12 Best Moral Stories In Hindi | 2021

इस Blog में आपको Best Moral Stories In Hindi में पढ़ने को मिलेंगी जो आपने अपने दादा दादी से सुनी होंगी। ये hindi stories बहुत ही प्रेरक है। ऐसे  किस्से तो आपने अपने बचपन मे बहुत सुने होंगे पर ये किस्से कुछ अलग हौ। हमने भी इस ब्लॉग में Best Moral Stories In Hindi में लिखा है जिसको पढ़कर आपको बहुत ही ज्यादा आनंद मिलेगा और आपका मनोरंजन भी होगा। इसमे कुछ Best Moral Stories In Hindi दी गयी है। जिसमे आपको नयापन अनुभव होगा। यदि आप पुरानी कहानियाँ पढ़कर बोर हो गए है तो यहाँ पर हम आपको Best Moral Stories In Hindi दे रहे है जिसको पढ़कर आपको बहुत ही ज्यादा मज़ा आने वाला है।


12 Best Moral Stories In Hindi
12 Best Moral Stories In Hindi



बुढिया और कद्दू | short stories in hindi with morals


बहुत पुरानी कहानी है। एक गांव में एक बुढ़िया रहती थी। उसकी बेटी की शादी उसने दूसरे गांव में की थी। अपनी बेटी से मिले बुढ़िया को बहुत दिन हो गए। एक दिन उसने सोचा कि चलो बेटी से मिलने जाती हूं। यह बात मन में सोचकर बुढ़िया ने नए-नए कपड़े, मिठाइयां और थोड़ा-बहुत सामान लिया और चल दी अपनी बेटी के गांव की ओर।

चलते-चलते उसके रास्ते में जंगल आया। उस समय तक रात होने को आई और अंधेरा भी घिरने लगा। तभी उसे सामने से आता हुआ बब्बर शेर दिखाई दिया। बुढ़िया को देख वह गुर्राया और बोला- बुढ़िया कहां जा रही हो? मैं तुम्हें खा जाऊंगा।

बुढ़िया बोली- शेर दादा, शेर दादा तुम मुझे अभी मत खाओ। मैं अपनी बेटी के घर जा रही हूं। बेटी के घर जाऊंगी, खीर-पूड़ी खाऊंगी। मोटी-ताजी हो जाऊंगी फिर तू मुझे खाना।

शेर ने कहा- ठीक है, वापसी में मिलना।

फिर बुढ़िया आगे चल दी। आगे रास्ते में उसे चीता मिला। चीते ने बुढ़िया को रोका और वह बोला- ओ बुढ़िया कहां जा रही हो?

बुढ़िया बड़ी मीठी आवाज में बोली- बेटा, मैं अपनी बेटी के घर जा रही हूं। चीते ने कहा- अब तो तुम मेरे सामने हो और मैं तुम्हें खाने वाला हूं।

बुढ़िया गिड़गिड़ाते हुए कहने लगी- तुम अभी मुझे खाओगे तो तुम्हें मजा नहीं आएगा। मैं अपनी बेटी के यहां जाऊंगी वहां पर खीर-पूड़ी खाऊंगी, मोटी-ताजी हो जाऊंगी, फिर तू मुझे खाना।

चीते ने कहा- ठीक है, जब वापस आओगी तब मैं तुम्हें खाऊंगा।

फिर बुढ़िया आगे बढ़ी। आगे उसे मिला भालू। भालू ने बुढ़िया से वैसे ही कहा जैसे शेर और चीते ने कहा था। बुढ़िया ने उसे भी वैसा ही जवाब देकर टाल दिया।

सबेरा होने तक बुढ़िया अपनी बेटी के घर पहुंच गई। उसने रास्ते की सारी कहानी अपनी बेटी को सुनाई। बेटी ने कहा कि मां फिक्र मत करो। मैं सब संभाल लूंगी।

