07 Best Moral Stories In Hindi | 2021

इस Blog में आपको Best Moral Stories In Hindi में पढ़ने को मिलेंगी जो आपने अपने दादा दादी से सुनी होंगी। ये hindi stories बहुत ही प्रेरक है। ऐसे  किस्से तो आपने अपने बचपन मे बहुत सुने होंगे पर ये किस्से कुछ अलग हौ। हमने भी इस ब्लॉग में Best Moral Stories In Hindi में लिखा है जिसको पढ़कर आपको बहुत ही ज्यादा आनंद मिलेगा और आपका मनोरंजन भी होगा। इसमे कुछ Best Moral Stories In Hindi दी गयी है। जिसमे आपको नयापन अनुभव होगा। यदि आप पुरानी कहानियाँ पढ़कर बोर हो गए है तो यहाँ पर हम आपको Best Moral Stories In Hindi दे रहे है जिसको पढ़कर आपको बहुत ही ज्यादा मज़ा आने वाला है।


07 Best Moral Stories In Hindi | 2021
07 Best Moral Stories In Hindi | 2021



दोस्त का महत्व | short stories in hindi with morals


वेद गर्मी की छुट्टी में अपनी नानी के घर जाता है। वहां वेद को खूब मजा आता है , क्योंकि नानी के आम का बगीचा है। वहां वेद ढेर सारे आम खाता है और खेलता है। उसके पांच दोस्त भी हैं , पर उन्हें बेद आम नहीं खिलाता है। एक दिन की बात है , वेद को खेलते खेलते चोट लग गई। वेद के दोस्तों ने वेद को उठाकर घर पहुंचाया और उसकी मम्मी से उसके चोट लगने की बात बताई , इस पर वेद को मालिश किया गया। मम्मी ने उन दोस्तों को धन्यवाद किया और उन्हें ढेर सारे आम खिलाएं। वेद जब ठीक हुआ तो उसे दोस्त का महत्व समझ में आ गया था। अब वह उनके साथ खेलता और खूब आम खाता था।


सन्त और बिच्छू | short stories in hindi with morals


एक समय की बात है एक बार एक संत समुद्र के किनारे किनारे जा रहे थे उन्होंने देखा एक बिच्छू पानी में डूब रहा है संत को दया आ गयी उन्होंने उसे उठाकर पानी से बहार छोड़ दिया फिर कुछ पल बाद देखा तो फिर लहार आयी और उस बिच्छू को फिर बहकर ले जा रही थी संत ने फिर बिच्छू को उठाया तो बिच्छू संत को डंक मारने लगा संत ने फिर भी उसे पानी से बचाया। फिर लहर आयी और उस बिच्छू को बहा ले गयी।

संत ने फिर उसे बचाया बिच्छू ने फिर डंक मारने की कोशिश की . ऐसा कई बार हुआ संत उसे बचाते और बिच्छू डंक मारने की कोशिश करता।

ये सब एक व्यक्ति देख रहा था उसने संत को आकर पूछा की आप उस बिच्छू को क्यों बचा रहे है मारने दो इसे ये तो आपको ही डंक मर रहा है तो संत ने जवाव दिया की ऐसे कैसे छोड़ दू जब बिच्छू अपना डंक मारने का सवभाव है छोड़ रहा तो में अपना दुसरो का हिट करने का स्वभाव कैसे छोड़ दू ।


