10 Best Moral Stories In Hindi | दिल खुश कर देने वाली कहानियाँ

इस Blog में आपको 10 Best Moral Stories In Hindi में पढ़ने को मिलेंगी जो आपने अपने दादा दादी से सुनी होंगी। ये hindi stories बहुत ही प्रेरक है। ऐसे  किस्से तो आपने अपने बचपन मे बहुत सुने होंगे पर ये किस्से कुछ अलग हौ। हमने भी इस ब्लॉग में 10 Best Moral Stories In Hindi में लिखा है जिसको पढ़कर आपको बहुत ही ज्यादा आनंद मिलेगा और आपका मनोरंजन भी होगा। इसमे कुछ 10 Best Moral Stories In Hindi दी गयी है। जिसमे आपको नयापन अनुभव होगा। यदि आप पुरानी कहानियाँ पढ़कर बोर हो गए है तो यहाँ पर हम आपको 10 Best Moral Stories In Hindi दे रहे है जिसको पढ़कर आपको बहुत ही ज्यादा मज़ा आने वाला है।


10 Best Moral Stories In Hindi
10 Best Moral Stories In Hindi


मोटी बकरी


10 Best Moral Stories In Hindi


एक बार महाराजा कृष्णदेव राय ने तेनालीराम को एक बकरी दी और कहा कि जितनी घास यह खाती है तुम्हें उससे तीन गुना ज्यादा घास रोज़ाना इसको खिलानी है। साथ में महाराज ने यह भी कहा कि तेनाली रामन ध्यान रखना बकरी का वजन बढ़ना नहीं चाहिए। यदि बकरी का वजन नहीं बढ़ा तो तेनाली को इनाम दिया जाएगा लेकिन यदि बकरी का वजन बढ़ गया तो तेनाली को दंड भुगतना होगा। तेनाली ने खुशी-खुशी इस बात को स्वीकार कर लिया। राजा और बाकी दरबारी सोच रहे थे कि अब तो तेनाली फंसा ही समझो। राजा ने वज़न तुलवा कर बकरी तेनाली के हवाले कर दी। तेनाली ने बकरी ली और चुपचाप घर चला गया। दिन में तेनाली बकरी को खूब घास खिलाता, मगर रात को बकरी के सामने कसाई का एक बड़ा छुरा टांग देता था। तेनाली रात को कई बार बकरी के सामने ही उस छुरे को बड़े से पत्थर पर घिसने बैठ जाता था और कभी कभी तो झूठ मूठ बकरी की गर्दन पर छुरे को रख देता। बकरी का तो सारा खून जल जाता, उसका दिन भर का खाया पिया डर और घबराहट से सब बराबर हो जाता था। एक महीने तक तेनाली ने ऐसा ही किया। एक महीने बाद तेनालीराम फिर से दरबार में हाजिर हुआ। महाराज सोच रहे थे कि बकरी तो खा पी कर खूब मोटी हो गई होगी। लेकिन जब बकरी का वज़न किया गया तो महाराज तथा सारे दरबारी हैरान रह गए। बकरी का वज़न बिल्कुल उतना ही निकला जितना एक महीने पहले था। महाराज ने पूछा की तेनाली तुमने बकरी को तीन गुना ज्यादा चारा खिलाया या नही? तेनाली ने जवाब दिया कि महाराज मैंने पूरी ईमानदारी से बकरी को रोज तीन गुना ज्यादा चारा खिलाया। महाराज ने पूछा फिर बकरी मोटी क्यों नहीं हुई? उतनी की उतनी कैसे है? तब तेनाली ने महाराज को सारी बात बताई कि कैसे वह दिन में उसे तीन गुना ज्यादा चारा खिलाता था लेकिन रात को उसके सामने कसाई का बड़ा छुरा टांग देता था और घबरा-घबरा कर बकरी का वज़न फिर बराबर हो जाता था।


