10 Best Stories In Hindi | दिमाग घुमा देंगी ये कहानियाँ

इस Blog में आपको 10 Best Stories In Hindi Of 2021 में पढ़ने को मिलेंगी जो आपने अपने दादा दादी से सुनी होंगी। ये hindi stories बहुत ही प्रेरक है। ऐसे  किस्से तो आपने अपने बचपन मे बहुत सुने होंगे पर ये किस्से कुछ अलग हौ। हमने भी इस ब्लॉग में 10 Best Stories In Hindi Of 2021 में लिखा है जिसको पढ़कर आपको बहुत ही ज्यादा आनंद मिलेगा और आपका मनोरंजन भी होगा। इसमे कुछ 10 Best Stories In Hindi Of 2021 दी गयी है। जिसमे आपको नयापन अनुभव होगा। यदि आप पुरानी कहानियाँ पढ़कर बोर हो गए है तो यहाँ पर हम आपको 10 Best Stories In Hindi Of 2021 दे रहे है जिसको पढ़कर आपको बहुत ही ज्यादा मज़ा आने वाला है।


10 Best Stories In Hindi
10 Best Stories In Hindi


सफ़ेद घर


हम समुन्दर के किनारे पर रहते थे और मेरे पापा के पास एक बढ़िया पाल वाली नौका थी। मैं उसे बड़ी अच्छी तरह चला सकता था – चप्पू भी चलाता था, और पाल खींचकर भी जाता था। मगर फिर भी पापा मुझे अकेले समुन्दर में नहीं जाने देते थे। मैं था बारह साल का।

एक बार मुझे और बहन नीना को पता चला कि पापा दो दिनों के लिए घर से दूर जा रहे हैं, और हमने नाव पर उस तरफ़ जाने का प्लान बनाया; खाड़ी के उस तरफ़ एक बहुत अच्छा छोटा सा घर था: सफ़ेद, लाल छत वाला। घर के चारों ओर बगिया थी। हम वहाँ कभी नहीं गए थे, हमने सोचा, कि वहाँ बहुत अच्छा होगा। शायद एक भला बूढ़ा अपनी बुढ़िया के साथ रहता होगा। नीना कहती है, कि उनके पास एक छोटा सा कुत्ता भी होगा, वो भी भला होगा। बूढ़े शायद दही खाते होंगे और हमारे आने से उन्हें ख़ुशी होगी, हमें भी वो दही देंगे।

तो, हमने ब्रेड और पानी के लिए बोतलें बचाना शुरू कर दिया। समंदर में तो पानी नमकीन होता है ना, और अगर अचानक रास्ते में प्यास लगी तो ?

पापा शाम को चले गए, और हमने फ़ौरन मम्मा से छुप के बोतल में पानी भर लिया। वर्ना पूछेगी : किसलिए ? और, फिर सब गुड़-गोबर हो जाता।

जैसे ही कुछ उजाला हुआ, मैं और नीना हौले से खिड़की से बाहर निकले, अपने साथ नाव में ब्रेड और पानी की बोतलें रख लीं। मैंने पाल लगा दिए, और हम समुंदर में आए। मैं कप्तान की तरह बैठा था, और नीना नाविक की तरह मेरी बात सुन रही थी।

हवा हल्के-हल्के चल रही थी, और लहरें छोटी-छोटी थीं, और मुझे और नीना को ऐसा लग रहा था, मानो हम एक बड़े जहाज़ में हैं, हमारे पास खाने-पीने का स्टॉक है, और हम दूसरे देश को जा रहे हैं। मैं सीधा लाल छत वाले घर की ओर चला। फिर मैंने बहन से नाश्ता बनाने के लिए कहा। उसने ब्रेड के छोटे-छोटे टुकड़े किए और पानी की बोतल खोली। वह नाव में नीचे ही बैठी थी, मगर अब, जैसे ही मुझे नाश्ता देने के लिए उठी, और पीछे मुड़ कर देखा, हमारे किनारे की ओर, तो वह ऐसे चिल्लाई, कि मैं काँप गया:

“ओय, हमारा घर मुश्किल से नज़र आ रहा है !” और वह बिसूरने लगी।

मैंने कहा:

“रोतली, मगर बूढ़ों का घर नज़दीक है।”

उसने सामने देखा और और भी बुरी तरह चीखी:

“और बूढ़ों का घर भी दूर है : हम उसके पास बिल्कुल नहीं पहुँचे हैं, मगर अपने घर से दूर हो गए हैं !”

वह बिसूरने लगी, और मैं चिढ़ाने के लिए ब्रेड खाने लगा, जैसे कुछ हुआ ही न हो। वह रो रही थी और मैं समझा रहा था;

“वापस जाना चाहती है, तो डेक से कूद जा और तैर कर घर पहुँच जा, मगर मैं तो बूढ़ों के पास जाऊँगा।”

फिर उसने बोतल से पानी पिया और सो गई। मैं स्टीयरिंग पर बैठा रहा, और हवा वैसे ही चल रही है। नाव आराम से जा रही है, और पिछले हिस्से की तरफ़ पानी कलकल कर रहा है। सूरज ऊपर आ गया था।

मैंने देखा कि हम उस किनारे के बिल्कुल नज़दीक आ गए हैं और घर भी साफ़ दिखाई दे रहा है। नीना उठेगी और देखेगी – ख़ुश हो जाएगी ! मैंनें इधर-उधर देखा, कि कुत्ता कहाँ है। मगर ना तो कुत्ता, ना ही बूढ़ लोग दिखाई दिए।

अचानक नाव लड़खड़ाई और एक किनारे मुड़ गई। मैंने फौरन पाल उतारे, जिससे पूरी तरह पलट न जाए। नीना उछली। वह अभी तक नींद में थी, वह समझ ही नहीं पाई, कि कहाँ है, और उसने आँखें फाड़ कर देखा। मैंने कहा:

“रेत में घुस गए हैं, उथले पानी में फँस गए हैं, मैं अभी धकेलता हूँ। और, ये रहा घर।”

मगर उसे घर देखकर ख़ुशी नहीं हुई, वह और ज़्यादा डर गई। मैंने कपड़े उतारे, पानी में कूदा और धकेलने लगा।

मैंने पूरी ताकत लगा दी, मगर नाव टस से मस नहीं हुई। मैंने उसे कभी एक तरफ़ तो कभी दूसरी तरफ़ झुकाया। मैंने पाल उतार दिए, मगर कुछ फ़ायदा नहीं हुआ।

नीना चिल्लाकर बूढ़े को मदद के लिए पुकारने लगी। मगर वो घर दूर था, और कोई भी बाहर नहीं आया। मैंने नीना को बाहर कूदने की आज्ञा दी, मगर इससे भी नाव हल्की नहीं हुई: नाव मज़बूती से रेत में धँस गई थी। मैंने पैदल चलकर किनारे की ओर जाने की कोशिश की। मगर जहाँ भी जाओ, सब जगह गहरा पानी था। कहीं जाने का सवाल ही नहीं था। और इतना दूर कि तैरकर जाना भी मुमकिन नहीं था।

और घर से भी कोई बाहर नहीं आ रहा है। मैंने ब्रेड खाई, पानी पिया और नीना से बात नहीं की। वह रो रही थी और कह रही थी:

“ लो, फँसा दिया ना, अब हमें यहाँ कोई नहीं ढूँढ़ पायेगा। समुंदर के बीच उथली जगह पर बिठा दिया। कैप्टन ! मम्मा पागल हो जाएगी। देख लेना। मम्मा मुझसे कहती ही थी : “अगर तुम लोगों को कुछ हो गया, तो मैं पागल हो जाऊँगी”।

मगर मैं ख़ामोश रहा। हवा बिल्कुल थम गई। मैं सो गया।

जब मेरी आँख खुली, तो चारों ओर घुप अँधेरा था। नीन्का, नाव की बिल्कुल नोक पर बेंच के नीचे दुबक कर कराह रही थी। मैं उठकर खड़ा हो गया, और पैरों के नीचे नाव हल्के-हल्के, आज़ादी से हिचकोले लेने लगी। मैंने जानबूझकर उसे ज़ोर से हिलाया। नाव आज़ाद हो गई। मैं ख़ुश हो गया ! हुर्रे ! हम उथले पानी से निकल गए थे। ये हवा ने अपनी दिशा बदल दी थी, उसने पानी को धकेला, नाव ऊपर उठी, और वह उथले पानी से बाहर निकल आई।      

मैंने चारों तरफ़ देखा। दूर रोशनियाँ जगमगा रही थीं – ढेर सारी। ये हमारे वाले किनारे पर थीं : छोटी-छोटी, चिनगारियों जैसी। मैं पाल चढ़ाने के लिए लपका। नीना उछली और पहले तो उसने सोचा कि मैं पागल हो गया हूँ। मगर मैंने कुछ नहीं कहा।

और जब नाव को रोशनियों की ओर मोड़ा, तो उससे कहा;

“क्या, रोतली ? घर जा रहे हैं। बिसूरने की ज़रूरत नहीं है।

हम पूरी रात चलते रहे। सुबह-सुबह हवा थम गई। मगर हम किनारे के पास ही थे। हम चप्पू चलाते हुए घर तक पहुँचे। मम्मा गुस्सा भी हुई और ख़ुश भी हुई। मगर हमने उससे विनती की, कि पापा को कुछ न बताए।

बाद में हमें पता चला, कि उस घर में साल भर से कोई भी नहीं रहता है।


झुलसी दुआ


सरकारी नौकरी की तैयारी में कई वर्ष बिताने के बाद सोमेश का चयन अग्निशमन कर्मी पद पर हुआ। जहाँ घरवालों में जोखिम भरी नौकरी को लेकर सवाल और चिंता थी वहीं सोमेश के तो जैसे मन की मुराद पूरी हो गयी थी। बचपन में वो सुपर हीरो बनना चाहता था, फ़िल्मी हीरो नहीं बल्कि लोगो की मदद करने वाला असली हीरो। बड़े होते-होते उसे दुनिया की ज़मीनी सच्चाई पता चली और उसने हीरो बनने का विचार तो छोड़ दिया पर लोगो की मदद करने वाले किसी क्षेत्र में जाने की बात ने उसके बचपन का सुपर हीरो फिर से जगा दिया। समाज सेवा के साथ-साथ जीविका कमाना और क्या चाहिए?

साधारण वेतन और जान के खतरे वाली नौकरी पर असमंजस में पड़े माँ-बाप और बड़ी बहन को किसी तरह मना कर सोमेश ट्रेनिंग पर निकल गया। फायर फाइटिंग के अभ्यास में सोमेश अपने बैच में सबसे आगे था। उसके पास रहने से उसके साथी जोश, सकारात्मकता से भर जाते थे। सोमेश से पिछड़ने के बाद भी सभी उसे पसंद करते थे। ट्रेनिंग के बाद सोमेश की पहली नियुक्ति दिल्ली में हुई। उसके छोटे कस्बे की तुलना में दिल्ली जैसे पूरी दुनिया था। जहाँ उसे अपनी जगह का आराम पसंद था वहीं महानगर की चुनौती का अपना ही मज़ा था। जब उसने सुना कि दिल्ली के कुछ इलाकों में 1 वर्ग किलोमीटर में 12,000 तक लोग रहते हैं तो किसी छोटे बच्चे की आँखों जैसा अविश्वास भर गया उसमें। गर्मी के मौसम में शहर में ख़ासकर औद्योगिक क्षेत्रों में लगने वाली आग के मामले बढ़ने लगे थे। अपनी शिफ्ट में सोमेश की दमकल वैन रोज़ाना 2-3 जगह जा रही थी, शिफ्ट ख़त्म होने के बाद भी ज़रुरत पड़ने पर सोमेश पास के अपने कमरे से फायर स्टेशन पहुँच जाता था। अपनी ड्यूटी के समय से बाहर या अधिक काम करना उसके लिए इतना सामान्य हो गया था कि उसके सीनियर अधिकारीयों, सहकर्मियों ने यह बात नोट करनी तक बंद कर दी थी। उसके दोस्त हँसते थे कि दुनिया में सबसे पॉजिटिव इंसान सोमेश है, इतना ज़िंदादिल तो फिल्मों के हीरो तक नहीं होते। सोमेश वापस उन्हें कहता कि वो सब भी आशावादी बने, हमेशा अच्छा सोचें, अपने भगवान या उपर वाले पर भरोसा रखें क्योंकि जिस भी जगह पर वह गया वहाँ लोग आग, भूकंप आदि से घायल तो हुए पर किसी की जान नहीं गयी।

उसकी दिन भर की थकान नींद से कम बल्कि घरवालों से घंटे-आधा घंटे बातें कर ज़्यादा ख़त्म होती थी। अक्सर उसने कितने लोगो को कैसे बचाया, कैसे बीमारी में भी स्टेशन आने वालो में सबसे पहला वो था, कैसे घायल पीड़ित के परिजन उस से लिपट गए, कैसे ट्रैफिक में कुछ देर हो जाने पर उनपर भीड़ ने पत्थर बरसाए या उनकी पिटाई तक की।

"माँ! आज आप मानोगी नहीं। सीढ़ी पर से झूलकर बिल्डिंग से गिरता हुआ बच्चा पकड़ा मैंने, पूरे मोहल्ले ने आशीर्वाद दिया मुझे। कोई कपड़े दे रहा था, कोई वैन में घर पर बनाई मिठाई ज़बरदस्ती रख गया। बच्चे की माँ तो अपना सोने का कड़ा उतार कर दे रही थी पर मैंने लिया नहीं। उसे देख कर आपकी याद आ गयी।"

माँ का मन करता था कि सोमेश बस बोलता रहे। उसकी आवाज़ में जो ख़ुशी झलकती थी वो ही माँ के लिए सबसे बड़ी दौलत थी।

"....फिर ना माँ ओखला में तुरंत दूसरी जगह जाना पड़ा। हम लोगो की गाड़ी ख़राब हो गई और पहुँचते-पहुँचते लेट हो गए। भीड़ ने घेर लिया और गुस्से में एक आंटी ने संजय के चप्पल बजा दी, बाकी लोग वैन की तरफ बढ़ने लगे तो मैंने माइक से समझाया कि देर हो गयी पर जो लोग फँसे हैं उन्हें बचा लेने दो फिर पीट लेना। राधे-कृष्ण की जो कृपा रही किसी को ज़्यादा चोट तक नहीं आई, सारे लोग बचा लिए।"

माँ बोली - "अपना ध्यान रखा कर। बेटा हर जगह ऐसे मत बढ़ा कर, कहीं लोग ना सुने... "

सोमेश ने माँ को दिलासा दिया - "माँ भगवान आपकी और मेरी हर बात सुनते हैं। इतने महीने हो गए यहाँ मेरे सामने कोई नहीं मरा, ना मुझे कुछ हुआ। कुछेक बार जलती बिल्डिंग, भूकंप से तहस-नहस घरों में फँसे लोग देखकर जब सबने उम्मीद छोड़ दी तब भगवान से माँगा बस बचा लो आपका सहारा है। जाने कैसे सबको बचा लाये हम लोग। तुम्हारे साथ-साथ दर्जनों लोगो का आशीर्वाद बटोरता हूँ रोज़। सब अच्छा होगा माँ, तुम चिंता मत किया करो।"