मुर्गाभाई और कौवेराम कि कथा | short stories in hindi with morals


संसार के सबसे बड़े 3 देवताओं में से एक ब्रह्माजी धरती पर भ्रमण करने निकले थे। सभी जीवचर उनके दर्शनों के अभिलाषी थे। इस कारण जैसे ही उनके आने की सूचना मिली, संसार के सभी प्राणी उनके जोरदार स्वागत की तैयारी में लग गए। कोई सुंदर सुगंधित मालाएं गूथने लगा तो कोई मीठे-मीठे फल-कंद और शहद एकत्रित करने लगा। जंगली जानवरों को इस बात की भनक लगी तो वे भी ब्रह्माजी के स्वागत की तैयारी करने लगे। जंगल के राजा शेरसिंह ने आदेश पारित कर दिया कि जंगल के सभी जानवरों को ब्रह्माजी के स्वागत के लिए अनिवार्यत: उपस्थित रहना पड़ेगा। समय कम था इस कारण शेरसिंह ने सभी बड़े जानवरों को बुलाकर समझाया कि एक जानवर दूसरे जानवर को और दूसरा जानवर तीसरे जानवर को इस तरह सूचित करे कि जंगल के छोटे से छोटे जानवर को भी यह समाचार प्राप्त हो जाए कि ब्रह्माजी का स्वागत करना है और उपस्थिति अनिवार्य है। ब्रह्माजी सुबह 6 बजे निकलने वाले थे इससे शेरसिंह ने सबको 5.30 बजे हाजिर होकर पंक्तिबद्ध होकर उनका स्वागत करने की योजना तैयार कर ली थी। सभी जानवर एक-दूसरे को सूचना दे रहे थे ताकि कोई छूट न जाए। यथासमय ब्रह्माजी अपने रथ पर सवार होकर जंगल से गुजरे। सड़क के दोनों ओर जानवर हाथों में माला और फल लेकर कतारबद्ध खड़े थे। उनका स्वागत करने लगे। इस तरह रंगारंग और भव्य स्वागत होता देखकर ब्रह्माजी गदगद हो गए। जंगल में मंगल ही मंगल हो रहा था। उन्हें फूलों की मालाओं से लाद दिया गया था। खुशी के मारे वे मालाएं उतार-उतारकर जानवरों के बच्चों की ओर फेंकने लगे। अचानक उन्होंने वनराज से पूछा कि 'राजा साहब, सभी जानवर तो यहां दिखाई पड़ रहे हैं, परंतु मुर्गा भाई और कौवाराम नहीं दिख रहे?' शेरसिंह ने देखा कि मुर्गा और कौवा सच में गायब थे। ब्रह्माजी ने इसे अपना अपमान समझा और जोर से दहाड़े कि तुरंत दोनों को मेरे सामने हाजिर किया जाए। डर के मारे शेरसिंह की घिग्गी बंध गई। वह डर गया कि कहीं ब्रह्माजी उससे राजपाट न छीन लें। आनन-फानन में हाथी को भेजकर कौवे और मुर्गे को बुलाकर ब्रह्माजी के समक्ष पेश कर दिया गया। ब्रह्माजी ने दोनों को आग्नेय दृष्टि से देखा और प्रश्न दागा कि 'जब जंगल के सभी जानवर मेरे स्वागत में हाजिर हैं तो आप क्यों नहीं आए?' मुर्गा बोला कि 'नहीं आए, तो नहीं आए मेरी मर्जी, तुम कौन होते हो पूछने वाले? सुबह नींद ही नहीं खुली।' कौआ बोला कि 'आप कौन हैं? कहां से आए हैं? मैं क्यों आपका स्वागत करूं?' इतना अपमान सुन ब्रह्माजी का भेजा खराब हो गया तथा एक मंत्र फूंका और कौआरामजी और मुर्गाभाई जहां खड़े थे, वहीं खड़े रह गए। हाथ-पैर वहीं जम गए। हिलना-डुलना बंद हो गया। दोनों डर गए और क्षमा मांगने लगे- 'त्राहिमाम, गलती हो गई सरकार, क्षमा करें, हमारे बाल-बच्चे मर जाएंगे।' ब्रह्माजी टस से मस नहीं हुए व कहा कि 'उद्दंडों को दंड दिया ही जाना चाहिए', ऐसा कहकर वे आगे बढ़ने लगे। 'नहीं प्रभु, हमें माफ करो। आप जो भी प्रायश्चित करने को कहेंगे, हम तैयार हैं किंतु हमें उबारो प्रभु', दोनों फफक-फफककर रोने लगे। 'ठीक है आज से तुम सुबह 4 बजे उठकर संसार के सभी प्राणियों को सूचित करोगे कि भोर हो गई है उठ जाओ। इसके लिए तुम्हें कुकड़ूं कूं की सुरीली तान छेड़ना पड़ेगी।' 'इतना बड़ा दंड?', मुर्गे ने आंसू बहाते हुए पूछा। 'नहीं, यह बड़ा दंड नहीं है, लोग तुम्हारी प्रशंसा करेंगे। स्कूलों में भी तुम्हारे चर्चे होंगे, किताबों में तुम्हारे गीत पढ़े जाएंगे।' 'मुर्गा बोला हुआ सबेरा, अब तो आंखें खोलो' अथवा 'मुर्गे की आवाज सुनी, तो मुन्ना भैया जाग उठे', जैसे मीठे गीत बच्चे बड़े मजे से गाएंगे। 'जो आज्ञा भगवन्' मुर्गे की आंखों में आंसू आ गए। भगवान ने फिर मंत्र फूंका और वह अपनी पूर्वावस्था में आ गया। इधर कौआ भी पश्चाताप कर रहा था। ब्रह्माजी बोले कि 'आज के बाद तुम जल्दी उठकर लोगों के घर की छतों अथवा मुंडेरों पर बैठोगे और जिनके यहां मेहमान आने वाले होंगे, उनके यहां कांव-कांव करके पूर्व सूचना दोगे ताकि उस घर का मालिक मेहमान के स्वागत के लिए खाने-पीने के सामान तथा सब्जी-भाजी इत्यादि की व्यवस्था कर सके। अथवा यदि मेहमान 'मान न मान, मैं तेरा मेहमान' हो तो सुबह से घर में ताला लगाकर भाग सकें।' तब से ही आज तक ये बेचारे अपना धर्म निभा रहे हैं।