ईमानदारी की जीत


10 Best Moral Stories In Hindi


चारों ओर सुंदर वन में उदासी छाई हुई थी। वन को अज्ञात बीमारी ने घेर लिया था। वन के लगभग सभी जानवर इस बीमारी के कारण अपने परिवार का कोई न कोई सदस्य गवां चुके थे। बीमारी से मुकाबला करने के लिए सुंदर वन के राजा शेर सिंह ने एक बैठक बुलाई। बैठक का नेतृत्व खुद शेर सिंह ने किया। बैठक में गज्जू हाथी, लंबू जिराफ, अकड़ू सांप, चिंपू बंदर, गिलू गिलहरी, कीनू खरगोश सहित सभी जंगलवासियों ने हिस्सा लिया। जब सभी जानवर इकठ्ठे हो गए, तो शेर सिंह एक ऊंचे पत्थर पर बैठ गया और जंगलवासियों को संबोधित करते हुए कहने लगा, 'भाइयों, वन में बीमारी फैलने के कारण हम अपने कई साथियों को गवाँ चुके हैं। इसलिए हमें इस बीमारी से बचने के लिए वन में एक अस्पताल खोलना चाहिए, ताकि जंगल में ही बीमार जानवरों का इलाज किया जा सके।' इस पर जंगलवासियों ने एतराज जताते हुए पूछा कि अस्पताल के लिए पैसा कहां से आएगा और अस्पताल में काम करने के लिए डॉक्टरों की जरूरत भी तो पड़ेगी? इस पर शेर सिंह ने कहा, यह पैसा हम सभी मिलकर इकठ्ठा करेंगे। यह सुनकर कीनू खरगोश खड़ा हो गया और बोला, 'महाराज! मेरे दो मित्र चंपकवन के अस्पताल में डॉक्टर हैं। मैं उन्हें अपने अस्पताल में ले आऊंगा।' इस फैसले का सभी जंगलवासियों ने समर्थन किया। अगले दिन से ही गज्जू हाथी व लंबू जिराफ ने अस्पताल के लिए पैसा इकठ्ठा करना शुरू कर दिया। जंगलवासियों की मेहनत रंग लाई और जल्दी ही वन में अस्पताल बन गया। कीनू खरगोश ने अपने दोनों डॉक्टर मित्रों वीनू खरगोश और चीनू खरगोश को अपने अस्पताल में बुला लिया। राजा शेर सिंह ने तय किया कि अस्पताल का आधा खर्च वे स्वयं वहन करेंगे और आधा जंगलवासियों से इकठ्ठा किया जाएगा। इस प्रकार वन में अस्पताल चलने लगा। धीरे-धीरे वन में फैली बीमारी पर काबू पा लिया गया। दोनों डॉक्टर अस्पताल में आने वाले मरीजों की पूरी सेवा करते और मरीज भी ठीक हो कर डाक्टरों को दुआएं देते हुए जाते। कुछ समय तक सब कुछ ठीक ठाक चलता रहा। परंतु कुछ समय के बाद चीनू खरगोश के मन में लालच बढ़ने लगा। उसने वीनू खरगोश को अपने पास बुलाया और कहने लगा यदि वे दोनों मिल कर अस्पताल की दवाइयां दूसरे वन में बेचें तथा रात में जाकर दूसरे वन के मरीजों को देखें तो अच्छी कमाई कर सकते हैं और इस बात का किसी को पता भी नहीं लगेगा। वीनू खरगोश पूरी तरह से ईमानदार था, इसलिए उसे चीनू का प्रस्ताव पसंद नहीं आया और उसने चीनू को भी ऐसा न करने का सुझाव दिया। लेकिन चीनू कब मानने वाला