोनों तन-मन से एक ही हो?' बंदर तो जैसे आज उनके पीछे ही पड़ गया।

'इसमें प्रमाण की क्या बात है? हम दोनों अभी एक-दूसरे को एक रस्सी से बांध लेते हैं', ऐसा कहकर दोनों ने एक-दूसरे को एक रस्सी से बांध लिया।

अब दोनों जहां भी जाते, साथ-साथ जाते। जाना ही पड़ता, क्योंकि बंधे होने की जो मजबूरी थी।

चूहा अपने घर जाता तो मेंढक भी साथ में कूदता जाता। चूहा बिल के भीतर चला जाता और मेंढक बाहर आराम करता। और जब मेंढक नदी किनारे आता और नदी में कूद जाता तो चूहा रेत में किनारे पर चहलकदमी करता रहता। मेंढक नदी में बहुत भीतर तक नहीं जाता था, क्योंकि उसे पता था कि किनारे चिंकू बेचारा बैठा है। उसे स्मरण था कि उसके किसी पूर्वज की लापरवाही से कोई चूहा नदी में डूबकर अपनी जान गंवा चुका था।

एक दिन दोनों नदी किनारे रेत में मस्ती कर रहे थे कि अचानक दो-तीन बच्चे वहां आ धमके और एक बड़ा-सा पत्थर मेंढक पर उछाल दिया। घबराहट में मेंढक नदी में कूद गया और नदी में दूर तक गहरे में चला गया। मेंढक की छलांग रस्सी से ज्यादा लंबी हो जाने से चिंकू नदी में जा गिरा और थोड़ी देर में ही तड़पकर मर गया और पानी के ऊपर उतराने लगा।

तभी अचानक आसमान से एक चील उड़ती हुई आई और मरे हुए चूहे को चोंच में दबाकर उड़ गई। इधर चूहे के साथ रस्सी से बंधा मिन्दू भी साथ में आसमान में झूलने लगा। डर के मारे उसकी भी जान निकल गई।

अचानक ही चील की चोंच से चिंकू छुट गया और दोनों उसी पेड़ के नीचे जा गिरे जिस पर बंदर बैठा था। दोनों की दशा देखकर बंदर जोर से हंसने लगा और बोला-

अलग-अलग जाति के प्राणी, मित्र नहीं बन सकते भाई।

किसी तरह भी चली मित्रता, ज्यादा देर नहीं चल पाई।

परंतु उन दोनों की दोस्ती तो पक्की ही थी। नदी किनारे के पेड़, नदी की रेत और नदी का नील जल- ये सभी साक्षी थे इस बात के और रो रहे थे उनकी मौत पर।

साथ-साथ वे रहे हमेशा, साथ मौत को गले लगाया।

अंत-अंत तक रहे साथ में, अहा! मित्रता धर्म निभाया।

बंदर अभी भी सोच रहा था कि ऐसी मित्रता कितनी उचित थी।


16) प्रेम का रिश्ता

(Short Stories With Moral Values In Hindi)


एक बार तीन वृद्ध पुरूषों ने एक घर के बाहर रात में आसरा लिया। एक महिला अपने घर से बाहर निकली उसने तीनों वृद्ध लोगों को देखा । महिला ने कहा मैं आप लोगों को जानती तो नहीं किंतु मैं सोचती हूं कि आप भूखे हैं !

कृपया अंदर आए और कुछ खा ले । वृद्धों ने कहा हम तीनों साथ – साथ कभी किसी घर में नहीं जाते । महिला ने जानना चाहा ऐसा क्यों ? एक वृद्ध ने समझाया मेरा नाम प्रेम है , दूसरे का नाम सफलता और तीसरे का नाम संपत्ति है । उसने आगे कहा अब आप अपने परिवार के लोगों से पूछ ले कि हम में से आप किसे अंदर बुलाना चाहेंगे ।

महिला ने अंदर जाकर अपने पति से बात कि उसने कहा – हम सब संपत्ति को बुलाते हैं ; उसकी पत्नी ने असहमति जाहिर की तथा कहा – क्यों ना हम सफलता को बुलाएं ? अंत में उनकी बेटी ने सलाह दी क्या प्रेम को बुलाना ज्यादा उचित नहीं होगा ? दोनों ने ही अपनी बेटी की इच्छा का मान रखते हुए हामी भर दी ।

उन्होंने प्रेम कौन है ? कहकर पुकारते हुए , उसे अंदर आने का आग्रह किया । जैसे ही प्रेम ने घर में प्रवेश किया संपत्ति और सफलता भी उसके पीछे – पीछे घर में आ गए । प्रेम ने मुस्कुराते हुए परिवार को कारण समझाया कि जहां प्रेम होता है , वहां सफलता और संपत्ति भी अपने आप आ जाते हैं । परंतु यदि आप संपत्ति या सफलता को बुलाते तो मैं उनके पीछे नहीं आता । जिनके परिवार में प्रेम, और शान्ति होती हैं , उन्हें सफलता और संपत्ति जरूर प्राप्त होता है ।


17) धूर्त मेंढक

(Short Stories With Moral Values In Hindi)


एक बार की बात है कि एक चूहे और मेंढक में गहरी दोस्ती थी| उन दोनों ने जीवन भर एक दूसरे से मित्रता निभाने का वादा किया लेकिन चूहा तो ज़मीन पर रहता था और मेंढक पानी में|

उन्होंने एक दूसरे के साथ रहने की एक तरकीब निकाली| दोनों ने एक रस्सी से खुद को बाँध लिया ताकि हर जगह हम एक साथ जाएँगे और सारे सुख दुख एक साथ भोगेंगे|

जब तक दोनों ज़मीन पर रहे, तब तक तो सब कुछ अच्छा चल रहा था| अचानक मेंढक को एक शरारत सूझी और उसने पास के ही एक तालाब में छलाँग लगा दी| बस फिर क्या था रस्सी से बँधे होने के कारण चूहा भी पानी में गिर गया|

अब चूहा बहुत परेशान था, वह डूब रहा था और बाहर निकलने की कोशिश कर रहा था| लेकिन मेंढक धूर्त था उसने अपने मित्र चूहे को नज़रअंदाज़ करते हुए टरटरते हुए ज़ोर ज़ोर से तैरना शुरू कर दिया|

अब तो चूहे की जान ही निकल गयी वह बड़ी मुश्किल से मेंढक को तालाब के किनारे तक खींच कर लाया|

जैसे ही दोनों ने ज़मीन पर पैर रखा अचानक एक चील आई और चूहे को झपट कर उड़ने लगी अब रस्सी से बँधे होने के कारण मेढक भी पंजे में आ गया उसने छूटने का बहुत प्रयास किया लेकिन रस्सी को तोड़ ना सका और अंत में दोनों को चील ने खा लिया|अब तो चूहे के साथ मेंढक भी बेमौत मारा गया|

इसीलिए कहा जाता है की जो लोग दूसरों का बुरा करते हैं उसके साथ वह भी गड्ढे में गिरते हैं, तो जैसी करनी वैसी भरनी|

आज के दौर में अक्सर ही लोग अपने फायदे के लिए दूसरों के साथ जुड़ जाते हैं और काम निकलने पर किनारा कर लेते हैं| ऐसे में वह अपने साथी के बारे में तनिक भी नहीं सोचते परन्तु आगे चलकर बुरा करने वाले व्यक्ति को उसका परिणाम भुगतना ही पड़ता है|


18) मैना को किसने बचाया

(Short Stories With Moral Values In Hindi)


रात का अँधेरा घना हो चला था। हवा तेज चल रही थी। बादल बिजली और वज्रध्वनि के साथ आने वाली आंधी की चेतावनी दे रहे थे। लगता था जैसे आज जम कर बारिश होगी और खूब ओले पड़ेंगें।

मैना बहुत घबरा गयी थी। अपने घोसले से वो बहुत दूर निकल चुकी थी। समझ में नहीं नहीं आ रहा था कि रात कहाँ गुजारे। उसे किसी पेड़ पर अकेले रहने से डर लगता था।

उड़ते हुए तभी उसकी नज़र एक पेड़ पर पड़ी। उस पेड़ पर बहुत से कौवे बैठे आपस में बातें कर रहे थे। इतने सारे कौवों को देख उसकी जान में जान आयी। सोचा रात यहाँ ही बिता लेती हूँ। फिर क्या था उड़ते हुए वो उस पेड़ पर जा बैठी। बैठते ही उसने कौवों से कहा ” भाईयों, क्या में आज रात आप सब के साथ रह सकती हूँ। ” इतना सुनते ही कौवों के सरदार ने जवाब दिए ” नहीं, ये हमारा पेड़ है। इस पर हमारे सिवाय कोई और नहीं रह सकता। तुम भागो यहाँ से। “
इस तरह का बर्ताव देख मैना बोली ” भाइयों, मैं अकेली किसी कोने में पड़ी रहूँगी और किसी को भी तंग नहीं करूंगी। आप ही सोचो मैं अकेली जान इतनी आँधी भरी रात कहाँ जाऊँगी। “

लेकिन मैना के अनुरोध करने का कोई भी असर उन कौवों पर नहीं पड़ा। ” तुम यहाँ से भाग जाओ नहीं तो हम तुम्हे मार देंगे। ” इतना कह सब मैना की तरफ बढ़ने लगे। बेचारी मैना दर गयी और वहाँ से उड़ने लगी। जाते जाते उसने उन सब कौवों को कहा ” भगवान तुम्हारी रक्षा करे। ” ये सुन सब कौवे हसने लगे और बोले ” जाकर अपने भगवान से बोल वो तेरी रक्षा करें। “

निराश हो मैना वहां से चल दी और पास ही के दुसरे पेड़ पर बैठ गयी। तभी बदल गरजने लगे और ज़ोर से बारिश और आँधी शुरू हो गयी। मैना बुरी तरह से भीड़ गयी और घबरा कर दूसरी डाल पर जा बैठी। उस डाल पर बैठते ही वो टूट गयी। उस खोकली डाल के टूटते ही पेड़ में एक बड़ा सा गड्ढा बन गया। बस फिर क्या था, मैना झट से उस बड़े से गड्ढे में जा छुपी।

कुछ देर बाद बहुत तेज बारिश के साथ मोटे मोटे ओले भी गिरने लगे। तभी उसके कान में कौवों के रोने चिल्लाने की आवाज सुनाई पड़ी। ओले की मार से बहुत से कौवे घायल हो जमीन पर गिर गए, कुछ कौवों की तो मौत भी हो गयी। लेकिन पेड़ के गड्ढे ने मैना की रक्षा की।

सुबह सवेरा हुआ तो बारिश रुक चुकी थी और आस्मां साफ़ हो गया था।

मैना पेड़ के गड्ढे से निकली तो देखा बहुत से कौवे घायल अवस्था में जमीन पर पड़े कराह रहे थे। उनके पास जा मैना बोली ” देखो, भगवान ने मुझे बचा लिया। तुम भी भगवान पर भरोसा रखते तो तुम्हारी ये दुर्दशा ना होती। ” इतना कह मैना अपने घोसले की तरफ उड़ गयी।

दुःख दर्द के समय भगवान् तो हमारी रक्षा करतें ही हैं, लेकिन बुरे समय में हम सबको एक दूसरे का साथ देना चाहिए। यह सोच दूसरों की मदत करो कि हो सकता है कल तुम्हे भी किसी मदत की जरुरत पड़ सकती है।


19) गाय का बटवारा

(Short Stories With Moral Values In Hindi)


गाँव में एक किसान अपने परिवार के साथ रहता था। उसके दो बेटे थे। एक का नाम राधे और दूसरे का श्याम।

परिवार की सारी पूँजी थी एक गाय जिसका दूध बेच कर जो कुछ कमाते बस उसी में गुजरा कर लेते थे। कोई खेत खलिआन तो था नहीं।

राधे तो पिता भक्त और सही रह पर चलने वाला था। लेकिन श्याम आवारा किस्म का लड़का था जो पिता की किसी भी बात की परवा नहीं करता था।

एक दिन श्याम ने अपने पिता से बटवारा करने की बात कही तो पिता और राधे दंग रह गए।

उन्होंने दोनों बेटों को अपने सामने बैठाया और पूछा कि गाय तो एक है फिर बटवारा कैसे हो। राधे तो सीधा सा लड़का था सो चुप रहा।

लेकिन श्याम बहुत ही चालाक था सो बोल पड़ा ” गाय के आगे का भाग राधे का और मेरा पीछे का।”

राधे और पिता चुपचाप मान गए। श्याम बहुत खुश हुआ ये सोच कर की कैसे अपने भाई को उल्लू बनाया।

बटवारे के अनुसार, अगले दिन से राधे सारा दिन गाय को चारा खिलाता, क्योंकि अगला भाग उसका था।

और श्याम, पिछले भाग का मालिक होने की वजह से उस गाय का दूध दोहता और बाजार में बेच देता।

महीने भर ये चलता रहा। महीना ख़तम होने पर जब राधे ने दूध की कमाई से आधा भाग माँगा तो श्याम बोला

” काहे का आधा पैसा, गाए का पिछला भाग मेरा है, उससे जो कमाई होगी वो मेरी।” बेचारा राधे मायूस हो चुप हो गया।

अगले दिन सुबह जब राधे गाय को चारा खिला रहा था तो उसके पिता ने उसके कान में कुछ कहा। उसने सुना और थोड़ा मुस्करा पड़ा।

कुछ देर बाद श्याम बाल्टी ले गाय का दुध दोहने लगा तो राधे ने जोर से गाय के मुँह पर थप्पड़ मारा।

थप्पड़ खा गाय ने जोर से अपने पिछली टाँगो से श्याम को लात मार दी। लात लगने से राधे को चोट तो लगी ही साथ में सारा दूध भी बिखर गया, श्याम चिल्ला उठा ” अबे, राधे क्या पागल हो गया है।” तब राधे ने जवाब दिया

” अरे श्याम, गाय का अगला भाग मेरा है भाई, मैं चाहे जो भी करूँ।”

ये जवाब सुन श्याम शर्मिंदा हुआ। अब सारी बात उसके समझ में आ गयी थी। और उसने पिता और भाई से माफ़ी माँगी।


20) बकरी और लोमड़ी

(Short Stories With Moral Values In Hindi)


एक बार एक लोमड़ी जंगल में घूम रही थी कि वो गलती से एक कुएं में जा गिरी. लोमड़ी काफी देर तक इंतज़ार करती रही और कुछ देर बाद एक बकरी वहां से गुज़र रही थी.

लोमड़ी को कुए में देख बकरी ने पूछा “लोमड़ी बहन तुम कुए में क्या कर रही हो?”

चालाक लोमड़ी ने कहा “जंगल में सूखा पड़ने वाला है और मैं कुएं में इसलिए हूँ ताकि ज़्यादा से ज़्यादा पानी पी सकू”

ये देख बकरी ने भी कुएं में छलांग लगा दी और जैसे ही बकरी ने छलांग लगायी, लोमड़ी बकरी के सिर पर अपना पैर रख कुएं से बाहर आ गयी.

बकरी बेचारी लोमड़ी से मदद मांगती रह गयी लेकिन लोमड़ी वहां से चली गयी.