बुढ़िया अपनी बेटी के यहां बड़े मजे में रही। चकाचका खाया-पिया, मोटी-ताजी हो गई। एक दिन बुढ़िया ने अपनी बेटी से कहा कि अब मैं अपने घर जाना चाहती हूं।

बेटी ने कहा कि ठीक है। मैं तुम्हारे जाने का बंदोबस्त कर देती हूं।

बेटी ने आंगन की बेल से कद्दू निकाला। उसे साफ किया। उसमें ढेर सारी लाल मिर्च का पावडर और ढेर सारा नमक भरा।

फिर अपनी मां को समझाया कि देखो मां तुम्हें रास्ते में कोई भी मिले तुम उनसे बातें करना और फिर उनकी आंखों में ये नमक-मिर्च डालकर आगे बढ़ जाना। घबराना नहीं।

बेटी ने भी अपनी मां को बहुत सारा सामान देकर विदा किया। बुढ़िया वापस अपने गांव की ओर चल दी। लौटने में फिर उसे जंगल से गुजरना पड़ा। पहले की तरह उसे भालू मिला।

उसने बुढ़िया को देखा तो वह खुश हो गया। उसने देखा तो मन ही मन सोचा अरे ये बुढ़िया तो बड़ी मुटिया गई है।

भालू ने कहा- बुढ़िया अब तो मैं तुम्हें खा सकता हूं?

बुढ़िया ने कहा- हां-हां क्यों नहीं खा सकते। आओ मुझे खा लो।

ऐसा कहकर उसने भालू को पास बुलाया। भालू पास आया तो बुढ़िया ने अपनी गाड़ी में से नमक-मिर्च निकाली और उसकी आंखों में डाल दी।

इतना करने के बाद उसने अपने कद्दू से कहा- चल मेरे कद्दू टुनूक-टुनूक। कद्दू अनोखा था, वह उसे लेकर बढ़ चला।

बुढ़िया आगे बढ़ी फिर उसे चीता मिला। बुढ़िया को देखकर चीते की आंखों में चमक आ गई।

चीता बोला- बुढ़िया तू तो बड़ी चंगी लग रही है। अब तो मैं तुम्हें जरूर खा जाऊंगा और मुझे बड़ी जोर की भूख लग रही है।

बुढ़िया ने कहा- हां-हां चीते जी आप मुझे खा ही लीजिए। जैसे ही चीता आगे बढ़ा बुढ़िया ने झट से अपनी गाड़ी में से नमक-मिर्च निकाली और चीते की आंखों में डाल दी।

चीता बेचारा अपनी आंखें ही मलता रह गया।

बुढ़िया ने कहा- चल मेरे कद्दू टुनूक-टुनूक। आगे उसे शेर मिला।

थोड़े आगे जाने पर बुढ़िया को फिर शेर मिला। उसने भी वही सवाल दोहराया।

बुढ़िया और कद्दू ने उसके साथ भी ऐसी ही हरकत की। इस तरह बुढ़िया और उसकी बेटी की चालाकी ने उसे बचा लिया। वह सुरक्षित अपने घर पहुंच गई।