था। उसके ऊपर तो लालच का भूत सवार था। उसने वीनू के सामने तो ईमानदारी से काम करने का नाटक किया। परंतु चोरी-छिपे बेइमानी पर उतर आया। वह जंगलवासियों की मेहनत से खरीदी गई दवाइयों को दूसरे जंगल में ले जाकर बेचने लगा तथा शाम को वहां के मरीजों का इलाज करके कमाई करने लगा। धीरे-धीरे उसका लालच बढ़ता गया। अब वह अस्पताल के कम, दूसरे वन के मरीजों को ज्यादा देखता। इसके विपरीत, डॉक्टर वीनू अधिक ईमानदारी से काम करता। मरीज भी चीनू की अपेक्षा डॉक्टर वीनू के पास जाना अधिक पसंद करते। एक दिन सभी जानवर मिलकर राजा शेर सिंह के पास चीनू की शिकायत लेकर पहुंचे। उन्होंने चीनू खरगोश की कारगुजारियों से राजा को अवगत कराया और उसे दंड देने की मांग की। शेर सिंह ने उनकी बात ध्यान से सुनी और कहा कि सच्चाई अपनी आंखों से देखे बिना वे कोई निर्णय नहीं लेंगे। इसलिए वे पहले चीनू डॉक्टर की जांच कराएंगे, फिर अपना निर्णय देंगे। जांच का काम चालाक लोमड़ी को सौंपा गया, क्योंकि चीनू खरगोश लोमड़ी को नहीं जानता था। लोमड़ी अगले ही दिन से चीनू के ऊपर नजर रखने लगी। कुछ दिन उस पर नजर रखने के बाद लोमड़ी ने उसे रंगे हाथों पकड़ने की योजना बनाई। उसने इस योजना की सूचना शेर सिंह को भी दी, ताकि वे समय पर पहुंच कर सच्चाई अपनी आंखों से देख सकें। लोमड़ी डॉक्टर चीनू के कमरे में गई और कहा कि वह पास के जंगल से आई है। वहां के राजा काफी बीमार हैं, यदि वे तुम्हारी दवाई से ठीक हो गए, तो तुम्हें मालामाल कर देंगे। यह सुनकर चीनू को लालच आ गया। उसने अपना सारा सामान समेटा और लोमड़ी के साथ दूसरे वन के राजा को देखने के लिए चल पड़ा। शेर सिंह जो पास ही छिपकर सारी बातें सुन रहा था, दौड़कर दूसरे जंगल में घुस गया और निर्धारित स्थान पर जाकर लेट गया। थोड़ी देर बाद लोमड़ी डॉक्टर चीनू को लेकर वहां पहुंची, जहां शेर सिंह मुंह ढंककर सो रहा था। जैसे ही चीनू ने राजा के मुंह से हाथ हटाया, वह शेर सिंह को वहां पाकर सकपका गया और डर से कांपने लगा। उसके हाथ से सारा सामान छूट गया, क्योंकि उसकी बेइमानी का सारा भेद खुल चुका था। तब तक सभी जानवर वहां आ गए थे। चीनू खरगोश हाथ जोड़कर अपनी कारगुजारियों की माफी मांगने लगा। राजा शेर सिंह ने आदेश दिया कि चीनू की बेइमानी से कमाई हुई सारी संपत्ति अस्पताल में मिला ली जाए और उसे धक्के मारकर जंगल से बाहर निकाल दिया जाए। शेर सिंह के आदेशानुसार चीनू खरगोश को जंगल से बाहर निकाल दिया गया। इस कार्रवाई को देखकर जंगलवासियों ने जान लिया कि ईमानदारी की हमेशा जीत होती है।