शहर और गाँव का चूहा | short stories in hindi with morals


बहुत समय पहले की बात है. दो चूहे बहुत अच्छे मित्र हुआ करते थे. दोनों में से एक चूहा शहर में रहता था और एक गाँव में. लेकिन दोनों अपने कुशल-मंगल होने की जानकारी दोनों स्थानों पर यात्रा करने वाले चूहों से लेते रहते थे. एक दिन शहर में रहने वाले चूहे का मन गाँव में रहने वाले अपने मित्र चूहे से मिलने का हुआ और उसने यह खबर एक गाँव जाने वाले चूहे की मदद से अपने मित्र तक पहुँचाई. अपने शहरी मित्र के आने की खबर सुनकर गाँव का चूहा बहुत खुश हुआ और उसके स्वागत की तैयारियां करने लगा. जिस दिन शहर का चूहा गाँव आया, गाँव का चूहा बहुत उत्साहित था. उसने उसका खुले दिल से स्वागत किया. दोनों ने बहुत सारी बातें की और विभिन्न विषयों पर चर्चा की. गाँव के चूहे ने शहर के चूहे को बताया, “शहर का वातावरण तो अशुद्ध होता है. लेकिन यहाँ गाँव में हम शुद्ध वातावरण में रहते हैं.” बहुत देर तक बातें करने के बाद वे दोनों भोजन करने बैठे. गाँव के चूहे ने अपने मित्र को फल और अनाज परोसा. भोजन के बाद वह शहरी चूहे को गाँव की सैर पर ले गया. उसने उसे गाँव के हरे-भरे खेत दिखाये. फिर वे दोनों जंगल चले गए और वहाँ की प्राकृतिक सुंदरता का नज़ारा लिया. वहाँ गाँव के चूहे ने शहर के चूहे से पूछा, “मित्र! क्या शहर में भी ऐसे सुंदर दृश्य हैं?” शहरी चूहे ने कोई उत्तर नहीं दिया. बल्कि, उसने गाँव के चूहे को शहर आने का निमंत्रण दे दिया, ताकि वह एक बार शहर के आरामदायक जीवन को निकट से देख सके. गाँव के चूहे ने वादा किया कि एक दिन वह ज़रूर शहर आएगा. यह सुनकर शहर का चूहा बोला, “एक दिन क्यों मित्र! तुम मेरे साथ ही शहर क्यों नहीं चलते?” गाँव का चूहा तैयार हो गया. सैर करने के बाद जब दोनों वापस लौटे, तब तक रात हो चुकी थी. रात में फिर फल और अनाज खाने के बाद दोनों हरी नरम घास पर सो गए. अगले दिन सुबह नाश्ते में गाँव के चूहे ने शहर के चूहे को फिर से फल और अनाज परोसा. यह देख शहर का चूहा खीझ गया और बोला, “तुम्हारे पास यहाँ गाँव में अच्छा खाना नहीं है. मेरे साथ शहर चलकर देखना वहाँ कितने प्रकार की चीज़ें खाने को मिलेंगी और वहाँ ज़िन्दगी कितनी आरामदायक होगी. चलो इसी समय शहर चलते है.” गाँव का चूहा तैयार हो गया. दिन भर यात्रा कर रात में दोनों शहर पहुंचे. शहर का चूहा एक बड़े घर में रहता था. जब वे भोजन के लिए बैठे, तो गाँव का चूहा यह देखकर दंग रह गया कि खाने की टेबल विभिन्न प्रकार के भोजन से सजी हुई है. इतने तरह का खाना उसने पहले कभी नहीं देखा था. शहर के चूहे ने उसे भोजन प्रारंभ करने के लिए कहा. दोनों भोजन करने लगे. गाँव के चूहे को पनीर का स्वाद बहुत पसंद आया और उसने उसका टुकड़ा तुरंत ख़त्म कर दिया. वे दोनों भोजन कर ही रहे थे कि अचानक उन्हें बिल्ली की आवाज़ सुनाई पड़ी. गाँव का चूहा घबरा गया. इस पर शहर के चूहे ने कहा, “मित्र! जल्दी खुद को अलमारी के भीतर छुपा लो, नहीं तो बिल्ली हमें खा जायेगी.” दोनों तुरंत अलमारी में जा घुसे और बिल्ली के जाने के बाद ही वहाँ से बाहर निकले. गाँव का चूहा डर के मारे काँप रहा था. बाहर निकलने के बाद शहर का चूहा फिर से भोजन करने लगा. उसने गाँव के चूहे को समझाते हुए कहा, “डरो मत मित्र. ये तो शहर की ज़िन्दगी का हिस्सा है. आओ खाना खा लो.” डरते-डरते गाँव का चूहा फिर से भोजन के लिए बैठा. इस बार उसने केक का एक छोटा टुकड़ा ख़त्म किया ही था कि एक लड़का कुत्ते को लेकर वहाँ आ गया. गाँव के चूहे के पूछने पर शहर के चूहे ने बताया कि वो उस घर के मालिक का बेटा है और उसके साथ में उसका पालतू कुत्ता है. वह फिर से गाँव के चूहे को लेकर अलमारी में छुप गया. उनके जाने के बाद वे बाहर आये. इस बार गाँव का चूहा और ज्यादा डरा हुआ था. वह डरते हुए बोला, “दोस्त! मुझे लगता है कि मुझे जाना चाहिए. इतने लज़ीज़ भोजन के लिए मैं तुम्हारा बहुत शुक्रगुजार हूँ. लेकिन यहाँ बहुत खतरा है.” उसके बाद वह वहाँ एक क्षण भी नहीं रुका और गाँव के लिए निकल पड़ा. गाँव पहुँचने के बाद ही उसने चैन की साँस ली और सोचने लगा, “जिन्दगी बहुत कीमती है.”।