21) बोलती हुई गुफ़ा

(Short Stories With Moral Values In Hindi)


बहुत दिनों की बात है ,जंगल की एक गुफा में शालू नाम का सियार रहता था । वह खाने की तलाश में दिन में बाहर जाता और रात को वापस आता । उसी जंगल में एक बूढ़ा और कमजोर शेर रहता था । एक दिन शेर शिकार कि तलाश में गुफा के पास पहुंचा ।

शेर ने कहा – अवश्य ही यहां कोई जानवर रहता होगा मैं उसका इंतजार करता हूं यार रात को लौटा उसने सी के पैरों के निशान देखी सियार में जोर से पुकारा मेरी प्यारी गुफा क्या मैं अंदर आ सकता हूं भूखा था उसे लगा शायद गुफा सियार से रोज बात करती हे सीने कहा हां अंदर आ जाओ सी की दहाड़ सुनकर सियार वहां से भाग गया और अपनी जान बचाई ।


22) अनोखी तरकीब

(Short Stories With Moral Values In Hindi)


बहुत पुरानी बात है। एक अमीर व्यापारी के यहाँ चोरी हो गयी। बहुत तलाश करने के बावजूद सामान न मिला और न ही चोर का पता चला। तब अमीर व्यापारी शहर के काजी के पास पहुँचा और चोरी के बारे में बताया। सबकुछ सुनने के बाद काजी ने व्यापारी के सारे नौकरों और मित्रों को बुलाया। जब सब सामने पहुँच गए तो काजी ने सब को एक-एक छड़ी दी। सभी छड़ियाँ बराबर थीं। न कोई छोटी न बड़ी। सब को छड़ी देने के बाद काजी बोला, "इन छड़ियों को आप सब अपने अपने घर ले जाएँ और कल सुबह वापस ले आएँ। इन सभी छड़ियों की खासियत यह है कि यह चोर के पास जा कर ये एक उँगली के बराबर अपने आप बढ़ जाती हैं। जो चोर नहीं होता, उस की छड़ी ऐसी की ऐसी रहती है। न बढ़ती है, न घटती है। इस तरह मैं चोर और बेगुनाह की पहचान कर लेता हूँ।" काजी की बात सुन कर सभी अपनी अपनी छड़ी ले कर अपने अपने घर चल दिए। उन्हीं में व्यापारी के यहाँ चोरी करने वाला चोर भी था। जब वह अपने घर पहुँचा तो उस ने सोचा, "अगर कल सुबह काजी के सामने मेरी छड़ी एक उँगली बड़ी निकली तो वह मुझे तुरंत पकड़ लेंगे। फिर न जाने वह सब के सामने कैसी सजा दें। इसलिए क्यों न इस विचित्र छड़ी को एक उँगली काट दिया जााए।

ताकि काजी को कुछ भी पता नहीं चले।' चोर यह सोच बहुत खुश हुआ और फिर उस ने तुरंत छड़ी को एक उँगली के बराबर काट दिया। फिर उसे घिसघिस कर ऐसा कर दिया कि पता ही न चले कि वह काटी गई है। अपनी इस चालाकी पर चोर बहुत खुश था और खुशीखुशी चादर तान कर सो गया। सुबह चोर अपनी छड़ी ले कर खुशी खुशी काजी के यहाँ पहुँचा। वहाँ पहले से काफी लोग जमा थे। काजी १-१ कर छड़ी देखने लगे। जब चोर की छड़ी देखी तो वह १ उँगली छोटी पाई गई। उस ने तुरंत चोर को पकड़ लिया। और फिर उस से व्यापारी का सारा माल निकलवा लिया। चोर को जेल में डाल दिया गया। सभी काजी की इस अनोखी तरकीब की प्रशंसा कर रहे थे।


23) निर्धन राजा

(Short Stories With Moral Values In Hindi)


भोलू अपने नाम के अनुसार बहुत सीधा और भोला-भाला इंसान था। एक बार भोलू जंगल के रास्ते से जा रहा था। रास्ते में उसे एक सोने का सिक्का पड़ा हुआ दिखाई दिया, उसने वो सिक्का उठा लिया।

न जाने किस बेचारे का सिक्का गिर गया है यहाँ। यह मेरा तो है नही इसलिये मैं इसे नही रख सकता। मैं इसे फेंक भी नही सकता आखिर यह सोना जो है। यही सब सोचता हुआ भोलू अपने रास्ते पर आगे बढ़ा जा रहा था।

थोड़ा आगे चलकर जंगल में एक विशालकाय पेड़ के नीचे आसन्न जमाए एक साधु बाबा माला जप रहे थे। भोलू ने सोचा कि क्यों ना यह सिक्का बाबा को दान में दे दिया जाए। भोलू बाबा के पास गया और बोला की बाबाजी मुझे यह सोने का सिक्का रास्ते में पड़ा हुआ मिला है, मैं आपको यह सिक्का दान में देना चाहता हूँ।

सिक्का देखकर बाबा बोले की बेटा यह सोने का सिक्का हमारे किस काम का। हम साधुओं को धन दौलत से कोई मोह नही, जिसे धन से मोह वो साधु नही। इसे तुम किसी गरीब को देदो ताकि वो अपना और अपने परिवार का पेट भर सके। साधु की बात मानकर भोलू फिर अपने रास्ते पर चल पड़ा।

आगे भोलू ने देखा की किसी राजा की विशाल सेना भारी लाव-लश्कर के साथ बढ़ी जा रही है। उसने एक सैनिक से पूछा कि भाई इतनी बड़ी सेना के साथ महाराज कहाँ जा रहे हैं? सैनिक ने बताया कि हमारे महाराज पड़ोसी देश पर हमला करके उसे लूटने जा रहे हैं।

भोलू राजा के रथ के पास पहुंचा और सोने का सिक्का राजा को देते हुए बोला कि लीजिये महाराज यह सोने का सिक्का आप रख लीजिये। राजा ने हैरान होते हुए भोलू से पूछा कि तुम मुझे यह सिक्का क्यों दे रहे हो? भोलू बोला कि महाराज एक साधु ने मुझे कहा था किसी निर्धन – गरीब को यह सिक्का दे देना।

क्या मैं तुम्हें गरीब लगता हूँ? मैं राजा हूँ। – राजा गुस्से में बिदक कर बोला।
भोलू बोला – महाराज आप यदि अमीर होते तो इतनी बड़ी सेना लेकर पड़ोसी देश को लूटने क्यों जाते? आप अपना खजाना भरने के लिए आक्रमण करेंगे लेकिन इसके लिए दोनों देशों के कितने ही निर्दोष सैनिकों को अपनी जान गंवानी पड़ेगी। कितनी ही विवाहित महिलाएं विधवा हो जाएंगी, माओं से उनके बेटे छिन जाएंगे तथा कितने परिवार बर्बाद हो जाएंगे।
भोलू की बातों का राजा पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। राजा ने अपनी सेना को वापस चलने का आदेश दिया और फिर कभी किसी देश में लूटपाट ना करने का प्रण लिया। इसके बाद राजा ने अपनी सेना का इश्तेमाल सिर्फ प्रजा की रक्षा के लिए तथा आपातकाल स्थितियों से निपटने के लिए ही किया। पड़ोसी देशों पर हमले तथा लूटपाट करने के स्थान पर राजा ने मंत्रियों के साथ मिलकर अपने देश के किसानों, व्यापारियों तथा मजदूरों आदि के लिए कई अच्छी योजनाओं पर काम किया जिससे उसका देश बहुत समृद्ध और खुशहाल होता चला गया।


24) हर जीव का मोल

(Short Stories With Moral Values In Hindi)


एक राजा था, उन्होंने आज्ञा दी कि संसार में इस बात की खोज की जाए कि कौन से जीव-जंतुओं का उपयोग नहीं है।

बहुत खोजबीन करने के बाद उन्हें जानकारी मिली कि संसार में दो जीव 'जंगली मक्खी' और 'मकड़ी' बिल्कुल बेकार हैं।

राजा ने सोचा- क्यों न जंगली मक्खियों और मकड़ियों को खत्म कर दिया जाए। इसी बीच राजा पर एक अन्य शक्तिशाली राजा ने आक्रमण कर दिया। युद्ध में राजा की हार हुई और जान बचाने के लिए उन्हें राजपाट छोड़कर जंगल में जाना पड़ा।

शत्रु के सैनिक उनका पीछा करने लगे। काफी दौड़भाग के बाद राजा ने अपनी जान बचाई और थक कर एक पेड़ के नीचे सो गए। तभी एक जंगली मक्खी ने उनकी नाक पर डंक मारा जिससे राजा की नींद खुल गई।

उन्हें ख्याल आया कि खुले में ऐसे सोना सुरक्षित नहीं है और वे एक गुफा में जा छिपे। राजा के गुफा में जाने के बाद मकड़ियों ने गुफा के द्वार पर जाला बुन दिया।

शत्रु के सैनिक उन्हें यहां-वहां ढूंढते हुए गुफा के नजदीक पहुंचे। द्वार पर घना जाला देखकर आपस में कहने लगे, 'अरे चलो आगे, इस गुफा में राजा आया होता तो द्वार पर बना यह जाला क्या नष्ट न हो जाता।'

भगवान की बनाई दुनिया में हर जीव का मोल है, कब कहां किसकी जरूरत पड़ जाए।

गुफा में छिपा बैठा राजा ये बातें सुन रहा था। शत्रु के सैनिक आगे निकल गए।

उस समय राजा की समझ में यह बात आई कि संसार में कोई भी प्राणी या चीज बेकार नहीं। अगर जंगली मक्खी और मकड़ी न होती तो उसकी जान न बच पाती।


25) राजा और मूर्ख बन्दर

(Short Stories With Moral Values In Hindi)


एक सम्पन राज्य का राजा था जिसको एक बन्दर से गहरा लगाव था। उस राजा ने उस बन्दर को अपना प्रधान सेवक नियुक्त किया। अब बन्दर हर सभा या किसी भी कार्यक्रम में राजा के साथ जाने लगा।

क्योंकि वो राजा का करीबी माना जाता था इस लिए उसके महल में आने जाने पर कोई रोक टोक नहीं थी।

एक बार राज्य सभा से वापिस आकर राजा ने भोजन किया और सुस्ताने के लिए अपने शयन कक्ष में लेट गए। वो लेटे तो बन्दर उनके सिरहाने खड़ा हो पंखे से उन्हे हवा करने लगा। बस फिर क्या था राजा को नींद आ गयी और वो सो गए।

तभी जाने कहाँ से एक मक्खी उड़ती हुई आयी और राजा की नाक पर बैठ गयी। बन्दर ने उसे उड़ा दिया। अभी उड़ाया ही था कि भिनभिनाते हुए फिर से आकर राजा की नाक पर बैठ गयी। बन्दर ने फिर उसे उड़ा दिया। ये सिलसिला काफी देर तक चलता रहा। मक्खी आती और बन्दर उसे भगा देता पर फिर वो आकर बैठ जाती।

आखिर बन्दर को गुस्सा आगया। उसने सोचा ये छोटी सी मक्खी इतने बड़े राजा को चैन से सोने भी नहीं दे रही, क्यों ना इसे मार ही दिया जाए। फिर क्या था, अब बन्दर मक्खी को मरने के लिए कोई हथियार ढूंढ़ने लगा। जब कुछ और नहीं दिखाई नहीं दिया तो सामने पड़ी राजा की तलवार पर उसकी नज़र पड़ी।

बस उसने तलवार उठाई और मक्खी के बैठते ही उस पर जोर से वार कर दिया। मक्खी तो उड़ गयी लेकिन राजा की मौत हो गयी।


26) बिल्ली और इंसान

(Short Stories With Moral Values In Hindi)


एक गांव जंगल के किनारे बसा था। अक्सर गांव वाले जंगल में टहलने को निकल जाया करते थे।

एक दिन एक बुजुर्ग जब जंगल में टहल रहा था तो उसे एक बिल्ली के चिल्लाने की आवाज सुनाई दी। आवाज की तरफ जब वह पहुंचा तो उसने देखा कि एक बिल्ली पेड़ में बने एक बिल में फँस गयी थी। अपने को बाहर निकलने की बिल्ली काफी कोशिश कर रही थी। मगर हर बार विफल हो जाती।

उसे इस तरह बिल में फंसा देख उस बुजुर्ग को उस पर तरस आ गया। उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया ताकि बिल्ली की मदत कर सके। लेकिन बिल्ली ने डर कर उसके हाथ पर पंजा मार दिया। उस बुजुर्ग के हाथ पर काफी खरोंच लगी। लेकिन उसने फिर से अपना हाथ आगे बढ़ाया ताकि किसी तरह वह बिल्ली को बाहर निकल सके। लेकिन बिल में फँसी बिल्ली बहुत ही घबराई और डरी हुई थी। डर कर बिल्ली ने फिर उस बुजुर्ग के हाथ पर पंजा मार दिया। दो तीन बार ऐसा हुआ, बूजुर्ग हाथ बढ़ाता और बिल्ली पंजा मार देती।

एक दूसरा आदमी पास ही खड़ा यह सब हैरानी से देख रहा था। उसने उस बुजुर्ग से कहा कि तुम इसे इसके हाल पर छोड़ दो, नहीं तो ये तुम्हे इसी तरह पंजा मारती रहेगी।

लेकिन उस बुजुर्ग ने आदमी की बातों को अनसुना कर फिर कोशिश की। किसी तरह उसने उस बिल्ली को बाहर निकल दिया। बिल्ली की तो मानो जान में जान आयी। बिल से बाहर निकलते ही वो भाग जंगल में गायब हो गयी। 
बिल्ली को छुड़ा वह बुजुर्ग उस आदमी के पास गया और बोला

” बिल्ली का तो स्वभाव ही पंजा मारना है। लेकिन इंसान के स्वभाव में दया और सहानुभूति होती है।” ” उस बिल्ली ने अपना स्वभाव दिखाया और मैंने अपना।”

किसी के साथ अपनी प्रकृति के अनुसार व्यवहार करो, ना की उसकी प्रकृति के अनुसार। हमें दूसरों के प्रीति दया और सदभावना से भरा बर्ताव करना चाहिए।


27) पड़ोसन का बर्तन

(Short Stories With Moral Values In Hindi)


एक बार एक औरत ने अपनी पड़ोसन से एक बर्तन उधार मांगा और दूसरे दिन उसने एक अन्य छोटे से बर्तन के साथ वह बर्तन वापस कर दिया । पड़ोसन को आश्चर्य हुआ उसने उससे पूछा कि , वह छोटा बर्तन कहां से आया ? औरत ने जवाब दिया – तुम्हारे बड़े बर्तन ने छोटे बर्तन को जन्म दिया है । उस औरत ने सोचा कि उसकी पड़ोसन का दिमाग घूम गया है , उसने उसे कुछ नहीं कहा । क्योंकि वह एक और बर्तन पाकर बहुत खुश थी ।

कुछ दिनों बाद पड़ोसन बर्तन फिर उधर मांगा । मगर इस बार उसने बर्तन अपनी पड़ोसन को वापस नहीं किया । सहेली के बर्तन वापस मांगने पर उसने कहा – बर्तन ! तुम्हारा बर्तन मर गया है । पड़ोसन ने हंसकर उससे पूछा कि बर्तन कैसे मर सकता है ? इस पर उस औरत ने बड़ी चतुराई से कहा – अगर तुम्हारा बर्तन , दूसरे बर्तन को जन्म दे सकता है तो , मर भी सकता है । यह सुनकर पड़ोसन दंग रह गई । मगर अब उस पड़ोसन के पास बर्तन को खो देने के अलावा कोई दूसरा चुनाव नहीं था ।

अनेकों बार हम छोटे से लाभ के लिए अपने आप को मुसीबतों में डाल लेते हैं । अतः हमें तात्कालिक लाभ नहीं देखते हुए किसी विषय पर विस्तार पूर्वक सोचना चाहिए, कि क्या गलत है और क्या सही।


28) मकडू भेड़िया और गबरू शेर

(Short Stories With Moral Values In Hindi)