चिड़ा और चिड़िया


10 Best Moral Stories In Hindi


जंगल में बरगद के बहुत बड़े पेड़ पर चिड़ा और चिड़िया का एक जोड़ा रहता था। दोनों बड़ी मस्ती में गाने गाते, नाचते और मजे से रह रहे थे। चिड़िया सीधी सादी और भोली थी लेकिन चिड़ा बहुत चालाक और कामचोर था। चिड़ा और चिड़िया सुबह उठकर साथ ही दाना – दुनका करने के लिए जाते थे।

एक दिन उन दोनों को खाने के लिए अनाज का एक भी दाना नही मिला। दोनों को बहुत भूख लगी थी। दाना ढूंढने के लिए दोनों उड़ते उड़ते बहुत दूर निकल गए और दूर गाँव में एक घर में जा घुसे। उस घर में एक बर्तन में दाल और दूसरे बर्तन में चावल रखे थे। दाल और चावल देखकर चिड़ा चिड़िया से बोला – “क्यों ना आज हम खिचड़ी बना कर खाएं?” चिड़िया ने भी हाँ कर दी। चिड़े ने अपनी चोंच में दाल भर ली और चिड़िया ने चावल भर लिए और दोनों अपने बरगद के पेड़ पर वापिस लौट आए। वापिस लौटते ही उन्होंने खिचड़ी बनाई। खिचड़ी इतनी स्वादिष्ट बनी की दूर दूर तक खिचड़ी की ख़ुशबू फैल रही थी।

चिड़ा चालाक और कामचोर होने के साथ साथ बहुत बड़ा पेटू भी था। उसने सोचा कि खिचड़ी अगर आधी आधी बांटी तो मेरा पेट नहीं भरेगा और में भूखा ही रह जाऊंगा। उसने एक चाल चली। वो चिड़िया से बोला – “अभी खिचड़ी गर्म है, गर्म गर्म खिचड़ी खाने से मुंह जल जाएगा, चलो जब तक खिचड़ी ठंडी हो तब तक पास के तालाब में नहा आते हैं, फिर आराम से बैठकर मजे से खिचड़ी खाएंगे। लेकिन अगर हम दोनों साथ में नहाने चले गए तो पीछे से कोई जानवर हमारी खिचड़ी खा जाएगा। इसलिए ऐसा करते हैं कि पहले मैं नहा कर आता हूँ, जब मैं नहाकर आ जाऊं तो तुम नहाने चली जाना।” यह कहकर चिड़ा तालाब पर नहाने चला गया और जल्दी से नहाकर वापस लौट आया। उसने चिड़िया से कहा कि अब तुम नहा आओ। जल्दी लौट कर आना फिर दोनों खिचड़ी खाएंगे तब तक मैं यहाँ खिचड़ी की रखवाली करता हूँ। जैसे ही चिड़िया नहाने गई तो चिड़ा खिचड़ी पर टूट पड़ा और कुछ देर में ही सारी खिचड़ी चट कर गया। वो चिड़िया के आने से पहले ही चादर ओढ़ कर सो गया।

थोड़ी देर बाद चिड़िया नहाकर आ गई। उसने ने देखा की खिचड़ी का बर्तन खाली पड़ा है और चिड़ा चादर तान कर सो रहा है। चिड़िया को यह समझते देर नहीं लगी कि यह सब चिड़े की ही करतूत है। उसने गुस्से में चिड़े की चादर खींचकर उसे जगाया। चिड़ा चिड़िया को गुस्से में देखकर अंजान बनने का नाटक करने लगा। चिड़ा बोला – ” क्या हुआ चिड़िया रानी तुम इतने गुस्से में क्यों हो, नहाकर आने में तुम्हे इतनी देर कैसे लग गई, मैं तो तुम्हारा इंतज़ार करता करता सो ही गया था। तुम आगई हो तो चलो अब हम खिचड़ी खाते हैं।” चिड़िया और गुस्से में बोली – “बनने और मुझे बेवकूफ बनाने की कोशिश मत करो। मैं तुम्हारी चाल अच्छी तरह समझ गई हूँ। खिचड़ी तुमने छोड़ी ही कहाँ खाने के लिए, वो तो तुमने पहले ही सारी चट कर ली।” चिड़ा बोला – “यह बिल्कुल झूठ है, मैंने खिचड़ी नही खाई। मुझे सोता हुआ देखकर शायद कोई और जानवर खिचड़ी खा गया होगा।” चिड़िया बोली – “ठीक है, तुम झूठ बोल रहे हो या सच इसका फैसला हम किसी तीसरे पक्षी से करवाएंगे।” थोड़ी दूर पीपल के पेड़ पर एक कौवा रहता था। कौवा बहुत अक्लमंद था। चिड़िया ने कहा कि चलो कौवे से पूछते हैं कि कौन सच बोल रहा है और कौन झूठ। दोनों कौवे के पास चले गए।