सोमेश पर भगवान की कृपा बनी रही और उसकी नौकरी का एक साल पूरा हुआ। एक दिन उसे शहर के बाहरी इलाके में स्थित अपार्टमेंट में लगी आग के मौके पर भेजा गया। अपार्टमेंट के आग के लिए पहले ही कुछ फायर वैन पहुँच चुकी थी पर भीषण आग बिल्डिंग से आस-पास मज़दूरों की बस्तियों में फैल गयी थी। दूर-दराज़ के इलाके और तंग गलियों के कारण लोगो को बचाने में मुश्किलें आ रहीं थी। एक-एक सेकण्ड से लड़ते हुए दमकल कर्मियों के कुछ दल अलग-अलग स्थानों पर फैल गए। सोमेश भगवान का नाम लेता हुआ बस्ती के अंदरूनी हिस्से में फँसे लोगो को बचाने लगा। कुछ देर में स्थिति काबू में आई पर घायलों के लिए इन अंदरूनी इलाकों तक एम्बुलेंस, अन्य मदद आने में काफी समय लगना।

तभी सोमेश की नज़र एक औरत के निर्जीव शरीर के पास खड़े 2 दमकल कर्मियों पर पड़ी। वो दोनों बहस कर रहे थे कि क्या यह औरत ज़िंदा है या नहीं। तेज़ धड़कन के साथ जब सोमेश पास पहुँचा उसे एक पूरी तरह जल चुकी गर्भवती महिला दिखी। उस महिला ने किसी तरह हाथ की ज़रा सी हरकत से जैसे बहस कर रहे बचावकर्मियों को बताया कि अभी उसमे जान थी। तारकोल की तरह चौथी डिग्री के जले के निशानों के साथ उसका मांस जगह-जगह से उतर रहा था और चेहरे की जगह एक अधभुने मांस का चिथड़ा दिख रहा था। उसका एक हाथ पेट से जलकर पेट से चिपका हुआ था, शायद जलते हुए भी वो अपने बच्चे को दिलासा दे रही थी कि सब ठीक हो जाएगा। दर्द में उसका शरीर हल्की फड़कन कर रहा था। सोमेश ने उसको पानी पिलाने की कोशिश की पर पानी की बूंदों के मांस से छूने से भी वो दर्द से और तेज़ हिलने लगी। सोमेश को विश्वास ही नहीं हो रहा था कि उसके साथ ऐसा कुछ हो सकता है। उसके साथ तो अंत में तो सब ठीक हो जाता था। एक सहकर्मी ने बताया कि इस औरत का पूरा परिवार मर चुका है। मदद आने में अभी बहुत समय था और पीड़ित औरत की हालत इतनी ख़राब थी कि सोमेश खुद को उस औरत के बचने की ज़रा सी उम्मीद का दिलासा तक नहीं दे सकता था। बेनाम औरत का दर्द सोमेश से देखा नहीं जा रहा था, नम आँखों से वह घुटनो के बल उसके पास बैठ गया। उसके हाथ बार-बार औरत की तरफ बढ़ते और उसे दर्द ना हो तो शरीर को छूने से पहले ही रुक जाते।

हमेशा हँसमुख, आशावादी रहने वाला, आज जीवन में पहली बार हार मान चुका सोमेश ऊपर देखते हुए रुंधे गले से बोला - "भगवान बहुत दर्द सह लिया इसने, प्लीज़ इस औरत को मार दो भगवान। इसे अपने पास बुला लो...प्लीज़ इसे मार दो..."

शायद भगवान ने उसकी पुकार सुन ली थी। उस औरत की नब्ज़ चली गई और सांसों का उतार-चढ़ाव भी बंद हो गया। भारी मन से सोमेश बस्ती के अन्य हिस्सों की तरफ बढ़ा।


पुराना बंगला


एक बड़ा सा बंगला था और दरवाजे पर बाहर से ताला लगा हुआ था। बंगला थोड़ा पुराना सा लग रहा था। बाहर से लग रहा था जैसे सालों से बंद पड़ा है। और उसके आस पास भी कोई रहता नहीं था। मेघना को उत्सुकता हुई उसके अंदर जाके देखने की। मेघना एक चुलबुली से लड़की है। वो इंजीनियरिंग की छात्रा है। उनका घर पुने में है। मेघना को उसकी माँ शीला जी ने भेजा है उनकी माँ, यानि की मेघना कि नानी को मुंबई से उनके घर ले जाने के लिए। क्यूँ की उनकी तबियत अभी ठीक नहीं रहती है।

जब मेघना उन्हें लेने आ रही थी तभी रास्ते में ही उसे इस बंगला नज़र आता है। तो वो वहीं पर ड्राइवर को रोक के अंदर जाने की प्रयास करती है। 


जब मेघना कौतूहल पूर्वक बंगले की पीछे की और जाती है तभी पीछे का एक दरवाज़ा खुला हुआ सा होता है। मेघना अंदर जाती है। बंगले के अंदर कुछ सामान टूटा हुआ पड़ा था। अंदर ऐसा लग रहा था जैसे वहीं पर कुछ फिल्म वगैरह की शूटिंग कभी हुई होगी। क्यों की फिल्मों की शूटिंग के दौरान जो मशीनों कि आवश्यकता होती है वहां पर वही सब चीजें टूटी हुई मौजूद थी।


तब मेघना को कुछ लोगों की बातें करने की आवाज़ दूसरे कमरे से सुनाई दी। जब वो पास गई तो कुछ शूटिंग चल रही थी। पहले तो मेघना को अजीब लगा कि बाहर से बंद बंगले की अंदर शूटिंग केसी चल रही है। पर जब ये सब देखा तो उसकी ध्यान भटक गया। सब लोग अपने अपने कामों में लगे हुए थे। फिल्म के अभिनेता और अभिनेत्री अपने अपने आलाप कहे जा रहे थे। निर्देशक महोदय फिल्म की निर्देशन दे रहे थे। तभी फिल्म के एक दृश्य था जिस‌ में अभिनेता अभिनेत्री को खलनायक से बचा रहा होता है और हाथा पाई के दौरान खलनायक की मौत हो जाती है। पर ये काल्पनिक होने की वजह दुर्भाग्य से खलनायक को सचमुच की खंज़र लग जाती है और घटना स्थल पर ही उसकी मृत्यु हो जाती है। और वो चिल्ला कर नीचे गिर जाता है। तभी यही दृश्य अचानक से ग़ायब हो जाता है। और चारों तरफ सिर्फ उस आदमी की चीखने की आवाज़ सुनाई देती है। 


ये चीखने की आवाज़ से मेघना डर कर दौड़ते हुए बंगले से बाहर निकल आती है। तभी एक आदमी से टकराती है जो उस बंगले का देख भाल करता है। वो आदमी मेघना को देख के डांटता है और अंदर क्यूँ गए थे पूछता है। मेघना उसे सारी बात बताता है। तो वो आदमी बोलता है कि जो भी उस बंगले के अंदर गया है उसे वही सब घटना दिखाई देती है। और भी वो बोलता है कि कई साल पहले यही घटना हुई थी, तब से ये बंगला बन्द पड़ा हुआ है। और मेघना वहां से निकल आती हैं। 


ट्रिंग ट्रिंग!! 

अलार्म की घंटी बज उठता है। मेघना चौक के बिस्तर से उठता है। तब उसे पता चलता है , अरे! ये तो सपना था। 

माँ :- मेघू! बेटा जल्दी उठ जा। तुझे नानी के घर जाना है ना। उनको लाने। 

मेघना: हां! जाती हूं माँ ।

मेघना जल्दी से अपने काम ख़तम करके नानी को लाने निकल पड़ता है। रास्ते में नानी की फ़ोन आता है,

नानी: मेघू! तू मुझे लेने आ रही है ना? 

मेघना: आ रही हूं में मेरी प्यारी नानी!

तभी उसी रास्ते पर एक बंगला दिखाई देता है। और हूबहू उसी बंगले की तरह दिखता है जो मेघना ने अपनी सपने में देखा था!!


एक रात की दुल्हन


किसी ज़माने में पाटलीपुत्र के एक छोटे से गांव में एक बूढी और उसकी खूबसूरत पोती देविका रहती थी। दूर दूर तक देविका के रूप के चर्चे थे और गांव का हर दूसरा आदमी उसे पाना चाहता था। उसके रूप और जवानी से खेलना चाहते थे पर कोई भी देविका से शादी नही करना चाहता था क्योंकि वो नीची जाती की थी। आए दिन कोई न कोई उसकी मजबूरी का फायदा उठा कर उसे हमबिस्तर करने की नापाक कोशिश करता। पर आज तक कोई कामयाब नही हो पाया। फूल सी देविका रोज़ अपनी आबरू इन भूखे लोगो से बचाए अपनी और अपनी दादी का भरण पोषण करती। वो रोज़ जंगली बेर चुनती और उसे बाज़ार में बेचने जाती। देविका को अपनी खूबसूरती का बस इतना फायदा मिलता की लोग फल खरीदने के बहाने आते और अपनी गन्दी निगाहो से रोज़ उसका दीदार करते, पर साथ ही साथ फल भी खरीद लेते। 

बस इसी तरह देविका और उसकी दादी का जीवन चल रहा था। 

दादी अपनी झोपड़ी में बैठी हमेशा की तरह देविका की राह बाट रही थी। तभी देविका आ गई। का री इतना देर कहा लगा दिया। उ दादी आ कुछ जादा ही काम था और हमरी फिकर न किया कर। काहे न करू, दिन रात सोचत रहती हूँ की तेरी शादी कब करुँगी। ये सारे गांव वाले राह देख रहे है की मैं कब मरु और वो कब तुझे नोच खाए। 

ओ दादी इतना मत सोच अभी तू और 100 साल जिएगी। चल अब ई बता की कमली अपने सशुराल से आई या नही।

हां हा आ गई जा मिल ले पर घर जल्दी आ जइयो, ठीक है दादी हम आ जई।

कमली के घर 

और कमली कईसी है, अरे देविका तू आ जा हम तोहरे याद कर रही थी। हाँ हाँ मैं आती हूँ पर ई तो बता की जीजा जी ने इतने दिन तक आने क्यों नही दिया, जा धत देविका हम नही बताएगी। बोलो न क्या किया जीजा जी ने। 

(दोनों मुस्कुराने लगी और कुछ देर बाद.....)



तेरे जीजा बड़े जानवर है, पहले तो दो मटके तारी पि गए और फिर नशे में पूरी तरह पागल होकर मेरे सारे कपड़े फाड़ दिए फिर अपने होटो की शराब मेरे होटो पर उतार दी और मैंं कुछ नही कर पाई, रात भर वो मुआ कुश्ती करता रहा और मेरा बदन टूटता रहा। जब सुबह हुई तो न मैं होश मे थी न वो। कई दिनों तक तो मैं सास भी नही ले पाई। पर जैसे ही पिताजी मुझे लेने आए मैं फौरन वहा से भाग आई। वो मुआ तो मुझे आने ही नही दे रहा था। मैं ही जानती हूँ कि मैं कैसे उस मुए के हाथो से बची। 

(ये सब सुन कर देविका हँसने लगी....)

तू हँस रही है जब तेरी शादी होगी तो तब तुझे अपनी दादी न याद आई तो मेरा नाम बदल दियो।

( बाते कई घण्टो तक यु ही चलती रही और फिर देविका कमली से विदा लेकर घर आ गई....)

उस रात देविका ने खाना बनाया और जो भी रुखा सुखा था खा कर दोनों सो गए। अभी रात के आधी भी नही हुई थी की अचानक कुछ आवाज़ आई, जिससे दादी की आँख खुल गई पर देविका अभी भी सो रही थी, दिन भर कड़ी मेहनत करने के कारण वो काफी गहरे नींद में थी। दादी उठी और दिया उठा कर इधर उधर देखने लगी, तभी उसे अँधेरे में कुछ नज़र आया, वो कोई आदमी की आकृति थी जिसे देख बुढ़िया डर गई तभी उस आदमी ने तेजी से बुढ़िया का मुँह दबा कर बोला। 

सुन मैं एक डाकू हूँ और अगर तूने शोर मचाया तो तुझे मार डालूँगा, राजा के सिपाही मुझे ढूढ़ रहे है और अगर उन्होंने मुझे पकड़ लिया तो फाँसी पर चढ़ा देंगे। ये सब सुन कर बुढ़िया शांत हो गई। ये देख डाकू ने भी अपना हाथ उसके मुँह से हटा लिया और कोने में जा कर बैठ गया। बुढ़िया बोली बेटा मेरे जैसी बूढी के पास क्या है जो तू मुझे लूटने आया है, ये सुन डाकू बोला की राजा के हाथ लगा तो वो मुझे मार देगा इसलिए मैं भागा भागा फिर रहा हूँ पर अब मैं थक चुका हूँ भागते-भागते। न जाने कब मारा जाऊ। तभी डाकू की नज़र दूसरी तरफ गई जहां देविका सो रही थी। उसका रूप देख कर डाकू का मन और दिल दोनों मचल उठा, उसे सुनहरे सपने नज़र आने लगे। उसके मन से मौत का डर निकल गया, उसने देविका की ओर इशारा कर के बुढ़िया से पूछा वो कौन है। बुढ़िया कुछ सोच कर बोली वो मेरी पोती देविका है।

डाकू कुछ देर सोच कर बोला मुझे तुम्हारी पोती से शादी करनी है। ये सुन कर बुढ़िया के होश उड़ गए और वो रोने लगी की हमे छोड़ दो हमने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है मेरी पोती को छोड़ दो। तुम कब मर जाओ कौन जाने, क्यों मेरी पोती की ज़िंदगी खराब करना चाहते हो।

(कुछ देर तक एक शान्ति सी छा गई....) 

