Top 10 Best Moral Stories Of 2021 In Hindi

इस Blog में आपको 10 best moral stories hindi में पढ़ने को मिलेंगी जो आपने अपने दादा दादी से सुनी होंगी। ये hindi stories बहुत ही प्रेरक है। ऐसे  किस्से तो आपने अपने बचपन मे बहुत सुने होंगे पर ये किस्से कुछ अलग हौ। हमने भी इस ब्लॉग में 10 best moral stories hindi में लिखा है जिसको पढ़कर आपको बहुत ही ज्यादा आनंद मिलेगा और आपका मनोरंजन भी होगा। इसमे कुछ 10 best Moral Stories In Hindi 2021 दी गयी है। जिसमे आपको नयापन अनुभव होगा। यदि आप पुरानी कहानियाँ पढ़कर बोर हो गए है तो यहाँ पर हम आपको 10 best moral stories hindi दे रहे है जिसको पढ़कर आपको बहुत ही ज्यादा मज़ा आने वाला है।


Top 10 Best Moral Stories Of 2021 In Hindi
Top 10 Best Moral Stories Of 2021 In Hindi 


धुनिया भूत की खुशी का राज़

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किसी गांव में एक धुनिया रूई बुनने वाला रहता था वह बडा मेहनती था और हमेशा खुश रहता था. लोग उसके भाग्य से ईष्या करते थे और अक्सर उसे सफेद भूत कहकर चिढाते थे क्योंकि काम करते समय उसे बहुत पसीना आता था और रूई धुनते समय रूई के छोटे-छोटे फोंहे उसके बदन से चिपक जाते थे. इसलिए उसका नाम सफेद भूत पड गया था.

बच्चे भी उसे सफेद भूत कहकर चिढाते थे. जब भी ऐसा होता धुनिया बनावटी क्रोध दिखाकर चिढाने वाले लोगों के पीछे भागता मगर कुछ दूर भागकर हंसता हुआ वापस आ जाता. उसे लोगों के चिढाने पर काफी मजा आता था गुस्सा तो वह दिखावे के लिए करता था. जिस दिन उसे कोई न चिढाता तो उसे बडा दुख होता था.

अक्सर लोग उससे पूछते भाई तुम इतने मस्त और सुखी कैसे रहते हो ? तब वह हंसकर कहता – में किसी चीज की इच्छा ही नहीं करता तभी तो सुखी रहता हूं. एक दिन एक आदमी उसके पास आया वह धुनिया से जीद करके पूछने लगा – भाई!! धुनिये तुम्हारी मस्ती का राज क्या है ?

इस नरक जमाने में भी तुम इतने खुश और मस्त कैसे रह लेते हो ? पहले तो धुनिये ने उसे टरकाने की कोशिश की मगर जब वह हाथ धोकर उसके पीछे ही पड गया तो उसने उसका रहस्य बताया –

एक दिन रूई धुनते-धुनते मेरा धनुष टूट गया, मेरा काम बंद हो गया इसलिए मैं फ़ौरन लकडी लेने जंगल पहूंच गया मुझे एक पेड़ दिखाई दिया जिसकी लकडी धनुष के लिए ठीक लगी मेंने पेड के पास जाकर उसके तने पर कुल्हाडी मारी जैंसे ही कुल्हाडी लगी पेड़ से आवाज आई — धुनिया भाई, धुनिया भाई, मुझे मत काटो, पहले तो मुझे लगा कि यह मेरा भ्रम हैं भला पेड़ भी कभी बोलते हैं इसलिए मैंने फिर पेड़ को काटना शुरू कर दिया पर जैसे ही कुल्हाडी पेड़ पर लगती तुरंत आवाज आती धुनिया भाई रहम करो मुझे मत काटो.

यह आवाज तेज होती गई. लेकिन मैंने भी उसे काटना बंद न किया तब फिर आवाज ने मुझसे प्रार्थना की धुनिया भाई तुम जो चाहो सो मांग लो मगर मुझे छोड दो मुझे मत काटो. तुम चाहो तो मैं तुम्हें इस देश का राजकाज भी दे सकता हूं.

मैंने वृक्षदेव से कहा –

हैं वृक्षदेव! मुझे राज नहीं चाहिए मैं मेहनत से काम करना और ईमादारी से जीना चाहता हूं. इसलिए मुझे दो हाथ और पीछे की ओर दो आंखे और दे दो. वृक्षदेव ने मुझे मूंह मांगा वर दे दिया. जब मैं चार हाथ और चार आंख लिये गांव में लौटा तो लोगों ने मुझे प्रेत समझा और मुझे पत्थरों से मारा जो भी देखता वही मुझे पत्थर मारता कुछ लोग मुझे देखकर भयभीत हो गये.

जब मैं अपने घर में पहूंचा तो मेरी पत्नी भी मुझे देखकर भयभीत हो गई. उसने भी मुझे प्रेत समझा और दूसरे के घर में भाग गई. मेरा तो पत्थरों की चोटों से बूरा हाल था मेरे समझ में नहीं आ रहा था कि में क्या करूं ?

फिर मैं वापस जंगल में गया फिर मैंने वृक्षदेव से प्रार्थना की – है देव!! मेेरे दो हाथ और दो आंख वापस ले लो, उस देव को मेरी हालत पर दया आ गई और उसने मुझे पहले जैसा कर दिया तब से मैंने सबक लिया कि मनुष्य को ज्यादा इच्छाएं नहीं करना चाहिए मनुष्य की इच्छाएं जितनी कम होंगी वह उतना ही सुखी रहेगा. बस मेरी मस्ती का यही राज है मैं तो रूई धुनते-धुनते बस सफेद भूत ही रहना चाहता हूं.