चिड़िया ने कौवे को सारी बात बताई। चिड़िया की बात सुनकर कौवा सारा माजरा समझ गया, वो बोला – “मैं तुम दोनों की कच्चे धागे से परीक्षा लूंगा। तुम दोनों को बारी बारी से पीपल के इस पेड़ से लटके हुए एक कच्चे धागे से झूलना होगा। तुम में से जो भी झूठा होगा उसका धागा टूट जाएगा और जो सच्चा होगा उसका धागा नहीं टूटेगा।” चिड़ा और चिड़िया दोनों परीक्षा देने के लिए राजी हो गए। चिड़े ने चिड़िया से कहा कि चिड़िया रानी पहले तुम झूलो, मैं तुम्हारे बाद झूलूँगा। चिड़िया बहुत भूखी थी इसलिए उसका वजन भी कम हो गया था। वो बड़े आराम से कच्चे धागे से झूल गई, उसके वजन से धागा नही टूटा। अब चिड़े के झूलने की बारी आई। चिड़ा डरते डरते कच्चे धागे से लटका लेकिन उसके लटकते ही धागा टूट गया क्योंकि वो सारी खिचड़ी अकेले ही खा गया था जिससे उसका वजन भी बढ़ गया था। चिड़ा धड़ाम से जमीन पर आ गिरा। उसके मुंह और पैर में चोट भी लगी।

कौवे ने कहा कि हो गया फैसला – चिड़िया सच्ची और चिड़ा झूठा, सारी खिचड़ी चिड़े ने ही खाई है। चिड़े ने भी अंत में अपनी गलती मान ही ली।


चिड़िया और हाथी


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एक थी चिड़िया। बहुत सुंदर और प्यारी सी। जब देखो इधर उधर फुदकती, नाचती रहती। जंगल में एक हाथी था। वो जब चिड़िया को नाचते फुदकते देखता तो बहुत खुश हो जाता। एक दिन उसने चिड़िया से कहा ” मुझसे दोस्ती करोगी। ” तो चिड़िया बोली ” मैं इतनी छोटी और आप इतने बड़े हो। हम कैसे दोस्त बन सकते हैं। ” तब हाथी बोला ” हम एक दूसरे के साथ रह कर खूब मजे कर सकते हैं। मैं तुम्हें अपनी पीठ पर बिठा कर पूरे जंगल में घुमा सकता हूँ। तुम्हें मुसीबत पड़ने पर बचा सकता हूँ। “ चिड़िया मान गई और दोनों दोस्त बन गए। वो रोज मिलते गप्प शप्प लगाते। जंगल में एक लोमड़ी भी थी। वो रोज चिड़िया को देखती और सोचती, काश ! मैं इसे पकड़ सकूँ, फिर तो खाने का मजा ही आ जाएगा। एक दिन जब चिड़िया मज़े से कूद रही थी तो अचानक से उसके सामने लोमड़ी आ गई। उसने झट से उसे पकड़ लिया। लोमड़ी ने कहा ” चिड़िया रानी, अब तो मैंने तुम्हें पकड़ लिया और मैं तुम्हें खा जाऊँगी। अब तुम्हें कोई भी बचा नहीं पाएगा। ” यह सुन कर चिड़िया ने जोर जोर से चिल्लाना शुरु किया। तभी हाथी ने चिड़िया का चिल्लाना सुना और झट से उसे बचाने दौड़ पड़ा। हाथी को देखते ही लोमड़ी डर के भाग गयी और उसके हाथ से चिड़िया निकल गयी। इस तरह हाथी ने चिड़िया की जान बचाई और उनकी दोस्ती और भी पक्की हो गई। बच्चो ! इस कहानी से हमें क्या शिक्षा मिलती है।