डाकू बोला मैं जानता हूँ की मैं मरने वाला हूँ पर मरने से पहले मैं अपनी दिल की सभी इच्छाए पूरी करना चाहता हूँ। यही कारण है की मैं तेरी पोती से शादी करना चाहता हूँ। 

तभी बुढ़िया रोते रोते बोली की अगर मैंने अपनी पोती की शादी तुझसे कर दी तो लोग तेरे मरने के बाद मेरी पोती की ज़िंदगी नर्क बना देगे तो फिर उसका क्या होगा। और ये बोलते बोलते वो रोने लगी।

डाकू कुछ देर सोच कर बोला अगर किसी को मालूम होगा तब न। हम आज ही रात को शादी कर लेंगे और मैंने आज तक जितनी भी दौलत लूटी है वो सब तुम दोनों को दे दूँगा। न किसी को पता चलेगा और तुम उस दौलत से अपनी सारी ज़िंदगी मजे में गुज़ार सकती हो। सोच लो एक रात में इतनी दौलत तुम्हे कभी भी नही मिलेगी और कल होते ही मैं मारा जाऊंगा। किसी को भी पता नही चलेगा की हमारे बीच क्या हुआ।

बुढ़िया सोच में पड़ गई की एक ही रात मे पोती दुल्हन भी बनेगी और विधवा भी और ऊपर से इतनी सारी दौलत और किसी को कानो कान खबर भी नही होगी। फिर किसी दूसरे गांव में जा कर फिर से अपनी पोती की शादी कर दूँगी। 

एक लम्बी साँस के बाद बुढ़िया बोली मुझे मंजूर है पर मुझे पहले दौलत चाहिए फिर होगी शादी। डाकू मान गया और 2 घण्टे बाद काली मन्दिर में आने को बोल वहाँ से भाग गया। 

देविका मान गई 

देविका अभी भी नींद में थी। दादी उसके पास गई और उसे जगाने लगी। जब देविका जाग गई तो दादी ने सारी आप बीती उसे सूना दी जिसे सुन कर देविका रोने लगी पर दादी ने उसे अपनी कसम दे कर कहा की अगर वो ये शादी नही करेगी तो वो अपनी जान ले लेगी। ये सुन कर देविका डर गई और शादी के लिए मान गई।

उसी वक्त दादी और देविका अँधेरी रात में काली मन्दिर की ओर चल दिए। डाकू पहले से ही सारा इंतजाम कर के बैठा था, जल्द ही शादी शुरू हो गई डाकू ने सोने से भरी गठरी बुढ़िया को दे दी और बुढ़िया ने देविका का हाथ डाकू को सौप दिया। जब शादी की सभी रस्मे ख़त्म हो गई तो डाकू देविका को अपने साथ ले जाने लगा और कहा की सुबह होने से पहले इसे काली मन्दिर ले आउगा। बुढ़िया ने दोनों को जाने दिया और सोने से भरी गठरी लेकर मन्दिर में बैठ गई।

आखरी सोहाग रात 

देविका काफी डरी हुई थी की न जाने अब क्या होगा ये डाकू न जाने उसके साथ क्या क्या करेगा। देविका सोच ही रही थी की दोनों एक खण्डर के सामने आ गए, डाकू न घास का बिस्तर बना दिया और लकड़ियाँ इक्कठी कर के आग जला दी और देविका को घोड़े पर से उठा कर घास पर फेक दिया और उसकी और ललचाई नज़रो से देखने लगा। उसने पहले देविका के पैर पकड़ लिए और उन्हें चूमने लगा तभी देविका बोली की आज हमारी सोहाग रात है और मैंने आपको दूध भी नही पिलाया। ये सुन कर डाकू हँसने लगा और बोला बस इतनी सी बात, मेरे पास दूध तो नही पर शराब बहुत है अभी लाता हूँ और डाकू अपने घोड़े से बन्धी एक सुराही ले आया जिसमे शराब थी और उसने उसे देविका के पास रख दी और बोला निकालो और पिला दो मुझे, पर जल्दी करो आज मैं तुम्हारी जवानी की किताब थोड़ा करीब से पढ़ना चाहता हूँ। देविका बोली अभी तो रात लम्बी और जवान है तो इतनी जल्दी क्यों। लो ये पी लो। 

देविका डाकू को शराब पिलाती रही और डाकू पीता रहा। जब शराब खत्म हो गई तो डाकू पूरी तरह पागल सा हो गया और देविका पर किसी भूखे शेर की तरह झपटा पर देविका वहाँ से हट गई। जिससे डाकू को गुस्सा आ गया और वो देविका से जबरदस्ती करने लगा।

तभी अचानक डाकू के आँखो के आगे अँधेरा छाने लगा और वो ज़मीन पर गिर गया और उसके मुँह से झाग आने लगी और वो मर गया। देविका ने उसकी लाश को उठा कर घोड़े पर डाला और काली मन्दिर की ओर चल दी। 

खुनी कौन

जल्द ही देविका मन्दिर पहुच गई जहाँ दादी उसका इंतजार कर रही थी। दादी समझ गई थी कि उसकी चाल कामयाब हो गई थी और जो ज़हर उसने देविका को दिया था वो उसने उस डाकू को पिला दिया।

जल्द ही सुबह हो गई और मन्दिर में लोग आने लगे पर जब सब की नजर डाकू की लाश पर गई तो पुरे गांव में खबर फैल गई की डाकू की लाश मन्दिर मे पाई गई है। उस लाश को देखने के लिए राजा स्वयं आते है और पूछते है की इसे किसने मारा है तो कोई जवाब नही मिलता है। तभी भीड़ में से एक आवाज़ आती है महराज मेरी पोती ने। ये सुन कर सभी गांव वाले हैरान हो जाते है। 

राजा उन दोनों को आगे बुलाते है और सारा हाल बयान करने को कहते है। तो बुढ़िया बोलती है महराज मैं और मेरी पोती सुबह मन्दिर में आए तो इस डाकू ने हमपर हमला कर दिया पर मेरी पोती डरी नही और माँ काली का त्रिशूल लेकर इसके सीने में उतार दिया। 

ये सुन कर राजा बहुत खुश हुए और देविका को बधाई दी साथ ही साथ उससे विवाह का प्रस्ताव भी रखा जिसे देविका ने स्वीकार कर लिया। जल्द ही देविका की शादी राजा से हो गई और वो ख़ुशी ख़ुशी अपनी दादी के साथ रहने लगी। 

किसी को कभी पता नही चला की उस रात क्या हुआ। ये राज़ तो सिर्फ वो एक रात की दुल्हन ही जानती थी।


उसकी चीख़


एक घर से कभी कभी चीख सुनाई देती थी अक्सर,

कौन चिल्लाता है ? रात को तो शांति छा जाती है |

उस घर में झांकने तक की कोशिश भी कोई नही कर सकता था, बहुत बडे सेठ का मकान था, काफी नौकर चाकर थे |

बाजार में नौकरों खरीदारी करते देखा तो पूछ ही लिया,

"तुम्हारे घर में कभी कभी चीख सुनाई देती है, ऐसा क्या है ?"

"हमें तो नही सुनाई देती, हम तो वही रहते है रात दिन |

तुम अपने काम से काम रखों विजय बाबू ! कही सेठ को पता लग गया कि तुम उसके घर की खोज खबर ले रहे थे तो जिन्दा गाड़ देगा |

"हमारे सेठ जी बडे ही गुस्सैल है, अभी तो पूछ लिया बच्चू, आगे ख्याल रखियों किसी ओर से न पूछ लियों !" - कहकर नौकर चलता बना |

बेचारा विजय सोचता ही रहा, उसने सोचा, हो सकता है यह उसका वहम ही हो खुद को तसल्ली दे, जल्दी से सामान ले निकल पडा अपनी राह ओर |

एक दिन विजय ने उस मकान के पीछे की खिडकी में एक औरत की परछाई को देखा, वो चिल्लातें हुए दिख रही थी। ओह ! गॉड ! यह माजरा क्या है ? उसने इस बारे में अपनी दोस्त रागिनी को बताया जो एक खोजी पत्रकार थी |

जब रागिनी ने विजय की सारी बात सुनी तो उसने कहा कि वह जरूर पता लगायेगी |

रागिनी ने सेल्सगर्ल बन उस घर में प्रवेश तो कर लिया, पर उसको संदिग्ध कही कुछ न मिला जो समान था, वह भी आसानी बेच दिया उसने लेकिन रागिनी अपनी बातें से मकान मालिक को प्रभावित कर दुबारा आने के लिए कही कुछ और नये समान के साथ जिसकी उसको अनुमति मिल गयी |

‎जब वह घर से बाहर गया तो विजय ने रागिनी को बता दिया। रागिनी झट से पंहुच गयी, घर में दाखिल हुई नौकर को उसने तबियत खराब होने बहाना बनाया कि वह कुछ देर वहां रूक जाये बाहर तेज धुप है। नौकर बोला, रूक जाओ | नौकर जब वहां से हटा तो रागिनी ने कमरों मे झांकना शुरू किया दबे पांव। एक जगह वह रूक गयी, एक कमरे में एक औरत कराह रही थी। वह झटपट वहां पहुंची। उसे देख वह चौकी। रागिनी ने पूछा कि उसे क्या तकलीफ है ? उसने बताने से इंकार कर दिया। जब रागिनी ने बताया वह सिर्फ उसके लिए ही आयी है, तो वह घबरी गयी, कहा, तुम चली जाओं !

‎रागिनी ने कहा, यदि वह नही बतायेगी तो वह नही जायेगी, चाहे कुछ भी अंजाम हो |

‎वो औरत गृहस्वामी की पत्नी थी जो बहुत सुंदर थी, उसका पति निर्दय था इतना की अपने घर जाने के बाद लोहे के अंतवस्त्र उसकों पहनाकर उस पर ताला लगाकर जाता था।

‎जबतक वह वापस न आये वह लघुशंका के लिए भी नही जा पाती थी, वह सिर्फ उसकी दया पर जी रही थी। कभी कभी उसकी चीख निकल जाती थी दर्द से | वह बहुत

कोशिश करती दर्द छिपाने की | देखने में सबकुछ समान्य लगता। उसने रागिनी को दिखाया, रागिनी की आँखों से आंसु निकल गये|

‎रागिनी ने अपने गुप्त कैमरें से सबकुछ रिकार्ड कर लिया और बिना कुछ कहे चुपचाप निकल गयी |

‎अगले दिन पुलिस की गिरफ्त में उस मकान का मालिक था, टी. ‎वी चैनलों पर यही खबर चल रही थी |

‎रागिनी ने विजय को धन्यवाद दिया, जिसकी वजह से एक औरत को उसके पति के वहशीपन से छुटकारा मिल गया |

‎फिर कभी विजय को उस मकान से चीख न सुनाई दी |


हत्या के दिन की डायरी एंट्री


डियर डायरी


मैं अगर किसी दिन किसी की हत्या कर के आऊं, तो शायद मैं हत्या वाली बात तुमसे साझा न कर पाऊं। हालांकि, मेरे ख्याल से किसी व्यक्ति का किसी दूसरे व्यक्ति की हत्या कर देना जीवन की एक बड़ी घटना में से एक है और इसका दस्तावेजीकरण करना जितना खतरनाक है उतना जरूरी भी है। लेकिन फिर भी मैं तुम्हे यह नहीं बताऊंगा की मैंने किसी की हत्या कर दी है। 

किसकी हत्या की है? क्यों कि है? कैसे की है? हत्या के लिए मैंने कौन से हथियार का प्रयोग किया? मैं ऐसे किसी भी सवाल के बारे में लिखने से हिचकुंगा। और हिचकना लाजिमी है । मुझे ऐसी कोई जानकारी कहीं भी लिखित या मौखिक रूप से किसी से भी साझा नहीं करनी चाहिए जो मुझे हत्यारा साबित करे और फांसी या कारावास के नजदीक कर दे या फिर मुझे खूनी घोषित कर दे। मैं भला ऐसी बाते किसी से भी साझा क्यों करूँ।


वैसे ह्त्या करना कोई मामूली बात नहीं है। हत्या करना राह चलते किसी दूकान से सिगरेट पी लेने जैसा या फिर घंटो चलते रहने की उब को दूर करने के लिए बेवजह किसी पेड़ से पत्ता तोड़ लेने जैसा नहीं है। किसी की ह्त्या करने के लिए आदमी के पास एक ठोस वजह होनी चाहिए।


जब मेरे गाँव की सबसे बूढी औरत 110 वर्ष की जिंदगी जीने के बाद मरी थी तब उसने कहा था " सांप भी किसी को यूँ ही नहीं ं डसता"। अदालती भाषा में कहें तो हर ह्त्या के पीछे एक मोटिव ऑफ़ मर्डर होता है और फिलहाल मेरे पास ऐसी कोई वजह नहीं है जिसकी वजह से मैं किसी की ह्त्या कर दूं। असल जिन्दगी में चलने वाली गोली का शोर फिल्मों में चलने वाली गोली के शोर से बहुत ज्यादा तेज होता है। इतना ज्यादा की एक साथ कई लोग जिंदगी भर के लिए बहरे हो जाते हैं।


खैर अगर मैं अगर हत्या करूँ भी तो उस दिन डायरी मैं हत्या के बारे में रत्ती भर न लिखकर एक कविता लिख दूं। एक सुन्दर सी प्रेम कविता। एक ऐसी कविता जिसमे इतना प्रेम हो की पढ़ने वाला कभी अंदाजा भी न लगा पाए कि जिसकी कविता में इतना प्रेम है वो किसी की हत्या भी कर सकता है। वो जिसके हाथों ने इतनी प्रेम से भरी कविता की रचना कि हो वो कैसे किसी और के खून से अपने हाथ रंग सकता है। हो सकता है मै कविता लिखने की जगह उस दिन की घटनाओं को बदलकर लिखूं।


मैं लिख दूं कि "आज मैं बहुत खुश था। मैंने नाश्ते मैं अपना पसंदीदा ऑमलेट टोस्ट खाया। आज मैंने एक बेहतरीन लव स्टोरी देखी। फ़िल्म देखने के बाद मैंने अपनी गर्लफ्रेंड को घर बुलाया। उसके साथ मैंने वही फ़िल्म दोबारा देखी। उसके लिए भी अपना पसंदीदा नाश्ता बनाया। फ़िल्म देखने के दौरान मैंने उसके बालों की चम्पी भी की। फ़िल्म के एक बहुत ही ज्यादा अतरंग दृश्य को देखने के बाद फ़िल्म को पौज कर गर्लफ्रेंड के साथ सेक्स भी किया। कूल मिलाकर मैं उस दिन के बारे में ये बताऊंगा की मैं उस दिन बहुत खुश था। एक आदमी अपना पसंदीदा खाना खाने के बाद, अपनी गर्लफ्रेंड के साथ अपनी पसंदीदा रोमांटिक फिल्म देखने के बाद, अपनी गर्लफ्रेंड के साथ ऑर्गेजमिक सेक्स करने के बाद भला खून क्यों करेगा। इतनी खुशी के बाद भला कोई किसी का खून कर सकता है क्या?


हालांकि घटनाओं को इस तरह बदलकर लिखने से कोई तेज तर्रार जासूस या पुलिसवाला डायरी पढ़ने के बाद ये मान के नहीं बैठेगा की मैंने हत्या नहीं की होगी। एकबारगी वो अगर इन घटनाओं पर विश्वास कर भी ले तब भी यह साबित नहीं होता कि मैंने हत्या नहीं की है। आदमी की खुशी कब दुख या क्रोध में बदल सकती है पता नहीं चलता। डायरी पढ़ने वाला ये भी तो सोच सकता है कि मेरे द्वारा बनाया गया नाश्ता मेरी गर्लफ्रेंड को पसंद न आया हो और उसने प्यार से बनाये गए इस नाश्ते को दुनिया का सर्वश्रेष्ठ नाश्ता घोषित करने बजाय यह कह दिया हो कि "इसमें नमक कम है, और अंडा ठीक से पका नहीं है। तुम्हे पता है न कच्चे अंडे से मुझे उबकाई आती है। हटो मुझे उल्टी आ रही है" और मुझे उसकी ये बात बुरी लग गयी हो और मैं दुखी या क्रोधित हो गया होऊं। 


या फिर ये भी हो सकता है की मैं उसके उल्टी करने के बात पर क्रोधित हो गया होउँ और मैने उस से बहस की हो कि अंडा इतना कच्चा नहीं था कि किसी को उल्टी आ जाये। या फिर ये भी हो सकता है कि उसकी उल्टी देख के मुझे लगा होगा कि वो प्रेग्नेंट है और मैने उसे प्यार भी किया हो। लेकिन फिर ये भी हो सकता है कि उसके शादी करने की बात से मैं अंदर ही अंदर परेशान हो गया हूँ। मैंने उसे समझाया हो कि अभी मैं शादी नहीं कर सकता। मेरे पास न नौकरी है न धेले भर का पैसा है। सड़कछाप मैगजीन में मचलती कहानियां लिखकर इतना पैसा नहीं जमा कर सकता कि शादी के आठ महीने बाद ही पिता बनना अफोर्ड कर पाऊं। इसलिए हो सकता है मैंने अबॉर्शन की बात की हो और उसने मुझे निष्ठुर हत्यारा जैसी गालियां दी हो। मैं गालियां सुनता हूँ। मुझे फर्क नहीं पड़ता है पर लेकिन शायद उस वक़्त मैं हत्यारा जैसी चटख लाल रंग की गाली बर्दाश्त नहीं कर पाया होऊं और मैंने उसे धक्का दे दिया हो और वो गिर गयी हो। यूँ मेरे धक्का देने से इंसान जल्दी गिरता नहीं है पर शायद वो गिर गयी हो क्योंकि उसके पैर गीले थे। गिरने से आदमी का सर नहीं फटता पर उसका फट गया हो और सर से खून बहने लगा हो। खून बहने से आदमी मरता नहीं पर शायद वो मर गयी हो।