संदेश : जीवन में सुखी रहने का रहस्य इच्छाओं का कम होना है. इस दुनिया में सभी लोग अपनी इच्छा को पूरी करने के लिए दिन रात मेहनत कर रहे है, लेकिन जब उनकी एक इच्छा पूरी हो जाती है तो तुरंत दूसरी इच्छा जाग जाती है. खुश कैसे रहे – इसलिए कहा जाता है आत्मसंतुष्टि ही सबसे बड़ा धन है. सुखी जीवन जीने की सिर्फ यही कला है. कभी किसी चीज की इच्छा मत रखो, कभी दूसरे के ऊपर निर्भर मत रहो. हमेशा अपेक्षा रहित जीवन जियो. अपने घर के छोटे भाई बहनो, बच्चों को भी यही सिख दो की वह अपने जीवन को बिना किसी अपेक्षा के जिये.


ठगपुर

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जीवन में ऐसा बहुत बार मौका आता है जब हमारे साथ लोग ठगी बेईमानी करने लगते है, ऐसे समय में बिना उनकी इस हरकत का सामना किया बिना हम उनके इस जुर्म को सहन कर लेते है.

ऐसे लोगों की बेईमानी भरी हरकतों का सामना करने के लिए सिर्फ बुद्धि/विवेक ही काफी होता है. लेकिन हम ऐसी परिस्थितियों में होश खो बैठते हैं इस वजह से हमारा विवेक नहीं जाग पाता. इस ठगी पर या ठगपुर की बोलती ठग की कहानी जरूर पडें दो घनिष्ट मित्र थे एक का नाम साधुराम था दूसरे का दूर्जन. एक कमाता था और दूसरा खाता था. एक बार दोनों व्यापार के लिए ठगपुर पहूंचे. वे ठगपूर की सीमा केे निकट ही एक सराय में ठहरे. दूर्जन बोला- साधुराम जाओ कुछ कामधाम देखो. जैसा कि हमारे बीच तय है उसके अनुसार जब कोई समस्या आयेगी तो व्यापार में देखूंगा इसलिए में तो यहीं रहूंगा.

साधुराम घोडे पर सवार होकर ठगपुर के नगर के बाजार की ओर चल दिया. उसने एक थैली में एक हजार अशर्फियां डाली और सुरक्षा की द्रष्टि से वह थैली घोडे की जींद से बांध दी. वह नगर में घूम-फिर ही रहा था कि एक व्यक्ति ने करीब आकर पूछा –क्यों भाई घोडा बिकाउ है ?

साधुराम बोला- बिकाउ तो है पर महंगा है. तुम काम-धंधा क्या करते हो ? वह बोला – मेरा नाम कल्लू कसाई है पर आपको इससे क्या ? आप तो घोडे की कीमत बताईये मेरी हैंसियत होगी तो खरीद लूंगा. साधुराम बोला- मेरे घोडे की कीमत पांच सौं अशर्फियां है, कल्लू बोला- यूं तो अच्छे से अच्छा घोडा भी सौं अशर्फियों में मिल जाता हैं लेकिन आपके घोडे की कीमत पांच सों अशर्फियां गिन लो. साधुराम घोडे से उतर गया लेकिन जब जींद से अशर्फियों की थैली खोलने लगा तो कल्लू बोला – जींद से यह क्या खोल रहे हो भाई. साधुराम बोला – अपनी अशर्फियों की थैली ले रहा हूं. मिया घोडा अब बिक चूका है और बिकते समय यह शर्त तय नहीं हुई थी कि घोडे पर से सामान उतार लिया जायेगा. ऐसा कह कल्लू घोडे पर सवार होकर चलता बना. साधुराम चिल्लाया, लानत है इस शहर को व्यापार में जबरन धोखेबाजी. कल्लू चिल्लाया मिंया यह ठगपुर हैं ठगपुर यहां कदम-कदम पर ठग है. साधुराम अपना सा मूंह ले सराय लौटा तो दूर्जन ने पूछा – क्या बात हैं भाई साधुराम तुम तो व्यापार करने गये थे, बताओ कैसे हैं यहां के लोग ? और यह रोनी सुरत क्यों बना रखी है ?

साधुराम ने सारी कहानी उसे बताते हुए कहा – भाई दूर्जन गांठ की जमा पूंजी भी गवा बैठा हूं. अब भला क्या व्यापार करूंगा इस ठगपुर में. लगता हैं हमें यह शहर छोडकर तुरंत आगे बढना होगा. सियारों के भौंकने से भी कहीं गांव छोडा जाता है ?

दूर्जन बोला – खैर तुमने बहुत दिनों तक कमा-कमा कर खिलाया हैं अब मुझे पच्चीस अशर्फियां दे दो मैं व्यापार करूंगा और तुम बैठकर खाना. जब तुम्हें व्यापार करना ही हैं तो यह पांच सौं अशर्फियां ले जाओं. जब सीधी उंगली से घी न निकले तो ऊँगली टेढ़ी कर के घी निकालिये यह सुनकर दुर्जन भाई बोला – मुझे तो पच्चीस अशर्फियां ही पर्याप्त है.

इस तरह पच्चीस अशर्फियां लेकर दूर्जन शहर पहूंचकर कल्लू कसाई के यहां पहूंचा. कल्लू दुकान पर बैठा कीमा बना रहा था. दुकान में बकरीयों के चार- पांच मुंड टंगे हुए थे. उपरी मंजिल के बरामदे में कल्लू के बाल बच्चे बैठे थे.

दूर्जन ने कहा– कहिए कल्लू मिया मुंड क्या भाव दिये ? कल्लू बोला – भाव क्या बस अशरफी मुंड है. दुर्जन बोला – प्रति मुंड एक अशरफी का है क्या ? कल्लू – हां. दुर्जन – क्या दुकान में जितने मुंड हैं सबकी कीमत एक-एक अशरफी है ?