शेर, लोमड़ी और भिक्षुक


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एक बौद्ध भिक्षुक भोजन बनाने के लिए जंगल से लकड़ियाँ चुन रहा था कि तभी उसने कुछ अनोखा देखा , “कितना अजीब है ये !”, उसने बिना पैरों की लोमड़ी को देखते हुए मन ही मन सोचा . “ आखिर इस हालत में ये जिंदा कैसे है ?” उसे आशचर्य हुआ , “ और ऊपर से ये बिलकुल स्वस्थ है ” शेर , लोमड़ी और भिक्षुक वह अपने ख़यालों में खोया हुआ था की अचानक चारो तरफ अफरा – तफरी मचने लगी ; जंगल का रजा शेर उस तरफ आ रहा था . भिक्षुक भी तेजी दिखाते हुए एक ऊँचे पेड़ पर चढ़ गया , और वहीँ से सब कुछ देखने लगा . शेर ने एक हिरन का शिकार किया था और उसे अपने जबड़े में दबा कर लोमड़ी की तरफ बढ़ रहा था , पर उसने लोमड़ी पर हमला नहीं किया बल्कि उसे भी खाने के लिए मांस के कुछ टुकड़े डाल दिए . “ ये तो घोर आश्चर्य है , शेर लोमड़ी को मारने की बजाये उसे भोजन दे रहा है .” , भिक्षुक बुदबुदाया,उसे अपनी आँखों पर भरोसा नहीं हो रहा था इसलिए वह अगले दिन फिर वहीँ आया और छिप कर शेर का इंतज़ार करने लगा . आज भी वैसा ही हुआ , शेर ने अपने शिकार का कुछ हिस्सा लोमड़ी के सामने डाल दिया . “यह भगवान् के होने का प्रमाण है !” भिक्षुक ने अपने आप से कहा . “ वह जिसे पैदा करता है उसकी रोटी का भी इंतजाम कर देता है , आज से इस लोमड़ी की तरह मैं भी ऊपर वाले की दया पर जीऊंगा , इश्वर मेरे भी भोजन की व्यवस्था करेगा .” और ऐसा सोचते हुए वह एक वीरान जगह पर जाकर एक पेड़ के नीचे बैठ गया . पहला दिन बीता , पर कोई वहां नहीं आया , दूसरे दिन भी कुछ लोग उधर से गुजर गए पर भिक्षुक की तरफ किसी ने ध्यान नहीं दिया . इधर बिना कुछ खाए -पीये वह कमजोर होता जा रहा था . इसी तरह कुछ और दिन बीत गए , अब तो उसकी रही सही ताकत भी खत्म हो गयी …वह चलने -फिरने के लायक भी नहीं रहा . उसकी हालत बिलकुल मृत व्यक्ति की तरह हो चुकी थी की तभी एक महात्मा उधर से गुजरे और भिक्षुक के पास पहुंचे . उसने अपनी सारी कहानी महात्मा जी को सुनाई और बोला , “ अब आप ही बताइए कि भगवान् इतना निर्दयी कैसे हो सकते हैं , क्या किसी व्यक्ति को इस हालत में पहुंचाना पाप नहीं है ?” “ बिल्कुल है ,”, महात्मा जी ने कहा , “ लेकिन तुम इतना मूर्ख कैसे हो सकते हो ? तुम ये क्यों नहीं समझे कि भगवान् तुम्हे उसे शेर की तरह बनते देखना चाहते थे , लोमड़ी की तरह नहीं !!!”