इंसान को अपने पैर या अपनी आँखें गीली नहीं रखने चाहिए, मरने की संभावना बढ़ जाती है। इंसान को प्यार भी नहीं करना चाहिए उसमे भी मरने की संभावना बहुत ज्यादा होती है। प्यार करने से आदमी को खून की कमी हो सकती है लेकिन आदमी प्यार किये जाने के बाद की जो प्यार की कमी होती है उस से मारा जा सकता है। इंसान को बेरोजगार आदमी से भी प्यार नहीं करना चाहिये। आदमी खाली जेब के कुवें में गिरकर भी मारा जा सकता है। आदमी हथियार से नहीं मरता। आदमी मारे जाने की संभावनाओं से ज्यादा मरता है। 'संभावना' से याद आया उसका नाम भी संभावना ही है। ही है?? या ही था।


मैं तीन दिनों से घर से बाहर नहीं निकला क्योंकि मैंने किसी की हत्या नहीं की। हत्या करने वाले लोग घर से बाहर होते है। घर के भीतर किसी लाश के पास बैठकर डायरी थोड़े ही लिखा करते है। घर में बस एक कप चाय के लिए दूध है। मुझे अब शायद दूध लाने के लिए घर से बाहर निकलना चाहिए। पर मेरे पास पैसे नहीं है। मेरे गाँव की वो बुढिया जिसने मरते समय सांप वाली बात कही थी वो जब ज़िंदा थी तब उसने एक बार कहा था की आदमी खाली हाथ आता है और खाली हाथ ही चला जाता है। आदमी अपना कमाया धमाया सबकुछ यहीं छोड़ के चला जाता है। मेरी गर्लफ्रेंड तो जा चुकी है पर उसके पर्स में अब भी शायद इतने पैसे जरुर होंगे जिससे मैं इतना दूध तो खरीद ही सकता हूँ की दो कप चाय मिल जाए। मुझे अब जाना चाहिए।


चमत्कार


फाइटर प्लेन रनवे के चक्कर लगा रहा है, लैंडिग के लिए एकदम तैयार। पर प्लेन लैंड कर पाता, ऐन उसके पहले ही जाने क्या तकनीकी खराबी आ गई कि प्लेन लैंड़ नहीं कर पा रहा था। जबरदस्ती लैंडिंग की जाती तो पूर्णतः आशंका थी कि प्लेन क्रैश कर जाता। नतीजा होता, प्लेन के साथ ही एक सीनियर पाइलट और साथ ही चार ट्रेनिंग ले रहे युवा पायलटों की जान भी जोखिम में पड़ जाती।

बड़ी अफरा तफरी मची हुई थी कंट्रोल रूम में। सबसे अनुभवी पायलट से फौरन संपर्क किया गया। उसने तुरंत फाइटर प्लेन के पायलट को दिशा निर्देशन देना प्रारंभ किया। नीचे रनवे पर भी युद्ध स्तर पर काम चल रहा था।

सारी फायर ब्रिगेड की गाड़ियाँ लगाई जा रही थी। रनवे पर ट्रकों से रेत बिछाया जा रहा था, ताकि प्लेन के रफ्तार पर यथाशीघ्र काबू पाया जा सके। एंबुलेंस, डाक्टर नर्स को मौके की जगह पर एलर्ट किया जा रहा था, सबके होश हवाश उड़े हुए थे, अगले पल क्या घटने वाला था, किसी को भी नहीं मालूम ?

सीनियर पायलट कंट्रोल रूम से मिल रही हर निर्देश का पालन कर रहा था पर कोई भी युक्ति काम नहीं कर रही थी ! सबके माथे पर पसीना टपक रहा था। अगले कुछ पलों में पाँच जिंदगियों का द एंड होने की संभावना से सभी का मन घबराया हुआ था। प्लेन में सवार सभी आने वाली मौत के बारे में सोच रहे थे। अपने परिवार के जिंदगी के बारे में सोच रहे थे, क्या होगा उनका, जब उनके बीच वे नहीं रहेंगे।

एक महिला पायलट स्वाति भी साथ थी। उसका साल भर का गोल मटोल बच्चा था। उसकी आँखों के आँसू रुक ही नहीं रहे थे, हाय अब अपने बच्चे को कभी नहीं देख पाऊँगी। मन मसोस रहा था, चेहरे का रंग उड़ा हुआ था। मन में तमाम तरह की शंकायें साँप के फन की तरह दंश दे रही थी। मेरे बाद कौन मेरे बच्चे को पूछेगा। कौन उसकी देखभाल करेगा। पुरूष जात का क्या भरोसा। सामने हूँ तो स्वाति-स्वाति करते घूमते हैं। आँख ओट तो पहाड़ ओट। मेरे पति निःसंदेह मेरे जाने के बाद दूसरी शादी कर लेंगे। अभी ही कैसे खूबसूरत लड़कियों को ताड़ते रहते हैं। वह तो मेरे रहते उनका वश नहीं चलता वरना कितनी लड़कियों के तो अभी भी हीरो बन सकते हैं। कितने हैंड़सम हैं भी तो निखिल। हुँह....जब मैं रहूँगी ही नहीं तो कुछ भी करते रहें पर हाय...कही दूसरी शादी कर ली तो मेरे गोलू को सौतेली माँ कितना सताएगी।

हाय मेरे बच्चे, मै क्या करूँ। अब न तो किसी की बेटी थी, न किसी की पत्नी, सामने खड़ी मौत को देखकर वह सिर्फ एक माँ थी। माँ के दिमाग में सिर्फ अपना साल भर का बच्चा था, उसका मासूम चेहरा था, बाकी सारी दुनिया वह भूल चुकी थी। आँखों से टप टप आँसू बहे जा रहे थे, छाती में मरोड़ उठा जा रहा था। सारी दुनिया में सिर्फ बच्चा ही शाश्वत था, बाकी दुनिया तो स्वाति के लिए अर्थहीन हो चुकी थी। टप-टप गिर रहे थे आँसू, मन बेसुध हुआ जा रहा। मेरे बाद मेरा बच्चा रहेगा कैसे, सोच यही खा रहा था। मौत का खौफ नहीं था, बस अपनों की चिंता थी। मेरे बाद सबका क्या होगा, मन में यही व्याकुलता थी।

धीरे-धीरे पास आती मौत देख, गहन सन्नाटा पसरा हुआ था। एयर कंडीशनर चलने के बावजूद सबका चेहरा पसीने से तर-बतर था। सभी की चुप्पी में दिमाग की खलबली मची हुई थी। तभी एक नये पायलट ने सीनियर पायलट से कहा कि सर, क्यों न तब तक चक्कर लगाया जाये जब तक प्लेन का पूरा फ्यूल खत्म न हो जाए, अगर लैंडिंग में आग लगती है तो फ्यूल न रहने से आग तेजी से तो नहीं फैलेगी। सब कुछ तुरंत ध्वस्त होने में शायद थोड़ी मोहलत मिल जाए। चूँकि बात बहुत वाजिब थी, तुरंत सीनियर पायलट ने इस बारे में कंट्रोल रूम में बात किया।

दैट्स ए ब्रिलियंट आइडिया, वहाँ से जवाब मिला, बिल्कुल ऐसा ही करो, जब तक सारा फ्यूल खत्म न हो जाए, चक्कर लगाते रहो। देखो कितने समय तक का फ्यूल बचा है ?

सर, 20 मिनट का।

ओके, 19 मिनट तक चक्कर लगाते रहो,आखिरी एक मिनट में लैंड करना। चिंता बिलकुल मत करना,सारे सिक्यॅरिटी के इंतजाम हो चुके हैं, हम सभी आपके साथ हैं, कुछ नहीं होगा।

सर, क्या इनके घरवालों तक खबर पहुँचा दिया जाय ? एक सुरक्षा गार्ड ने कंट्रोल रूम में बैठे कर्नल से पूछा ?

डोंट, सभी घबरा जायेंगे, जरूरी नहीं कि कुछ बुरा ही हो, जब तक आस है, प्रयास करो। हम फौजी हैं, डटकर मुकाबला करो। हारने से पहले हार मानना हमारी फितरत में नहीं है।

ओके सर !

चिंता मत करना.....हुंह, मेन पायलट ने मन में दोहराया। मौत एकदम सामने खड़ी है,अब चिंता करने से क्या होगा। पहले से मालूम होता तो दोनों बच्चों की शादी कर देता, सरला क्या क्या करेगी। बीमा की रकम, मेरी मौत से मिले मुवावजे और एफ डी की रकम से सारे काम निपटा तो लेगी। कितनी पेंशन मिलेगी, कभी कैलकुलेट भी नहीं किया। इतनी तो बन जाए कि कभी उसे तकलीफ न हो।

कितनी बार कहा था......सीख लो बैंकिंग के सारे काम, पर नहीं ! हर बार टाल जाती थी, आपके रहते मुझे क्या जरूरत, अब जरूरत तो आन पड़ी है न..हे भगवान, सारे पेपर वर्क कैसे करेगी, हे भगवान .. काश, एक फोन करने की गुंजाइश कर देते, तो सभी कुछ समझा देता। अब कैसे करूँ ?

इन्हीं पांच मे निहायत खूबसूरत नौजवान था, 25 वर्षीय मनोरंजन चक्रवर्ती। मात्र एक सप्ताह बाद ही शादी की तारीख पड़ चुकी थी। लव कम अरेंज मैरिज थी। बहुत मुश्किल से मम्मी पापा को राजी कर पाया था। बहुत प्यार करता था वह काजल को, अब नहीं देख पायेगा, कितने सतरंगी सपने सजाए थे। हनीमून पर जाने के लिए कुल्लू मनाली का हनीमून पैकेज ले लिया था। शादी के बाद के क्या क्या सपने थे, काजल के साथ जिंदगी, क्या-क्या न सोच रखा था। अब एक भी पूरे नहीं होंगे....

अच्छा ....जब काजल को मेरे मरने की खबर होगी तो कैसे अपनी प्रतिक्रिया देगी काजल.... जाने काजल कभी याद भी करेगी या नहीं। एकाध साल में जरूर किसी और से शादी कर लेगी।

मम्मी पापा कितना रोयेंगे, शालू( छोटी बहन) के लिए, मम्मी पापा के लिए कुछ भी नहीं कर पाया, न अब कर पाऊंगा ? काजल से शादी करने की जिद में कितना दुख पहुँचया मैंने मम्मी- पापा को, किसी तरह नहीं मान रहे थे, घर छोड़ने की धमकी के आगे हार गए। मेरी खुशियों पर हर हमेशा अपनी खुशियों की बलि चढ़ाते आए थे, अब भी चढ़ा ही दिए।कैसे बुझे-बुझे से हो गए थे मम्मी- पापा। कैसा नालायक बेटा था मैं, सिर्फ अपने बारे में ही सोचता रहा। अब सामने खड़ी मौत देख कलेजे में एक हूक उठ रही थी। आँखों से आँसू रुक ही नहीं रहे थे।

हाय शालू, हाय मम्मी पापा, हाय काजल अब कभी किसी को नहीं देख पाऊँगा। हे भगवान .....बस एक आखिरी मौका दे दो, मम्मी-पापा का अच्छा बेटा बन कर दिखाऊँगा। शालू को हर हमेशा डाँटता ही रहा, अब एक अच्छा भाई बन कर प्यार दूँगा। बस एक मौका हे भगवान .....

विपिन चौधरी, मनोरंजन चक्रवर्ती का समव्यस्क, छः महीने पहले ही शादी हुई थी। माँ-पिताजी, पत्नी, भाई-बहन सभी गाँव में ही रहते हैं। किसान पिता ने कैसे हाड़ तोड़ मेहनत कर, कुछ जमीन बेचकर, कुछ गिरवी रखकर पढाई पूरी करवाई थी। सबको उम्मीद थी, बेटा पायलट बन गया है तो अब सबके दिन फिरेंगे। विपिन की आँखों के सामने सबके चेहरे घूम रहे थे, एक दूसरे में गड्ड-मड्ड हुए जा रहे थे ! पहचान ही नहीं पा रहा था कि कौन सा चेहरा किसका था, सामने दिख रही थी सबके आँखों की आस.... किसी के लिए कुछ न कर पाया, न अब कर पाऊँगा। बाबूजी तो जीते जी मर जायेंगे, उनकी सारी आस मुझसे ही थी। अब मैं ही नहीं रहूँगा तो क्या होगा..... पत्नी का मासूम चेहरा सामने आए जा रहा था, अभी तो मधुमास का सुरूर ही खत्म नहीं हुआ था। कैसी पनीली आँख लिये घूमती थी बावरी, अभी तो जी-भर देखा भी नहीं था कुसुम को...कैसी सलोनी सी है कुसुम, अभी तक बाँहों में उसकी गर्माहट महसूस करता हूँ। उसका वह उच्छवास... वह कोंपल सी नरमाहट, वह मद से लबालब नयना, हाय...हे भगवान...तू कितना निष्ठुर हैं।अभी दिया ही कितना था कि अब सब तुझे वापिस चाहिए ?

कुसुम मुझे माफ करना, हमारा मात्र पंद्रह दिन का साथ था....इतना बड़ा जीवन मेरे नाम पर मत बैठना, मायके चली जाना। किसी और से ब्याह कर लेना। मुझे नहीं है तो क्या ? तुम अपने जीवन के सारे अरमान पूरे कर लेना ! बाबूजी, मुझे क्षमा कर देना.....मैं नालायक बेटा हूँ, कुछ पल सुख का नहीं दे सका, मुझे माफ कर देना।

वह चुपचाप आँख मींच कर पल पल आ रही मौत की आहट को महसूस रहा था।

संजय कुमार, 24 वर्षीय नौजवान भावशून्य चेहरे से बारी बारी सबके चेहरे देखे जा रहा था, कैसे सबके चेहरे सफेद हो चुके हैं। इसी ने फ्यूल खत्म होने तक चक्कर लगाने की लगाने की सलाह दी थी, सच, कुछ नहीं सोच रहा था ? या एक साथ इतनी बातें सोच रहा था कि कुछ स्पष्ट नहीं था। वह तो बस अपनी जिंदगी में जिनसे भी मिला था, सबके चेहरे याद कर रहा था। कितने सारे चेहरे, कितने तरह के सबके रंग। कोई किसी से भी नहीं मेल खाते थे। फिर जाने कैसे सबसे निभाए जाते थे। अब वह किसी से नहीं मिल पाएगा, वह धीमे से बुदबुदाया..... चलो यारों, अब जिंदगी के तमाम किस्से खत्म, आ गया समय सितारा बन आसमान में लटकने का, सच में पुनर्जन्म होता होगा तो फिर मिलूँगा सबसे..... कितना समय बचा है अब अलविदा कहने के लिए...

घड़ी पर निगाह गयी, मोहलत खत्म, उन्नीसवॉं मिनट खत्म होने में मात्र दस सेकेंड ..उसने अपने पाँचवे साथी सचिन पर एक भावशून्य निगाह डाली जो लगभग चेतना शून्या स्थति में तभी से था, उसने तेजी से उसका बेल्ट बाँधते हुए ..... आँखें बंद करते हुए, जोर से चिल्लाया, सर लैंड कीजिए,

यह वह समय था, जब पूरा एयरोड्रम इतना शांत हो गया था कि मात्र अपने दिल की हर धड़कन, हर किसी को सुनाई पड़ रही थी, धाड़-धाड़ धाड़- धाड़.........हर कदम दौड़ने को तत्पर, हर साँस अटकी हुई....