कल्लू – हां भाई हां. झुंझलाकर कल्लू बोला – लिखकर दूं क्या ? अरे भाई तुम तो नाराज हो गये खैर मुंड तो कुछ ज्यादा ही चाहिए थे मगर इस समय मेरे पास पच्चीस अशर्फियां है इसलिए पच्चीस मुंड दे दो. कल्लू हडबडाकर बोला – मुंड तो पांच ही हैं पच्चीस कहां से लाउं ? पांच अशर्फियां गिनीये पांच मुंड ले जाईये. लेकिन मुझे तो पच्चीस मुंड चाहिए और यह बात तो पहले ही तय हो गई थी कि दुकान मे जितने मुंड हैं प्रति मुंड एक अशरफी का है. उपर बरामदे में जितने बैठे हैं सबके मुंड उतार लाईये और पच्चीस मूंड पूर कीजिए.

अब कल्लू मिया घबराया वह हाथ जोडने लगा माफी मांगते हुए बोला कि भविष्य में ऐसी मूर्खता नहीं होगी, मूर्खंता कैसी भाई ठगपुर में कद-कदम पर ठग बैठे हैं यहां का तो मुख्य धंधा ही ठगी है. समय न गवांकर पच्चीस मूंड उतारो और पैसे गिनो. मुझे आगे भी जाना है. अब तो कल्लू दूर्जन के पांव में गिर गया, बस बस अब मैं समझ गया कुछ देर पहले जिनसे मैंने घोडा लिया था आप उन्हीं के कोई भाईबंद हैं आप अपना घोडा भी ले जाईये और अपनी अशर्फियां भी. मेरी और मेरे बाल बच्चो की जान बक्श दीजिए. दूर्जन घोडा और हजार अशर्फियां लेकर वापस सराय में लौट आया और साथ ही बकरी के पाच मुंड जूर्माने के भी ले आया.

सच है, चतुर को भला कौन ठग सकता है. चतुराई के आगे ठगी धरी रह जाती है. अर्थात जीवन में चाहे कैसे भी बुरी परिस्थिति आये अगर उसका धैर्य और बुद्धि से सामना किया जाए तो उससे आसानी से बचा जा सकता है.


पेड़ का दर्द

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लकडहारे को लकडी काटते देख पेड की आखों में एक दम ही आंसू की धारा बहने लगी। यू तो वह हर दृष्टि से द्रढ़ था, उसकी जड भी गहरी थी, काया भी हृष्ट-पुष्ट सभी तरह से मजबूत लेकिन आज अपने आप कुछ सोच-सोच कर वह मन ही मन पश्यताप कर रहा था। कुल्हाडी की तीखी चोंटे बाराबर उसके तने पर पड रही थी।

लगातार कुल्हाडी चलाने से हथेली में आया हुआ पसीना भेट पर लग जाने के कारण लकडहारा थोडी देर रूक कर उसे पोछता, सुस्ताता। फिर खट-खट चोटे मारने लगता उसका एक-एक हिस्सा थोडा-थोड़ा करके काटता जा रहा था। कुल्हाडी ने पेड को सोच विचार मे मग्न और गर्म-गर्म आसु बहाते देख सहानुभूति और दर्द भरे स्वर में कहा’- क्षमा करना भाई! सब मेंरा ही कसुर है। मेरी वजह से जी तुम्हारे शरीर पर अत्याचार हो रहा है। तुम्हारी दुर्दषा का कारण मैं ही पापी हू। माफ़ करना। मुझसे क्यों क्षमा मांग रहे हो भाई ? लोहा तो लकडी को काटता ही हैं। मुझे पछतावा यही हैं कि मेरे द्वारा तुम्हारी दुर्दषा हो रही है। मैं तुम्हारी दुर्दषा का साधन बन रहा हूं । नहीं , नहीं । यह मैं क्यों मानने लगा ? यह मेरे – अपने दुष्कर्माें की सजा है। हर व्यक्ति को अपने पापों का फल भुगतना पडता है।

कुल्हाडी की सहानुभूति देखकर पेड ने दर्द भरे स्वर में कहा- नही भाई! मैं तुम्हे दोष नही देता। कुल्हाड़ी बोली – तो फिर किस लिए उदास हो भला? अपने मन की बात मुझसे कहकर हल्का कर लो । यूँ अन्दर ही अन्दर घुटकर तो तुम बहुत ही जल्दी अपने को बर्बाद कर डालोगे । दुसरों से कहने पर ही मन का भार हल्का होता है। बोलो तुम्हारे दुख का क्या कारण है ? पेड कुछ सकुचाया उसने लज्जित होकर आंखे नीचे कर ली । आज जैंसे वह अपनी ही नजरों में गिर गया था। क्या कहें ? कैंसे कहें ? निष्चय ही नही कर पा रहा था।

भाई बोलते क्यों नही, पश्यताप की अग्नि मे क्यो भस्म हो रहे हो। कुल्हाडी के इस अनुनय और अनुरोध से पेड कुछ आश्वस्त हुआ, साहस बटोर कर कुछ कहने को उघत हुआ। वह बोला – मुझे तुमसे कोई शिकायत नही है।

मुझे लज्जा तो इस बात पर आ रही हैं कि हमारी लकडी की ही जाति का बना यह हत्था अपनी जाति और वंष को नष्ट करने में सहायक बना हुआ है। तुम्ही सोचो यदि लकडी का यह हत्था तुम्हारा सहायक न बनता तो भला तुम मुझे किस तरह काट सकते थे। नही बिलकु नही। लकडी की सहायता से ही तुम इस योग्य बने हो कि मुझे यो धीरे-धीरे काटते चले जा रहे हो। फिर ?