एक नया विचार | short stories in hindi with morals


एक बार की बात है एक राजा था। उसका एक बड़ा-सा राज्य था। एक दिन उसे देश घूमने का विचार आया और उसने देश भ्रमण की योजना बनाई और घूमने निकल पड़ा। जब वह यात्रा से लौट कर अपने महल आया। उसने अपने मंत्रियों से पैरों में दर्द होने की शिकायत की। राजा का कहना था कि मार्ग में जो कंकड़ पत्थर थे वे मेरे पैरों में चुभ गए और इसके लिए कुछ इंतजाम करना चाहिए। कुछ देर विचार करने के बाद उसने अपने सैनिकों व मंत्रियों को आदेश दिया कि देश की संपूर्ण सड़कें चमड़े से ढंक दी जाएं। राजा का ऐसा आदेश सुनकर सब सकते में आ गए। लेकिन किसी ने भी मना करने की हिम्मत नहीं दिखाई। यह तो निश्चित ही था कि इस काम के लिए बहुत सारे रुपए की जरूरत थी। फिर भी किसी ने कुछ नहीं कहा। कुछ देर बाद राजा के एक बुद्घिमान मंत्री ने एक युक्ति निकाली। उसने राजा के पास जाकर डरते हुए कहा कि मैं आपको एक सुझाव देना चाहता हूं। अगर आप इतने रुपयों को अनावश्यक रूप से बर्बाद न करना चाहें तो एक अच्छी तरकीब मेरे पास है। जिससे आपका काम भी हो जाएगा और अनावश्यक रुपयों की बर्बादी भी बच जाएगी। राजा आश्चर्यचकित था क्योंकि पहली बार किसी ने उसकी आज्ञा न मानने की बात कही थी। उसने कहा बताओ क्या सुझाव है। मंत्री ने कहा कि पूरे देश की सड़कों को चमड़े से ढंकने के बजाय आप चमड़े के एक टुकड़े का उपयोग कर अपने पैरों को ही क्यों नहीं ढंक लेते। राजा ने अचरज की दृष्टि से मंत्री को देखा और उसके सुझाव को मानते हुए अपने लिए जूता बनवाने का आदेश दे दिया। यह कहानी हमें एक महत्वपूर्ण पाठ सिखाती है कि हमेशा ऐसे हल के बारे में सोचना चाहिए जो ज्यादा उपयोगी हो। जल्दबाजी में अप्रायोगिक हल सोचना बुद्धिमानी नहीं है। दूसरों के साथ बातचीत से भी अच्छे हल निकाले जा सकते हैं।


बिल्ली बच गयी | short stories in hindi with morals


ढोलू – मोलू दो भाई थे। दोनों खूब खेलते , पढ़ाई करते और कभी-कभी खूब लड़ाई भी करते थे। एक दिन दोनों अपने घर के पीछे खेल रहे थे। वहां एक कमरे में बिल्ली के दो छोटे-छोटे बच्चे थे। बिल्ली की मां कहीं गई हुई थी , दोनों बच्चे अकेले थे। उन्हें भूख लगी हुई थी इसलिए खूब रो रहे थे। ढोलू – मोलू ने दोनों बिल्ली के बच्चों की आवाज सुनी और अपने दादाजी को बुला कर लाए। दादा जी ने देखा दोनों बिल्ली के बच्चे भूखे थे। दादा जी ने उन दोनों बिल्ली के बच्चों को खाना खिलाया और एक एक कटोरी दूध पिलाई। अब बिल्ली की भूख शांत हो गई। वह दोनों आपस में खेलने लगे। इसे देखकर ढोलू – मोलू बोले बिल्ली बच गई दादाजी ने ढोलू – मोलू को शाबाशी दी।