एक वन में गबरू नामक तेजतर्रार शेर रहता था। सियार पंजू और भेड़िया मकडू उसके आज्ञाकारी सेवक थे। दुर्भाग्यवश एक दिन शेर ने एक ऊंटनी का शिकार किया। जो गर्भवती थी। शेर ने जैसे ही उसका पेट फाड़ा, पेट फटते ही उसका बच्चा बाहर निकल आया।

बच्चे को देखकर गबरू शेर का दिल भर आया। उसके मन में ऊंटनी के बच्चे के प्रति स्नेह, प्यार-दुलार उत्पन्न हुआ तो वह बच्चे को अपने घर ले आया और उसका नाम शंकु रख उसका पालन-पोषण करने लगा। समय जैसे-जैसे बीतता गया वैसे ही गुजरते वक्त के साथ-साथ ऊंटनी का बच्चा हष्टपुष्‍ट जवान हो गया।

फिर एक दिन शाम के वक्त संयोगवश शेर का हाथी से सामना हो गया। गुर्राए हाथी ने अपने दांतों से प्रहार कर शेर को इतना घायल कर दिया कि वह उठने-बैठने, यहां तक कि चलने-फिरने और शिकार करने में भी असमर्थ हो गया।

इस तरह कई दिन बीत गए। भूख से व्याकुल शेर ने एक दिन अपने सेवकों से कहा - मेरे प्यारे साथियों, वन में जाकर किसी ऐसे पशु को खोज लाओ, जिसका शिकार मैं इस असहाय अवस्था में भी कर सकूं।

अपने स्वामी की आज्ञा का पालन करते हुए सेवक वन के एक कोने से दूसरे कोने तक भटकते रहे, परंतु उन्हें ऐसा कोई पशु नहीं मिला, जिसका शेर बैठे-बैठे ही शिकार कर सके।

सेवक निराश होकर लौटे, और अपनी असफलता की कहानी शेर को सुनाई।

दूसरे दिन मकडू ने पंजू से कहा - अगर इस प्रकार भूखे रहें, तो एक दिन हम सभी मर जाएंगे।

मेरे दिमाग में एक योजना है, अगर हमारे स्वामी शेर उसे कार्यरूप देने को तैयार हो जाए तो। उसने आगे कहा - यदि शंकु का वध कर दिया जाए, तो कुछ दिनों के भोजन की व्यवस्था हो सकती है।

अपने साथी की योजना का समर्थन करते हुए पंजू ने कहा - तुम ठीक कहते हो मकडू भाई, इसके सिवा हमारे पास कोई और चारा भी तो नहीं है। तब तक शायद हमारे स्वामी भी पुन: स्वस्थ होकर शिकार करने लग जाए।

लेकिन इतना कह कर मकडू के चेहरे पर गंभीरता छा गई।

पंजू बोला - लेकिन क्या? आपका सुझाव तो उत्तम है।

मकडू ने निराश स्वर में कहा - यहां स्थिति तो हमारे अनुकूल दिखाई दे रही है, मगर शेर ने शंकु का वध करने से इनकार कर दिया तो।

पंजू बोला - इस बात को तो मैं भी अच्छी प्रकार समझता हूं, लेकिन परिस्थिति भूखे-प्यासे को सबकुछ करने पर विवश कर देती है।

इस प्रकार सोच-विचार करने के बाद दोनों शेर के पास गए और बोले - राजन! यदि आपको अपने प्राण प्यारे है तो शंकु के वध का प्रस्ताव स्वीकार कर लीजिए, वर्ना भूखे-प्यासे रहने के कारण आप और हम दोनों भी यमलोक का प्रस्थान कर जाएंगे।

शेर ने बेहद धीमे स्वर में कहा - यदि शंकु स्वेच्छा से आत्मसमर्पण करने को तैयार होता है तो मैं उसके वध के प्रस्ताव पर विचार कर सकता हूं। अगर वह ऐसा नहीं करना चाहेगा तो मैं भूख से तड़प-तड़पकर मर जाऊंगा, लेकिन उसका वध नहीं करूंगा।

शेर की अनुमति मिलते ही दोनों के चेहरे पर लालच भरी मुस्कान दौड़ गई। वे शंकु के पास गए और चिंतित मुद्रा में कहने लगे - देखो मित्र! हमारे स्वामी कई दिनों से भोजन न मिलने के कारण इतने असमर्थ हो गए है कि वह उठ-बैठ भी नहीं सकते। हम स्वामी के हित की सोच कर ही तुम्हें आत्मसमर्पण के लिए कह रहे हैं।

शंकु ने सहज भाव से उत्तर दिया - बंधु! अगर स्वामी के लिए मैं कुछ भी कर सका तो मैं अपने आपको भाग्यशाली समझूंगा।

मकडू ने पुन: कहा - इस समय स्वामी के प्राणों पर संकट आ पड़ा है। तुम अपने शरीर को समर्पित करके स्वामी के प्राणों की रक्षा कर सकते हो।

शंकु ने गर्दन हिलाते हुए अपनी स्वीकृति दी और कहा - मैं हर प्रकार से तैयार हूं। फिर दोनों शंकु को शेर के पास ले गए।

शेर के पास पहुंच कर शंकु ने अपने निवेदन में कहा - स्वामी! मैं अपने धर्म का पालन करने के लिए तैयार हूं। यह जीवन आपका ही दिया हुआ है। आप मेरे प्राण को लेकर अपनी और अपने सेवकों के प्राणों की रक्षा करें।

शंकु की स्वीकृति मिलते ही दोनों ने उस ऊंट को फाड़ डाला। शंकु के वध के बाद शेर ने मकडू से कहा- मैं नदी में स्नान करके आता हूं, तब तक तुम इस मांस की देखभाल करना।

शेर के जाते ही मकडू सोच में पड़ गया, कि कोई ऐसी युक्ति निकाली जाए, जिससे सारा मांस मुझे अकेले को ही मिल जाए।

उसने कुछ देर सोचने के बाद अपने साथी पंजू से बोला- मित्र, तुम तो बहुत ज्यादा भूख से पीड़ित नजर आ रहे हो इसलिए जब तक स्वामी लौट कर नहीं आते, तुम इस बढ़िया मांस का आनंद प्राप्त कर लो। स्वामी के आने पर मैं उनसे निपट लूंगा।

भूखे पंजू ने जैसे ही मांस खाने के लिए मुंह खोला मकडू उस पर टूट पड़ा और उसे भी फाड़ डाला। फिर मकडू दोनों के मांस को लेकर वन में दूसरी ओर चला गया। शेर ने आकर दोनों को ढूंढा मगर कोई भी नहीं मिला। शेर को अपने ‍किए पर काफी पछतावा हुआ और दुखी मन से उसने अपने प्राण त्याग दिए।


29) तोते और पेड़ की दोस्ती

(Short Stories With Moral Values In Hindi)


एक बार जंगल में एक शिकारी शिकार की तलाश में घूम रहा था। शिकारी को थोड़ी दूर हिरनों का एक झुंड दिखाई दिया, उसने अपने जहर वाले बाण से एक हिरन पर निशाना साधा और बाण चला दिया। शिकारी का निशाना चूक गया जिससे हिरन तो बच गया लेकिन जहर वाला बाण एक बड़े पेड़ के तने में जा लगा। बाण में इतना अधिक जहर था कि उसके असर से कुछ ही दिनों में पेड़ की सारी पत्तियां झड़ने लगीं और पेड़ सूख गया।

उस पेड़ पर एक तोता बचपन से रहता था, तोते का जन्म भी इसी पेड़ पर हुआ था। तोते को इस पेड़ से बहुत अधिक लगाव था। पेड़ के सूखने पर भी तोता उसे छोड़ कर किसी दूसरे पेड़ पर नही गया। सूख जाने के कारण इस पेड़ में बहुत अधिक गर्मी रहने लगी थी तथा खाने के लिए फल भी नहीं थे इस वजह से पेड़ के साथ साथ तोता भी सूखने लगा। इतने कष्ट सहने पर भी तोता अपने प्रिय पेड़ को छोड़कर कहीं नहीं गया।

बादलों के भगवान इंद्र ने देखा कि एक इतना छोटा सा तोता अपने बचपन के साथी पेड़ के लिए इतने कष्ट सह रहा है तो भगवान इंद्र एक ब्राह्मण के रूप में उसके पास आए और बोले – “अरे छोटे से प्यारे पंछी तुम इस सूखे हुए मृत पेड़ पर बैठे रहते हो, ना तो इसमें छाया के लिए पत्तियां हैं और ना ही खाने के लिए फल। इतना बड़ा जंगल है और तुम तो उड़ भी सकते हो तो तुम क्यों नहीं किसी दूसरे पेड़ पर जाकर रहते। तुम दूसरे पेड़ों की छाया में आराम से रह सकते हो, फल भी खा सकते हो।” तोता एक गहरी लम्बी सांस लेकर बोला – “मैंने इस पेड़ पर ही जन्म लिया है और इसी पेड़ पर खेल कूद कर मैं बड़ा हुआ हूँ। जब यह पेड़ हरा भरा था तो इसने बड़े प्यार से अपने संरक्षण में मुझे रखा। मुझे धूप की गर्मी से बचाया, शिकारियों के हमले से बचाया और खाने के लिए मीठे फल भी दिये। जो कुछ भी इसके पास था इसने सब मुझे दिया, कभी किसी चीज के लिए मना नहीं किया। मैं इस पेड़ के सहारे ही जिंदा रहा, अब मैं इसके साथ ही मर जाना चाहता हूँ।”

भगवान इंद्र तोते की बातों से बहुत अधिक प्रभावित हुए और बोले कि प्यारे पंछी तुम मुझसे कोई वर मांग सकते हो। तोता बोला कि प्रभु मैं तो उस समय की प्रतीक्षा कर रहा हूँ जब पेड़ पौधों को जीवनदान देने वाला जल बरसेगा, बारिश होने से यह मेरा प्रिय मित्र पेड़ शायद फिर से हरा भरा हो जाए, अगर ऐसा नहीं हुआ तो मैं भी यहीं बैठे बैठे अपने प्राण त्याग दूंगा। यह सुनते ही भगवान इंद्र की आज्ञा से आसमान में काले बादल घिर आए और खूब तेज बारिश होने लगी जिससे सूखते हुए पेड़ में नया जीवन आ गया। कुछ ही दिनों में पेड़ फिर से खूब हरा भरा हो गया।


30) मेरी छात्रा

(Short Stories With Moral Values In Hindi)


बात पुरानी हो चली है। उन्नीस सौ चौहत्तर ईसवीं में कठिघरा नाम के गांव में एक नई शिक्षिका आई। हमेशा वह समय से विद्यालय आती। विद्यालय में कई बच्चे स्कूल आना छोड़ रहे थे। सबकी सूची बनाकर वह बच्चों के घर संपर्क साधने लगी। वह चाहती थी कोई बच्चा शिक्षा से वंचित न हो। कुछ बच्चे मार की डर से विद्यालय छोड़ रहे थे।

अध्यापकों का उस समय का प्रसिद्ध फॉर्मूला था 'या तो पढ़ाई छोड़ दोगे या पढ़ने लगोगे'।

नई शिक्षिका ने बच्चों को पढ़ाने का विधिवत प्रशिक्षण प्राप्त किया था। वह अन्य अध्यापिकाओं से भिन्न थी। धीरे-धीरे बच्चों के मन का भय निकलने लगा। बच्चे अपनी नई अध्यापिका की सब बात मानने लगे।

विद्यालय का वातावरण बहुत हद तक बदल चुका था। अन्य चार अध्यापिकाओं से बच्चे थोड़ा-बहुत डरते से थे। अध्यापिका सत्यभामा की मेहनत से पूरे गांव के लोग काफी प्रभावित थे।

सत्यभामा पहले इमिलिया और अढ़ौरी गांव में तैनात रही थी। वहां के गांव के लोग और बच्चे बार-बार उस सत्यभामा के पुनः तैनाती करवाने का संदेश भेजते। वहां के बच्चे अब भी उस महान शिक्षिका की याद में आंसू न रोक पाते।

कठिघरा गांव में लगभग सब लोग खेतिहर और मजदूर थे। स्कूल के पास में एक गहरा तालाब था। एक दिन इंटरवेल की घंटी लगी तो रोज की तरह आज भी बच्चे खेलने के लिए भाग खड़े हुए। सत्यभामा ने उच्च स्वर में आदेशित किया 'धीरे से निकलिए भागिए नहीं, नहीं तो चोट लग सकती है'।

भले ही सत्यभामा बच्चों को मारती-पीटती न हो, पर बच्चे फिर भी उसकी सारी बात मानते थे। सब बच्चे अनुशासन के साथ कक्षा से बाहर निकले। एक बच्चा फिर भी बहुत तेज भागा।

सत्यभामा ने उससे कहा- अभी आओ, तुमको ठीक करती हूं। इतना सुनते ही वह बच्चा भी अनुशासन में आ गया। यद्यपि वह जानता था कि वह किसी को पीटती नहीं। शेष अध्यापिकाएं अपने घर से लाए भोजन को करने में और बातचीत में मशगूल हो गईं।

सत्यभामा नए पाठ को कैसे पढ़ाया, इस तैयारी में जुट गई। कुछ देर बाद उसने परीक्षा की शेष कॉपियां जांचने का काम शुरू किया। कक्षा एक के दो बच्चे अचानक कक्षा में घुसे और आपस में बातें करने लगे।

एक ने कहा- बहनजी से मत बताना। सत्यभामा अनजान बनकर उनकी बातें सुन रही थीं। दूसरी बोली- हां बोदिका (स्याही की दवात) में पानी डालने गई थी, डूब गई। यह सुनते ही सत्यभामा की सारी कॉपियां बिखरती चली गईं। पेन उंगलियों में दबा रह गया और वह भाग खड़ी हुई।

तालाब के पास जाकर देखा तो बच्ची के एक हाथ ऊपर पानी आ चुका था। जान की परवाह छोड़ वह तालाब में कूद गई। तालाब गहरा था। मिट्टी निकाले जाने की वजह से यह किनारों पर से ही गहरा होता चला गया था। सारे बच्चे अपनी प्रिय अध्यापिका के पीछे दौड़ पड़े। सभी अध्यापिकाओं ने देखा कि सत्यभामा ने बहुत बड़ा खतरा मोल ले लिया है।

गांव के लोग भी कोहराम सुन जमा होने लगे। सत्यभामा उस बच्ची को पकड़ने के लिए आगे बढ़ रही थी। वह बिलकुल असावधान थी और बेपरवाह भी। बच्ची गहरे तालाब के मध्य खिंची जा रही थी। प्राणरक्षा को धीरे-धीरे हाथ-पैर चला रही थी।

सत्यभामा की नाक तक पानी आ चुका था, लेकिन वह उस छात्रा को पकड़ने में सफल हो गई। अब वह उसे हाथों से ऊपर उठाकर किनारे की तरफ बढ़ रही थी। बिना भय के पानी में छलांग लगाने वाली वह अध्यापिका अब सतर्कता से बाहर आ रही थी।

गांव के लोग और सारा विद्यालय पसरे सन्नाटे के साथ भयभीत होकर तमाशा देख रहे थे। किनारे आकर उसने बच्ची को बाहर की तरफ फेंका और फिर बड़ी मुश्किल से खुद बाहर आई। उसके मुंह से कुछ उल्टी कराई। चारों तरफ उस अध्यापिका की बहादुरी के किस्से शुरू हो गए।

जिसकी बिटिया बची थी, वे ठाकुर थे। पूरी ठाकुर बिरादरी के लोग इकट्ठा थे।

शिक्षिका ने बेटी के सर पर बड़े प्यार से हाथ फेरते हुए पूछा- कहां गई थीं, वह बोली- मामा के घर।

शिक्षिका ने उसे प्यार से देखकर प्रसन्न भाव से कहा- हम्म, फिर उसे गले लगा लिया और पीठ थपथपाकर उत्साह दिया ताकि वह तनिक भय महसूस न करे।