सारा दुख-दर्द शब्दो में उडेलते हुए और नेत्रों से आंसू बहाते हुए पेड बोला – जब अपना ही अपने को काटता हैं तो बडी ग्लानि होती है। अपना यदि विश्वाश्घात न करे तो दूसरा कुछ नही बिगाड सकता। अब तुम्ही बताओं अगर यह लकडी का टुकडा – यह मेरा ही अंश तुम्हारी सहायता सहयोग नहीं करे । दूसरे शब्दों मे विश्वाश्घात न करे तो तुम्हारी पैनी धार भी मेरा कुछ नही बिगाड सकती।

यदि हमारे अन्दर ही कोई कमजारी हैं तो दूसरे को भला क्यों दोष दें । वह क्या कमजोरी है ? लोहे की कुल्हाडी ने स्पष्टीकरण चाहा- एकता का अभाव ! यदि हम सबमें एकता रहती तो भले ही यह लकडी का छोटा सा टुकडा जलकर ख़त्म हो जाता लेकिन दुश्मन की किसी भी हालात में मदद नहीं करता। विष्वासघात, विभाजन, फुट- यही तो सारे उत्पातो की जड है। जब हम खुद ही
एक-दूसरे को परेशान करने लगते हैं तो मैं क्या, बडे-बडे परिवार, बडे-बडे समुदाय यहां तक कि देश तक नष्ट हो जाते हैं । कुल्हाडी चुप! डससे आगे कुछ पुछते न बना।


सत्य की खोज

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दस भिक्षु सत्य की खोज में एक बार निकले थे। उन्होने बहुत पर्वतों-पहाडों, आश्रमों की यात्रा की। लेकिन उन्हें कोई सत्य का अनुभव न हो सका। क्योंकि सारी यात्रा बाहर हो रही थी। किन्हीं पहाडों पर, किन्ही आश्रमों में, किन्हीं गुरुओं के पास खोज चल हरी थी। जब तक खोज किसी और की तरफ चलती है, तब तक उसे पाया भी कैसे जा सकता है, जो स्वयं में है।

आखिर में थक गए और अपने गांव वापस लौटने लगे। वर्षा के दिन थे, नदी बहुत पूर पर थी। उन्होने नदी पार की। पार करने के बाद सोचा कि गिन लें, कोई खो तो नहीं गया। गिनती की, एक आदमी प्रतीत हुआ खो गया है, एक भिक्षु डूब गया था। गिनती नौ होती थी। दस थे वे । दस ने नदी पार की थी। लौटकर बाहर आकर गिना, तो नौ मालूम होेते थै।

प्रत्येक व्यक्ति अपने को गिनना छोड जाता था, शेष सबको गिन लेता था। वे रोने बेठ गए। सत्य की खोज का एक साथी खो गया था। एक यात्री उस रस्ते से निकल रहा था, दूसरे गांव तक जाने के लिए । उसने उनकी पीडा पूछी, उनके गिरते आंसू देखे। उसने पूछा, क्या कठिनाई है ?

उन्होंने कहा- हम दस नदी में उतरे थे, एक साथी खो गया। उसके लिए हम रोते है। कैंसे खोंजे ? उसने देखा वे दस ही थे। वह हंसा और उसने कहा, तुम दस ही हो, व्यर्थ की खोज मत करो अपने रास्ते चला गया।

उन्होने फिर से गिनती की कि हो सकता है, उनकी गिनती में भूल हो। लेकिन उस यात्री को पता भी न था। उनकी गिनती में भूल न थी, वे गिनती तो ठीक ही जानते थे। भूल यहां थी कि कोई भी अपनी गिनती नहीं करता था।

उन्होने बहुत बार गिना, फिर भी वे नौ ही थे। और तब उनमें से एक भिक्षु नदी के किनारे गया। उसने नदी में झांककर देखा। एक चट्टान के पास पानी स्थिर था। उसे अपनी ही परछाई नीचे पानी में दिखाई पडी। वह चिल्लाया, उसने अपने मित्रों को कहाः आओ, जिसे हम खोजते थे, वह मौजुद है। दसवां साथी मिल गया है। लेकिन पानी बहुत गहरा है। और उसे हम शायद निकाल न सकेंगे। लेकिन उसका अंतिम दर्शन तो कर लें। एक-एक व्यक्ति ने उस चट्टान के पास झांककर देखा, नीचे एक भिक्षु मौजुद था। सबकी परछाई नीचे बनती उन्हे दिखाई पडी। तब इतना तो तय हो गया, इतने डूबे पानी में वह मर गया हैं।

वे उसका अंतिम संस्कार कर रहे थे। तब वह यात्री फिर वापस लौटा, उसने पूछा कि यह चिता किसके लिए जलाई हुई है ? यह क्या कर रहे हो ? उन नौ ही रोते हुए भिक्षुओं ने कहा, मित्र हमारा मर गया है। देख लिया हमने गहरे पानी में डूबी है उसकी लाश। निकालना तो संभव नहीं है। फिर वह मर भी गया होगा, हम उसका अंतिम दाह-संस्कार कर रहे है।

उस यात्री ने फिर से गिनती की और उनसे कहा, पागलों! एक अर्थ में तुम सबने अपना ही दाह-संस्कार कर लिया है। तुमने जिसे दखा है पानी में, वह तुम्हीं हो। लेकिन पानी में देख सके तुम, लेकिन स्वयं में न देख सके! प्रतिबिंब को पकड सके जल में, लेकिन खुद पर तुम्हारी दृष्टि न जा सकी! तुमने अपना ही दाह-संस्कार कर लिया। और दसों ने मिलकर उस दसवें को दफना
दिया है, जो खोया ही नहीं था।