गोनू झा की चतुराई | short stories in hindi with morals


मिथिला नरेश क‍ी सभा में उनके बचपन का मित्र परदेश आया था। नरेश उन्हें अपने अतिथि कक्ष में ले गए। उन्होंने अपने मित्र की खूब आवभगत की। अचानक मित्र की नजर दीवार पर लगे एक चित्र पर गई, चित्र खरबूजे का था। मित्र बोला - कितने सुंदर खरबूजे हैं। वर्षों से खरबूजे खाने को क्या, देखने को भी नहीं मिले। अगले दिन मित्र ने यही बात दरबार में दोहरा दी। मिथिला नरेश ने दरबारियों की तरफ देखकर कहा- क्या अतिथि की यह मामूली-सी इच्छा भी पूरी नहीं की जा सकती? सारे दरबारी, मंत्री, पुरोहित खरबूजे की खोज में लग गए। बाजार का कोना-कोना छान मारा। गांवों में भी जा पहुंचे। गांव वाले उनकी बात सुनकर हंसते कि इस सर्दी के मौसम में खरबूजे कहां। जब सब थक गए तो एक दरबारी ने व्यंग्य से कहा- महाराज, अतिथि की इच्छा गोनू झा ही पूरी कर सकते हैं। सच है इनके खेतों में इन दिनों भी बहुत सारे रसीले खरबूजे लगे हैं। मिथिला नरेश ने गोनू झा की तरफ देखा। नरेश की आज्ञा मानते हुए गोनू झा ने कुछ दिन का समय मांगा फिर कुछ उपाय सोचते हुए दरबार से चले गए। कई दिन बीतने पर भी गोनू झा दरबार में नहीं आए। पुरोहित ने कहा- कहीं डरकर गोनू झा राज्य छोड़कर तो नहीं चले गए। एक सुबह ‍जब मिथिला नरेश अपने मित्र के साथ बाग में टहल रहे थे तो गोनू झा कई सेवकों के साथ आए।सबने मिथिला नरेश को प्रणाम किया। सेवकों के साथ लाए टोकने जमीन पर रख दिए। उसमें खरबूजे थे। यह देख नरेश खुश हो उठे। उनके मित्र ने कहा कि आज वर्षों बाद इतने अच्छे खरबूजे देख रहा हूं।मिथिला नरेश ने सेवकों से छुरी और थाली लाने को कहा तो गोनू झा बोले- क्षमा करें महाराज, हमारे अतिथि ने कहा था कि वर्षों से खरबूजे नहीं देखे इसलिए ये खरबूजे खाने के लिए नहीं, देखने के लिए हैं। ये मिट्टी के बने हैं। नरेश सहित सभी दरबारी गोनू झा की चतुराई पर दंग रह गए। गोनू झा की चतुराई पर मित्र भी जोर से हंसा- वाह गोनू झा, समझो हमने खरबूजे देखे ही नहीं, खा ‍भी लिए। मि‍थिला नरेश ने गोनू झा को उसकी चतुराई के लिए ढेर सारा इनाम देते हुए उसको शाबाशी दी कि तुम सचमुच इस दरबार के अनमोल रत्न हो, तुम्हारी सूझबूझ से आज मेरे मित्र की इच्‍छा पूरी हो सकी।