लालची बेटे | short stories in hindi with morals


एक पिता अपने दोनों बेटों से बहुत प्यार करते थे। यह सोच कि शहर चले जाएँ तो दोनों बेटों का भविष्य उज्जवल हो जाएगा, उन्होंने अपना पुश्तेनी घर बेच दिया। गांव में चोरियाँ बहुत हो रही थी इस लिए वो सारा पैसा उन्होंने एक खेत में गाड़ दिया। घर पहुँच कर घर बेचने की बात दोनों बेटों को बताई और यह भी बताया कि घर का नया मालिक एक दो दिन में यहाँ रहने आ जाएगा। इस लिए तैयारी करो शहर चलने की। घर बिकने की बात सुन दोनों बेटों के मन में खोट आ गया। दोनों सोचने लगे की क्यों न मैं ही सारा पैसा हड़प लूँ। तरकीब सोचते हुए दोनों अपने पिता के पास गए और पूछा ” पर पैसा तो आप लाए नहीं।” पिता ने उत्तर दिया ” अरे, सारे पैसे मेरे पास हैं, तुम दोनों चिंता मत करो।” रात को बड़ा बेटा उठा और सोते हुए पिता के सामान की तलाशी लेने लगा। तभी छोटा बेटा भी वहाँ पैसा ढूँढ़ते हुए पहुँच गया। एक दूसरे को देख दोनों घबरा गए। तब फुसफुसाते हुए दोनों ने तय किया कि इस बूढ़े पिता को साथ ले जा कर क्या करेंगे। क्यों न हम दोनों मिल कर पैसा ढूंढे। जब पैसा मिल जाएगा तो उसका बराबर बँटवारा कर शहर भाग जाएंगे। उन्हें पता ही नहीं चला, पिता की नींद खुल गयी थी और वो उनकी सारी बातें सुन रहे थे। अपनी पत्नी की मौत के बाद इतने प्यार से पाला था इन दोनों बेटों को और आज वही उसे धोखा दे रहे हैं। अगले दिन उन्होंने सारा पैसा जमीन से निकाला और एक वृद्ध आश्रम को दान कर दिया। वो अपने बेटों की घृणित सोच से इतने दुखी हुए की उन्होंने फ़ौरन घर छोड़ दिया और साधू का वेश धारण कर गाँव से हमेशा के लिए चले गए। दूसरे दिन नया मकान मालिक आया और उसने दोनों बेटों को घर से निकाल दिया। अब दोनों के पास ना पिता था, ना घर था, और ना ही पैसा। देखा आपने, लालच की वजह से दोनों के हाथ से पैसा भी गया और पिता का प्यार भी।


मूर्ख राजा और चतुर मंत्री | short stories in hindi with morals


एक समय की बात है दियत्स नाम की नगरी एक नदी किनारे बसी हुई थी। वहां का राजा बहुत ही मूर्ख और सनकी था। एक दिन राजा अपने मंत्री के साथ संध्या के समय नदी के किनारे टहल रहा था। तभी उसने मंत्री से पूछा, “मंत्री बताओ यह नदी किस दिशा की ओर और कहाँ बहकर जाती है?” “महाराज, यह पूर्व दिशा की ओर बहती है और पूर्व की ओर स्तिथ देशो में बहकर समुन्द्र में मिल जाती है।”, मंत्री ने उत्तर दिया। यह सुनकर राजा बोला, “यह नदी हमारी है, और इसका पानी भी हमारा है, क्या पूर्व में स्तिथ देश इस नदी के पानी का उपयोग करते हैं।” “जी, महाराज, जब नदी उधर बहती है तो करते ही होंगे।”, मंत्री ने उत्तर दिया। इस पर राजा बोला,”जाओ नदी पर दीवार बनवा दो, और सारा का सारा पानी रोक दो, हम नहीं चाहते है की पूर्व दिशा में स्तिथ देशों को पानी दिया जाये।” “लेकिन, महाराज इससे हमे ही नुकसान होगा।”, मंत्री ने उत्तर दिया। “नुकसान! कैसा नुकसान? नुकसान तो हमारा हो रहा है, हमारा पानी पूरब के देश मुफ्त में ले रहे हैं। और तुम कहते हो की नुक्सान हमारा ही होगा? मेरी आज्ञा का शीघ्र से शीघ्र पालन करो।”, राजा गुस्से में बोला। मंत्री तुरंत कारीगरों को बुला लाया और नदी पर दीवार बनाने के काम शुरू करवा दिया। कुछ ही दिनों में दीवार बन कर तैयार हो गयी। राजा बहुत खुश हुआ। पर उसकी मूर्खता की वजह से कुछ समय बाद नदी का पानी शहर के घरों में घुसने लगा। लोग अपनी परेशानी लेकर मंत्री के पास आये। मंत्री ने उन्हें आश्वासन दिया की वह सब कुछ ठीक कर देगा। मंत्री ने एक योज़ना बनाई । महल में एक घंटा बजाने वाला आदमी रहता था। वह हर घंटे पर समय के अनुसार घंटा बजा देता था, जिससे सभी को समय का पता चल जाता था। मंत्री ने उस आदमी को आदेश दिया की वह आज रात को जितना समय हो उसका दोगुना घंटा बजाये। आदमी ने ऐसा ही किया; जब रात के तीन बजे तो उसने 6 बार घंटा बजाया, जिसका अर्थ था कि सुबह के 6 बज गए हैं। घंटा बजते ही सभी लोग उठ गए। राजा भी उठ गया और बाहर आ गया। वहा पर मंत्री मौजूद था, राजा ने मंत्री से पूछा, “मंत्री अभी तक सुबह नहीं हुई है क्या? और सूरज अभी तक निकला क्यों नहीं है?” मंत्री ने उत्तर दिया, “महाराज सुबह तो हो चुकी है,परन्तु सूरज नहीं निकला है, क्योंकि सूरज पूरब की ओर से निकलता है, शायद पूरब के देशों ने सूरज को रोक दिया है क्योंकि हमने उनका पानी रोक दिया था, इसीलिए अब हमारे राज्य में कभी सूरज नहीं निकलेगा।” राजा बहुत चिंतित हुआ और बोला,”क्या अब कभी भी हमारे देश में सूरज नहीं निकलेगा ? हम सब अन्धकार में कैसे रहेंगे? इसका उपाय बताओ मंत्री?” “महाराज, यदि आप नदी का पानी छोड़ दें, तो शायद वे भी सूरज छोड़ देंगे।”, मंत्री ने उत्तर दिया। राजा ने तुरंत मंत्री को हुक्म दिया की वह नदी पर बनाई गयी दीवार को तुड़वाए। मंत्री ने राजा की आज्ञा का पालन किया और कारीगरों को आदेश दिया कि दीवार को तोड़ दिया जाये। कारीगरों ने दीवार तोड़ दी। और जैसे ही दिवार टूटी सचमुच सूर्योदय का समय हो चुका था, और दिव्यमान सूरज चारों तरफ अपनी लालिमा बिखेर रहा था! सूरज को उगता देख राजा बहुत खुश हुआ और मंत्री को इनाम दिया और कहा,”तुम्हारी वजह से आज हम फिर सूरज को देख पाये है। अब हमारे राज्य में कभी अँधेरा नहीं रहेगा।” मंत्री ने मासूम सा मुँह बनाकर जवाब दिया, “महाराज, यह तो मेरा फ़र्ज़ था।”