उसकी इस बात के कहते ही उन्हें स्मरण आया कि दसंवा तो मैं ही हूं। हर आदमी को खयाल आया कि वह दसंवा आदमी तो मैं ही हूं। और जिस सत्य की खोज वे पहाडों पर नहीं कर सकते थे, अपने ही गांव लौटकर वह खोज पूरी हो गई। वे दसों ही जागृत होकर, जान कर गांव वापस लौट गये थे।

उन दस भिक्षुओं की कथा ही हम सभी की कथा है। एक को भर हम छोड जाते है- स्वंय को। और सब तरफ हमारी दृष्टि जाती है- शास्त्रो में खोजते हैं, शब्दों में खोजते हैं, शास्त्रों के वचनों में खोजते हैं, पहाडों पर, पर्वतों पर खोजते हैं, सेवा में, समाज सेवा में, प्रार्थना में, पूजा में खोजते है। सिर्फ एक व्यक्ति भर इस खोज से वंचित रह जाता है, वह दसवां आदमी वंचित रह जाता है, जो कि हम स्वयं है।

स्वतंत्रता का अर्थ है- इस स्वयं को जानने से जो जीवन उपलब्ध होता है, उसका नाम स्वतंत्रता है। स्वतंत्र होना इस जगत में सबसे दूर्लभ बात है। स्वतंत्र वही हो सकता है, जो स्वंय को जानता हो। जो स्वंय को नहीं जानता, वह परतंत्र हो सकता है या स्वच्छंद हो सकता है, लेकिन स्वतंत्र नहीं।


श्रेष्ठ और बुरा अंग

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प्राचीनकाल में अरब में आमिर लोग निर्धनों को खरीदकर गुलाम बनाकर रखते थे | ऐसा ही एक गुलाम था लुकमान | लुकमान अपने मालिक ( जो एक शेख था ) के प्रति अत्यंत वफादार था | वह अपने मालिक की हर प्रकार से सेवा करता था |

लुकमान बुध्दिमान भी था | यह बात शेख को भी पता थी और इसलिए वह लुकमान से जब-तब तर्कपूर्ण चर्चाएं करता था | वह अक्सर लुकमान से विचित्र प्रश्न पूछकर उसके ज्ञान की परीक्षा लेता और लुकमान भी उसे कभी निराश नहीं करता था |

एक बार शेख ने उससे कहा – लुकमान ! जाओ बकरे का जो श्रेष्ठ अंग हो, उसे काटकर ले आओ | लुकमान गया और तुरंत बकरे की जीभ काटकर ले अाया | शेख ने पुन: उसे आदेश दिया अब जाकर बकरे का वह आंग लेकर आओ, जो सबसे बुरा है | लुकमान तुरंत गया और थोड़ी देर बाद एक अन्य बकरे की जीभ काटकर ले आया |

यह देख कर शेख ने कहा यह क्या, इस बार भी तुम बकरे की जीभ काट लाए ? लुकमान ने जवाब दिया मालिक ! शरीर के अंगो में जीभ ही ऐसी है जो सबसे अच्छी भी और बुरी भी | यदि जीभ से उत्तम वाणी बोली जाए तो यह सभी को अच्छी लगती है और उसी से कटु वचन बोले जाएं तो यह सबको बुरी लगने लगती है | शेख एक बार फिर लुकमान की बुद्धि का कायल हो गया |

सार यह है की वाणी की मधुरता से हम दुश्मन को भी अपना बना सकते हैं, जबकि कर्कश वाणी के चलते अपनों को भी परे होने में ज्यादा देर नहीं लगती | हमें दूसरों के खिलाफ अपशब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए | जीभ तो हमें परमात्मा का दिया हुआ उपकार हैं यह हमारे ऊपर निर्भर करता है, की हम उसका कैसा उपयोग करें | तो दोस्तों हमेशा इस जीभ का सकारात्मक उपयोग करें.


माँगे ही दुख होय

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मांगे ही दुःख का कारण हैं इसके ऊपर एक लोक प्रिय मजाकिया काल्पनिक कहानी सुनने को मिलता है।

जब भगवान ने दुनिया बनाई, तब उसने पहले गधा को बनाया और उससे कहा कि तु सूर्योदय से सूर्यास्त तक दिन भर तेज़ धुप में भी अपने मालिक की गुलामी करगा । अपनी पीठ पर बोझ लेकर घास खाएगा, तेरा कोई बुद्धि नहीं होगी और तू 60 साल तक जियेगा । गधे ने जवाब दिया कि मैं एक गधा हूँगा, लेकिन 60 साल जीना मेरेलिए ज्यादा है । मुझे केवल बीस साल तक ही जीना है । भगवान ने गधा की बात मान ली और उसे 20 साल की उम्र दे दी ।

फिर भगवान ने कुत्ते को बनाया और उससे कहा कि तू एक कुत्ता होगा, तू लोगों के घर की चौकीदारी करेगा और इंसान की सबसे अच्छा दोस्त बनेगा और कुछ भी दिया हुआ संतोष से खायेगा और तू 25 साल तक जियेगा । कुत्ते ने उत्तर दिया 25 साल तक जीना मेरेलिए ज्यादा हैं, आप मुझे केवल 10 साल दें । भगवान ने कुत्ता की बात मान ली और उसे 10 साल की उम्र दे दी ।

और फिर भगवान ने बंदर बनाएं और भगवान ने बंदर से कहा – तुम लोगों का मनोरंजन करना, उन्हें करतब दिखाना और उन्हें खूब हसाना । में तुझे जीने के लिए 20 साल की उम्र देता हूँ । बन्दर ने कहा – करतब दिखाने के लिए 20 साल की उम्र? आपको यह ज्यादा नहीं लगती? में भी उन कुत्तों की तरह आपको 20 साल की उम्र में से 10 साल आपको वापस लौटाता हूँ । भगवान राजी हो गया ।