वह एक अच्छे शिक्षक की भांति उसके मनोभावों को समझ रही थी। फिर अचानक उसकी निगाह छात्रा की मां पर गई। उसने उससे कहा- वो देखो मां रास्ता देख रही है। बच्ची की मां लगातार आंसू बहाए चली जा रही थी। गांव वालों ने उसे पुरस्कृत करने का फैसला किया।

जैसे ही प्रस्ताव अध्यापिका के पास आया, वह बोली- कर्तव्यों के निर्वहन का पुरस्कार नहीं लिया जाता। मेरी छात्रा को ईश्वर ने जीवनदान दिया, यह मेरे लिए एक बड़ा और अनमोल पुरस्कार है।

गांव का कोई व्यक्ति उस आदर्श अध्यापिका के शब्दों के आगे न बोल सका। उनके मन में 'अध्यापिका' शब्द के प्रति अगाध सम्मान पैदा हो चुका था।

'अध्यापिका' शब्द की सच्ची परिभाषा को सभी जीवित रूप में देख रहे थे।


31) साधू और अहिंसा

(Short Stories With Moral Values In Hindi)


एक राजा था। उसके राज्य में चारों ओर सुख शान्ति थी। उसकी प्रजा भी बहुत मेहनती थी और सभी लोग अपना अपना काम बहुत अच्छे से करते थे।

एक बार उस देश में एक साधु सन्यासी आया। वो साधु बहुत मीठी मीठी बातें करता था। उसकी बातों में ऐसा जादू था कि उसके उपदेश सुनकर लोग मन्त्र मुग्ध हो जाते थे। साधु सबको कहता की हिंसा पाप है, जीव हत्या करने से नरक मिलता है। उसने लोगों को कहा की मोह माया को छोड़कर सदा भगवान के भजन करो और अपने भाग्य पर भरोसा रखो, भगवान सबको देता है। साधु ने कई कीर्तन मंडलियां बना लीं। सारे राज्य में दिन रात भजन कीर्तन होने लगा। लोग साधु के ऐसे भक्त्त बन गए की सारा दिन उसके पास बैठे रहते और अपने काम काज में बहुत कम रूचि लेने लगे। इस तरह उस देश का उत्पादन बहुत कम होगया और देश की प्रगति रुक गई। लोग भूल गए की सिर्फ धर्म का पालन करने से कुछ नहीं होता, काम करना भी बहुत जरूरी होता है।

राजा को यह सब देख कर बहुत चिंता होने लगी। उसका राज्य कमजोर होता जा रहा था। लोगों के दिल में अपने देश की रक्षा की भावना भी खत्म हो गई थी। इन सब बातों का फायदा उठा कर पड़ोसी राजा ने जस देश पर हमला कर दिया।

राजा ने अपनी प्रजा से कहा कि हम सब को दुश्मन से मुकाबला करना चाहिए। लेकिन लोग तो साधु के उपदेश सुन सुन कर अहिंसावादी हो गए थे। उनके दिमाग में यह बात पूरी तरह बैठ गई थी की हमें किसी को मारना नहीं चाहिए। कोई भी युद्ध करने के लिए तैयार नही था। राजा अपने देश की रक्षा करना चाहता था। उसने अपनी प्रजा के सब लोगों को समझाया कि अहिंसा बहुत अच्छी बात है लेकिन अगर तुम हमेशा ही अहिंसा अहिंसा करोगे तो तुम्हारे साथ ही हिंसा हो जाएगी, शत्रु तुम्हे मार डालेगा और हमारा देश गुलाम बन जाएगा। लेकिन राजा की बात किसी ने नही मानी।

शत्रु आगे बढ़ा आ रहा था और राजा हर कीमत पर अपने देश को बचाना चाहता था। राजा ने साधु को सबक सिखाने और लोगों को सुधारने का एक तरीका सोचा। राजा के महल में एक छोटा सा चिड़ियाघर था और एक भयंकर शेर भी पिंजरे में बंद था। राजा ने अपने दो विश्वासपात्र सैनिकों को अपने साथ लेकर शेर को चुपचाप उसी जंगल में ले जाने को कहा जहां साधु तपस्या करता था और लोगों को उपदेश देता था। वहाँ दो मोटे मोटे तने के पेड़ एक साथ थे इन दोनों पेडों के बीच बहुत कम खाली स्थान था। इतना कम खाली स्थान था की उनके बीच से शेर की पूँछ निकाली जा सकती थी लेकिन शेर नही निकल सकता था। राजा ने शेर का पिंजरा दोनों पेड़ों के साथ लगवाया और शेर की पूंछ पिंजरे के पीछे के दरवाजे से दोनों पेड़ो के बीच से निकाल ली और उसे मजबूती से पकड़ लिया। राजा ने सैनिकों से कहा कि वो आगे से पिंजरा खींच कर ले जाएं। सैनिकों ने पिंजरा हटा लिया। राजा शेर की पूंछ को पकड़े खड़ा था। 

सैनिक अपने राजा को ऐसी स्थिति में छोड़ कर जाना नही चाहते थे लेकिन राजा ने उन्हें जाने का आदेश दिया और कहा कि यह बात किसी को मत बताना कि शेर की पूंछ मैंने पकड़ी हुई है। सैनिक चले गए। राजा अपने पैर जमाये शेर की पूंछ को मजबूती से पकड़े खड़ा था। शेर की दहाड़ से राजा के प्राण सूख जाते लेकिन राजा ने पूँछ को नही छोड़ा।

सवेरा होते ही साधु वहाँ आया। राजा तो उसी की प्रतीक्षा में था। साधु को देखते ही राजा ने कहा – “साधु महाराज जी, में इधर से जा रहा था ये शेर अचानक मुझ पर झपटा, मैंने किसी तरह पेड़ों की आड़ लेकर इस शेर की पूंछ पकड़ ली और अपनी जान बचाई। अब मैं इस पूँछ को पकड़े पकड़े बहुत थक गया हूँ और ये शेर मेरे हाथ से छूटते ही मुझे खा जायेगा, आप तुरंत इसे मार डालो और मेरी जान बचाओ।” साधु बोला – “महाराज ये तो बड़ी अजीब समस्या है, परंतु मैं शेर को नहीं मार सकता, जीव हत्या करना पाप है।” राजा ने अपने गुस्से को नियंत्रित करते हुए कहा – “अच्छा तो आप इतना करें कि थोड़ी देर शेर की पूंछ को पकड़ लें तो मैं शेर को मार दूंगा, पूँछ पकड़ने में तो कोई पाप नहीं है।” पूँछ पकड़ने में तो कोई पाप नहीं था इसलिए साधु ने राजा की तरह पैर जमाकर पेडों के पीछे से शेर की पूंछ पकड़ली। राजा ने अपने हाथ हटा लिए और दूर खड़ा हो कर थोड़ा आराम किया। इतने में साधु का उपदेश सुनने के लिए साधु के भक्त भी वहाँ आने शुरू हो गए। साधु चिल्लाया – “राजन शेर मेरे हाथों से छूटा जा रहा है और मैं थक गया हूँ। 

ये तो छूटते ही मुझे खा जायेगा, जल्दी से इसे मारो।” अब राजा मुस्कुराने लगा और बोला – “साधु महाराज जी, आपकी तो यह शिक्षा है की जीव हत्या करना पाप है तो इस शेर को मार कर इसकी हत्या करने का पाप मैं अपने सर क्यों लूँ?” लेकिन साधु जोर जोर से रोने लगा, गिड़गिड़ाने लगा और बोला – “कोई मुझे बचाओ, कोई मुझे बचाओ” जब साधु बहुत जोर से रो रहा था तो राजा ने शेर को मार डाला। साधु ने राजा के पांव पकड़ लिए। अब तो बात साधु को भी समझ में आगई और प्रजा को भी समझ आगई। सभी को यह बात समझ में आगई कि हिंसा करना पाप है लेकिन जब कोई मजबूरी हो तो हिंसा करना भी जरूरी होता है।

अब सारी प्रजा मिलकर दुश्मन देश से युद्ध करने के लिए तैयार हो गई और राजा ने प्रजा की मदद से युद्ध जीत कर अपने राज्य और प्रजा को बचा लिया।


32) कंजूस मक्खीचूस

(Short Stories With Moral Values In Hindi)


गांव का एक किसान बहुत धनी था। खेत खलिहान से कमाई बहुत अच्छी करता था। मगर जब कहीं पैसे खर्च करने की बात होती तो अपनी गरीबी का रोना रो देता। यहाँ तक कि उसके घर वाले भी उससे परेशान थे। अच्छा खाना, अच्छा पहनना, कहीं दूसरे शहर घूमने या किसी मेले में जाना उसे फिजूलखर्ची लगती थी।

जितना भी कमाता उसे अपने संदूक में बंद कर के रख देता। उसे बस एक ही शौक था, हर रात सोने से पहले जमा किए धन को गिनना और फिर से उन्हें संदूक में बंद करना।

महीनों, सालों बीत गए मगर उसकी कंजूसी में कोई फर्क नहीं आया। और न ही फर्क आया उसकी रोज़ रूपए गिनने की आदत में।
एक रात बहुत ज़ोरदार बारिश के बाद बिजली बंद हो गयी। सारा गांव अन्धकार में डूब गया। काफी देर तक लोग गर्मी से परेशान हो अपने घरों के बाहर बैठे रहे। मगर आखिर कब तक अपनी नींद को रोक पाते। सो धीरे-धीरे सब सोने चले गए।

इस धनी किसान का भी नींद से बुरा हाल था मगर वो इंतज़ार कर रहा था बिजली के वापिस आने का। आखिर उसे सोने से पहले अपनी जमा धनराशि को गिनना जो था। जब काफी रात बीत गयी और बिजली आने के कोई आसार नहीं लग रहे थे तो वो भारी मन से उठा और अपने कमरे में जा पहुंचा।

पलंग पर लेट तो गया मगर धयान उसका रुपयों की तरफ ही लगा रहा। इधर उधर करवटें बदलता रहा मगर नींद तो तो उससे कोसों दूर थी। आखिर जब बेचैनी बहुत बढ़ गयी तो वो उठा और संदूक को अपनी तरफ खींचा और उस पर हाथ फेरने लगा। जैसे कोई किसी अपने दुलारे को सेहला रहा हो।

फिर भी मन की बेचैनी दूर न हुई तो उसने अँधेरे में ही उस संदूक का ताला खोला और रुपयों के बंडलों पर हाथ रख बैठ गया। मानो रुपयों के दिल की धरकन सुन रहा हो। रुपयों पर हाथ रख उसे कुछ चैन महसूस हुआ। रहत तो मिली मगर उसकी बेचैनी तो उन्हें गिनने से ही दूर हो सकती थी।

नींद से आंखें बोझल हो रही थी मगर रुपयों के बंडल उसे अपने आगोश में बुला रहे थे। तभी बहार जोर से बिजली गर्जी और उस बिजली के प्रकाश में उसकी नज़र रुपयों पर पड़ी तो उसके दिमाग में विचार आया कि क्यों न मोमबत्ती जला कर रुपयों को गिन लूँ। ये बात सोचते ही वो उठा और जाकर रसोईघर से मोमबत्ती और दियासलाई उठा लाया।

मोमबत्ती को रोशनी जब रुपयों पर पड़ी तो उसके मन को कुछ आराम मिला। उसने रुपयों को गिनना शुरू कर दिया। आधी नींद में होने के कारण जब गिनती पूरी हुई तो रूपए उसे कम लगे। बेचैनी छोड़ अब उसे परेशानी होने लगी। सो उसने रूपए दोबारा गिनना शुरू किया और तब तक गिनता रहा जब तक उसे सही रकम का पता नहीं चल गया।

गिनती पूरी होते-होते सवेरा होने लगा था। नींद से बुरा हाल था मगर उसके चेहरे पर एक राहत और संतुष्टि की आभा झलक रही थी। और उसी आनंदित और इच्छा अनुकूल अवस्था में वो गहरी नींद सो गया।
निंद्रावस्था में भी वो रुपयों को गिनता रहा। रूपए गिनना उसके मन को ठंडक पहुंचा रहे थे मगर तभी सपने में उसे कुछ गर्मी सी महसूस हुई। गर्मी के साथ सांस लेने में भी तकलीफ होने लगी तो झट से उसकी नींद टूट गयी।

आँखें मलता हुआ उठा तो सामने पड़े सक्न्दूक में लगी आग पर उसकी नज़र गयी। हे राम! ये क्या हो गया। रुपयों से भरा संदूक जल कर राख हो गया था। सारे जीवन की जमा की हुई पूंजी को राख की तरह पड़े देख उसकी अंतरात्मा तक काँप उठी, दिल की धड़कनें थमने सी लगी, आंखें तो मानो पथरा सी गयी थी।

सन्दूक से उठते धुंए को देख गाँव वाले भी इकठ्ठा हो गए। संदूक के पास जल रही मोमबत्ती ने सारा हाल बयान कर दिया। नींद से बोझल किसान रूपए गिनने के बाद मोमबत्ती बुझाना भूल गया था।

सबने मिल कर उस जलते संदूक को बाहर फेंका और किसान को कमरे से बाहर खुली हवा में ले गए।

बाहर खुली हवा ने किसान को कुछ राहत सी मिली तो अपनी लुटी पूँजी को याद कर उसकी आंखों से आँसुओं का सैलाब उमर पड़ा। रोते, चिल्लाते, छाती पीटते वो अपनी पूँजी को याद करने लगा। तब गाँव के एक बुजुर्ग ने उसे समझाया कि रूपए तब तक पूँजी कहला सकते हैं जब आप उनका प्रयोग करें। बंद संदूक में तो वो मात्र कागज के टुकड़े ही ह।


33) सच्ची ईश्वर भक्ति

(Short Stories With Moral Values In Hindi)


एक यहूदी पुजारी थे-रबी बर्डिक्टेव। लोग उन्हें अत्यंत श्रद्घा एवं भक्ति भाव से देखते थे। वहां मंदिर को सैनेगाग कहा जाता है। यहूदी पुजारी प्रतिदिन सुबह सैनेगाग जाते और दिनभर मंदिर में रहते। सुबह से ही लोग उनके पास प्रार्थना के लिए आने लगते। जब कुछ लोग इकट्ठे हो जाते, तब मंदिर में सामूहिक प्रार्थना होती।

जब प्रार्थना संपन्न हो जाती, तब पुजारी लोगों को अपना उपदेश देते। उसी नगर में एक गाड़ीवान था। वह सुबह से शाम तक अपने काम में लगा रहता। इसी से उसकी रोजी-रोटी चलती।

यह सोचकर उसके मन में बहुत दुख होता कि मैं हमेशा अपना पेट पालने के लिए काम-धंधे में लगा रहता हूं, जबकि लोग मंदिर में जाते हैं और प्रार्थना करते हैं। मुझ जैसा पापी शायद ही कोई इस संसार में हो।

यह सोचकर उसका मन आत्मग्लानि से भर जाता था। सोचते-सोचते कभी तो उसका मन और शरीर इतना शिथिल हो जाता कि वह अपना काम भी ठीक से नहीं कर पाता। इससे उसको दूसरों की झिड़कियां सुननी पड़तीं।

जब इस बात का बोझ उसके मन में बहुत अधिक बढ़ गया, तब उसने एक दिन यहूदी पुजारी के पास जाकर अपने मन की बात कहने का निश्चय किया।

अतः वह रबी बर्डिक्टेव के पास पहुंचा और श्रद्घा से अभिवादन करते हुए बोला- 'हे धर्मपिता! मैं सुबह से लेकर शाम तक एक गांव से दूसरे गांव गाड़ी चलाकर अपने परिवार का पेट पालने में व्यस्त रहता हूं। मुझे इतना भी समय नहीं मिलता कि मैं ईश्वर के बारे में सोच सकूं। ऐसी स्थिति में मंदिर में आकर प्रार्थना करना तो बहुत दूर की बात है।'

पुजारी ने देखा कि गाड़ीवान की आंखों में एक भय और असहाय होने की भावना झांक रही है। उसकी बात सुनकर पुजारी ने कहा-' तो इसमें दुखी होने की क्या बात है?'