फाइटर प्लेन ने गोता खाया,और रन वे पर दौड़ पड़ा.... थोड़ा ही आगे बढ़ा, बिछी रेत फिसलने में अवरोध बन रही, स्पीड कम होते जा रही थी, दो तीन जबरदस्त हिचकोले खाए और फिर स्थिर हो गया।

जरा भी डैमेज नहीं !

पूरा फाइटर प्लेन सुरक्षित, अंदर बैठे सभी पाँचों पायलट सुरक्षित। एक भयंकर हादसा जो होना अवश्यंभावी था....पर वह हुआ नहीं। किसी को एक खरोंच तक नहीं .....पूरा एयरोड्रम तालियों की आवाज से गूँज उठा, हर चेहरा जो पिछले तीन घंटों से तनाव का चरम झेल रहा था। वह ईश्वरीय सत्ता के प्रति नतमस्तक था, जिसने मौत को धता बता दिया था।

प्लेन में सवार महिला पायलट रो रही थी लगातार ... बार बार कहे जा रही थी, मेरे गोलू ने बचा दिया।

मेरे बच्चे ने अपनी माँ की रक्षा की। हमेशा तो नहीं होता है, पर आज अभी...चमत्कार हो चुका था।।


सफ़ेद दाग


इला बड़ी देर से बस के आने का इन्तज़ार कर रही थी। काफ़ी लम्बे इन्तज़ार के बाद जब बस आई, तो इला भीड़ के साथ बस में चढ़ तो गई, लेकिन बैठने के लिए उसे सीट नहीं मिली। उसने भीड़ से खचा-खच भरी हुई बस से उतर जाना चाहा, ये सोचकर कि “अगली बस से चलूँगी।” लेकिन इससे पहले कि वो भीड़ को चीरकर उतर पाती, बस चल दी थी।

अब उसे खड़े-खड़े ही सफ़र करना था। वैसे तो उसे बस में खड़े रहने में कोई दिक़्क़त नहीं होती थी, क्योंकि अब तो उसे इसकी आदत हो चुकी थी। लेकिन आज उसकी तबियत कुछ ख़राब थी, इसलिए उससे खड़े नहीं रहा जा रहा था।वो बैठना चाहती थी, लेकिन बस पूरी भरी हुई थी। बस में एक के बाद एक, और इसी तरह से ढेर सारे लोग चढ़ते जा रहे थे, कण्डकर टिकट काटता जा रहा था, और भीड़ को देखकर इला की बेचैनी बढ़ती जा रही थी।

फिर वही हुआ, जो वो नहीं चाहती थी। उसे ऐसा लगा कि “अब मुझे उल्टी हो जाएगी। भरी बस में लोग मुझे उल्टी करते हुए देखेंगे, तो क्या सोचेंगे?” ये सवाल उसके मन को अच्छा नहीं लग रहा था। इसलिए वो नहीं चाहती थी कि कोई उसकी तरफ़ देखे या उसके ऊपर ध्यान दे।

लेकिन इला का इस तरह बेचैनी से इधर-उधर देखना, लोगों की नज़रों से छुपा हुआ नहीं था। थोड़ी ही देर में उसे पता चल गया कि “सब लोग मुझे बड़ी अजीब नज़र से देख रहे हैं।” अब इला किसी भी तरह बैठ जाना चाहती थी, क्योंकि अब उससे बिल्कुल भी खड़े रहा नहीं जा रहा था। वो सोच-सोच कर परेशान हो रही थी कि “लोग पहले ही मुझे अजीब नज़रों से घूर रहे हैं, अब अगर उल्टी करते भी हुए देख लेंगे, तो पता नहीं क्या सोचेंगे!”

लेकिन बस में बैठे हुए लोग तो पहले से ही उसे देख रहे थे और सोच रहे थे कि “ये लड़की इतनी बेचैन क्यूँ है?” क्योंकि लोगों को तो उसकी ख़राब हालत का कुछ पता नहीं था। लोगों की नज़र तो बस उसके सफ़ेद दाग़ से भरे हुए चेहरे पर टिकी थी। उसका चेहरा सफ़ेद दाग़ से इतनी बुरी तरह भरा हुआ है कि लोगों को उससे घिन आ रही थी, लेकिन फिर भी लोग उसे आँखें फाड़-फाड़ कर घूरे जा रहे थे, क्योंकि वो एक लड़की है, और उसके पास देखने जैसा बहुत कुछ है। भले ही, उसके चेहरे पर सफ़ेद दाग़ है तो क्या हुआ!

ये सफ़ेद दाग़ भी,वैसे तो किसी-किसी को कहीं एक-आध जगह हो जाता है, लेकिन इला का तो पूरा जिस्म ही इतनी बुरी तरह सफ़ेद दाग़ के चितकबरे धब्बों से ढँका हुआ है कि उसे ख़ुद भी अपने आप से घिन आती है। क्योंकि सफ़ेद दाग़ उसके होंठों पर है, उसकी नाक पर है, उसके कान के आस-पास है, उसके माथे पर है, उसकी गर्दन पर है, उसके हाथ पर है और उसकीसलवार के नीचे दिख रहे पैर के पंजों पर भी है।

उसको देखकर ऐसा लगता है कि ये सफ़ेद दाग़ इसी तरह उसके जिस्म के उन हिस्सों पर भी होगा, जो अभी उसकी सलवार-क़मीज़ के अन्दर ढँके हुए हैं, यानी उसकी पीठ पर, उसके परट पर, उसके सीने पर, उसकी जाँघों पर। और वहाँ भी।

लोगों की नज़र ख़ुद से अन्दाज़ा लगा रही थी कि “इस लड़की के पूरे जिस्म पर सफ़ेद दाग़ ने अपना कब्ज़ा जमा रखा है।” लोग ये भी सोच रहे थे कि “जब ये लड़की नहाने के लिए अपने सारे कपड़े उतार देती होगी, तो इसके जिस्म के सारे सफ़ेद दाग़ कितने बुरे लगते होंगे, है ना?” लोग ये भी अटकलें लगा रहे थे कि “अभी तो इस लड़की की उम्र भी कुछ बीस से ज़्यादा नहीं लग रही है। बेचारी की ज़िन्दगी सफ़ेद दाग़ की वजह से बेक़ार हो गई। अब कौन करेगा इससे शादी-वग़ैरह?”

लोगों की सारी अटकलें सही थीं। इला के पूरे जिस्म पर सफ़ेद दाग़ हैं। उसके होंठों के चारों ओर बने सफ़ेद दाग़ की वजह से उसका चेहरा, किसी चितकबरी बकरी की तरह लगता है। और जब वो नहाती है, तो आँख बन्द करके नहाती है, क्योंकि ये चितकबरापन, यही सफ़ेद और गहरे भूरे धब्बों का मिला-जुला जिस्म, उसकी आँखों में किसी काँटे की तरह चुभता रहता है और यही वजह है कि अभी तक उसकी शादी भी नहीं हुई है। वरना ग़रीब लड़कियों की शादी बीस बरस तक न हो, ऐसा तो होता नहीं।

लेकिन इस वक़्त इला को अपने सफ़ेद दाग़या अपनी शादी की उतनी चिन्ता नहीं थी, जितनी इस बात की थी, कि वो कहीं किसी आदमी के ऊपर उल्टी न कर दे। इसलिए जब उससे बिल्कुल ही नहीं रहा गया, तो उसने बस के पिछले गेट के पास, पहली सीट पर बैठे हुए आदमी से, बड़ी लाचारगी भरी आवाज़ में कहा, “मेरी तबियत ठीक नहीं है। क्या आप मुझे थोड़ी देर बैठने देंगे?”

उस सीट पर बैठे हुए आदमी ने उसे एक नज़र देखा और झट से खड़ा हो गया। ऐसा नहीं था कि उस आदमी को इला पर दया आ गई थी, बल्कि हक़ीक़त ये थी कि इला को देखते ही वो आदमी बिदक सा गया था कि “कहीं इस लड़की से मेरा हाथ-वाथ न छू जाए, और कहीं इस लड़की के ढेर सारे सफ़ेद दाग़ मुझे भी न लग जाएँ।”

वो आदमी सीट छोड़कर उठ गया, फिर इलाउस आदमी को “आपकी बड़ी मेहरबानी” के अन्दाज़ में देखते हुएसीट पर बैठ गई।फिर बैठते ही वो अगली सीट के हत्थे पर, अपना सिर टिकाकर,आगे की तरफ़ झुक गई। लोगों की नज़र अब उसकी गर्दन के पीछे और क़मीज़ से बाहर दिख रही पीठ पर थी, जिसके ऊपर भी सफ़ेद दाग़ के कुछ धब्बे नज़र आ रहे थे।

अमूमन, होता तो ये है कि लड़की के जिस्मपर सफ़ेद दाग़ बुरे लगते हैं, लेकिन इला के जिस्म पर सफ़ेद दाग़ इतने ज़्यादा हैं कि उसके सफ़ेद दाग़ों से ज़्यादा उसका अपना गहरे भूरे रंग का जिस्म बुरा लगता है। ऐसा लगता है जैसे उसके सफ़ेद जिस्म पर ढेर सारे गहरे-भूरे दाग़ हो गए हैं। इला ज़्यादा ख़ूबसूरत नहीं है। उसका जिस्म गेहूँ के रंग को पार करते हुए, गहरे भूरे खजूर के रंग का है, जिसपर इतने सारे सफ़ेद दाग़, उसके जिस्म को बहुत ही बदसूरत बना चुके हैं।

सीट पर बैठी और आगे की ओर सिर झुकाये हुए इला से अब नहीं रहा गया और उसने बस में ही उल्टी कर दी। अब क्या था, लोगों की नज़र में उसके लिए जो घिन थी, अचानक उसने एक भयानक रूप ले लिया। सब लोग उसे कोसने लगे, “अरे बस में ही उल्टी कर दी। तबियत सही नहीं है, तो घर से निकली ही क्यों?” वग़ैरह, वग़ैरह की नसीहतें सुनाई देने लगीं।

समद अपनी ज़िन्दगी लगभग जी चुका है। उसने अपनी ज़िन्दगी में लगभग सब कुछ देख लिया है। नौकरी, पैसा, शादी, बच्चा, रिश्तेदार, दोस्त, यार। लेकिन ये सबकुछ वो बहुत पीछे छोड़ चुका है। उसको किसी भी चीज़ से तसल्ली नहीं मिली है।

नौकरी की, तो थोड़े ही दिनों में नौकरी से ऊब गया। पैसा तो बहुत कमाया, लेकिन उसे पैसे से कभी मोह नहीं रहा। शादी हुई, तो बीवी ऐसी मिली, जो हमेशा बीवी बनके रहना चाहती थी, और सबको दिखाना चाहती थी कि “मेरा पति बहुत पैसा कमाता है, और मुझे बहुत प्यार करता है।” बीवी की ज़िद पर, और न चाहते हुए भी,समद को एक बच्चा पैदा करना पड़ा।

बच्चा हुआ, तो बीवी का पूरा ध्यान बच्चे पर चला गया। अब उसकी बीवी, लोगों से ये कहती फिरने लगी कि “हम लोग अपने बच्चे को सबसे बढ़िया स्कूल में पढ़ायेंगे। मेरे पति ने अभी से सारा इन्तज़ाम कर दिया है। पैसे की कोई दिक़्क़त नहीं है।” बच्चा बड़ा हुआ, तो रिश्तेंदारों ने ‘एक और’ की रट लगा ली।

अब यहाँ आके समद के सब्र का बाँध टूट गया और उसकी सबसे अनबन हो गई। उसने साफ़-साफ़ कह दिया, “तुम लोगों ने चक्कर में, मैं अपने आप को खोता जा रहा हूँ। मैं जीना चाहता हूँ। सभी रिश्तेदारियों और इस दिखावे से भरी हुई ज़िन्दगी से बहुत दूर, कुछ दिन अकेले रहना चाहता हूँ।”

लेकिन एक शादी-शुदा आदमी ऐसा कर सके, इसके लिए हमारा समाज अभी इतना आज़ाद-ख्याल नहीं हुआ है। समद की बातों से लोगों ने ये अन्दाज़ा लगाया कि “समद का, शादी के बाद,अपनी बीवी से जी भर चुका है, और अब उसका किसी ‘दूसरी औरत’ से चक्कर चल रहा है।” फिर रिश्तेदारों ने भी अपना हक़ जताया और समद की बीवी को उकसाया कि “पति को इस तरह आज़ाद-ख़्याल रहने दोगी, तो किसी दिन हाथ से जाएगा।” फिर बीवी तो आख़िर बीवी होती है। उसने भी अपना हक़ जताया और बात सीधे तलाक़ पर ही ख़तम हुई। बीवी-बच्चा, रिश्तेदार, सब के सब समद के ख़िलाफ़ हो गए। और अन्त में समद अकेला रह गया। अब उसकी ज़िन्दगी में जीने का कोई ख़ास मक़सद नहीं बचा है। और अब वो अपनी बेमक़सद ज़िन्दगी को ढोते हुए इधर-उधर भटकता रहता है।

आज जब समद ने बस में अपने बगल में बैठी हुई लड़की को उल्टी करते हुए देखा, और लोगों को उसे बुरी तरह झिड़कते हुए देखा, तो उसे बहुत बुरा लगा। उसने अपनी पानी की बोतल, उसे पकड़ाते हुए कहा, “पानी पी लीजिए, थोड़ा आराम मिलेगा।” इला ने इस आदमी को हैरानी से देखा, जो पूरी बस में अकेला ऐसा आदमी था, जिसे उसके सफ़ेद दाग़ या उसकी बदसूरती से कोई हिचक नहीं हो रही थी। यहाँ तक कि उसने उल्टी भी उसके बगल में ही बैठ कर की थी।

समद के चेहरे पर, एक ख़ामोश मुस्कुराहट देखकर, इला ने पानी की बोतल उसके हाथ से ले ली, और बोतल अपने मुँह से थोड़ा सा ऊपर रखकर एक घूँट पानी पीना चाहा। लेकिन तभी ड्राइवर ने ब्रेक मारी और इला का हाथ हिल गया, जिससे बोतल का थोड़ा सा पानी उसके चेहरे और उसके कपड़ों पर गिर गया। समद ने उसे मुँह पोंछने के लिए अपना रुमाल देते हुए कहा, “कोई बात नहीं, मुँह लगा के पी लीजिए।”

लोग आगे-पीछे से सब कुछ देख रहे थे, और अब, जबकि इला को एक हमदर्द मिल गया था, लोगों को ये भी थोड़ा बुरा लगा। इतने में कण्डक्टर भी टिकट काटते हुए पास आ गया था। उसने इला को बस में उल्टी किये हुए देखा, तो बिगड़ गया, “अरे,ये क्या कर दिया? अब इसे साफ़ कौन करेगा?”

तभी समद ने इला के हाथ से पानी की बोतल वापस ली और बचे हुए पानी से इला की उल्टी बहा दी। कण्डक्टर ने झेंपते हुए कहा, “साहब, जब मैडम की तबियत सही नहीं है, तो बाहर लेकर क्यूँ घूम रहे हो? घर लेके जाओ इनको, या किसी डॉक्टर को दिखाओ।”

ये सुनकर इला और समद ने एक-दूसरे को हैरानी से देखा। कण्डकर ने अनजाने में ही, उनके बीच एक रिश्ता क़ायम कर दिया था। समद को भी ऐसा लगा, जैसे उसे थोड़ी देर के लिए एक मक़सद मिल गया है।

लेकिन इला ये सोच रही थी कि “क्या इस आदमी को अभी तक मेरे चेहरे के सफ़ेद दाग़ नहीं दिखे हैं? या फिर, क्या ये आदमी जानबूझ के अन्धा बन रहा है?”