बकरी का बच्चा | short stories in hindi with morals


बकरी के छोटे से, प्यारे से बच्चे ने अपनी माँ को हरी हरी घास खाते देखा। अपनी माँ को हरी घास खाता देख बकरी के बच्चे के मुँह में पानी आ गया। उसका भी मन हुआ हरी घास खाने का और घास की खोज में वो जँगल की तरफ निकल पड़ा। रास्ते में ठंडी हवा, उप्पर थोड़े बादल और चारों तरफ हरियाली देख वो बहुत खुश हुआ। जंगल पहुँचा तो उसे घास तो मिली पर उतनी हरी नहीं थी जितनी उसकी माँ खा रही थी। वो थोड़ा और आगे बड़ा और हरी घास को खोजते हुए वो घने जंगल में पहुँच गया। वहाँ मीठी सी हरी घास देख वो बहुत खुश हुआ और उछलता हुआ घास खाने लगा। घास इतनी अच्छी लगी कि वो बहुत सारी खा गया और उसके बाद उसी घास पर लेट कर सो गया। जब बकरी अपने बच्चे को ढूँढ़ते हुए जँगल पहुँची और उसे सोए हुए देखा तो उसे उठा के पूछा “तुम बिना बताए अकेले इतनी दूर क्यों आ गए।” तब बकरी के बच्चे ने मुस्कराते हुए कहा “माँ, में हरी घास खाने आया था और खाने के बाद नींद आ गयी।” इस पर बकरी बोली “अरे, खाने का मन था तो मुझे बोलते, मैं ला देती।” तब शान से बकरी का बच्चा बोला ” माँ, आप तो रोज़ खिलाती हो, लेकिन खुद ढून्ढ कर खाने में मजा ही कुछ और है।”