गाड़ीवान ने फिर से अभिवादन करते हुए कहा- 'हे धर्मपिता! मैं इस बात से दुखी हूं कि कहीं मृत्यु के बाद ईश्वर मुझे गंभीर दंड ने दे। स्वामी, मैं न तो कभी मंदिर आ पाया हूं और लगता भी नहीं कि कभी आ पाऊंगा।'

गाड़ीवान ने दुखी मन से कहा- 'धर्मपिता! मैं आपसे यह पूछने आया हूं कि क्या मैं अपना यह पेशा छोड़कर नियमित मंदिर में प्रार्थना के लिए आना आरंभ कर दूं।' पुजारी ने गाड़ीवान की बात गंभीरता से सुनी।

उन्होंने गाड़ीवान से पूछा- 'अच्छा, तुम यह बताओ कि तुम गाड़ी में सुबह से शाम तक लोगों को एक गांव से दूसरे गांव तक पहुंचाते हो। क्या कभी ऐसे अवसर आए हैं कि तुम अपनी गाड़ी में बूढ़े, अपाहिजों और बच्चों को मुफ्त में एक गांव से दूसरे गांव तक ले गए हो?'

गाड़ीवान ने तुरंत ही उत्तर दिया- 'हां धर्मपिता! ऐसे अनेक अवसर आते हैं। यहां तक कि जब मुझे यह लगता है कि राहगीर पैदल चल पाने में असमर्थ है, तब मैं उसे अपनी गाड़ी में बिठा लेता हूं।'

पुजारी गाड़ीवान की यह बात सुनकर अत्यंत उत्साहित हुए। उन्होंने गाड़ीवान से कहा- 'तब तुम अपना पेशा बिलकुल मत छोड़ो। थके हुए बूढ़ों, अपाहिजों, रोगियों और बच्चों को कष्ट से राहत देना ही ईश्वर की सच्ची प्रार्थना है। जिनके मन में करुणा और सेवा की यह भावना रहती है, उनके लिए पृथ्वी का प्रत्येक कण मंदिर के समान होता है और उनके जीवन की प्रत्येक सांस में ईश्वर की प्रार्थना बसी रहती है।

मंदिर में तो वे लोग आते हैं, जो अपने कर्मों द्वारा ईश्वर की प्रार्थना नहीं कर पाते। तुम्हें मंदिर आने की बिलकुल जरूरत नहीं है। सच तो यह है कि सच्ची प्रार्थना तो तुम ही कर रहे हो।' यह सुनकर गाड़ीवान अभिभूत हो उठा। उसकी आंखों से आंसुओं की धारा बह चली। उसने पुजारी रबी बर्डिक्टेव का अभिवादन किया और काम पर लौट गया।


34) आनंद का त्योहार होली

(Short Stories With Moral Values In Hindi)


चिंटू अपने पापा के साथ कॉलोनी में होली खेलने निकल रहा था तभी मम्मी और पापा में बहस शुरू हो गई।

मम्मी गुस्से से बोली- पहले गंवारों की तरह एक-दूसरे को बेदर्दी से रंग लगाओ, फिर घंटों शरीर पर साबुन लगाकर उसे साफ करना यह कौन-सी बुद्धिमानी है? आप जाइए और हुड़दंगबाजी कीजिए, पर मैं चिंटू को नहीं जाने दूंगी!'

पापा उन्हें समझाने का प्रयत्न कर थे किंतु मम्मी अपनी उसी बात पर जोर दिए जा रही थीं।

चिंटू हाथ में पिचकारी पकड़े, उदास गैलरी में खड़ा सोच रहा था कॉलोनी के सारे लोग एक-दूसरे पर रंग डाल रहे हैं, गले मिल रहे हैं और मम्मी इसे गंवारों का त्योहार मान रही है। मम्मी को रंग नहीं खेलना हो तो वे न खेलें, पर मुझे तो पापा के साथ जाने दें.!

कॉलोनी के कुछ लड़के-लड़कियां ढोल की धुन पर नाचते-गाते आ रहे थे। उस शोरगुल से मम्मी-पापा की बहस रुक गई। कुछ देर बाद उन दोनों का ध्यान गैलरी की ओर गया।

जमीन पर चिंटू की पिचकारी पड़ी थी पर वह वहां नहीं था। मम्मी गैलरी की ओर दौड़ पड़ी। उनके पीछे-पीछे पापा भी वहां आ गए।

उन्होंने देखा कि सड़क पर चिंटू मस्ती से झूम रहा है ढोल की थाप पर नाच रहा है. लड़के-लड़कियां उसके चारों ओर गोला बनाकर खड़े हैं और तालियां बजा रहे हैं। वह दृश्य देखकर उनका मन आनंदित हो उठा था। दोनों एक पल के लिए भूल गए कि पिछले पंद्रह मिनट से उनके बीच बहस छिड़ी हुई थी!

नाचते-नाचते चिंटू का ध्यान गैलरी की ओर चला गया। वहां मम्मी को खड़ा देखकर उसके थिरकते हुए हाथ-पांव एकाएक रुक गए। वह घर की ओर दौड़ पड़ा।

चिंटू घर में प्रवेश करते ही आश्चर्यचकित रह गया। मम्मी के हाथ में उसकी पिचकारी थी। वे पापा को रंग रही थीं और पापा उनके हाथ से पिचकारी छीनने का प्रयास कर रहे थे। पिचकारी जमीन पर गिर पड़ी। चिंटू ने उसे उठाया और मम्मी पर रंग डालने लगा।

पिचकारी का रंग खत्म होते ही पापा बोले- 'बेटा! तुझे धन्यवाद जो काम मैं वर्षों से नहीं कर पाया, वह आज तुमने कर दिखाया। तुमने मम्मी को सिखा दिया कि होली कितने आनंद का त्योहार है!' यह सुनकर मम्मी मुस्कुरा रही थी और चिंटू का चेहरा चमक उठा था।


35) दो बिल्लियाँ और बन्दर

(Short Stories With Moral Values In Hindi)


दो बिल्लियां एक केक के लिए लड़ रही थी. एक बोल रही थी कि मैं ज़्यादा खाउंगी और दूसरी बोल रही थी कि मैं ही ज़्यादा खाउंगी. पेड़ पर एक बन्दर ये सब देख रहा था. बिल्लियों को लड़ता देख कर बन्दर नीचे आ गया और बिल्लियों को कहा “मेरे पास तुम्हारी परेशानी का हल है. मैं इस केक के दो बराबर टुकड़े कर देता हूँ, इस तरह तुम्हे लड़ने की ज़रूरत नहीं, दोनों को बराबर आ जायेगा”

बिल्लियां बन्दर की इस बात पर राज़ी हो गयी. बन्दर चालाक था, उसने केक के दो टुकड़े किये लेकिन फिर अचानक बोला ” अरे…इस बार केक बराबर नहीं कटा. मैं ऐसा करता हूँ थोड़ा केक खा लेता हूँ ताकि दोनों टुकड़े बराबर हो जाए.”

बन्दर ऐसे करते करते पूरा केक खा गया और अंत में बिल्लियां एक दूसरे का मुंह तांकती रह गयी।


36) सनकी राजा

(Short Stories With Moral Values In Hindi)


बहुत पुरानी बात है, किसी देश में एक राजा राज करता था। उसका नाम सुन्दर सिंह था। वैसे तो सुन्दर सिंह के पास प्रजा की भलाई के लिए बहुत काम थे, जैसे की तालाब खुदवाना, धर्मशालाएं बनवाना, दुष्टों को दण्ड देना आदि आदि। लेकिन राजा सुन्दर सिंह ये सब काम न करके फ़ालतू की बातें ज्यादा सोचता था जैसे एक बार उसने अपने मंत्री को आज्ञा दी की राज्य के छोटे छोटे तालाबों में जितनी भी मछलियां हैं उन सभी को इकटठा करके एक बड़े तालाब में छोड़ दिया जाए। मंत्री बेचारा कह भी क्या सकता था, राजा का सेवक जो ठहरा। पूरे एक महीने की कड़ी मेहनत के बाद यह काम पूरा हो सका।

मंत्री ने सेनापति से मुलाकात करके सारी बात बताई। सेनापति ने राज्य के सारे मंत्रियों को बुलाकर सबके साथ एक बैठक की। सभी ने निर्णय लिया की राजा को सबक सिखाना चाहिए, राजा अपनी मूर्खता से धन और श्रम का दुरूपयोग करता है। इतना धन और श्रम व्यर्थ न करके सही जगह उपयोग किया जाए तो इससे प्रजा को बहुत लाभ होगा।

दो महीने बाद राजा ने सेनापति को बुलाकर आदेश दिया की पूरे राज्य में जो तीन सबसे बड़े मूर्ख हों उन्हें एक महीने के अंदर दरबार में पेश किया जाए। राजा ने कहा – “ध्यान रखना सेनापति जिन तीन मूर्खों को तुम लाओगे उनसे बड़ा कोई मूर्ख राज्य में ढूंढने से भी नहीं मिलना चाहिए। अगर तुमने तीन सबसे बड़े मूर्खों को पेश नहीं किया तो तुम्हे मृत्युदंड दिया जाएगा।” “परंतु उन तीन मूर्खों का आप करेंगे क्या महाराज?” – सेनापति ने पूछा। “अरे करेंगे क्या, उन तीन मूर्खों को हम महामूर्ख की उपाधि देकर सम्मानित करेंगे। उन्हें बहुत धनदौलत और एक एक प्रान्त भी देंगे।” – राजा ने बहुत घमंड से कहा। सेनापति मूर्खों की तालाश में चल दिया। वो मन ही मन सोचता जा रहा था की अबकी बार तो राजा को सबक सिखाना ही पड़ेगा। राजा की मूर्खता भरी बातों से किसी ना किसी तरह पीछा छुड़ाया जाए।

बीस पच्चीस दिन बाद सेनापति वापस लौटा और सीधा राजदरबार में जा पहुंचा। दरबार लगा हुआ था। सभी मंत्री दरबार में उपस्थित थे। सेनापति को देखते ही राजा सुन्दर सिंह ने पूछा – ” कहिये सेनापति जी, क्या आपकी खोज पूरी हो गई?” सेनापति ने झुक कर प्रणाम करते हुए कहा – “जी महाराज” और अपने पीछे खड़े हुए एक आदमी की ओर इशारा किया। “तो ये हैं हमारे राज्य के सबसे बड़े मूर्ख” – राजा ठहाका लगाकर हँसते बुए बोला। “सुनाईये इन्होंने क्या मूर्खता का काम किया है” – राजा ने कहा। सेनापति बताने लगा – “महाराज इस आदमी का परिवार भूख से बिलख रहा है, बच्चे रो रहे हैं, इसकी पत्नी हड्डियों का ढांचा बन गई है मगर फिर भी यह कुछ काम नहीं करता। इससे किसी ने यह कह दिया की देवी जब तुमसे खुश होगी तो तुमपर धन दौलत की बारिश होगी। बस फिर यह एक साल से सारा काम छोड़कर देवी को खुश करने में लगा रहा। पर काम न करने वाले की तो किसी भी देवी देवता ने कभी कोई मदद नहीं की है, इसको धन कैसे मिलता। ना धन की बारिश होनी थी और ना हुई। एक साल तक काम न करने से इसके घर का सारा सामान भी बिक गया और इसके परिवार के पास खाने को भी कुछ नही रहा। एक महीने पहले इस मूर्ख ने किसी को कहते सुना की रूपया रुपये को खींचता है।

बस फिर क्या था, इसने तुरंत एक साहूकार के यहां नौकरी करली। जब भी यह खाली होता जेब से रूपया निकाल कर तिजोरी के छेद में लगाने लगता क्योंकि इसको पूरा विस्वास है की एक ना एक दिन इसका रूपया तिजोरी के रुपयों को जरूर खींच लेगा। इस चक्कर में इसके काफी रुपये हाथ से छुटकर तिजोरी में गिर चुके हैं।”

सेनापति की बातें सुनकर सारे दरबारी जोर जोर से हंसने लगे। राजा ने तुरंत अपने गले से बहुत कीमती रत्नों का हार निकालकर उस मूर्ख को पहना दिया। सभी को उत्सुकता होने लगी की देखें दूसरा और तीसरा मूर्ख कौन है?

तभी राजा ने आदेश दिया – “अब दूसरे मूर्ख को पेश किया जाए”। झिझकते हुए सेनापति बोला – “महाराज हमारे राज्य के दूसरे और तीसरे मूर्ख दरबार में ही उपस्थित हैं।” “हमारे दरबार में?” – राजा ने हैरान होकर पूछा “कौन हैं वो? ” “महाराज मैं उनका नाम नहीं ले सकता, वो मुझे मरवा देंगे” – सेनापति बोला। “अरे मेरे होते हुए तुम अपने प्राणों की चिंता मत करो, बिलकुल निडर होकर बताओ” – राजा ने कहा। सेनापति बोला – “महाराज बुरा न मानें तो राज्य के दुसरे मूर्ख आपही हैं।” राजा ने गुस्से में भरकर पूछा – “इस बात का क्या मतलब है?” सेनापति बोला – “मतलब बिलकुल साफ़ है। जो राजा विद्वानों की खोज ना कराकर मूर्खों की खोज करवाए, विद्वानों को इनाम ना देकर मूर्खों को इनाम दे तो उसे क्या कहा जाएगा?” “और तीसरा मूर्ख कौन है ?” – राजा ने पूछा। सेनापति बोला “वो तो मैं ही हूँ जो मूर्खों को ढूंढने निकला। क्यों ना मैंने यह काम करने से पहले अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया। मूर्ख स्वामी की सेवा करने वाले सेवक भी धीरे धीरे मूर्ख ही बनजाते हैं।” – सारे दरबारी सेनापति की बात से सहमत थे।


37) दो मुँह वाली चिड़िया

(Short Stories With Moral Values In Hindi)


नंदन वन में एक नन्हीं चिड़िया रहती थी जिसके दो मुँह थे। दो मुँह होने के कारण वह चिड़िया दूसरे पछियों से बिल्कुल विचित्र दिखती थी। वह चिड़िया एक बरगद के पेड़ पर घौंसला बना कर रहती थी।

एक दिन वह चिड़िया जंगल में भोजन की तलाश में इधर उधर उड़ रही थी। अचानक चिड़िया के दायें वाले मुँह की नजर एक लाल फल पर पड़ी। देखते ही उसके मुँह में पानी आ गया और वह तेजी से वो लाल फल खाने को आगे बढ़ी।

अब चिड़िया का दायाँ मुँह बड़े स्वाद से वो फल खा रहा था। बायाँ मुँह बेचारा बार बार दाएं मुंह की तरफ देख रहा था कि ये मुझे भी खाने को दे लेकिन दायाँ वाला चुपचाप मस्ती से फल खाये जा रहा था।

अब बाएँ मुँह ने दाएँ वाले से प्रार्थना की, कि थोड़ा सा फल खाने को मुझे भी दे दो तो इसपर दाएं मुंह ने गुस्सा दिखाते हुए कहा – कि हम दोनों का पेट एक ही है। अगर मैं खाऊँगा तो वो हमारे पेट में ही जायेगा। लेकिन उसने बाएं वाले को कुछ खाने को नहीं दिया।