फिर समद ने इला को बस से उतर चलने का इशारा किया, जिसे इला ने अपनी ख़राब हालत को देखते हुए, बिना कुछ कहे, सिर झुका के मान लिया। इला और करती भी क्या? पूरी बस में उसे एक ही आदमी मिला था, जिसने उसे भी एक इन्सान समझा था और उसकी ख़राब हालत को बिना कुछ कहे समझ गया था।

अब दोनों बस से उतरकर सड़क पर खड़े थे। इला को समझ में नहीं आ रहा था कि वो समद से क्या कहे। उसकी झिझक को देखते हुए समद ने ही कहा, “चलिये, पहले किसी डॉक्टर के पास चलते हैं।”

इला ने उसकी बात को बड़े ग़ौर से सुना, “चलिये, पहले किसी डॉक्टर के पास चलते हैं” का क्या मतलब था? इला अपने ही सवालों में उलझती जा रही थी। लेकिन समद उसके पास बिना किसी परेशानी के इस तरह खड़ा था, जैसे वो उसके अपने ही परिवार का एक हिस्सा हो। इतना अपनापन तो उसने अपनी ज़िन्दगी में आज से पहले कभी नहीं देखा था।

बचपन से लेकर आज तक उसे सिर्फ़ हिक़ारत की नज़र से ही देखा गया था, और लोगों ने उससे दूर ही रहना चाहा था। लेकिन एक ये आदमी है, जो एक अजनबी होते हुए भी, उसे अपनी ज़िम्मेदारी समझते हुए, डॉक्टर के पास ले जाना चाहता है।

आख़िर में जब उसे कुछ और समझ में नहीं आया कि वो क्या करे? तब उसने ‘हाँ’ में सिर हिला दिया।

अब डॉक्टर के पास जाते हुए रास्ते में दोनों ने अपनी-अपनी ज़िन्दगी एक-दूसरे के सामने पोटली की तरह खोलकर रख दी। जिसके बाददोनों को ही पता चला कि समाज ने दोनों के ही साथ बहुत बुरा सुलूक किया है।

डॉक्टर के क्लीनिक से दवाई लेकर जब दोनों बाहर निकले, तब दोनों को समझ में नहीं आया कि अब आगे क्या बात करें? क्या दोनों ये कहें कि “अच्छा अब चलते हैं। आपसे मिलकर अच्छा लगा।” या कुछ और? लेकिन कुछ और, क्या?

दोनों सड़क पर खड़े बस एक-दूसरे को देखते रहे, और “पहले कौन बोले?” ये सोचते रहे। फिर जब समद को लगा कि “शायद ये लड़की झिझक रही है और कुछ नहीं बोलेगी।” तब उसने ही कहा, “अपना ख्याल रखियेगा।” और इतना कहकर समद मुस्कुराते हुए वहाँ से चल दिया।

लेकिन इला वहीं खड़ी रही। थोड़ी दूर चलने के बाद जब समद ने वापस पलट कर देखा, तो इला वहीं खड़ी थी, और पहले से ज़्यादा उदास लग रही थी। उसके चेहरे से ऐसा लग रहा था, जैसे अगर उसे किसी ने तुरन्त नहीं रोका, तो वो अभी रो देगी।

समद ने दूर से ही उसे न रोने का इशारा किया और उसके क़दम अपने आप इला की तरफ़ वापस मुड़ गये। समद को अपनी ओर वापस आते हुए देखकर इला से नहीं रहा गया और उसकी आँखों से भरभरा के आँसू बह निकले।

समद ने उसके आँसूओं को पोछते हुए कहा, “पागल हो क्या?”

उसके इस सवाल का जवाब इला के पास नहीं था, लेकिन उसने समद का हाथ कस के पकड़ लिया और अपने आँसूओं की तेज़ धार के साथ और बिना शब्दों के ये कहना चाहा कि “फिर कभी मुझे इस तरह सड़क पर अकेले छोड़कर मत जाना।”

समद ने अपनी प्यार भरी आँखों से उसकी बात सुनी,फिर उसके कन्धे पर अपनेपन से भरा हुआ हाथ रखते हुए, उसकी ही तरह, बिना शब्दों में कहा, “चलो, अब घर चलते हैं।”

समद पढ़ा-लिखा था। वो जानता था कि सफ़ेद-दाग़ मिटाना मुश्किल तो है, लेकिन नामुमकिन नहीं। उसने इला को अपनी जान-पहचान के अच्छे डॉक्टरों को दिखाया और भरोसा दिलाया कि “तुम्हारे ये सारे सफ़ेद दाग़ एक दिन मिट जायेंगे और तुम इतनी ख़ूबसूरत हो जाओगी कि लोग तुम्हारी ख़ूबसूरती को पाने के लिये आह भरेंगे।”

इला को समद की इस बात पर बिल्कुल भी यक़ीन नहीं था। लेकिन उसे समद की ये प्यार भरी हमदर्दी बहुत अच्छी लगी।

समद को अपनी ज़िन्दगी में अब एक मक़सद मिल गया था। और वो जी-तोड़ मेहनत करके इला के सफ़ेद-दाग़ मिटाने और उसे ख़ूबसूरत बनाने में जुट गया था। इतने सालों की नौकरी में उसने पैसा बहुत कमाया था। उसने अपना सारा पैसा और सारा समय इला को ख़ूबसूरत बनाने में लगा दिया।

उसने इला को शहर की भीड़ से दूर, एक हरियाली से भरी हुई जगह पर रखा, जहाँ आस-पास कोई दूसरा मकान नहीं था। ताकि वो लोगों की नज़र से बची रहे और उसे अपने बदसूरत होने का ज़रा भी अहसास न हो। इला ने भी ख़ुद को अब पूरी तरह से समद के हवाले छोड़ दिया था।

समदइला के जिस्म से सफ़ेद दाग़ को मिटाने के लिये तरह-तरह के नुस्ख़े इस्तेमाल करता था। वो उसे तुलसी के पत्‍ते और नींबू का रस पिलाता था। विटामिन बी, फ़ोलिक एसिड और विटामिन सी की गोलियाँ खिलाता था।

वो उसके सफ़ेद दाग़ के धब्बों पर नदियों के किनारे पाई जाने वाली लाल मिट्टी में अदरक का रस मिलाकर लगाता था। उसके सफ़ेद दाग़ के धब्बों पर हल्दी और सरसों के तेल को मिलाकर बनाया हुआ लेप लगाता था।

वो अँग्रेज़ी दवाओं के साथ-साथ होमियोपैथी का भी सहारा लेता था। ताँबे के लोटे में रात भर पानी भरके रखता था, और सुबह-सुबह इला को खाली परट पिलाता था। वो इला को अनार की पत्‍तियाँ पीस कर पिलाता था। नारियल के तेल से इला के पूरे जिस्म की दिन में तीन बार मालिश करता था। वो उसे नीम के पत्‍तों का रस पिलाता था, जिसे पीने में इला की हालत ख़राब हो जाती थी, लेकिन समद के प्यार और दुलार के आगे वो मना भी नहीं कर पाती थी।

समद इतना कुछ कर रहा था लेकिन इला के जिस्म से सफ़ेद-दाग़ मिटने का नाम ही नहीं ले रहे थे। बस उनका रंग थोड़ा हल्का ज़रूर हुआ था। फिर इस चाहत में कि “जिस दिन मेरे ये सफ़ेद-दाग़ मिट जायेंगे, उस दिन मैं कैसी दिखूँगी?” ये सोचकर इला ने एक दिन अपने सारे कपड़े उतारकर, ख़ुद को आईने में देखा तो उसे बड़ी हैरानी हुई।

उसके जिस्म के सफ़ेद-दाग़ कम होने के बजाए उल्टा बढ़ रहे थे।उसको कुछ समझ में नहीं आया। उसने तुरन्त अपने खुले जिस्म को ढँका और हड़बड़ाती हुई उन सारी दवाईयों को टटोल डाला, जो वो अब तक ले रही थी। उसने अपनी सारी रिपोर्ट्स भी देख डालीं, लेकिन उसको कोई वजह हाथ नहीं लगी। अभी तक वो समद के ही भरोसे थी कि वो सब कुछ सँभाल लेगा। वो सोच में पड़ गई कि मेरे दाग़ तो कम हो नहीं रहे हैं, उल्टा बढ़ रहे हैं। इसका क्या मतलब है?”

उसने सोचा कि आज रात मैं समद से कहूँगी कि “हम किसी और डॉक्टर को दिखाते हैं।” तभी उसे अपनी रिपोर्ट्स के बीच एक ख़त मिला, जिसे पढ़कर इला के होश उड़ गये। उस ख़त में उसी डॉक्टर ने,जो इला का इलाज कर रहा था, समद को लिखा था कि “जैसा आप चाहते हैं, इला के सफ़ेद दाग़ जल्दी ही उसके पूरे जिस्म पर फैल जायेंगे।”

“जैसा आप चाहते हैं” पढ़कर इलाको इतना बड़ा धक्का लगा, जैसे कमरे की दीवारें, और छत, सब अचानक से इला के ऊपर आ गिरेंगी, और वो उनके नीचे दबके मर जायेगी। वो भागती हुई फिर से आईने के सामने गई और उसने एक बार फिर से अपने सारे कपड़े उतार कर, आईने में अपना जिस्म ग़ौर से देखा। ख़त में लिखी बात बिल्कुल सही थी। उसके सफ़ेद-दाग़ अब उसके जिस्म के उन हिस्सों पर भी फैल चुके थे, जहाँ पहले नहीं थे।

उसने तुरन्त इन्टरनेट पर जाकर सफ़ेद दाग़ के बारे में पढ़ा। और इन्टरनेट पर मौजूद जानकारियों को पढ़कर उसके दिमाग़ को और बड़ा सदमा पहुँचा। अब उसे पता चला कि समद उसका हर वो इलाज कर रहा था, जिससे सफ़ेद दाग़ मिटते हैं। लेकिन उनके साथ ही साथ वो इला को हर वो चीज़ खिला रहा था, जो सफ़ेद दाग़ के रोगियों को नहीं खिलाना चाहिये। जैसे कि वो उसे मछली खाने के तुरन्त बाद दूध पिलाता है। खट्टी चीज़ें ज़्यादा खिलाता है। उसके खाने में नमक ज़्यादा डालता है। मिठाई, रबड़ी, दूध और दही एक साथ खिलाता है। उड़द की दाल, माँस और मछली ज़्यादा खिलाता है। खाने में तेल, मिर्च और गुड़ भी खिलाता है।

इला सोचने लगी, “लेकिन ये सब चीज़ें तो सफ़ेद दाग़ के रोगियों को मना हैं।” इला को कुछ समझ में नहीं आया कि अब वो क्या करे? वो काँपते और रोते हुए बड़बड़ाने लगी कि “समद मेरे साथ ऐसा कैसे कर सकता है? उसने तो मेरे दाग़ मिटाने का वादा किया था? लेकिन वो तो डॉक्टर के साथ मिलके मेरे दाग़ और बढ़ा रहा है! लेकिन वो ऐसा क्यों कर रहा है?”

तभी उसके दिमाग़ में एक बात आई कि“समद अपनी पहली बीवी को छोड़ चुका है। कहीं ऐसा तो नहीं कि अब वो मुझे भी छोड़ने की तैयारी कर रहा हो?” लेकिन उसे ये नहीं समझ में आ रहा था कि “समद मुझे क्यों छोड़ना चाहेगा? जबकि वो तो मेरे साथ बहुत ख़ुश रहता है, मेरी इतनी देखभाल करता है, मेरा इतना ख़्याल रखता है, मुझे ख़ुश रखता है। क्या उसका प्यार सिर्फ़ एक नाटक है?”

इला ने अपने आप को बहुत समझाया, लेकिन कोई भी बात उसकी समझ में नहीं आई। तब उसने समद को बिना बताए, उसकी पहली बीवी, ज़ुलेखा का पता लगाया, और उससे ख़ुद जाकर मिली। वहाँ उसे ज़ुलेखा ने बताया कि “समद एक पारिवारिक ज़िन्दगी के लिये नहीं बना है। उसे आज़ादी चाहिये, हर चीज़ से। रिश्तों-नातों को वो नहीं मानता। उसे रोज़ एक नई-नई लड़की चाहिए। इसीलिए तो उसने मुझे छोड़ दिया। पता नहीं, तुम्हारे साथ अभी तक कैसे और क्यों रह रहा है!”

ज़ुलेखा की बातों ने इला के दिल में आग पैदा कर दीं। ज़ुलेखा के मुताबिक़, “समद सिर्फ़ कुछ दिनों तक ही एक लड़की के पास रह सकता है, फिर उसे छोड़ वो दूसरी के पास चला जाता है।”

इलाज़ुलेखा से मिलके वापस आ गई। समद को, “इला के मन में कुछ हलचल मची हुई है”, इसका अन्दाज़ा तो हुआ, लेकिन उसके पूछने पर वो “कुछ नहीं” कहके टाल गई। समद अभी भी पूरी लगन से इला को सही वक़्त पर दवाएँ खिलाता था, उसके जिस्म पर लगाने वाली दवाएँ, वो ख़ुद अपने हाथ से लगाता था। यहाँ तक कि उसके जिस्म की मालिश भी वो ख़ुद ही किया करता था। वो चाहता तो कोई नर्स रख सकता था, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया।

इला ने महसूस किया कि समद उसके बढ़ते हुए दाग़ों की वजह से बिल्कुल भी परेशान दिखाई नहीं देता है। बल्कि वो उनकी तरफ़ देखकर मुस्कुराते हुए कहता है, “बहुत जल्द ही ये सब दाग़ मिट जाएँगे।” लेकिन इला को उसके दाग़ मिटते हुए कहीं से भी दिखाई नहीं दे रहे थे।

अब इला को इस बात का पक्का यक़ीन हो गया कि “समद मेरे दाग़ मिटाना नहीं, बल्कि बढ़ाना चाहता है, ताकि एक दिन इन्हीं बढ़े हुए दाग़ों का बहाना बनाकर वो मुझे छोड़ सके, और फिर मेरी ही तरह किसी और मासूम लड़की को अपनी हवस का शिकार बना सके।”

“समद ने मेरे साथ ये किया?” ये सोच-सोचकर उसकी आँखों से आँसू बहने लगते थे। जबकि समद को लगता था कि “इला मेरी देखभाल से इतनी ख़ुश है कि उसे रोना आ जाता है।”

अब इला अपने जिस्म का कुछ नहीं कर सकती थी। सफ़ेद दाग़ उसके पूरे जिस्म पर फैल चुका था। उसकी सफ़ेद चमड़ी इतनी चमकती थी कि अब उसे अपने-आप से ही नफ़रत होने लगी। और एक दिन उसने गुस्से में आकर घर का आईना भी तोड़ दिया ताकि उसे अपनी सफ़ेद चमड़ी दिखाई न दे। समद के पूछने पर उसने कहा, “अच्छा हुआ टूट गया। मुझे लगता है, अब इस घर में आईने की ज़रूरत नहीं है।” समद को लगा कि “इस वक़्त इला गुस्से में है”, इसलिए उसने फिर कुछ और नहीं पूछा।

फिर एक दिन किचन में काम करते हुए इला ने समद को डॉक्टर से फ़ोन पर बात करते हुए सुना। समद डॉक्टर के साथ बड़ा ख़ुश होके बात कर रहा था। वो कह रहा था, “शुक्रिया डॉक्टर साहब! आपने मेरा काम आसान कर दिया। अब दाग़ इला के पूरे जिस्मपर फैल चुका है।”