वफ़ादार बूढ़ा सुलतान | short stories in hindi with morals


किसी गांव में एक गरीब किसान अपनी पत्नी और बच्चे के साथ रहता था। उसका एक वफादार कुत्ता भी था जिसका नाम सुल्तान था। सुल्तान काफी बूढ़ा हो गया था और उसके सारे दांत गिर गए थे। अब वो कुछ भी चबा नही पाता था, ना ही खाने के लिए और ना ही अपनी रक्षा के लिए। एक दिन किसान ने अपनी पत्नी से कहा – “कल मैं इस बूढ़े सुल्तान को जंगल में छोड़ आऊंगा, अब ये हमारे किसी काम का नहीं है।” उसकी पत्नी को उस वफादार जानवर पर दया आई और वो बोली – “उसने हमारी बहुत सेवा की है, वह अभी तक वफादार रहा है। उसने हम सबकी देखभाल की है अब हमें उसके इन आखिरी दिनों में उसकी देखभाल करनी चाहिए।” “अरे ऐसी बेवकूफी भरी बातें मत करो, उसके मुंह में एक भी दांत नहीं रहा और उससे कोई चोर नहीं डरता। अगर उसने हमारी सेवा की है तो उसके लिए उसे खूब अच्छा खाना पीना भी तो मिला है। अब मेरे पास ना पैसा है और ना भोजन इस बेकार कुत्ते पर बर्बाद करने के लिए।” – किसान ने अपनी पत्नी को जवाब दिया। वो बेचारा कुत्ता पास ही लेटा हुआ था उसने सब सुन लिया और वह बहुत दुखी था कि कल उसका अंतिम दिन होगा। सुल्तान ने अपने मन में सोचा – “यह क्या मेरा मालिक मुझे बेकार समझता है। मुझे जल्दी ही कुछ करना पड़ेगा वरना कल से मैं बेघर हो जाऊंगा। मुझे अपने मित्र भेड़िए की सलाह लेनी चाहिए।” तो वह शाम को निकल पड़ा जंगल में अपने दोस्त भेड़िए से मिलने के लिए और उसने उसे उस आने वाली आफत के बारे में बताया। सुल्तान की बात सुनकर भेड़िया बोला – “हे भगवान यह सचमुच बहुत दुख की बात है। पर तुम उदास मत होना, तुम्हें सिर्फ इतना करने है कि अपनी योग्यता का सबूत दो। मैंने एक तरकीब सोची है, ध्यान से सुनो। कल सुबह सवेरे रोज की तरह तुम्हारा मालिक अपनी पत्नी के साथ अपने खेतों में काम करने के लिए जाएगा और वे दोनों अपने साथ अपने नन्हें बच्चे को भी ले जायेंगे। हमेशा की तरह वह उस बच्चे को छाया में पेड़ के पास लेटा देंगे। तुम्हें बस यही करना होगा कि तुम भी वहां लेट जाओ। फिर मैं वहां आउंगा और तुम समझ जाओगे की आगे क्या करना है।” भेड़िए ने एक बहुत डरावनी और खतरनाक योजना बनाई थी। पर सुल्तान ने उस पर अमल किया इस उम्मीद में की शायद इससे उसकी जान बच जाएगी। अगले दिन सब वैसे ही हुआ जैसे कि उसने योजना बनाई थी। किसान और उसकी पत्नी खेत में काम कर रहे थे और सुल्तान उस नन्हे बच्चे के पास लेटा था और अपनी योजना के अनुसार भेड़िया प्रकट हुआ। सुल्तान ने भेड़िये से पूछा – “तुम आ गए दोस्त, यह बताओ कि अब मुझे क्या करना है?” अचानक भेड़िये ने बच्चे को उठा लिया और वो जंगल की ओर भाग गया। अपने मित्र की इस करतूत से हैरान होकर सुल्तान भौंकने लगा और जंगल में भेड़िए के पीछे भागा। किसान और उसकी पत्नी ने यह दूर से देखा और वे दोनों सुल्तान के पीछे भागे। भेड़िया जंगल के अंधेरे भाग की और पहुंचा और रुक गया। सुल्तान भी वहां पहुंचा और उसे चेतावनी दी – “तुम उस बच्चे को मेरे जीते जी नुकसान नहीं पहुंचा सकते” भेड़िया बोला – “मैं यहां बच्चे को नुकसान पहुंचाने नहीं आया, मैं बस तुम्हारे मालिक को दिखाना चाहता था कि तुम कितने अच्छे कुत्ते हो। अब बच्चे को वापस अपने मालिक के पास ले जाओ। वो यह सोचेगा कि तुमने इसे बचाया है और वो फिर कभी तुम्हें कोई नुकसान नहीं पहुचायेगा बल्कि इसके बिल्कुल विपरीत तुम उसके चहीते बन जाओगे।” भेड़िए ने बच्चे को वापस किया और सुल्तान को खुशकिस्मती की शुभकामनाएं दी। “धन्यवाद मेरे दोस्त तुमने तो मेरी जान बचा ली” – सुल्तान ने कहा और इसके बाद भेड़िया जंगल में चला गया। किसान और उसकी पत्नी जंगल में चिल्लाते हुए आए और उन्होंने देखा कि उनका बूढ़ा सुल्तान बच्चे को सुरक्षित और हिफाजत के साथ वापस ला रहा है। “मेरे दोस्त सुल्तान शाबाश शाबाश तुमने मेरे बच्चे को बचा लिया और मुझे दिखा दिया कि तुम कितने बढ़िया कुत्ते हो। माफ करना मेरे दोस्त। अब जब तक तुम जिंदा हो तब तक मैं तुम्हारा ख्याल रखूँगा।” – किसान आनंद से भर गया और बूढ़े सुल्तान को प्यार सहलाते हुए बोला “और तुम इसे छोड़ना चाहते थे।” – उसकी पत्नी ने कहा। “जाओ जल्दी से घर जाओ और बूढ़े सुल्तान के लिए कुछ नरम नरम रोटियां बनाओ जिन्हें उसे ज्यादा चबाना ना पड़े और मेरे बिस्तर का तकिया लाओ वो मैं इसे लेटने के लिए