अगले दिन चिड़िया फिर से जंगल में खाने की तलाश में उड़ रही थी। तभी बाएं मुँह की नजर एक अदभुत फल पर पड़ी जो बहुत चमकीला था। वह तेजी से उस फल की तरफ लपका। अब जैसे ही वो फल खाने को हुआ तुरंत पास बैठे एक कौए ने चेतावनी दी कि इस फल को मत खाओ ये बहुत जहरीला है।

ये सुनकर दायाँ मुंह भी चौंका और बाएं से प्रार्थना की कि इस फल को मत खाओ ये हमारे लिए बहुत खतरनाक साबित होगा लेकिन बाएं मुंह को तो दाएं से बदला लेना था।

उसने एक ना सुनी और चुपचाप वह फल खाने लगा। कुछ ही देर में चिड़िया का शरीर मृत होकर जमीन पर गिर पड़ा।


38) खारा समुंदर

(Short Stories With Moral Values In Hindi)


एक बार एक गांव में दो भाई रहते थे । बड़े भाई के पास एक साधू द्वारा दिया गया एक बर्तन था । वह एक जादूई बर्तन था , जो अपने मालिक की सारी इच्छाएं पूरी चलता था । बड़ा भाई जो कुछ माँगता ,बर्तन उसकी सारी जरुरते पूरी करता था । छोटे भाई को बड़े भाई से जलन होने लगी एक रात वह जादुई बर्तन को चुरा कर , एक नाव में सवार होकर समुद्र के रास्ते भाग निकला ।

उसने बर्तन से जो कुछ भी माँगा जादुई बर्तन ने उसे दिया । आखिर उसे रास्ते में भूख लगी जादूई बर्तन ने लजीज व्यंजनों की थाली उसके सामने रख दी । जब उसने खाना शुरू किया भोजन में नमक कम था । उसने बर्तन से नमक की मांग की, बर्तन से नमक निकलना शुरू हुआ लेकिन नमक निकलता ही रहा, बंद करने का मंत्र उसे नहीं आता था ।

नाव में नमक भर गया और समुद्र में डूब गया ।कहते हैं आज भी उस बर्तन से नमक निकल रहा है इसलिए समुन्दर का पानी खारा होता है ।


39) भेड़िया और पिल्ला

(Short Stories With Moral Values In Hindi)


एक बार की बात है कि एक कुत्ते का पिल्ला अपने मालिक के घर के बाहर धूप में सोया पड़ा था। मालिक का घर जंगल के किनारे पर था। अतः वहां भेड़िया, गीदड़ और लकड़बग्घे जैसे चालाक जानवर आते रहते थे।

यह बात उस नन्हे पिल्ले को मालूम नहीं थी। उसका मालिक कुछ दिन पहले ही उसे वहां लाया था। अभी उसकी आयु भी सिर्फ दो महीने थी।

अचानक एक लोमड़ वहां आ निकला, उसने आराम से सोते पिल्ले को दबोच लिया। पिल्ला इस अकस्मात आक्रमण से भयभीत हो उठा। मगर वह बड़ी ही समझदार नस्ल का था। उसका पिता मिलिटरी में था और मां पुलिस में जासूसी करती थी।

संकट सिर पर आया देखकर भी वह घबराया नहीं और धैर्य से बोला−'लोमड़ भाई! अब तुमने मुझे पकड़ ही लिया है तो खा लो। मगर मेरी एक राय है अगर मानो तो। इसमें तुम्हारा ही लाभ है।'

अपने लाभ की बातर सुनकर लोमड़ ने पूछा− 'कैसा लाभ?'

'देखो भाई! मैं यहां नया−नया आया हूं, इसलिए अभी दुबला तथा निर्बल हूं। कुछ दिन खा−पीकर मुझे मोटा−ताजा हो जाने दीजिए। फिर आकर मुझे खा लेना। वैसे भी अभी मैं बच्चा हूं। मुझे खाकर भी शायद आज आपकी भूख न मिटे।'

लोमड़ पिल्ले की बातों में आ गया उसे छोड़कर चला गया। पिल्ले ने अपने भाग्य को धन्यवाद दिया तथा असुरक्षित स्थान पर सोने की गलती फिर कभी न करने की कसम खाई। कुछ महीनों के पश्चात लोमड़ फिर उस घर के पास आकर उस पिल्ले को खोजने लगा। लेकिन अब वह पिल्ला कहां रहा था, अब तो वह बड़ा हो गया था और पहले से अधिक समझदार भी। उस समय वह मकान की छत पर सो रहा था।

लोमड़ ने उससे कहा, 'अपने वचन के अनुसार नीचे आकर मेरा आहार बन जाओ।' 'अरे जा रे मूर्ख! मृत्यु का भी वचन दिया है कभी किसी ने? जा अपनी मूर्खता पर आयु−भर पछताता रह। अब मैं तेरे हाथ आने वाला नहीं है।' कुत्ते ने उत्तर दिया।

लोमड़ अपना−सा मुंह लेकर चला गया। सच है, समझदारी व सूझ−बूझ से मौत को भी टाला जा सकता है।


40) प्यासा कौवा

(Short Stories With Moral Values In Hindi)


ठंडी ठंडी हवा और चारों तरफ खुला आसमान देख कर एक कौआ अपने पंख फैला कर उड़ने लगा और मौज मस्ती करते हुए बहुत दूर निकल गया।

काफी देर तक उड़ने के बाद वह थकने लगा और उसे प्यास भी लग गयी।

सोचा नीचे जा कर पानी पी लेता हूँ फिर दुबारा आसमान में चला जाऊँगा। नीचे पहुँच कर चारों तरफ देखा मगर उसे पानी कहीं भी दिखाई नहीं दिया। प्यासा कौआ निराश हो इधर उधर भटकने लगा। तभी उसकी नज़र एक बर्तन पर गई। वह भागा भागा उसके पास पहुँचा। बर्तन में पानी तो था लेकिन बहुत ही कम।

अब बेचारा कौआ सोचने लगा, ” अरे! मैं पानी कैसे पियूँ । मेरी चोंच तो नीचे तक जाएगी ही नहीं “।

तभी उसे एक उपाय सूझा, क्यों ना पानी को ऊपर लाया जाए । उसने इधर उधर देखा। आसपास बहुत से कंकड़ थे। वह एक कंकड़ उठाता और पानी में डाल देता। ऐसे करते करते देखा कि पानी ऊपर आगया । कौए ने मजे से पानी पिया, अपनी प्यास बुझाई और खुश हो कर आसमान में उड़ गया।


41) पिंजरे का बन्दर

(Short Stories With Moral Values In Hindi)


एक समय की बात है एक शरीफ आदमी था । उसके पास एक बंदर था ,वह बंदर के जरिए अपनी आजीविका कमाता था । बंदर कई तरह के करतब लोगों को दिखाता था । लोग उस पर पैसे फेंकते थे , जिसे बंदर इकट्ठा करके अपने मालिक को दे देता था । एक दिन मालिक बंदर को चिड़ियाघर लेकर गया ,बंदर ने वहां पिंजरे में एक और बंदर देखा । लोग उसे देख – देख कर खुश हो रहे थे तथा उसे खाने को फल बिस्किट इत्यादि दे रहे थे । बंदर ने सोचा कि पिंजरे में रहकर भी यह बंदर कितना भाग्यवान है, बिना किसी परिश्रम के ही इसे खाना-पीना मिल जाता है ।

उस रात वह बंदर भी भाग कर चिड़ियाघर में रहने पहुंच गया , उसे मुफ्त का खाना और आराम बहुत अच्छा लगा । पर कुछ दिनों में ही बंदर का मन भर गया । उसे अपनी स्वतंत्रता की याद आने लगी, अपनी आजादी वापस चाहता था । वह फिर चिड़ियाघर से भाग कर अपने मालिक के पास पहुंच गया । उसे मालूम हो गया की रोटी कमाना कठिन होता है , किंतु आश्रित होकर पिंजरे में कैद रहना उससे भी कठिन है । अपने पौरुष से ही मनुष्य की महानता है ,मुफ्त की चीजें लोगों को निक्कमी बना देती है ।

” जिंदगी तो अपने दम पर जिया जाता है यारों , दूसरों के कांधों पर तो सिर्फ जनाजे निकलते हैं ।”


42) गन्दा तालाब

(Short Stories With Moral Values In Hindi)


फ्रेडी मेंढक एक तालाब के पास से गुजर रहा था , तभी उसे किसी की दर्द भरी आवाज़ सुनाई दी .

उसने रुक के देखा तो फ्रैंक नाम का एक मेंढक उदास बैठा हुआ था .

” क्या हुआ , तुम इतने उदास क्यों हो ?” , फ्रेडी ने पुछा .

” देखते नहीं ये तालाब कितना गन्दा है …यहाँ ज़िन्दगी कितनी कठिन है ,” फ्रैंक ने बोलना शुरू किया , “पहले यहाँ इतने सारे कीड़े-मकौड़े हुआ करते थे …पर अब मुश्किल से ही कुछ खाने

को मिल पाता है …अब तो भूखों मरने की नौबत आ गयी है .”

फ्रेडी बोला , ” मैं करीब के ही एक तालाब में रहता हूँ , वो साफ़ है और वहां बहुत सारे कीड़े -मकौड़े भी मौजूद हैं , आओ तुम भी वहीँ चलो .”

” काश यहाँ पर ही खूब सारे कीड़े होते तो मुझे हिलना नहीं पड़ता .”, ” फ्रैंक मायूस होते हुए बोला .

फ्रेडी ने समझाया , “लेकिन अगर तुम वहां चलते हो तो तुम पेट भर के कीड़े खा सकते हो !”

” काश मेरी जीभ इतनी लम्बी होती कि मैं यहीं बैठे -बैठे दूर -दूर तक के कीड़े पकड़ पाता …और मुझे यहाँ से हिलना नहीं पड़ता ..”, फ्रैंक हताश होते हुए बोला .

फ्रेडी ने फिर से समझाया , ” ये तो तुम भी जानते हो कि तुम्हारी जीभ कभी इतनी लम्बी नहीं हो सकती , इसलिए बेकार की बातें सोच कर परेशान होने से अच्छा है वो करो जो तुम्हारे हाथ में है …चलो उठो और मेरे साथ चलो ..”

अभी वे बात कर ही रहे थे कि एक बड़ा सा बगुला तालाब के किनारे आकर बैठ गया .

“वाह , अभी मुसीबत कम थी क्या कि ये बगुला मुझे खाने आ गया …अब तो मेरी मौत निश्चित है …” , फ्रैंक लगभग रोते हुए बोला .

“घबराओ मत जल्दी करो मेरे साथ चलो , वहां कोई बगुला नहीं आता …”, फ्रेडी कूदते हुए बोला .

फ्रैंक उसे जाते हुए देख ही रहा था कि बगुले ने उसे अपनी चोंच में दबा लिया …मरते हुए फ्रैंक मन ही मन सोच रहा था कि बाकि मेंढक कितने लकी हैं !


43) पोंगा पंडित के संग होली

(Short Stories With Moral Values In Hindi)


शहर में पोंगा नाम का एक पंडित था। वह अपने आपको बहुत विद्वान समझता था। वह लोगों के मन में ग्रह-नक्षत्र वगैरह के खतरे का डर बैठाकर खूब दावतें उड़ाता। इस तरह उसे मुफ्त खाने की आदत पड़ गई थी। उसे बात-बात में चुनौती देने की भी बुरी आदत थी।

होली का त्योहार पास में आया तो पोंगा पंडित ने मुहल्ले के लड़कों को चुनौती दी, 'मैं इस बार भी होली नहीं खेलूंगा। आज तक कोई मुझे रंग नहीं डाल सका। आगे भी किसी में इतनी हिम्मत नहीं है कि कोई मुझ पर रंग डाल सके। मैं हर बार अपनी बुद्धिमानी से बच जाता हूं।'

तभी सामने से आते हुए टीनू बोला, 'क्यों दोस्तों, इस बार होली जमकर खेलने का इरादा है न?'

'इरादा तो है, पर पोंगा पंडित इस बार भी होली खेलने के मूड में नहीं है। पंडित हम लोगों को चुनौती दे रहा है कि इस बार भी उसे कोई रंग नहीं लगा सकता।' राज ने कहा।

'तुम लोगों में से किसी ने मुझे रंग लगाकर दिखा दिया तो मैं सभी को जोरदार दावत दूंगा।' पोंगा पंडित ने कहा।

'दावत की बात है तो हमें आपकी चुनौती मंजूर है।' टीनू ने कहा, 'देखो, वादे से मुकर मत जाना।'

'नहीं, पंडित की जबान से निकली बात पत्थर की लकीर होती है।' पोंगा पंडित बोला।

घर लौटते ही पोंगा पंडित रंगों से बचने के उपाय सोचने लगा। आखिर उसकी इज्जत का सवाल जो था। अबकी बार सभी लड़कों ने कोई ऐसी योजना बनाने का फैसला किया जिससे कि पोंगा पंडित को रंगों से सराबोर किया जा सके। सब बैठकर कोई तरकीब सोचने लगे।

सबसे पहले टीनू उछल पड़ा, 'आइडिया।'

सब दोस्तों ने उसे चारों ओर से घेर लिया, 'टीनू बता न।' सब ओर से आवाजें आने लगीं। सभी की निगाहें उस पर लगी हुई थीं, पर टीनू चुप रहा। सब उसकी खुशामद करेंगे, यही सोचकर उसे देरी करने में मजा आ रहा था।

'अभी नहीं, थोड़ी देर में बताऊंगा।' वह नाचता हुआ बोला।

राज बहुत ही जल्दबाज था। वह जल्दी से जल्दी टीनू से उसकी बात उगलवाना चाहता था। उसे भी एक उपाय सूझा।

'क्यों इसकी योजना पर भरोसा करते हो। मेरी तरकीब जरूर इससे भी अच्छी होगी। आओ, मैं बताता हूं सबको।' राज ने लड़कों से कहा।

राज ने एक-एक करके सबके कान में कुछ कहा। सब खुशी से नाचने लगे। सभी एकसाथ चिल्लाने लगे, 'राज की तरकीब वाकई बहुत अच्छी है। यह टीनू क्या जाने इतनी अक्ल की बात। अबकी बार तो पोंगा पंडित को खूब छकाएंगे।'

फिर वे नाचते हुए गाने लगे, 'राज की योजना अपनाएंगे, पोंगा पंडित को मजे चखाएंगे।'

टीनू का घमंड चूर-चूर हो गया। 'अब मुझे कोई नहीं पूछेगा। राज की योजना सबको पसंद आ गई है। मैं क्यों न खुद ही इन्हें अपनी योजना बता दूं। हो सकता है मेरी योजना राज से भी अच्छी हो और सबको पसंद आए।' टीनू ने सोचा।

सबके बीच पहुंचकर वह चिल्लाया, 'रुको तो सही, मैं भी अपनी योजना बता रहा हूं। शायद तुम सबको पसंद आ जाए।'

राज का चेहरा खुशी से चमक उठा, 'हां हां, जरूर बताओ, मेरी योजना तो बस यहीं तक थी और कुछ नहीं।'

'क्या मतलब, मैं समझा नहीं।' टीनू बोला।

'पहले तुम अपनी योजना बताओ, तब मैं भी पूरी बात बताऊंगा।' राज ने कहा।

'हां हां लो सब सुनो।' टीनू ने चुपके से सबको अपनी योजना बता दी। सब उसकी सूझबूझ पर ताली बजाने लगे।