फिर भगवान ने इंसान को बनाया, और कहा तुम – सोना, भर-पेट खाना, खेलना, शादी करना, अपनी जिंदगी में खूब मजे करना में तुम्हें जीने के लिए 20 साल देता हूँ । इंसान ने कहा – क्या ? सिर्फ 2० साल ? आदमी ने इस्वर से कहा, में मेरे 20 साल, और 40 वो जो गधा ने आपको दिये थे, 15 और 10 साल वो जो कुत्ते और बन्दर ने आपको दिये थे, यह सब मुझे चाहिए । ईश्वर राजी हो गए और ईश्वर ने अपनी हाँ भर दी और तब से मनुष्य एक आदमी के रूप में 20 साल तक मजा करता है, वह शादी करता है और 40 साल तक गधे की तरह काम करता है और उसके फॅमिली बोझ को संभालता है, जब उसके बच्चे बड़े होने लगते हैं, वह कुत्ते की तरह 15 साल तक घर, फॅमिली, बीवी और बच्चों का रखवाली करता है घर में जो भी कुछ खाने को दिया जाता है उसे खाता है; और जब वह बूढ़ा हो जाता है वह रिटायर हो कर बाकी की जिंदगी एक बंदर की तरह बच्चों की एक घर से दुषरे घर जाकर अपने पोते-पोतियों को हँसाता है ।

हमारी, और-और मांगने की आदत से ही हम परेशान हैं, हमें जितना मिलता है उससे हम कभी संतुष्ट ही कहा हुए? हमारे दुखो का कारण सिर्फ एक है और वह हैं – असंतुष्टि ।


दैत्य से बचना

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किसी नगर में एक सेठ रहता था उसके दो बेटे थे, दोनों ही जवान और निकम्मे थे । सेठ स्वयं खुब मेहनत करता और बेटों से भी काम करने को कहता मगर बेटों पर उसकी बातों का कोई असर नही पडता था।

जब सेठ बुढा होकर मरने वाला था, तो उसने दोनों बेटों को पास बुलाकर कहा- मैं तुम दोनों को व्यापार करने के लिए थोडा-थोडा धन दे रहा हूं इसे लेकर कोई व्यापार शुरू कर दो पर ध्यान रहे, राह में तुम्हें एक दैत्य मिलेगा उससे बचना।

धन देने के लिए सेठ ने जैसे ही तिजोरी खोली, दोनों बेटों की नजर उस पर पडी तिजोरी हीरे, जवारात और सोने चांदी से भरी पडी थी। तिजोरी में इतना माल देखकर दोनों के दिल खिल उठे उन्होंने सोचा इतने धन से तो हम जिंदगीभर बैठे-बैठे खा सकते है । फिर भला हमें व्यापार करने जाने की क्या जरुरत है ? यह सोच दोनों व्यापार करने गये ही नहीं ।

जब पिता की मृत्यु हो गई तो बेटों ने सोचा यदि किसी तरह मैं अपने छोटे भाई का खात्मा कर दूं तो मैं सारी संपत्ति का वारिस बन जाउंगा उधर छोटे भाई के मन में भी ऐसा ही खयाल आया, क्यों न मैं अपने बडे भाई के भोजन में जहर मिला दूं पर जैसे ही वह जहरीला भोजन लेकर बडे भाई के पास पहूंचा वह पहले से ही तैयार बैठा था ।

छोटे भाई के आते ही वह उस पर टूट पडा और उसका गला दबोचकर मार डाला। छोटे भाई का लाया भोजन किया और पलंग पर लैट गया और बिस्तर पर ही ढेर हो गया ।

जहरीेले भोजन ने उसका काम तमाम कर दिया था । पिता ने ठीक ही कहा था कि दैत्य से बचना वह दैत्य कोई और न होकर संचित धन के लालच का ही तो था । अपने पिता के संकेत को दोनों बेटों में से कोई न समझ सका और अंत में दोनों को ही अपनी जान गवानी पडीं | ऐसा नहीं हैं की सिर्फ धन का लालच ही बुरा होता हो, लालच मात्र ही बुरा होता हैं | फिर चाहे वह किसी भी चीज से सम्बंधित क्यों न हो |

और ऐसा नहीं हैं की इस देत्य की मुलाक़ात सिर्फ इन दोनों निकम्मे लड़को से ही हुई हो | इस देत्य की मुलाकात सभी से होती, अगर आपके जीवन में यह देत्य अभी नहीं आया तो चिंता मत करें यह आएगा और आपको इसके आने की खबर भी नहीं लगेगी |


बईमानी का अंजाम बईमानी

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एक़ बार क़ी बात है किसी गांव में एक़ किसान था जो क़ी दुध से दही और मख्खन बना-क़र उसे बेचकर घर चलाता था एक़ दिन उसकी पत्नी ने उसे मख्खन तैय्यार क़र के दिया वो उसे बेचने के लिये अपने गांव से शहर क़ी तरफ़ रवाना हो गया..

वो मख्खन गोल-मोल पेढ़ो क़ी शकल् में बना हुआ था और हर पेढ़े का वजन एक़ Kilogram था | शहर में किसान ने उस मख्खन क़ो रोज़ क़ी तरह एक़ दूकानदार क़ो बैच दिया, और दूकानदार से चायपत्ति, चिनी, रसोई का तेल और साबून वगैरह ख़रीदकर वापस अपने गांव जाने के लिये रवाना हो गया,