इतना सुनते ही इलाको ऐसा लगा, जैसे उसके कानों में किसी ने जलता हुआ कोयला डाल दिया हो। उसने तुरन्त, किचन में लटके हुए, सब्ज़ी काटने वाले चाकू से, अपनी नस काट लेनी चाही, लेकिन चाकू उसकी सफ़ेद चमड़ी पर कुछ इस तरह चमक रहा था कि उसे लगा, “अगर मैंने चाकू फेर दिया तो मेरे जिस्म से लाल नहीं, बल्कि सफ़ेद ख़ून निकलेगा।”

उसकी आँखों में समद के लिये इतना गुस्सा भर चुका था कि उसे अपने आस-पास हर चीज़ जलती हुई दिखाई दे रही थी। उसे महसूस हो रहा था कि उसकी आँखों के सामने मौजूद हर चीज़ को सफ़ेद दाग़ हो गया है। किचन के बर्तनों, दीवारों, फ़र्श और घर की छत, सबको सफ़ेद दाग़ हो गया है।

इला ने कस के अपनी आँखें भींच लीं, क्योंकि उससे अब कुछ भी देखा नहीं जा रहा था। किचन से निकलकर, अपने कमरे में जाते हुए उसने सुना, समद हँसते हुए डॉक्टर से कह रहा था, “बस, एक हफ़्ता और।”

इला समझ चुकी थी कि “बस एक हफ़्ते के बाद समद मुझे अपनी ज़िन्दगी से बाहर निकाल देगा।” लेकिन उसके पहले वो कुछ कर देना चाहती थी। कुछ ऐसा, जो समद को सबक सिखा सके कि “किसी मासूम और भोली लड़की के जज़्बातों के साथ ऐसा मज़ाक नहीं करना चाहिए।”

रात को बिस्तर पर समद के साथ लेटे हुएइला बार-बार छत को देख रही थी। समद ने उसका माथा चूमा और कहा, “बस इला, एक हफ़्ता और” इला ने अपना गुस्सा छिपाते हुए कहा, “लेकिन मुझे अफ़सोस है कि तुम वो दिन नहीं देख पाओगे।”

“क्यों?” समद ने हँसते हुए, और इला के चेहरे को फिर से चूमने की कोशिश करते हुए पूछा। लेकिनतभी इला ने, एक झटके के साथ, और अपनी पूरी ताक़त के साथ, चादर के नीचे छिपाया हुआ चाकू, समद के गले में उस जगह घुसा दिया, जहाँ से आवाज़ निकलती है।

समद को कुछ समझ नहीं आया कि “ये क्या हुआ?” वो चाकू और अपनी गर्दन पकड़े हुए, सीधा छत को देखते हुए एक तरफ़ लुढ़क गया।

तब इला ने बिस्तर से उतरकर, लगभग चिल्लाते हुए कहा, “अगर तुम्हें मुझे छोड़ना ही था, तो मेरा जिस्म क्यों ख़राब क्यों किया? मुझसे कह देते, मैं चुपचाप तुम्हारी ज़िन्दगी से दूर चली जाती। तुमने औरतों को समझ क्या रखा है? मैं तुम्हारी बीवी ज़ुलेखा से मिल चुकी हूँ। उसने मुझे तुम्हारे बारे में सब बता दिया है। तुम एक हफ़्ते बाद मुझे छोड़कर फिर किसी मासूम लड़की को अपने जाल में फँसाने वाले थे ना?”

समद के गले से ख़ून का फ़व्वारा बह रहा था। उसकी साँस धीरे-धीरे कम होती जा रही थी, लेकिन उसने इला की पूरी बात सुनी। वोइला की तरफ़ अपने ख़ून से सने हाथ बढ़ाकर, रुकते-रुकते बस इतना ही कह पाया कि “एक हफ़्ते बाद। अपने आप को। आईने में देखना।” और इतना कहकर उसने इला को एक बार और देखा, फिर अपनी आँख बन्द कर ली। कुछ इस तरह, जैसे वो जाते-जाते इला को अपनी आँखों में भरके ले जाना चाहता हो।

इला ने समद को अपनी आँखों के सामने तड़पकर मरते हुए देखा। समद के गले से बहता हुआ ख़ून पूरे बिस्तर पर और पूरे कमरे में फैल चुका था। फिर इला ने समद की लाश कोरात में ही घर के पिछवाड़े ज़मीन में गाड़ दी। चूँकि आस-पास कोई रहता नहीं था, इसलिए किसी को कोई शक होने की गुंजाइश भी नहीं थी।फिर वो कमरे में से ख़ून के धब्बे रगड़-रगड़ के मिटाने लगी। उसके मन को अब एक तसल्ली थी कि “मैंने समद को सबक सिखा दिया है।” समद की लाश को ठिकाने लगाने के बाद और समद के क़त्ल के सारे सबूत मिटा देने के बाद इलाने चैन की साँस ली।

कुछ दिन बीतने के बाद, उसे घर में राशन लाकर रखना था, क्योंकि अब तक घर के बाहर के सारे काम समद ही किया करता था। बाज़ार में पहुँचकर,इला को अब एक आज़ादी महसूस हुई। लेकिन जब वो बाज़ार से गुज़र रही थी, तो उसे बड़ी हैरानी हुई। कुछ लड़के और आदमी लोग उसे अपनी आँखें बड़ी-बड़ी करके घूर रहे थे।

इला को शक हुआ, “कहीं इन लोगों को समद के क़त्ल के बारे में पता तो नहीं है?” लेकिन तभी उसने पीछे से किसी को सीटी मारते हुए सुना। और कोई कह रहा था, “क्या ख़ूबसूरत लड़की है यार! लगता है सीधे लण्डन से आई है।”

इतना सुनते ही इला के क़दम अपने-आप तेज़ हो गये। वो जल्दी-जल्दी घर वापस आई और सारा सामान एक तरफ़ फेंकते हुए, सबसे पहले उस आईने के सामने जाकर खड़ी हो गई, जो समद उसकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़, पहला आईना टूटने के बाद लाया था।

इला ने आज बहुत दिनों बाद आईना देखा था। और आज उसे भी अपना चेहरा कुछ बदला-बदला सा महसूस हुआ। फिर उसने एक-एक करके अपने सारे कपड़े उतार दिए, लेकिन उसने जहाँ भी देखा, उसे अपना जिस्म पहले जैसा नहीं लगा।

उसके सफ़ेद दाग़, अब सफ़ेद की बजाए ख़ून से भरे हुए दिखाई दे रहे थे। वो सिर से पैर तक ख़ूबसूरत लग रही थी। तब अचानक उसे समद की बात याद आई, जो उसने मरते हुए कहा था कि “एक हफ़्ते बाद।।। ख़ुद को।।। आईने में देखना।।।”

अब उसे लगा, “क्या समद उस दिन कुछ और कहना चाहता था?” वो जल्दी से उसी तरह, बिना कपड़ों में भागती हुई, उस कमरे में गई, जहाँ उसकी सारी दवाईयाँ रखी हुई थीं। उसने सब दवाईयों, मलहम, और तेल की शीशियों को इधर-उधर हटाते हुए अपनी रिपोर्ट्स ढूँढ़ने की कोशिश की। और फिर उसे अपनी रिपोर्ट्स के साथ,एक और ख़त मिला, जो उसी डॉक्टर ने लिखा था, जो उसके सफ़ेद दाग़ का इलाज कर रहा था। इला ने ख़त को तुरन्त खोलकर पढ़ना शुरू किया।

ख़त में लिखा था कि “समद, अब जबकि इला का सफ़ेद दाग़ उसके पूरे जिस्म पर फैल चुका है, अब हम अपना असली ट्रीटमेन्ट शुरू कर सकते हैं। ये दुनिया का पहला ऐसा केस होगा, जिसमें सफ़ेद दाग़ को पहले बढ़ाकर, पूरे जिस्म पर फैलाकर, फिर सफ़ेद दाग़ के ही रंग को इस्तेमाल करके, किसी लड़की को इतना ख़ूबसूरत बनाया जाएगा कि देखने वाले देखते रह जाएँगे। वैसे मैं चाहता हूँ कि तुम इला को भी ये बात बता दो, तो अच्छा रहे। बेचारी अपने बढ़ते हुए दाग़ों को देखकर परेशान होती होगी।”

इतना पढ़कर इला को ऐसा लगा, जैसे वो एक बहुत बड़े पहाड़ के नीचे अकेली खड़ी हो और अचानक से, उसके देखते ही देखते वो पूरा पहाड़ उसके ऊपर आ गिरा हो।


भूलभुलैया


अक्सर यह पहाड़ी मन, शहर की धूमिल आब-ओ-हवा से घुटने लगता है। बेचैनी जब सब दहलीज़ें लाँघ लेती है तो मजबूर होकर यह मन वापस पहाड़ की ओर चल देता है। मेरी यात्राएँ यूँ तो बेमतलब की ही होती है, पर अक्सर यात्रा के दौरान कुछ न कुछ ऐसा घटित हो ही जाता है, जो यात्रा को व्यर्थ नहीं जाने देता। 

पिछले दो सप्ताह बेहद ही व्यस्त रहे, घर और दफ्तर के काम से तन के साथ-साथ मन भी थक गया था। फिर अचानक से गाँव जाने की योजना बन गयी। शुक्रवार की शाम अपने दुपहिया चेतक को ले दफ्तर से विलम्ब से ही निकला। मन दफ्तर से ही थोड़ा विचलित था तो रोज की तरह चेतक की सवारी मन को भा नहीं रही थी। मन न जाने किस जगह जाके बैठा था। शायद इसी बात का बुरा चेतक भी मान गया। गेयर पेड चलते-चलते आप ही निकल गया। 

दिल्ली से गाँव तक के लिये गाड़ी बुक थी, जो आठ बजे घर पर पहुँचने वाली थी। और गेयर पेड को भी उसी समय निकलना था?

बेहद माथापच्ची के बाद में अखिरकार गेयर पेड ठीक करने में सफल हुआ। मुझे घर पहुँचते-पहुँचते पौने नौ बज चुके थे। पर शुक्र है, दिल्ली में लगने वाले वाहनों की भीड़ का कि मेरे पहुँचने के थोड़ी देर बाद जाकर वह गाड़ी पहुँच सकी। दौड़ते भागते ही एक आध रोटी का टुकड़ा ही भोजन स्वरूप लिया। और फिर गाड़ी मे बैठ गया। यूँ तो छोटी गाड़ी से सफर करना काफी आरामदायक है, लेकिन पूरी रात दिल्ली के एक कोने से दूसरे कोने तक सवारियों के लिये दौड़ने वाली बात मेरे गले नहीं उतरती। 

दिन भर की भाग दौड़ से काफी थक गया था और नींद अपनी आगोश में भरने को व्याकुल थी, पर सड़क पर बनी कलाकारियों पर से जब वाहन गुजरता तो रूह तक काँप उठती, न चाह कर भी आप ही आँखें खुल जाती। दिल्ली से कोटद्वार तक का सफर कुछ ऐसा ही रहा। 

कोटद्वार पहुँचते ही व्योम दरक से प्रचण्ड़ रौशनी के साथ मोती-स्वरूप वारि धरा पर यूँ गिरने लगा मानो मेरे आगमन पर व्योम धरा को हर्षित कर रहा हो। सड़क पर पारदर्शी मोती रबर के टायर के छूते ही जब दो तीन फुट ऊपर तक उछलने लगते और पीछे से आने वाले वाहनों की ‌हेडलाइट से निकलती रौशनी जब उन मोतियों से होकर गुजरती तो मन रोमांच से भर जाता। मैं सोचने लगता काश इस पल चेतक की सवारी का मौका मिलता।

कोटद्वार से एक आध किलोमीटर चले ही थे कि सामने एक अनभिज्ञ झरना दिखाई दिया, जो इतने भंयकर रूप में हरे घने जंगल के बीच बह रहा था कि उसके शोर से ही उसके रूप का आकलन किया जा सकता था। मैं इस बात से चकित था कि न जाने कितनी बार उस राह पर मेरी आवाजाही रही। लेकिन कभी उस झरने को देखा नहीं। मैं उसकी तस्वीर लेना चाहता था किन्तु चालक ने अनुरोध, उपरान्त भी गाड़ी नहीं रोकी।

कोटद्वार और दुगड्ड़ा के मध्य दुर्गा मन्दिर के पास पहुँचते ही सफर भर का सारा रोमांच डर में तब्दील हो गया। नदी का इतना विकराल रूप बेहद लम्बे समयांतराल के बाद देखने को मिला। चालक को काफी समझाने के बाद भी चालक नहीं माने और नतीजा यह हुआ कि नदी पार करते समय गाड़ी बहती हुई उग्र नदी के बीच फँसने लगी, गाड़ी का पिछला हिस्सा नदी के बहाव की दिशा में फिसलने लगा। अब सोचता हूँ तो.... हँसी नहीं रुकती कि डर की वजह से लोगों के मुँह से उस क्षण भर में ही सैकड़ों देवी-देवताओं का नाम सुनने को मिला। और शायद उन्हीं में से किसी प्रभु की ही कृपा हुई कि न जाने कैसे गाड़ी ने उस उफनती नदी को पार किया। 

यह थी तो बस पल भर की घटना पर सबको शेष सफर तक डराने के लिये काफी थी। अब नींद पर डर हावी हो गया, चालक ने नेगी जी के बेहद पुराने गीतों का संकलन अपने अधमरे से म्यूजिक प्लेयर पर बजाना शुरू किया। अधमरा इसलिये कि गाड़ी ज्यों ही किसी गड्ढे या स्पीड़ ब्रेकर से गुजरती.. वो आप ही मौन हो जाता। 

खैर अंधेरी भोर में हम सतपुली पहुँच गये। सामान काफी था तो सुबह-सुबह अच्छी खासी कसरत भी हो गयी।

सुबह की चाय प्रीतम भाई के होटल में पी। चाय अच्छी थी या बुरी ये नहीं कहूँगा‌ किन्तु सुबह की ठण्ड में वह अमृत के समरूप थी।

उस सुबह सतपुली से गाँव के लिये कोई यातायात साधन नहीं मिला। मैं बैग प्रीतम भाई की दुकान पर रखकर मार्केट घूमने निकल पड़ा। ठण्ड थी तो लगा चलने से ठण्ड का आभास कम होगा।

पूरा मार्केट बन्द था। बस एकाध लोगों के खाँसने की आवाजें ही कभी कभार सन्नाटे को चीर रहीं थी। 

मैं अपने ही लिखी कविता की पंक्तियाँ गुनगुना रहा था। 

मत्थम-मत्थम भीग रहा है... मन,

तेरी इश्क़ की लहरों के, छू जाने से...

हरदम-हरदम होती हैं हलचल,

होठों पे मेरे...इक नाम तेरा आ जाने से...

मैं उस पल इसी रचना की किसी पंक्ति पर था जब पीछे से एक बेहद ही कंपन भरी तेज आवाज सुनाई दी।

शम्भो....!!

हर हर शम्भो!