'वाह, भाई टीनू, वाकई तुम्हारा जवाब नहीं।' एक लड़के ने कहा।

'अच्छा, तो क्या मेरी योजना राज की योजना से अच्छी है?' वह मुस्कुराया।

'भाई टीनू, मेरी योजना तो सिर्फ इतनी ही थी कि किसी तरह जल्दी से जल्दी तुम्हारी योजना उगलवाई जाए।' राज ने बताया तो टीनू शर्मिंदा हो गया।

होली की सुबह पोंगा पंडित अभी सोकर उठा ही था तभी उसके कानों में कई लोगों की आवाजें पड़ीं, 'चाय मिलेगी साहब, गरमागरम चाय। हमने सुना है कि यहां आपने नया टी स्टॉल खोला है।'

पोंगा पंडित ने घर की खिड़की से बाहर झांका। सामने खड़े कुछ बूढ़े चाय मांग रहे थे।

'अरे भाई यह तो मेरा घर है। कोई टी स्टॉल नहीं, तुम शायद गलती से यहां आ गए हो।' पोंगा पंडित ने उनसे कहा।

बूढ़ों का भेस बदले लड़कों की टोली मुस्कुराती हुई आगे बढ़ गई। थोड़ी देर में फिर वही आवाज सुनाई दी, 'चाय चाहिए साहब, बड़ी ठंड लग रही है। आज आपकी चाय का स्वाद लेकर देखते हैं।'

पोंगा पंडित को हैरानी हुई और गुस्सा भी आया। 'आज सवेरे ही इन लोगों ने भांग पी ली है। होली है न', सोचकर वह कड़कती आवाज में बोला, 'अरे गधों, भांग पी ली है तो फिर चाय क्यों मांगते हो? देखते नहीं, यह मेरा घर है, कोई चाय की दुकान नहीं, भागो यहां से।'

पोंगा पंडित की बात पर सब खिलखिला पड़े। 'फिर यह चाय की दुकान का साइन बोर्ड क्यों लगा रखा है। भांग हमने पी है या आपने?' सबने व्यंग्य किया।

पोंगा पंडित को गुस्सा आ गया। वह ताव खाकर बाहर निकला। 'जरा दिखाओ तो, कहां है साइन बोर्ड?' कहने के साथ ज्यों ही उसने ऊपर देखा, साइन बोर्ड दिखाई दे गया। पंडित ने आव देखा न ताव, वह एक लाठी अंदर से उठा लाया और तख्ते पर जोर से मारते हुए बोला, 'न जाने कौन गधा यह बोर्ड यहां टांग गया है।'

ज्यों ही लाठी तख्ते पर पड़ी, रंगों की बौछार से पंडित का पूरा शरीर भीग गया। इधर-उधर छिपे लड़कों, यहां तक कि लड़कियों ने भी रंग से भरे गुब्बारे पोंगा पंडित पर फेंके। साथ ही ताली पीट-पीटकर गाने लगे, 'होली है भई होली है, रंग-बिरंगी होली है।'

यह योजना टीनू की ही थी कि साइन बोर्ड के पीछे रंगों से भरे गुब्बारे टांग दिए जाएं। ज्यों ही पोंगा पंडित उस पर वार करेगा, गुब्बारे फूट पड़ेंगे।

'राज भैया, अब हो जाए दावत।' सीमा चहकती हुई बोली।

'दावत, पर तुम लड़कियों को कैसे पता चला?' पोंगा पंडित हैरान हो गया।

'लो कर लो बात, हम लड़कियों ने राज और टीनू भैया का साथ यों ही थोड़े दिया था।'

'बताओ, भला क्यों दिया था?' सीमा ने पूछा।

तो सभी लड़कियां एकसाथ चिल्लाईं, 'दावत में छककर खाने के लिए।'

'ठीक है, ठीक है।' पोंगा पंडित बोला, 'तुम लोग बैठो। मैं अभी मिठाई वगैरह लेकर आता हूं।' कुछ ही देर में पोंगा पंडित खीर, हलवा-पूरी और लड्डुओं का थाल लेकर पहुंच गया।

लड़के-लड़कियों की टोली दावत उड़ाने लगी। लोगों को बेवकूफ बनाकर हलवा-पूरी खाने वाला पोंगा पंडित आज खुद हलवा-पूरी खिला रहा था।


44) बादल और राजा

(Short Stories With Moral Values In Hindi)


बादल अरबी नस्ल का एक शानदार घोड़ा था। वह अभी 1 साल का ही था और रोज अपने पिता – “राजा” के साथ ट्रैक पर जाता था। राजा

घोड़ों की बाधा दौड़ का चैंपियन था और कई सालों से वह अपने मालिक को सर्वश्रेष्ठ घुड़सवार का खिताब दिला रहा था।

एक दिन जब राजा ने बादल को ट्रैक के किनारे उदास खड़े देखा तो बोला, ” क्या हुआ बेटा तुम इस तरह उदास क्यों खड़े हो?”

“कुछ नहीं पिताजी…आज मैंने आपकी तरह उस पहली बाधा को कूदने का प्रयास किया लेकिन मैं मुंह के बल गिर पड़ा…मैं कभी आपकी तरह काबिल नहीं बन पाऊंगा…”

राजा बादल की बात समझ गया। अगले दिन सुबह-सुबह वह बादल को लेकर ट्रैक पर आया और एक लकड़ी के लट्ठ की तरफ इशारा करते हुए बोला- ” चलो बादल, ज़रा उसे लट्ठ के ऊपर से कूद कर तो दिखाओ।”

बादला हंसते हुए बोला, “क्या पिताजी, वो तो ज़मीन पे पड़ा है…उसे कूदने में क्या रखा है…मैं तो उन बाधाओं को कूदना चाहता हूँ जिन्हें आप कूदते हैं।”

“मैं जैसा कहता हूँ करो।”, राजा ने लगभग डपटते हुए कहा।

अगले ही क्षण बादल लकड़ी के लट्ठ की और दौड़ा और उसे कूद कर पार कर गया।

“शाबाश! ऐसे ही बार-बार कूद कर दिखाओ!”, राजा उसका उत्साह बढाता रहा।

अगले दिन बादल उत्साहित था कि शायद आज उसे बड़ी बाधाओं को कूदने का मौका मिले पर राजा ने फिर उसी लट्ठ को कूदने का निर्देश दिया।

करीब 1 हफ्ते ऐसे ही चलता रहा फिर उसके बाद राजा ने बादल से थोड़े और बड़े लट्ठ कूदने की प्रैक्टिस कराई।

इस तरह हर हफ्ते थोड़ा-थोड़ा कर के बादल के कूदने की क्षमता बढती गयी और एक दिन वो भी आ गया जब राजा उसे ट्रैक पर ले गया।

महीनो बाद आज एक बार फिर बादल उसी बाधा के सामने खड़ा था जिस पर पिछली बार वह मुंह के बल गिर पड़ा था… बादल ने दौड़ना शुरू किया… उसके टापों की आवाज़ साफ़ सुनी जा सकती थी… 1…2…3….जम्प….और बादल बाधा के उस पार था।

आज बादल की ख़ुशी का ठिकाना न था…आज उसे अन्दर से विश्वास हो गया कि एक दिन वो भी अपने पिता की तरह चैंपियन घोड़ा बन सकता है और इस विश्वास के बलबूते आगे चल कर बादल भी एक चैंपियन घोड़ा बना।

दोस्तों, बहुत से लोग सिर्फ इसलिए goals achieve नहीं कर पाते क्योंकि वो एक बड़े challenge या obstacle को छोटे-छोटे challenges में divide नहीं कर पाते। इसलिए अगर आप भी अपनी life में एक champion बनना चाहते हैं…एक बड़ा लक्ष्य हासिल करना चाहते हैं तो systematically उसे पाने के लिए आगे बढिए… पहले छोटी-छोटी बाधाओं को पार करिए और ultimately उस बड़े goal को achieve कर अपना जीवन सफल बनाइये।

Moral of the story is:

जल्दी हार मत मानिए, बल्कि छोटे से शुरू करिए और प्रयास जारी रखिये…इस तरह आप उस लक्ष्य को भी प्राप्त कर पायेंगे जो आज असंभव लगता है।


45) कहीं बारिश हो गयी तो!

(Short Stories With Moral Values In Hindi)


4 साल से किशनगढ़ गाँव में बारिश की एक बूँद तक नहीं गिरी थी। सभी बड़े परेशान थे। हरिया भी अपने बीवी-बच्चों के साथ जैसे-तैसे समय काट रहा था।

एक दिन बहुत परेशान होकर वह बोला, “अरे ओ मुन्नी की माँ, जरा बच्चों को लेकर पूजा घर में तो आओ…”

बच्चों की माँ 6 साल की मुन्नी और 4 साल के राजू को लेकर पूजा घर में पहुंची।

हरिया हाथ जोड़ कर भगवान् के सामने बैठा था, वह रुंधी हुई आवाज़ में अपने आंसू छिपाते हुए बोला, “सुना है भगवान् बच्चों की जल्दी सुनता है…चलो हम सब मिलकर ईश्वर से बारिश के लिए प्रार्थना करते हैं…”

सभी अपनी-अपनी तरह से बारिश के लिए प्रार्थना करने लगे।

मुन्नी मन ही मन बोली-

भगवान् जी मेरे बाबा बहुत परेशान हैं…आप तो सब कुछ कर सकते हैं…हमारे गाँव में भी बारिश कर दीजिये न…

पूजा करने के कुछ देर बाद हरिया उठा और घर से बाहर निकलने लगा।

“आप कहाँ जा रहे हैं बाबा।”, मुन्नी बोली।

“बस ऐसे ही खेत तक जा रहा हूँ बेटा…”, हरिया बाहर निकलते हुए बोला।

“अरे रुको-रुको…अपने साथ ये छाता तो लेते जाओ”, मुन्नी दौड़ कर गयी और खूंटी पर टंगा छाता ले आई।”

छाता देख कर हरिया बोला, “अरे! इसका क्या काम, अब तो शाम होने को है…धूप तो जा चुकी है…”

मुन्नी मासूमियत से बोली, “अरे बाबा अभी थोड़ी देर पहले ही तो हमने प्रार्थना की है….कहीं बारिश हो गयी तो…”

मुन्नी का जवाब सुन हरिया स्तब्ध रह गया।

कभी वो आसमान की तरफ देखता तो कभी अपनी बिटिया के भोले चेहरे की तरफ…

उसी क्षण उसने महसूस किया कि कोई आवाज़ उससे कह रही हो-

प्रार्थना करना अच्छा है। लेकिन उससे भी ज़रूरी है इस बात में यकीन रखना कि तुम्हारी प्रार्थना सुनी जायेगी और फिर उसी के मुताबिक काम करना….

हरिया ने फौरन अपनी बेटी को गोद में उठा लिया, उसके माथे को चूमा और छाता अपने हाथ में घुमाते हुए आगे बढ़ गया।

दोस्तों, हम सभी प्रार्थना करते हैं पर हम सभी अपनी prayers में firmly believe नहीं करते। और ऐसे में हमारी प्रार्थना बस शब्द बन कर रह जाती है…वास्तविकता में नहीं बदलती। सभी धर्मों में विश्वास की शक्ति का उल्लेख है, कहते भी हैं कि “faith can move mountains” यानि दृढ विश्वास हो तो इंसान पहाड़ भी हिला सकता है। And, in fact दशरथ मांझी के रूप में हमारे सामने इसका एक प्रत्यक्ष प्रमाण भी है।

इसलिए अपनी पूजा को सही मायने में सफल होते देखना चाहते हैं तो ईश्वर में विश्वास रखें और ऐसे act करें मानो आपको प्रार्थना सुनी ही जाने वाली हो…और जब आप लगातार ऐसा करेंगे तो भगवान् आपकी ज़रूर सुनेगा!


46) हथौड़ा और चाभी

(Short Stories With Moral Values In Hindi)


शहर की तंग गलियों के बीच एक पुरानी ताले की दूकान थी। लोग वहां से ताला-चाबी खरीदते और कभी-कभी चाबी खोने पर डुप्लीकेट चाबी बनवाने भी आते। ताले वाले की दुकान में एक भारी-भरकम हथौड़ा भी था जो कभी-कभार ताले तोड़ने के काम आता था।

हथौड़ा अक्सर सोचा करता कि आखिर इन छोटी-छोटी चाबियों में कौन सी खूबी है जो इतने मजबूत तालों को भी चुटकियों में खोल देती हैं जबकि मुझे इसके लिए कितने प्रहार करने पड़ते हैं?

एक दिन उससे रहा नहीं गया, और दूकान बंद होने के बाद उसने एक नन्ही चाबी से पूछा, “बहन ये बताओ कि आखिर तुम्हारे अन्दर ऐसी कौन सी शक्ति है जो तुम इतने जिद्दी तालों को भी बड़ी आसानी से खोल देती हो, जबकि मैं इतना बलशाली होते हुए भी ऐसा नहीं कर पाता?”

चाबी मुस्कुराई और बोली,

दरअसल, तुम तालों को खोलने के लिए बल का प्रयोग करते हो…उनके ऊपर प्रहार करते हो…और ऐसा करने से ताला खुलता नहीं टूट जाता है….जबकि मैं ताले को बिलकुल भी चोट नहीं पहुंचाती….बल्कि मैं तो उसके मन में उतर कर उसके हृदय को स्पर्श करती हूँ और उसके दिल में अपनी जगह बनाती हूँ। इसके बाद जैसे ही मैं उससे खुलने का निवेदन करती हूँ, वह फ़ौरन खुल जाता है।

दोस्तों, मनुष्य जीवन में भी ऐसा ही कुछ होता है। यदि हम किसी को सचमुच जीतना चाहते हैं, अपना बनाना चाहते हैं तो हमें उस व्यक्ति के हृदय में उतरना होगा। जोर-जबरदस्ती या forcibly किसी से कोई काम कराना संभव तो है पर इस तरह से हम ताले को खोलते नहीं बल्कि उसे तोड़ देते हैं ….यानि उस व्यक्ति की उपयोगिता को नष्ट कर देते हैं, जबकि प्रेम पूर्वक किसी का दिल जीत कर हम सदा के लिए उसे अपना मित्र बना लेते हैं और उसकी उपयोगिता को कई गुना बढ़ा देते हैं।

इस बात को हेमशा याद रखिये-

हर एक चीज जो बल से प्राप्त की जा सकती है उसे प्रेम से भी पाया जा सकता है लेकिन हर एक जिसे प्रेम से पाया जा सकता है उसे बल से नहीं प्राप्त किया जा सकता।


47) आरी की कीमत

(Short Stories With Moral Values In Hindi)


एक बार की बात है एक बढ़ई था। वह दूर किसी शहर में एक सेठ के यहाँ काम करने गया। एक दिन काम करते-करते उसकी आरी टूट गयी। 

बिना आरी के वह काम नहीं कर सकता था, और वापस अपने गाँव लौटना भी मुश्किल था, इसलिए वह शहर से सटे एक गाँव पहुंचा। इधर-उधर पूछने पर उसे लोहार का पता चल गया।

वह लोहार के पास गया और बोला-

भाई मेरी आरी टूट गयी है, तुम मेरे लिए एक अच्छी सी आरी बना दो। 

लोहार बोला, “बना दूंगा, पर इसमें समय लगेगा, तुम कल इसी वक़्त आकर मुझसे आरी ले सकते हो।”

बढ़ई को तो जल्दी थी सो उसने कहा, ” भाई कुछ पैसे अधिक ले लो पर मुझे अभी आरी बना कर दे दो!”