दूंगा।” – किसान बोला। उस समय के बाद से बूढ़ा सुल्तान इतने मजे में था जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी। कुछ दिन बाद भेड़िया सुल्तान से मिलने आया। भेड़िया बहुत खुश था कि उसकी बनाई योजना आसानी से सफल हुई। बूढ़े सुल्तान से उसने एक अनुरोध किया – “जो मैंने तुम्हारे लिए यह किया उसके लिए मैं दावत का हकदार हूँ।” “हाँ बेशक मेरे दोस्त मैं हर रोज तुम्हारे साथ अपना खाना बांटने को तैयार हूँ” – सुल्तान ने जवाब दिया। “नहीं नहीं मैं अपने खाने का इंतेज़ाम खुद कर लूंगा। तुम्हें बस यह करना है की जब मैं तुम्हारे मालिक की एक मोटी ताजी भेड़ उठा कर ले जाऊँ तो तुम आराम से सोते रहना।” यह सुन कर सुल्तान गुस्से से बोला – “क्या! कभी नहीं। मैं अपने मालिक को धोखा नहीं दे सकता। माफ करना मैं इससे सहमत नहीं हूँ।” भेड़िये ने सोचा कि ये ईमानदारी से नही मानेगा। भेड़िया रात को छुपकर आया और वो एक भेड़ ले जाने ही वाला था पर वफादार सुल्तान खतरे की आहट पाकर सतर्क हो गया और जोर जोर से भोंकने लगा। सुल्तान की आवाज सुनकर किसान उठ गया और एक बड़ी सी लाठी लेकर भेड़िये के पीछे भागा। भेड़िये को भेड़ छोड़कर भागना पड़ा पर वो जाते जाते सुल्तान को धमकी देकर गया कि तुम्हें इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी। अगले दिन भेड़िये ने अपने चापलूस दोस्त सियार को भेजा कि वह सुल्तान को चुनौती दे जंगल में आने की ताकि वो यह मामला सुल्टा सके। सियार सुल्तान के पास पहुंचा और बोला – “तुम पर भेड़िये ने एक बहुत बड़ा एहसान किया है, तुम उसके कर्जदार हो और तुमने अपना कर्जा नहीं चुकाया है। तुम्हें जंगल में आना पड़ेगा और तुम्हें भेड़िये से उस मार-पीट के लिए माफी मांगनी होगी जो तुम्हारे मालिक ने उसके साथ की है।” बूढ़े सुल्तान को पता था कि उसे सिर्फ माफ़ी मांगने के लिए नहीं बुलाया जा रहा बल्कि भेड़िया उसे पीटने की योजना बना रहा है। मगर फिर भी वो जंगल की ओर चल दिया। उसके साथ कोई भी नही था। रास्ते में उसे एक बिल्ली मिली जिसकी एक टांग टूटी हुई थी। बूढ़े सुल्तान की बात सुनकर वो लंगड़ी बिल्ली बोली की मैं भी तुम्हारे साथ चलूंगी। बिल्ली सुल्तान के साथ लंगड़ाते हुए चल रही थी। जंगल तक पहुंचते पहुंचते बिल्ली बहुत थक और अंगड़ाई लेते हुए उसने अपनी दुम फैला कर पूरी ऊपर उठा दी। भेड़िया और उसका दोस्त सियार पहले से ही उस जगह पर तैनात थे। जब उन्होंने सुल्तान को आते हुए देखा तो उन्हे लगा कि वह एक तलवार ला रहा है। उन्होंने बिल्ली की फैली हुई खड़ी दुम को तलवार समझा। सियार भेड़िये से बोला – “इस बूढ़े सुल्तान को यह तलवार कहां से मिली! मुझे यकीन है तुम्हारा खात्मा करने के लिए ही ये तलवार लेकर आया है भेड़िये। वहां एक बिल्ली भी है पर वह क्या कर रही है?” जब वह बेचारी बिल्ली अपनी तीन टांगों पर लंगड़ा रही थी तो वे हर बार यही सोच रहे थे कि वह पत्थर फेंक रही है उन्हें मारने के लिए। “मेरे ख्याल से हम यह जंग नहीं जीत पाएंगे भेड़िये। मैं तो छिपने जा रहा हूं।” – यह कहकर सियार झाड़ियों के पीछे छिप गया और भेड़िया कूदकर एक छोटे से पेड़ पर चढ़ गया। सुल्तान और बिल्ली जब वहां आए तो सोच रहे थे कोई दिख ही नहीं रहा। सियार हालांकि खुद को पूरी तरह छिपा नहीं पाया था, उसका एक कान अभी नजर आ रहा था। इस बीच बिल्ली सावधानी से इधर उधर देख रही थी। सियार ने अपने कान हिलाए। बिल्ली को लगा कि वहां एक चूहा है। वह उस पर झपट पड़ी और उसने सियार के कान को बुरी तरह नोच डाला और उसे लहु लुहान कर दिया। सियार ने बहुत भयानक शोर मचाया और वो बोला कि मुझे छोड़ दो जो दोषी है वो तो पेड़ पर बैठा है, वो रोते चिल्लाते वहां से भाग गया। हैरान होकर सुल्तान और बिल्ली ने ऊपर देखा। वहां एक भेड़िया नजर आया जो शर्मिंदा था कि उसने खुद को इतना भयभीत साबित किया। सुल्तान भेड़िये से बोला – “तुम वहां ऊपर क्या कर रहे हो दोस्त? डर के मारे छुपे हो ना।” भेड़िया नीचे उतरा पर वह शर्मिंदा था कि वह एक बुरा मित्र साबित हुआ लेकिन वो ज्यादा शर्मिंदा इस बात से था कि वो बहुत ज्यादा डरपोक साबित हुआ। बूढ़े सुल्तान ने भेड़िये को गले लगाया और उसके डर को दूर किया। ‘फ़िक्र मत करो अब मैं अपने दोस्त को चोट नहीं पहुँचाऊँगा।” – सुल्तान बोला। भेड़िये ने सबक सीख लिया था और उसने सुल्तान से फिर दोस्ती कर ली।