लोमड़ी और खट्टे अँगूर


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एक जंगल में एक लोमड़ी जा रही थी की रास्ते में उसे अंगूर का पेड़ दिखा जिसपर बहुत सारे अंगूर के फल लगे हुए थे जिसको देखकर लोमड़ी के मुह में पानी आ गया और फिर लोमड़ी अंगूर के फल खाने की इच्छा से अंगूर के गुच्छे की तरफ छलांग लगायी लेकिन अंगूर का पेड़ काफी उचा था जो की लोमड़ी की पहुच से दूर था जिसके कारण लोमड़ी ने कई बार कोशिश लेकिन वह अंगूर के फल को न पा सकी और अंत में थक हारकर खुद को सांत्वना देते हुए चली गयी और जाते हुए मन में यही कह रही थी अंगूर खट्टे है।


मछलियों की एकता


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मछली जल की रानी है। यह सुन सुन कर मछलियाँ दुखी थी। काहे की रानी, कोई भी मछुवारा आता और अपना जाल फ़ेंक उन्हें पकड़ कर ले जाता। एक दिन सब मछलियाँ इकठ्ठा हो कर अपनी महारानी के पास गयी और विनती की “हमें मछुवारों से बचाओ, महारानी।” महारानी एक बहुत ही बड़ी और समझदार मछली थी। महारानी ने उन्हें बचाने का वादा किया और कहा ” जैसा मैं कहूँ, तुम सब वैसा ही करना।” अगले दिन महारानी उन छोटी मछलियों की रक्षा के लिए उनके आस पास ही रही। जैसे ही मछुवारे ने अपना जाल फेंका तो बहुत सी मछलियाँ उसमे फँस गई। उस समय महारानी ने आदेश देते हुए कहा ” मेरा इशारा मिलते ही तुम सब एक साथ जोर लगाना और जाल अपने साथ लेकर समुन्दर की गहरायी में चली जाना।” v और फिर महारानी का इशारा मिलते ही सब मछलियों ने एक ही समय जोर लगाया और जाल लेकर भाग गयी। मछुवारा देखता ही रह गया। समुन्दर की गहरायी में महारानी ने अपने दांतों से उस जाल को काट दिया और सब मछलियाँ आज़ाद हो गयी।


कैसे आया जूता


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एक राजा था। उसका एक बड़ा-सा राज्य था। एक दिन उसे देश घूमने का विचार आया और उसने देश भ्रमण की योजना बनाई और घूमने निकल पड़ा। जब वह यात्रा से लौट कर अपने महल आया। उसने अपने मंत्रियों से पैरों में दर्द होने की शिकायत की। राजा का कहना था कि मार्ग में जो कंकड़-पत्थर थे वे मेरे पैरों में चुभ गए और इसके लिए कुछ इंतजाम करना चाहिए। कुछ देर विचार करने के बाद उसने अपने सैनिकों व मंत्रियों को आदेश दिया कि देश की संपूर्ण सड़कें चमड़े से ढंक दी जाएं। राजा का ऐसा आदेश सुनकर सब सकते में आ गए। लेकिन किसी ने भी मना करने की हिम्मत नहीं दिखाई। यह तो निश्चित ही था कि इस काम के लिए बहुत सारे रुपए की जरूरत थी। लेकिन फिर भी किसी ने कुछ नहीं कहा। कुछ देर बाद राजा के एक बुद्घिमान मंत्री ने एक युक्ति निकाली। उसने राजा के पास जाकर डरते हुए कहा- महाराज! मैं आपको एक सुझाव देना चाहता हूं। अगर आप इतने रुपयों को अनावश्यक रूप से बर्बाद न करना चाहें तो मेरे पास एक अच्छी तरकीब है, जिससे आपका काम भी हो जाएगा और अनावश्यक रुपयों की बर्बादी भी बच जाएगी। राजा आश्चर्यचकित था क्योंकि पहली बार किसी ने उसकी आज्ञा न मानने की बात कही थी। उसने कहा- बताओ क्या सुझाव है? मंत्री ने कहा- महाराज! पूरे देश की सड़कों को चमड़े से ढंकने के बजाय आप चमड़े के एक टुकड़े का उपयोग कर अपने पैरों को ही क्यों नहीं ढंक लेते। राजा ने अचरज की दृष्टि से मंत्री को देखा और उसके सुझाव को मानते हुए अपने लिए जूता बनवाने का आदेश दे दिया।