“बात पैसे की नहीं है भाई…अगर मैं इतनी जल्दबाजी में औजार बनाऊंगा तो मुझे खुद उससे संतुष्टि नहीं होगी, मैं औजार बनाने में कभी भी अपनी तरफ से कोई कमी नहीं रखता!”, लोहार ने समझाया।

बढ़ई तैयार हो गया, और अगले दिन आकर अपनी आरी ले गया।

आरी बहुत अच्छी बनी थी। बढ़ई पहले की अपेक्षा आसानी से और पहले से बेहतर काम कर पा रहा था।

बढ़ई ने ख़ुशी से ये बात अपने सेठ को भी बताई और लोहार की खूब प्रसंशा की।

सेठ ने भी आरी को करीब से देखा!

“इसके कितने पैसे लिए उस लोहार ने?”, सेठ ने बढ़ई से पूछा।

“दस रुपये!”

सेठ ने मन ही मन सोचा कि शहर में इतनी अच्छी आरी के तो कोई भी तीस रुपये देने को तैयार हो जाएगा। क्यों न उस लोहार से ऐसी दर्जनों आरियाँ बनवा कर शहर में बेचा जाये!

अगले दिन सेठ लोहार के पास पहुंचा और बोला, “मैं तुमसे ढेर सारी आरियाँ बनवाऊंगा और हर आरी के दस रुपये दूंगा, लेकिन मेरी एक शर्त है… आज के बाद तुम सिर्फ मेरे लिए काम करोगे। किसी और को आरी बनाकर नहीं बेचोगे।”

“मैं आपकी शर्त नहीं मान सकता!” लोहार बोला।

सेठ ने सोचा कि लोहार को और अधिक पैसे चाहिए। वह बोला, “ठीक है मैं तुम्हे हर आरी के पन्द्रह रूपए दूंगा….अब तो मेरी शर्त मंजूर है।”v लोहार ने कहा, “नहीं मैं अभी भी आपकी शर्त नहीं मान सकता। मैं अपनी मेहनत का मूल्य खुद निर्धारित करूँगा। मैं आपके लिए काम नहीं कर सकता। मैं इस दाम से संतुष्ट हूँ इससे ज्यादा दाम मुझे नहीं चाहिए।”

“बड़े अजीब आदमी हो…भला कोई आती हुई लक्ष्मी को मना करता है?”, व्यापारी ने आश्चर्य से बोला।

लोहार बोला, “आप मुझसे आरी लेंगे फिर उसे दुगने दाम में गरीब खरीदारों को बेचेंगे। लेकिन मैं किसी गरीब के शोषण का माध्यम नहीं बन सकता। अगर मैं लालच करूँगा तो उसका भुगतान कई लोगों को करना पड़ेगा, इसलिए आपका ये प्रस्ताव मैं स्वीकार नहीं कर सकता।”

सेठ समझ गया कि एक सच्चे और ईमानदार व्यक्ति को दुनिया की कोई दौलत नहीं खरीद सकती। वह अपने सिद्धांतों पर अडिग रहता है।

अपने हित से ऊपर उठ कर और लोगों के बारे में सोचना एक महान गुण है। लोहार चाहता तो आसानी से अच्छे पैसे कमा सकता था पर वह जानता था कि उसका जरा सा लालच बहुत से ज़रूरतमंद लोगों के लिए नुक्सानदायक साबित होगा और वह सेठ के लालच में नहीं पड़ता।


48) पागल हाथी

(Short Stories With Moral Values In Hindi)


एक बार की बात है। एक गुरूजी थे। उनके बहुत से शिष्य थे। उन्होंने एक दिन अपने शिष्यों को बुलाया और समझाया-

शिष्यों सभी जीवों में ईश्वर का वास होता है इसलिए हमें सबको नमस्कार करना चाहिए।

कुछ दिनों बाद गुरूजी ने एक विशाल हवन का आयोजन किया और कुछ शिष्यों को लकड़ी लेने के लिए पास के जंगल भेजा। शिष्य लकड़ियाँ चुन रहे थे कि तभी वहाँ एक पागल हाथी आ धमका। सभी शिष्य शोर मचा कर भागने लगे,” भागो….हाथी आया…पागल हाथी आया….”

लेकिन उन सबके बीच एक शिष्य ऐसा भी था जो इस खतरनाक परिस्थिति में भी शांत खड़ा था। उसे ऐसा करते देख उसके साथियों को आश्चर्य हुआ और उनमे से एक बोला, “ये तुम क्या कर रहे हो? देखते नहीं पागल हाथी इधर ही आ रहा है…भागो और अपनी जान बचाओ!”

इस पर शिष्य बोला, ” तुम लोग जाओ, मुझे इस हाथी से कोई भय नहीं है… गुरूजी ने कहा था ना कि हर जीव में नारायण का वास है इसलिए भागने कि कोई जरुरत नहीं।”

और ऐसा कह कर वह वहीं खड़ा रहा और जैसे ही हाथी पास आया वह उसे नमस्कार करने लगा।

लेकिन हाथी कहाँ रुकने वाला था, वह सामने आने वाली हर एक चीज को तबाह करते जा रहा था। और जैसे ही शिष्य उसके सामने आया हाथी ने उसे एक तरफ उठा कर फेंक दिया और आगे बढ़ गया।

शिष्य को बहुत चोट आई, और वह घायल हो कर वहीँ बेहोश हो गया।

जब उसे होश आया तो वह आश्रम में था और गुरूजी उसके सामने खड़े थे।

गुरूजी बोले, “हाथी को आते देखकर भी तुम वहाँ से हटे क्यों नहीं जबकि तुम्हे पता था कि वह तुम्हे चोट पहुंचा सकता है।”

तब शिष्य बोला, “गुरूजी आपने ही तो ये बात कही थी कि सभी जीवों में ईश्वर का वास होता है। इसी वजह से मैं नहीं भागा, मैंने नमस्कार करना उचित समझा।”

तब गुरूजी ने समझाया –

बेटा तुम मेरी आज्ञा मानते हो ये बहुत अच्छी बात है मगर मैंने ये भी तो सिखाया है कि विकट परिस्थितियों में अपना विवेक नहीं खोना चाहिए । पुत्र, हाथी नारायण आ रहे थे ये तो तुमने देखा। हाथी को तुमने नारायण समझा। मगर बाकी शिष्यों ने जब तुम्हे रोका तो तुम्हे उनमे नारायण क्यों नज़र नहीं आये। उन्होंने भो तो तुम्हे मना किया था ना। उनकी बात का तुमने विश्वास क्यों नहीं किया।उनकी बात मान लेते तो तुम्हे इतनी तकलीफ का सामना नहीं करना पड़ता, तुम्हारी ऐसी हालत नहीं होती।जल भी नारायण है पर किसी जल को लोग देवता पर चढ़ाते है और किसी जल से लोग नहाते धोते हैं। हमेशा देश, काल और परिस्थिति को ध्यान में रखकर निर्णय लेना चाहिए।

मित्रों, कई बार ऐसा होता है कि किसी ज्ञानवर्धक बात का असल भाव समझने की बजाये हम उस बात में कहे गए शब्दों को पकड़ कर बैठ जाते हैं। गुरूजी ने शिष्यों को प्रत्येक जीव में नारायण देखने को कहा था जिसका अर्थ था कि हमें सभी का आदर करना चाहिए और किसी को नुक्सान नहीं पहुंचना चाहिए। लेकिन वह शिष्य बस उनके शब्दों को पकड़ कर बैठ गया और उसके जान पर बन आई।

अतः इस कहनी से हमें ये शिक्षा मिलती है कि हमें दूसरों कि बात का अनुसरण तो जरुर करना चाहिए मगर विशेष परिस्थिति में अपने विवेक का प्रयोग करने से नहीं चूकना चाहिए। हमें अपनी परिस्थिति के अनुसार ही निर्णय लेना चाहिए।

49) चिड़िया की परेशानी

(Short Stories With Moral Values In Hindi)


कैसोवैरी चिड़िया को बचपन से ही बाकी चिड़ियों के बच्चे चिढाते थे।

कोई कहता, ” जब तू उड़ नहीं सकती तो चिड़िया किस काम की।”, तो कोई उसे ऊपर पेड़ की डाल पर बैठ कर चिढाता कि,” अरे कभी सकारात्मक सोच पर कहानी sakaratmak soch ki kahaniहमारे पास भी आ जाया करो…जब देखो जानवरों की तरह नीचे चरती रहती हो…”

और ऐसा बोलकर सब के सब खूब हँसते!

कैसोवैरी चिड़िया शुरू-शुरू में इन बातों का बुरा नहीं मानती थी लेकिन किसी भी चीज की एक सीमा होती है।

बार-बार चिढाये जाने से उसका दिल टूट गया! वह उदास बैठ गयी और आसमान की तरफ देखते हुए बोली,

“हे ईश्वर, तुमने मुझे चिड़िया क्यों बनाया…और बनया तो मुझे उड़ने की काबिलियत क्यों नहीं दी… देखो सब मुझे कितना चिढ़ाते हैं… अब मैं यहाँ एक पल भी नहीं रह सकती, मैं इस जंगल को हमेशा-हमेशा के लिए छोड़ कर जा रही हूँ!”

और ऐसा कहते हुए कैसोवैरी चिड़िया आगे बढ़ गयी।

अभी वो कुछ ही दूर गयी थी कि पीछे से एक भारी-भरकम आवाज़ आई-

रुको कैसोवैरी! तुम कहाँ जा रही हो!

कैसोवैरी ने आश्चर्य से पीछे मुड़ कर देखा, वहां खड़ा जामुन का पेड़ उससे कुछ कह रहा था।

“कृपया तुम यहाँ से मत जाओ! हमें तुम्हारी ज़रुरत है। पूरे जंगल में हम सबसे अधिक तुम्हारी वजह से ही फल-फूल पाते हैं…. वो तुम ही हो जो अपनी मजबूत चोंच से फलों को अन्दर तक खाती हो और हमारे बीजों को पूरे जंगल में बिखेरती हो…हो सकता है बाकी चिड़ियों के लिए तुम मायने ना रखती हो लेकिन हम पेड़ों के लिए तुमसे बढ़कर कोई दूसरी चिड़िया नहीं है…मत जाओ…तुम्हारी जगह कोई और नहीं ले सकता!”

पेड़ की बात सुन कर कैसोवैरी चिड़िया को जीवन में पहली बार एहसास हुआ कि वो इस धरती पर बेकार में मौजूद नहीं है, भगवान् ने उसे एक बेहद ज़रूरी काम के लिए भेजा है और सिर्फ बाकी चिड़ियों की तरह न उड़ पाना कहीं से उसे छोटा नहीं बनाता!

आज एक बार फिर कैसोवैरी चिड़िया बहुत खुश थी, वह ख़ुशी-ख़ुशी जंगल में वापस लौट गयी।

Friends, कैसोवैरी चिड़िया की तरह ही कई बार हम इंसान भी औरों को देखकर low feel करने लगते हैं। हम सोचते हैं कि उसके पास ये है…उसके पास वो है….सब कितनी lucky हैं…and all that!

हमें कभी भी बेकार के comparisons में नहीं पड़ना चाहिए! हर एक इंसान अपने आप में unique है…अलग है। हर किसी के अन्दर कोई न कोई बात है जो उसे ख़ास बनाती है..हाँ हो सकता है कि वो पूरी दुनिया के लिए बस एक इंसान हो लेकिन किसी एक के लिए वो पूरी दुनिया हो सकता है!

इसलिए life की importance को समझिये और अपने इस अमूल्य जीवन को positive thoughts का तोहफा दीजिये….यकीन जानिये सकारात्मक सोच का ये एक तोहफा आपकी पूरी लाइफ को शानदार बना देगा!


50) राजा भोज और व्यापारी

(Short Stories With Moral Values In Hindi)


एक बार राजा भोज की सभा में एक व्यापारी ने प्रवेश किया। राजा ने उसे देखा तो देखते ही उनके मन में आया कि इस व्यापारी का सबकुछ छीन लिया जाना चाहिए। व्यापारी के जाने के बाद राजा ने सोचा –

मै प्रजा को हमेशा न्याय देता हूं। आज मेेरे मन में यह अन्याय पूर्ण भाव क्यों आ गया कि व्यापारी की संपत्ति छीन ली जाये?

उसने अपने मंत्री से सवाल किया मंत्री ने कहा, “इसका सही जवाब कुछ दिन बाद दे पाउंगा, राजा ने मंत्री की बात स्वीकार कर ली। मंत्री विलक्षण बुद्धि का था वह इधर-उधर के सोच-विचार में सयम न खोकर सीधा व्यापारी से मिलने पहूंचा। व्यापारी से दोस्ती करके उसने व्यापारी से पूछा, “तुम इतने चिंतित और दुखी क्या हो? तुम तो भारी मुनाफे वाला चंदन का व्यापार करते हो।”

व्यापारी बोला, “धारा नगरी सहित मैं कई नगरों में चंदन की गाडीयां भरे फिर रहा हूं, पर चंदन इस बार चन्दन की बिक्री ही नहीं हुई! बहुत सारा धन इसमें फंसा पडा है। अब नुकसान से बच पाने का कोई उपाय नहीं है।

व्यापारी की बातें सुन मंत्री ने पूछा, “क्या अब कोई भी रास्ता नही बचा है?”

व्यापारी हंस कर कहने लगा अगर राजा भोज की मृत्यु हो जाये तो उनके दाह-संस्कार के लिए सारा चंदन बिक सकता है।

मंत्री को राजा का उत्तर देने की सामग्री मिल चुकी थी। अगले दिन मंत्री ने व्यापारी से कहा कि, तुम प्रतिदिन राजा का भोजन पकाने के लिए एक मन (40 kg) चंदन दे दिया करो और नगद पैसे उसी समय ले लिया करो। व्यापारी मंत्री के आदेश को सुनकर बड़ा खुश हुूआ। वह अब मन ही मन राजा की लंबी उम्र होने की कामना करने लगा।

एक दिन राज-सभा चल रही थी। व्यापारी दोबारा राजा को वहां दिखाई दे गया। तो राजा सोचने लगा यह कितना आकर्षक व्यक्ति है इसे क्या पुरस्कार दिया जाये?

राजा ने मंत्री को बुलाया और पूछा, “मंत्रीवर, यह व्यापारी जब पहली बार आया था तब मैंने तुमसे कुछ पूछा था, उसका उत्तर तुमने अभी तक नहीं दिया। खैर, आज जब मैंने इसे देखा तो मेरे मन का भाव बदल गया! पता नहीं आज मैं इसपर खुश क्यों हो रहा हूँ और इसे इनाम देना चाहता हूँ!

मंत्री को तो जैसे इसी क्षण की प्रतीक्षा थी। उसने समझाया-

महाराज! दोनों ही प्रश्नों का उत्तर आज दे रहा हूं। जब यह पहले आया था तब अपनी चन्दन की लकड़ियों का ढेर बेंचने के लिए आपकी मृत्यु के बारे में सोच रहा था। लेकिन अब यह रोज आपके भोजन के लिए एक मन लकड़ियाँ देता है इसलिए अब ये आपके लम्बे जीवन की कामना करता है। यही कारण है कि पहले आप इसे दण्डित करना चाहते थे और अब इनाम देना चाहते हैं।

मित्रों, अपनी जैसी भावना होती है वैसा ही प्रतिबिंब दूसरे के मन पर पड़ने लगता है। जैसे हम होते है वैसे ही परिस्थितियां हमारी ओर आकर्षित होती हैं। हमारी जैसी सोच होगी वैसे ही लोग हमें मिलेंगे। यहीं इस जगत का नियम है – हम जैसा बोते हैं वैसा काटते हैं…हम जैसा दूसरों के लिए मन में भाव रखते हैं वैसा ही भाव दूसरों के मन में हमारे प्रति हो जाता है!

अतः इस कहानी से हमें ये सीख मिलती है कि हमेशा औरों के प्रति सकारात्मक भाव रखें।

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