चतुर खरगोश | short stories in hindi with morals


एक वन में हाथियों का एक झुंड रहता था। झुंड के सरदार को गजराज कहते थे। वो विशालकाय, लम्बी सूंड तथा लम्बे मोटे दांतों वाला था। खंभे के समान उसके मोटे-मोटे पैर थे। जब वो चिंघाड़ता था तो सारा वन गूंज उठता था। गजराज अपने झुंड के हाथियों से बड़ा प्यार करता था। स्वयं कष्ट उठा लेता था, पर झुंड के किसी भी हाथी को कष्ट में नहीं पड़ने देता था और सारे के सारे हाथी भी गजराज के प्रति बड़ी श्रद्घा रखते थे। एक बार जलवृष्टि न होने के कारण वन में जोरों का अकाल पड़ा। नदियां, सरोवर सूख गए, वृक्ष और लताएं भी सूख गईं। पानी और भोजन के अभाव में पशु-पक्षी वन को छोड़कर भाग खड़े हुए। वन में चीख-पुकार होने लगी, हाय-हाय होने लगी। गजराज के झुंड के हाथी भी अकाल के शिकार होने लगे। वे भी भोजन और पानी न मिलने से तड़प-तड़पकर मरने लगे। झुंड के हाथियों का बुरा हाल देखकर गजराज बड़ा दुखी हुआ। वह सोचने लगा, कौन सा उपाय किया जाए, जिससे हाथियों के प्राण बचें। एक दिन गजराज ने तमाम हाथियों को बुलाकर उनसे कहा, 'इस वन में न तो भोजन है, न पानी है! तुम सब भिन्न-भिन्न दिशाओं में जाओ, भोजन और पानी की खोज करो।' हाथियों ने गजराज की आज्ञा का पालन किया। हाथी भिन्न-भिन्न दिशाओं में छिटक गए। एक हाथी ने लौटकर गजराज को सूचना दी, 'यहां से कुछ दूर पर एक दूसरा वन है। वहां पानी की बहुत बड़ी झील है। वन के वृक्ष फूलों और फलों से लदे हुए हैं।' गजराज बड़ा प्रसन्न हुआ। उसने हाथियों से कहा कि अब हमें देर न करके तुरंत उसी वन में पहुंच जाना चाहिए, क्योंकि वहां भोजन और पानी दोनों हैं। गजराज अन्य हाथियों के साथ दुसरे वन में चला गया। हाथी वहां भोजन और पानी पाकर बड़े प्रसन्न हुए। उस वन में खरगोशों की एक बस्ती थी। बस्ती में बहुत से खरगोश रहते थे। हाथी खरगोशों की बस्ती से ही होकर झील में पानी पीने के लिए जाया करते थे। हाथी जब खरगोशों की बस्ती से निकलने लगते थे, तो छोटे-छोटे खरगोश उनके पैरों के नीचे आ जाते थे। कुछ खरगोश मर जाते थे, कुछ घायल हो जाते थे। रोज-रोज खरगोशों के मरते और घायल होते देखकर खरगोशों की बस्ती में हलचल मच गई। खरगोश सोचने लगे, यदि हाथियों के पैरों से वे इसी तरह कुचले जाते रहे, तो वह दिन दूर नहीं जब उनका खात्मा हो जाएगा। अपनी रक्षा का उपाय सोचने के लिए खरगोशों ने एक सभा बुलाई। सभा में बहुत से खरगोश इकट्ठे हुए। खरगोशों के सरदार ने हाथियों के अत्याचारों का वर्णन करते हुए कहा, 'क्या हममें से कोई ऐसा है, जो अपनी जान पर खेलकर हाथियों का अत्याचार बंद करा सके ?' सरदार की बात सुनकर एक खरगोश बोल उठा, 'यदि मुझे खरगोशों का दूत बनाकर गजराज के पास भेजा जाए, तो मैं हाथियों के अत्याचार को बंद करा सकता हूं। 