उस किसान के जाने के बाद उस दूकानदार ने मख्खन क़ो Freezer में रखना शुरू किया और उसे अचानक ख़याल आया क़ी क्यों ना इनमें से एक़ पेढ़े का वजन चेक किया जाए, वजन तोलने पर पेढ़ा सिर्फ़ 900 Gram. का निकला, हेरत और निराषा से उसने सारें पेढ़े तोल डालें मग़र किसान के लाए हुए सभि पेढ़े 900-900 Gram के हि निकलें । ठीक अगले हफ़्ते फ़िर किसान हमेषा क़ी तरह मख्खन लेकर जैसे ही दूकानदार क़ी दहलीज पर चढा दूकानदार ने किसान से चिल्लाते हुए कहा, – तू दफा हो जा यहाँ से, किसी बेइमान और धोखेबाज शख़्स से क़ारोबार करना, पर मूझसे नहीं । 900 Gram. मख्खन को पूरा एक़ किलो 1.KG कह-क़र बेचने वाले शख़्स क़ी वो शक़्ल भी देखना गवारा नहीं करता |

किसान ने बडी ही आजिज़ी (विनम्रता) से दूकानदार से कहा “मे्रे भाई मूझसे बद-ज़न ना हो हम तो ग़रीब और बेचारे लोग है, हमारी पास माल तोलने के लिए बाट (वजन) ख़रीदने की हेसियत कहां” आपसे जो एक़ किलो चिनी लेकर जाता हूं उसी क़ो तराज़ू के एक़ पलडें मे रख-क़र दुसरें पलडें मे उतने ही वजन का मख्खन तोलकर ले आता हूं।


हीरो से भरा खेत

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हफ़ीज अफ़्रीका का एक़ किसान था वह अपनी ज़िन्दगी से ख़ुश और संतुश्ट था। हफ़ीज ख़ुश ईसलिए था क़्योंकि वह संतुश्ट था। वह संतुश्ट ईसलिए था क्योंकि वह ख़ुश था।

एक़ दिन एक़ अक़्लमन्द आदमी उसके पास आया और हफ़ीज को हिरों के महत्त्व और उनसें जुङी ताकत के बारे मेँ बताया। उसनें हफ़ीज से कहा- अग़र तुम्हारे पास अंगूठे जीतना भी बडा हीरा हो तो तुम पुरा शहर ख़रीद सकते हो।

और अग़र तुम्हारें पास मुठ्ठी जीतना बडा हीरा हो तो तुम आपने लिये शायद पुरा देश ही ख़रीद लो । वह अक़्लमन्द आदमी ईतना क़ह-क़र वहां से चला गया। उस रात हफ़ीज सो नहीँ सका । वह असंतुष्ट हो चुका था ईसलिए उसकि ख़ुशी भी ख़त्म हो चुकीं थी।

दुसरे दिन सुबह होतें ही हफ़ीज ने अपने खेतेां को बेंचने और अपने परीवार क़ी देख़-भाल का इंतज़ाम क़िया और हीरे खोज़ने के लिये रवाना हो गया। वह हिरों क़ी ख़ोज मेँ पुरे अफ़्रीका मेँ भटकता रहा पर उन्हें पा न सका।

उसने उन्हेँ Europe मेँ भी ढूंढा पर वे उसे वहां भी नहीँ मीलें । Spain पहूंचते-पहूंचते वह मानसीक, शारिरिक और आर्थीक स्तर पर पूरी तरह टुट चुका था। वह ईतना मायुस हो चूका था की उसने बर्सिलोना नदी मेँ कुदकर ख़ुद-ख़ुशी क़र ली।

ईधर जीस आदमी ने हफ़ीज के ख़ेत ख़रीदें थे वह एक़ दिन उन ख़ेतों से होंकर बहनें वाले नालेँ मेँ अपने ऊंटों को पानी पिला रहा था तभी सुबह के वक्त ऊग रहें सुरज क़ी किरणेँ नालेँ के दुसरी ओर पढ़े एक़ पथ्थर पर पडी और वह इंद्र धनुष क़ी तरह जगमगा ऊठा ।

यह सोंचकर क़ी वह पथ्थर उसकि बैठक मेँ अच्छा दीखेगा उसने उसे उठा क़र अपनी बैठक कक्ष मेँ सजा दिया उस दिन दोपहर मेँ हफ़ीज क़ो हीरों के बारें मेँ बताने वाला आदमीं ख़ेतों के इस नए मालिक़ के पास आया, उसनें उस जगमगाते हुए पथ्थर को देख़-पुछा -क्या हफ़ीज लौट आया ?

नए मालिक़ ने जवाब दिया- नहीँ लेक़िन आपने यह सवाल क़्यों पुछा ? अक़्लमन्द आदमीं ने ज़वाब दिया क्योंकी यह हिरा हैँ, में उन्हें देखतें ही पहचान जाता हूँ । नए मालिक़ ने कहा- नहीँ यह तो महज एक़ पथ्थर हैँ, मैने उसे नाले के पास से उठाया हैँ । चलिए मैं आपक़ो दीखाता हूँ, वहां ऐसे बहुत सारे पथ्थर पड़े हुए हैँ।

उन्होनें वहां से बहुत सरे पथ्थर उठाए और उन्हेँ जांचने परखने के लिये भेंज दिया। वे पथ्थर हीरे ही साबीत हुए। उन्होनें पाया क़ी उस ख़ेत में दुर-दुर तक़ हीरे दबे हुए थे। जब हमारा नज़रिया सहीं होता हैँ, तो हमेँ महसुस होता हैँ क़ी हम हीरों से बनीं हुई ज़मीन पर चल रहें हैँ। मौके हमेंशा हमारें पांव तले दबे हुए होतें हैँ और इसके लिए हमको उन्हेँ खोज़ने कहीं जाना नहीँ हैँ, वह ख़ुद हमारे पास हैँ जरुरत हैँ तो बस उस नजरिये क़ी जो क़ी उन्हेँ पहचान सकें |

लेक़िन हमें तो दुसरे के ख़ेत क़ी घाँस हमेशा हरी लगती हैँ | हमारे पास जितने भी क्यों न अच्छी साधन हो हमारी ललचाने क़ी आदत कभी नहीँ छुट्ती | इसी प्रकार दूसरे हमारे पास मौजूद चीजों को देखकर ललताते रहते है। हमसे अपनी जगह की अदला-बदली करने की जगह हासिल करने पर उन्हें ख़ुशी होगी।