लोभी चिड़िया


10 Best Moral Stories In Hindi


बहुत समय पहले की बात है। एक चिड़िया ज्यादातर ऐसे राजमार्ग पर रहती थी, जहां से अनाज से लदी गा‍ड़ियां गुजरती थीं। चावल, मूंग, अरहर के दाने इधर-उधर बिखरे पड़े रहते। वह जी भरकर दाना चुगती। एक दिन उसने सोचा- मुझे कुछ ऐसी तरकीब करनी चाहिए कि अन्य पक्षी इस रास्ते पर न आएं वरना मुझे दाना कम पड़ने लगेगा। उसने दूसरी चिड़ियों से कहना शुरू कर दिया- राजमार्ग पर मत जाना, वह बड़ा खतरनाक है। उधर से जंगली हाथी-घोड़े व मारने वाले बैलों वाली गाड़ियां निकलती हैं। वहां से जल्दी से उड़कर सुरक्षित स्थान पर पहुंचा भी नहीं जा सकता। उसकी बात सुनकर पक्षी डर गए और उसका नाम अनुशासिका रख दिया। एक दिन वह राजपथ पर चुग रही थी। जोर से आती गाड़ी का शब्द सुनकर उसने पीछे मुड़कर देखा- 'अरे, अभी तो वह बहुत दूर है, थोड़ा और चुग लूं', सोचकर दाना खाने में इतनी मग्न हो गई कि उसे पता ही नहीं लगा कि गाड़ी कब उसके नजदीक आ गई। वह उड़ न सकी और पहिए के नीचे कुचल जाने से मर गई। थोड़ी देर में खलबली मच गई- अनुशासिका कहां गई, अनुशासिका कहां गई? ढूंढते-ढूंढते वह मिल ही गई।


नन्ही चिड़िया


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बहुत समय पुरानी बात है, एक बहुत घना जंगल हुआ करता था| एक बार किन्हीं कारणों से पूरे जंगल में भीषण आग लग गयी| सभी जानवर देख के डर रहे थे की अब क्या होगा?? थोड़ी ही देर में जंगल में भगदड़ मच गयी सभी जानवर इधर से उधर भाग रहे थे पूरा जंगल अपनी अपनी जान बचाने में लगा हुआ था| उस जंगल में एक नन्हीं चिड़िया रहा करती थी उसने देखा क़ि सभी लोग भयभीत हैं जंगल में आग लगी है मुझे लोगों की मदद करनी चाहिए| यही सोचकर वह जल्दी ही पास की नदी में गयी और चोच में पानी भरकर लाई और आग में डालने लगी| वह बार बार नदी में जाती और चोच में पानी डालती| पास से ही एक उल्लू गुजर रहा था उसने चिड़िया की इस हरकत को देखा और मन ही मन सोचने लगा बोला क़ि ये चिड़िया कितनी मूर्ख है इतनी भीषण आग को ये चोंच में पानी भरकर कैसे बुझा सकती है| यही सोचकर वह चिड़िया के पास गया और बोला कि तुम मूर्ख हो इस तरह से आग नहीं बुझाई जा सकती है| चिड़िया ने बहुत विनम्रता के साथ उत्तर दिया-“मुझे पता है कि मेरे इस प्रयास से कुछ नहीं होगा लेकिन मुझे अपनी तरफ से best करना है, आग कितनी भी भयंकर हो लेकिन मैं अपना प्रयास नहीं छोड़ूँगी” उल्लू यह सुनकर बहुत प्रभावित हुआ| तो मित्रों यही बात हमारे जीवन पर भी लागू होती है| जब कोई परेशानी आती है तो इंसान घबराकर हार मान लेता है लेकिन हमें बिना डरे प्रयास करते रहना चाहिए यही इस कहानी की शिक्षा है|

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