'सरदार ने खरगोश की बात मान ली और खरगोशों का दूत बनाकर गजराज के पास भेज दिया। खरगोश गजराज के पास जा पहुंचा। वह हाथियों के बीच में खड़ा था। खरगोश ने सोचा, वह गजराज के पास पहुंचे तो किस तरह पहुंचे। अगर वह हाथियों के बीच में घुसता है, तो हो सकता है, हाथी उसे पैरों से कुचल दे। यह सोचकर वह पास ही की एक ऊंची चट्टान पर चढ़ गया। चट्टान पर खड़ा होकर उसने गजराज को पुकारकर कहा, 'गजराज, मैं चंद्रमा का दूत हूं। चंद्रमा के पास से तुम्हारे लिए एक संदेश लाया हूं।' चद्रमा का नाम सुनकर, गजराज खरगोश की ओर आकर्षित हुआ। उसने खरगोश की ओर देखते हुए कहा, 'क्या कहा तुमने? तुम चद्रमा के दूत हो? तुम चंद्रमा के पास से मेरे लिए क्या संदेश लाए हो?' खरगोश बोला, 'हां गजराज, मैं चंद्रमा का दूत हूं। चंद्रमा ने तुम्हारे लिए संदेश भेजा है। सुनो, तुमने चंद्रमा की झील का पानी गंदा कर दिया है। तुम्हारे झुंड के हाथी खरगोशों को पैरों से कुचल-कुचलकर मार डालते हैं। चंद्रमा खरगोशों को बहुत प्यार करते हैं, उन्हें अपनी गोद में रखते हैं। चंद्रमा तुमसे बहुत नाराज हैं। तुम सावधान हो जाओ। नहीं तो चंद्रमा तुम्हारे सारे हाथियों को मार डालेंगे।' खरगोश की बात सुनकर गजराज भयभीत हो उठा। उसने खरगोश को सचमुच चंद्रमा का दूत और उसकी बात को सचमुच चंद्रमा का संदेश समझ लिया उसने डर कर कहा, 'यह तो बड़ा बुरा संदेश है। तुम मुझे तुरंत चंद्रमा के पास ले चलो। मैं उनसे अपने अपराधों के लिए क्षमा याचना करूंगा।' खरगोश गजराज को चंद्रमा के पास ले जाने के लिए तैयार हो गया। उसने कहा, 'मैं तुम्हें चंद्रमा के पास ले चल सकता हूं, पर शर्त यह है कि तुम अकेले ही चलोगे।' गजराज ने खरगोश की बात मान ली। पूर्णिमा की रात थी। आकाश में चंद्रमा हंस रहा था। खरगोश गजराज को लेकर झील के किनारे गया। उसने गजराज से कहा, 'गजराज, मिलो चंद्रमा से ' खरगोश ने झील के पानी की ओर संकेत किया। पानी में पूर्णिमा के चंद्रमा की परछाईं को ही चंद्रमा मान लिया। गजराज ने चंद्रमा से क्षमा मांगने के लिए अपनी सूंड पानी में डाल दी। पानी में लहरें पैदा हो उठीं, परछाईं अदृश्य हो गई। गजराज बोल उठा, 'दूत, चंद्रमा कहां चले गए ?' खरगोश ने उत्तर दिया, 'चंद्रमा तुमसे नाराज हैं। तुमने झील के पानी को अपवित्र कर दिया है । तुमने खरगोशों की जान लेकर पाप किया है इसलिए चंद्रमा तुमसे मिलना नहीं चाहते।' गजराज ने खरगोश की बात सच मान ली । उसने डर कर कहा, 'क्या ऐसा कोई उपाय है, जिससे चंद्रमा मुझसे प्रसन्ना हो सकते हैं?' खरगोश बोला 'हां, है। तुम्हें प्रायश्चित करना होगा। तुम कल सवेरे ही अपने झुंड के हाथियों को लेकर यहां से दूर चले जाओ। चंद्रमा तुम पर प्रसन्न हो जाएंगे।' गजराज प्रायश्चित करने के लिए तैयार हो गया। वह दूसरे दिन हाथियों के झुंड सहित वहां से चला गया। इस तरह खरगोश की चालाकी ने बलवान गजराज को धोखे में डाल दिया और उसने अपनी बुद्घिमानी के बल से ही खरगोशों को मृत्यु के मुख में जाने से बचा लिया।

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