शेर और किशमिश | short stories in hindi with morals


एक खूबसूरत गांव था। चारों ओर पहाड़ियों से घिरा हुआ। पहाड़ी के पीछे एक शेर रहता था। जब भी वह ऊंचाई पर चढ़कर गरजता था तो गांव वाले डर के मारे कांपने लगते थे। कड़ाके की ठंड का समय था। सारी दुनिया बर्फ से ढंकी हुई थी। शेर बहुत भूखा था। उसने कई दिनों से कुछ नहीं खाया था। शिकार के लिए वह नीचे उतरा और गांव में घुस गया। वह शिकार की ताक में घूम रहा था। दूर से उसे एक झोपड़ी दिखाई दी। खिड़की में से टिमटिमाते दिए की रोशनी बाहर आ रही थी। शेर ने सोचा यहां कुछ न कुछ खाने को जरूर मिल जाएगा। वह खिड़की के नीचे बैठ गया। झोपड़ी के अंदर से बच्चे के रोने की आवाज आई। ऊं आं ऊं आं । वह लगातार रोता जा रहा था। शेर इधर-उधर देखकर मकान में घुसने ही वाला था कि उसे औरत की आवाज आई- 'चुप रहे बेटा। देखो लोमड़ी आ रही है। बाप रे, कितनी बड़ी लोमड़ी है? कितना बड़ा मुंह है इसका। कितना डर लगता है उसको देखकर।' लेकिन बच्चे ने रोना बंद नहीं किया। मां ने फिर कहा- 'वह देखो, भालू आ गया भालू खिड़की के बाहर बैठा है। बंद करो रोना नहीं तो भालू अंदर आ जाएगा', लेकिन बच्चे का रोना जारी रहा। उसे डराने का कोई असर नहीं पड़ा। खिड़की के नीचे बैठा शेर सोच रहा था- 'अजीब बच्चा है यह! काश मैं उसे देख सकता। यह न तो लोमड़ी से डरता है, न भालू से।' उसे फिर जोर की भूख सताने लगी। शेर खड़ा हो गया। बच्चा अभी भी रोए जा रहा था। 'देखो देखो ' मां की आवाज आई, 'देखो शेर आ गया शेर। वह रहा खिड़की के नीचे।' लेकिन बच्चे का रोना, फिर भी बंद नहीं हुआ। यह सुनकर शेर को बहुत ताज्जुब हुआ और बच्चे की बहादुरी से उसको डर लगने लगा। उसे चक्कर आने लगे और बेहोश-सा हो गया। 'वह कैसे जान गई कि मैं खिड़की के पास हूं।' शेर ने सोचा।थोड़ी देर बाद उसकी जान में जान आई और उसने खिड़की के अंदर झांका। बच्चा अभी भी रो रहा था। उसे शेर का नाम सुनकर भी डर नहीं लगा। शेर ने आज तक ऐसा कोई जीव नहीं देखा जो उससे न डरता हो। वह तो यही समझता था कि उसका नाम सुनकर दुनिया के सारे जीव डर के मारे कांपने लगते हैं, लेकिन इस विचित्र बच्चे ने मेरी भी कोई परवाह नहीं की। उसे किसी भी चीज का डर नहीं है। शेर का भी नहीं। अब शेर को चिंता होने लगी। तभी मां की फिर आवाज सुनाई दी। 'लो अब चुप रहो। यह देखो किशमिश।' बच्चे ने फौरन रोना बंद कर दिया। बिलकुल सन्नाटा छा गया। शेर ने सोचा- 'यह किशमिश कौन है? बहुत खूंखार होगा।' अब तो शेर भी किशमिश के बारे में सोचकर डरने लगा। उसी समय कोई भारी चीज धम्म से उसकी पीठ पर गिरी। शेर अपनी जान बचाकर वहां से भागा। उसने सोचा कि उसकी पीठ पर किशमिश ही कूदा होगा। असल में उसकी पीठ पर एक चोर कूदा था, जो उस घर में गाय-भैंस चुराने आया था। अंधेरे में शेर को गाय समझकर वह छत पर से उसकी पीठ पर कूद गया। डरा तो चोर भी। उसकी तो जान ही निकल गई जब उसे पता चला कि वह शेर की पीठ पर सवार है, गाय की पीठ पर नहीं। शेर बहुत तेजी से पहाड़ी की ओर दौड़ा, ताकि किशमिश नीचे गिर पड़े, लेकिन चोर ने भी कसकर शेर को पकड़ रखा था। वह जानता था कि यदि वह नीचे गिरा तो शेर उसे जिंदा नहीं छोड़ेगा। शेर को अपनी जान का डर था और चोर को अपनी जान का। थोड़ी देर में सुबह का उजाला होने लगा। चोर को एक पेड़ की डाली दिखाई दी। उसने जोर से डाली पकड़ी और तेजी से पेड़ के ऊपर चढ़कर छिप गया। शेर की पीठ से छुटकारा पाकर उसने चैन की सांस ली। शेर ने भी चैन की सांस ली- 'भगवान को धन्यवाद मेरी जान बचाने के लिए। किशमिश तो सचमुच बहुत भयानक जीव है' और वह भूखा-प्यासा वापस पहाड़ी पर अपनी गुफा में चला गया।