हमें इस कहानी से बहुत ही अच्छी सिख तो यह मिलती हैँ क़ी जीस जोश, जूनून, और सकारात्मकता क़ो पाने के लिये हम किताबें सेमिनार करते हैँ, वह हमारे ख़ुद के अंदर हैँ | जी हां ! आप चाहें जितनी किताबें पढ़लें, लेक़िन जब तक़ आप आपने आपक़ो नहीँ पढ़ेंगे, समझेंगे तब तक़ सब किताबें व्यर्थ हैँ |


अपनी ज़मीन खोदे खज़ाना मिलेगा

short stories in hindi by premchand


एक राजधानी में एक भिखारी एक सड़क के किनारे बैठकर बीस-पच्चीस वर्षों तक भीख मांगता रहा। फिर मौत आ गयी, फिर मर गया। जीवन भर यही कामना की कि मैं भी सम्राट हो जाऊं। कौन भिखारी ऐसा है, जो सम्राट होने की कामना नहीं करता? जीवन भर हाथ फैलाये खड़ा रहा रास्तों पर।

लेकिन हाथ फैलाकर, एक-एक पैसा मांगकर कभी कोई सम्राट हुआ है? मांगने वाला कभी सम्राट हुआ है? मांगने की आदत जितनी बढ़ती है, उतना ही बड़ा भिखारी हो जाता है। सम्राट कैसे हो जायेगा? जो पच्चीस वर्ष पहले छोटा भिखारी था, पच्चीस वर्ष बाद पूरे नगर में प्रसिद्ध भिखारी हो गया था, लेकिन सम्राट नहीं हुआ था। फिर मौत आ गयी। मौत कोई फिक्र नहीं करती। सम्राटों को भी आ जाती है, भिखारियों को भी आ जाती है। और सच्चाई शायद यही है कि सम्राट थोड़े बड़े भिखारी होते हैं, भिखारी जरा छोटे सम्राट होते हैं। और क्या फर्क होता होगा!

वह मर गया भिखारी तो गांव के लोगों ने उसकी लाश को उठाकर फिकवा दिया। फिर उन्हें लगा कि पच्चीस वर्ष एक ही जगह बैठकर भीख मांगता रहा। सब जगह गंदी हो गयी। गंदे चीथड़े फैला दिये हैं। टीन-टप्पर, बर्तन-भांडे फैला दिये हैं। सब फिकवा दिया। फिर किसी को ख्याल आया कि पच्चीस वर्ष में जमीन भी गंदी कर दी होगी। थोड़ी जमीन उखाड़कर थोड़ी मिट्टी साफ कर दें। ऐसा ही सब व्यवहार करते हैं, मर गये आदमी के साथ। भिखारियों के साथ ही करते हों, ऐसा नहीं। जिसको प्रेमी कहते हैं, उनके साथ भी यही व्यवहार होता है। उखाड़ दी, थोड़ी मिट्टी भी खोद डाली।

मिट्टी खोदी तो नगर दंग रह गया। भीड़ लग गयी। सारा नगर वहां इकट्टा हो गया। वह भिखारी जिस जगह बैठा था, वहां बड़े खजाने गड़े हुए थे। सब कहने लगे, कैसा पागल था! मर गया पागल, भीख मांगते-मांगते! जिस जमीन पर बैठा था, वहां बड़े हंडे गड़े हुए थे, जिनमें बहुमूल्य हीरे-जवाहरात थे, स्वर्ण अशर्फियां थीं! वह सम्राट हो सकता था, लेकिन उसने वह जमीन न खोदी, जिस पर वह बैठा हुआ था! वह उन लोगों की तरफ हाथ पसारे रहा, जो खुद ही भिखारी थे, जो खुद ही दूसरों से मांग-मांगकर ला रहे थे! वे भी अपनी जमीन नहीं खोदे होंगे। उसने भी अपनी जमीन नहीं खोदी! फिर गांव के लोग कहने लगे, बड़ा अभागा था!

मैं भी उस गांव में गया था। मैं भी उस भीड़ में खड़ा था। मैंने लोगों से कहा, उस अभागे की फिक्र छोड़ो। दौड़ो अपने घर, अपनी जमीन तुम खोदो। कहीं वहां कोई खजाना तो नहीं? पता नहीं, उस गांव के लोगों ने सुना कि नहीं! आपसे भी यही कहता हूं-अपनी जमीन खोदो, जहां खड़े हैं, वहीं खोद लें। मैं कहता हूं, वहां खजाना हमेशा है!

लेकिन हम सब भिखारी हैं और कहीं मांग रहे हैं! प्रेम के बड़े खजाने भीतर हैं, लेकिन हम दूसरों से मांग रहे हैं कि हमें प्रेम दो! पत्नी पति से मांग रही है, मित्र-मित्र से मांग रहा है कि हमें प्रेम दो! जिनके पास खुद ही नहीं है, वे खुद दूसरों से मांग रहे हैं, कि हमें प्रेम दो! हम उनसे मांग रहे हैं! भिखारी भिखारियों से मांग रहे हैं! इसलिए दुनिया बड़ी बुरी हो गयी है। लेकिन अपनी जमीन पर, जहां हम खड़े हैं, कोई खोदने की फिक्र नहीं करता।

वह कैसे खोदा जा सकता है, वह थोड़ी-सी बात मैंने कही हैं। वहां खोदें, वहां बहुत खजाना है और प्रेम का खजाना खोदते-खोदते ही एक दिन आदमी सुख के खजाने तक पहुंच जाता है। और कोई रास्ता न कभी था, न है और न हो सकता है।

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