वह आवाज इतनी प्रभावशाली थी, कि मुझे अन्दर तक कम्पित कर गई। मैं पीछे की ओर मुड़ा। और देखा, मेरे ठीक सामने.... शायद कदम भर की दूरी पर, एक साधु जिनके पूरे शरीर पर भभूत लगी हुई थी। सुनसान सड़क पर और आँख फोड़ती रौशनी में चमक रहे थे। मैं इतना डरा हुआ था, कि मेरे शरीर में बहने वाले रक्त के बहाव तक को मैं महसूस कर रहा था। धड़कने इतनी तेज थी कि मानो सीने को चीर ही देंगी। और मैं एक टक साधु को देख रहा था।

"महादेव को मानते हो बालक....?" साधु ने गंम्भीरता से पूछा।

मैं इतना डरा हुआ था कि मेरे लिये शब्दों को कंठ से निकाल पाना बेहद मुश्किल था।

मैंने हाँ कहने की कोशिश की और सिर हिलाया।

साधु ने कमण्डल से भभूत निकालकर मेरे‌ सिर पर लगाया।

हर हर शम्भो!

महादेव सबका भला करें।

‌यूँ तो मेरे मन में आस्था को लेकर रोज जंग होती है। यह नहीं है कि मैं ईश्वर एवं धर्म को नहीं मानता किन्तु यह भी सत्य है कि मन धार्मिक व दिमाग प्रयोगात्मक है। मन भक्ति में लीन होने को आतुर था तो दिमाग साधु को शक के दायरे में खड़ा कर रहा था।

मैंने जेब से दस रुपये निकाले और साधु की और बढ़ाए। 

साधु ने मुस्का‌न के साथ अपना हाथ मेरे सिर पर रखा और कहा...

बालक!

यह मेरे किस काम का? 

बस इतना कहकर साधु उसी दिशा में वापस लौट गये। हर घटना जो आप के साथ घटित होती है उसका कोई न कोई उद्देश्य अवश्य होता है किन्तु मुझे अभी तक उनका मुझसे मिलने का उद्देश्य समझ नहीं आता। 

मन भक्ति भाव से भर गया। जो भी घटनाऐं सफर भर विचलित करती रहीं, उनसे पनपे डर को साधु जैसे अपने साथ लेकर चले गये। मन को अलग ही सुकून मिला। अब बारिश ने भी एक लय पकड़ ली थी। मैं भीगता-भागता वापस उस स्थान पर आ पहुँचा जहाँ पर मैंने अपना सामान रखा था। लोग मेरे सिर पर लगी और कपड़ों पर गिरी भस्म का रहस्य पूछने लगे। मैं सबके प्रश्नों से बचता रहा पर जो प्रश्न मेरे मन में उमड़ रहे थे उनसे बचना मेरे लिये आसान नहीं था। वह साधु कौन थे, महादेव को मानते हो बालक? यह किस प्रकार का प्रश्न था? उन्होंने तो मुझसे पैसे भी नहीं लिये फिर मेरे पास क्यों आए? ऐसे ही न जाने कितने प्रश्न।

खैर लोग ज्यादा थे तो दो गाड़ियाँ गाँव के लिये बुक करनी पड़ी।

अब मुझे नींद आ गयी। सुबह की पहली किरण के साथ मैं अपने गाँव पहुँचा। मैं गाड़ी की छत से सामान निकाल रहा था और तब तक मेरा एक भ्रातसम मित्र मुझे लेने सड़क पर‌ पहुँच गया। मैं पूर्ण रूप से भीग चुका था। भस्म बारिश के पानी से पूरे चहरे व कपड़ों पर लग गयी थी। दोेस्त ने कारण पूछा तो उससे पूरी बात साझा करनी पड़ी। नतीजा यह हुआ कि उसने उस घटना को न जाने कितनी कहानियों से जोड़ दिया। और घर पहुँचते ही सब को उस घटना के बारे में बताने लगा। 

वह उस घटना को बढ़ा-चढ़ाकर लोगों को सुनाता। कभी-कभार साधु को, महादेव तो कभी उनका दूत तक बताने लगा। 

माँ तक बात पहुँची तो माँ ने अगले ही दिन हमारे ईष्ट देव के मन्दिर जाकर उनके दर्शन करके आने का आदेश दे दिया।

फिर तो जो यात्रा ईष्ट देव के मन्दिर से शुरू हुई वह मेरे जीवन भर में किए सभी भ्रमणों से अधिक थी। उस दौरान लगभग छोटे बड़े ३० मन्दिरों के भ्रमण का सौभाग्य मिला। मैं मन में अथाह शक्ति लिये वापस दिल्ली लौट आया। सब पुनः जैसा‌ हो गया। और वह घटना स्मृति पटल पर धुंधली होने लगी। किन्तु एक साल दो महीने बाद जब मैंने हर्षित मन से श्री बद्रीनाथ के दर्शन को जाते समय गोविंदघाट के समीप उन्हीं साधु को नंगे पैर चलते देखा। तो वह घटना पुनः याद आ गई, साधु को मैंने क्षणभर में ही पहचान लिया। उनके चेहरे की चमक ने मुझे पुनः आकर्षित किया। मैं गाड़ी से उतरकर उनसे मिलने ही वाला था कि प्रयोगात्मक दिमाग और धार्मिक मन की जंग और उतनी ही तेज रफ्तार से चलता वाहन मुझे पल भर में उनसे मीलों दूर तलक ले गया। 

मैंने चालक से गाड़ी रोकने का अनुरोध किया वह रुके भी। मैंने कुछ देर उनका इन्तजार किया। किन्तु अन्य लोग जो मेरे साथ गाड़ी में थे। मुझे वापस गाड़ी में बैठने के लिये मनाने लगे। मैं वापस गाड़ी में जाकर बैठ गया। कई भाव कई प्रश्नों को लिये।

क्या वह वही साधु थे?

मुझे उनसे मिल लेना चाहिये था।

क्या उनका‌ मुझे पुनः दिखना मात्र संयोग था?

उस हँसी‌ में‌ क्या रहस्य छुपा था? जो मुझे आज भी आकर्षित करता है।

इन्हीं प्रश्नों इन्हीं शब्दों की भूलभुलैया में मैं आज भी भटक रहा हूँ । शायद इस वृतांत को पढ़ने वाले बुद्धिजीवी इस भूलभुलैया से निकलने में मेरी सहायता कर सकें।

इसी आस के साथ आप सब से इस वृतांत को साझा कर रहा हूँ।


मौत के बाद


मेरे परिवार के लिये बड़ा ही मनहूस दिन होगा आज, ऐसे मातम की कल्पना तो मैंने भी नहीं की थी। भोर की शान्ति अचानक से रुदन विलाप में परिवर्तित हो गयी। रिश्तेदारों, पडौसियों का ताँता लग गया। मेरा छोटा भाई और चचेरे- ममेरे भाई एक के बाद एक सभी दूर-पास के लोगों को फोन लगाकर मेरी मृत्यु की सूचना देने में लगे हैं।

आज सुबह 8.45 पर मेरी मौत हो गयी, आख़िरकार उस भयंकर शारीरिक पीड़ा से छुटकारा मिल ही गया। मैं अपना शरीर त्यागकर ठीक हूँ, बहुत ही बेहतर स्थिति में, मेरी आत्मा और मेरा मन सही तालमेल में लग रहे हैं। गज़ब का हल्कापन महसूस हो रहा है। इतनी ख़ुशी शायद जीवित रहते हुये कभी महसूस नहीं हुई। मुझे गुज़रे हुए अभी सिर्फ एक घंटा ही हुआ है पर जिस पल मेरी मौत हुई, सब कुछ बदल गया। अपनी बीवी व 3 बच्चों को मेरी लाश के सामने बिलखता देख कुछ भी फ़र्क नहीं पड़ रहा। मेरी पत्नी रो-रोकर अधमरी हुए जा रही है पर उसे देख कर दया भी नहीं आ रही। मैं अपने घर का इकलौता कमाऊ इंसान था, मेरे बिना मेरे बच्चे और सीधी-साधी बीवी क्या करेगी, इन सब की चिंता से भी मुक्त महसूस कर रहा हूँ खुद को। मैं इस दृश्य और त्रासदी से बिलकुल आहत नहीं हूँ। धड़कन बंद होते ही दिल ने अपना काम करना छोड़ दियाष अब तो चाहकर भी दुखी नहीं हो पा रहा पर सुकून की बात यह है कि सब कुछ देख और समझ पा रहा हूँ बस महसूस करने वाली इन्द्रियां मर गयी हैं। 

जीवित रहते इतनी वेदना सहता था कि हर पल बस यही कामना रहती थी कि अब मरूं....अब मरूं....

काफ़ी समय से केंसर की पीड़ा भुगत रहा था, गत एक वर्ष से शय्याग्रस्त था। बीमारी के अंतिम पड़ाव पर बदन सूख कर काँटा हो गया था। किमोथेरेपी से चमड़ी काली पड़ गयी, दवाओं की शीशी चढ़ाने के लिए सुइयां घुसा-घुसा कर नसें सूख गयी। बाल नहीं रहे, मुँह में छाले पड़ गए। छह महीने से ऊपर बिस्तर पर पड़े-पड़े हाथ-पैर सुन्न हो गए थे।

भोजन, पानी, लोग, दीवारें, बिस्तर, कम्बल, मेज़, पंखा, मुझे कभी-कभी देखने आने वाले लोग, मेरे पेशाब की बाल्टी, खिड़की में रखा पानी का ग्लास, अलमारी के ऊपर रखी आयुर्वेदिक दवाओं की डिब्बियाँ, दूसरे कमरे से आती टी.वी की आवाजें, रोड़ पर चलते वाहनों का शोर, सब एक ही पायदान पर आ गए थे। किसी में भी भेद करना मुश्किल था, सजीव-निर्जीव सब बराबर हो गया था। आँखें खुल रही थी और साँसें चल रही थी बस। आख़िरी एक महीना सिर्फ पानी की कुछ बूंदों पर जिंदा रहा था मैं। ना जाने कब से पेट में जमा किया छुट-पुट ठोस मल में भी तब्दील नहीं हो पा रहा था, दुर्गति की पराकाष्टा यह थी कि खांसने पर मुंह से और मल करने की चेष्टा से गुर्दों से बचा खुचा खून बाहर आ जाता। ऐसे बुरे समय में कोई क्या जीना चाहेगा ? इसीलिए जीने की इच्छा तो जीते हुए ही छोड़ आया मैं। अब तो मेरी ख़ुशी का ठिकाना नहीं है, एक बार फिर स्वतन्त्र हूँ मैं, सभी बंधनों से मुक्त, आह ! 

मेरे घर वाले पिछले एक घंटे से बिलख रहे हैं, सबके चहरे पर थकावट है। मेरी बीवी तो लगता है बस अब बेहोश ही हो जाएगी। मेरी वजह से पिछली कई रातें जगने व हर सुबह मेरी जड़ स्वरूप काया को देख-देख कर आँखें थक गयी थी उसकी। मुझसे बहुत प्रेम करती थी, पर क्या मुझे रोज़ इस हालत में पाकर मेरी मृत्यु की कामना न की होगी उसने ? खैर, मेरे क्रियाकर्म के बाद अब जाकर वो चैन से सोएगी। 45 वर्ष की उम्र मरने के लिए कम होती है पर दुनिया के हर परिवार की तरह मेरा परिवार भी संभाल ही लेगा ख़ुद को।

पहले ही क्या कम परेशान हुये वो आये दिन अस्पताल के चक्कर काटने में ? महँगी दवाइयों के खर्च ने बची खुची कमर भी तोड़ दी। मैं अपनी जमापूंजी को ऐसे नहीं गंवाना चाहता था, अच्छा हुआ जो समय पर मौत आ गयी। 

मेरा क्रियाकर्म करके वापस लौट रहे हैं सब...दोस्त, रिश्तेदार, समाज के लोग अब धीरे-धीरे ख़िसक रहे हैं। बीवी रो-रोकर आख़िरकार सो गयी। दोनों बेटियाँ फ़ोन में शायद अपने दोस्तों को मेरी मौत की इत्तिला कर रही है। काफ़ी देर से फोन से दूर बैठी थी दोनों, सब्र टूट गया शायद। आख़िरकार उठा ही लिया अपना-अपना फोन। सबसे छोटा बेटा रसोई में कुछ खाने को ढूंढ रहा है, सुबह से इस रोने-पीटने में भूखे पेट बैठा है बेचारा। जो करीबी रिश्तेदार हैं वे भी धीरे-धीरे विदा ले रहे हैं। किसी के बच्चों की परीक्षा है तो किसी के ऑफिस में बड़ा काम है इन दिनों, कोई मेरी वजह से पूरे दिन दुकान बंद रखने से हिचकिचा रहा है तो कोई वैसे ही बोर हो रहा है। मातम का माहौल भला किसे पसंद है ? जो मर गया उसके जाने पर समय ख़राब करके भी क्या मिलेगा ? लोग समझदार हो गए हैं, कम-स-कम मेरे घरवालों को मेरे अच्छेपन की याद दिलाकर उन्हें छाती पीटने के लिए मजबूर नहीं कर रहे।

वैसे देखा जाय तो उनका खिसक लेना ही ठीक है। दुनियादारी के चक्कर में बेचारे मेरे घरवाले ज़बरदस्ती आँसू बहाने को मजबूर हैं। आदमी सामाजिक है, कहने को समाज हमें एकता में बांधता है पर सच्चाई तो यह है कि सामाजिक होने का सही मतलब ही ‘औपचारिकता’ है। जैसे वे लोग जो एक समाज से जुड़े हैं वे दिल से उतने ही अलग हैं । तभी तो अन्दर की भावनायें कोई समझ नहीं पाता। हर भावना का प्रदर्शन करके दिखाना होता है। नहीं तो गम भी कोई प्रदर्शित करने की चीज़ है ? पचासों लोगों के बीच किसी अपने को खोने के गम में किसी अभिनेता की तरह चीखना-चिल्लाना, उस पूरी भावना को ही मलिन कर देता है, नाटक सा प्रतीत होता है

वैसे भी शाम हो गयी, आज के लिए काफ़ी है इतना, अब बाकी के आँसुओं की किश्त कल भी देनी हैं। लगातार 12 दिनों तक गम बचा कर रखना है, ताकि सामाजिक संतुष्टि के लिये रोज़ थोड़ा-थोड़ा पानी आँखों से गिराया जा सके। 

तो हाँ, ये तो बस मन को समझाने के तरीके हैं कि मरे हुये को जलाने के बाद उसकी आत्मा शांत हो जाती है। आत्मा तो उसी के आस-पास रहती है जिसे वो बहुत चाहता हो।

चलो घर का एक चक्कर लगा लूं, मेरा दराज़, कितना साफ़ है, ये सोफ़ा, जिस पर ऑफिस से आने के बाद चैन की सांस लेता था मैं।

मेरा कुत्ता, इसे भी समझ आ गया है मैं अब नहीं रहा, कल रात से ही मायूस पड़ा है किसी कोने में। मेरी पेन्स का कलेक्शन, कितना पसंद था मुझे तरह-तरह की कलमें जमा करना। मेरा चाय का कप, मेरी पसंदीदा शर्ट, मोर्निंग वाक वाला पार्क, मेरी शादी का एल्बम और मेरे बेड-रूम में पड़ी ये। मेरी अब भी चमचमाती मेन ऑफ़ द मैच की ये ट्रॉफी ! मेरे जीवन का सबसे बेहतरीन क्षण था वो। इससे जुड़ा हर एक दृश्य इतना जीवंत है आँखों में कि लगता है जैसे कल की ही बात हो। 

वैसे मरे हुए को भूलने के लिए 12 दिन तो बहुत होते हैं। संभावना है कि मेरे अपने कुछ महीनों में भूल जायेंगे मुझे, पर मैं, मेरा बसेरा यहीं है, इसी घर में, अपने कमरे के शो केस में रखी इस ट्रॉफी में, तब तक, जब तक इसे यहाँ से उठाकर कहीं और न फेंक दिया जाय...!

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