प्रजा का धन | short stories in hindi with morals


राजनगर का राजा था हरि सिंह। बड़ा ही कंजूस और लालची। प्रजा के सुख-दुख की हरि सिंह को तनिक भी चिंता नही थी। उसके राज में जनता से भारी टैक्स वसूला जाता था मगर फिर भी कोई सुख सुविधाएं उपलब्ध नही कराई गई थीं। जनता से बहुत अधिक टैक्स वसूलने के कारण राजा के खजाने में बहुत धन इकट्ठा हो गया था। सोने की मुद्राओं के बड़े-बड़े बोरे भर कर राज-कोष में रखवा दिए गए। जनता गरीब होती जा रही थी और अपने राजा से बहुत दुःखी थी। अचानक पड़ोसी राज्य के राजा दुर्जन सिंह ने राजनगर पर हमला कर दिया। हरि सिंह की सेना दुर्जन सिंह की सेना से बड़ी थी लेकिन इसके बावजूद दुर्जन सिंह की सेना उन पर भारी पड़ी। दुश्मन की सेना ने राजनगर को जम कर लूटा। दुर्जन सिंह ने राजनगर का सारा खजाना लूट लिया। दुर्जन सिंह ने लूटपाट के लिए ही हमला किया था। खजाना लूट कर वो अपनी सेना के साथ वापस लौट गया। दुर्जन सिंह के इस हमले के बाद राजनगर की आर्थिक स्थिति बहुत खराब हो गई, सारा खजाना लुट चुका था। हरि सिंह ने अपने मंत्रियों और राजपुरोहित की सभा बुलाई। उसने अपने मंत्रियों से पूछा की संख्या में अधिक होने के बावजूद हमारी सेना दुर्जन सिंह की सेना से क्यों हार गई। सारे मंत्री आपस में विचार-विमर्श ही करते रह गए लेकिन डर के मारे कोई कुछ नहीं बोल पाया। कौन राजा के सामने उसकी बुराई करके अपनी जान को जोखिम में डालता। राजपुरोहित ने साहस दिखाया और राजा से कहा कि राजन आपने अपनी जनता का इतना अधिक शोषण किया है कि आपकी प्रजा आप से घृणा करने लगी है। सिर्फ संख्या अधिक होने से युद्ध नहीं जीते जा सकते, जब तक सैनिकों में मनोबल, जोश और देशप्रेम नहीं होगा तब तक वह कभी भी नहीं जीत सकते हैं। अच्छा तो इसका मतलब सैनिकों ने जानबूझटैक्स मेरा खजाना लुटवाया है – हरि सिंह ने गुस्से में कहा। राजपुरोहित ने शांत स्वभाव से राजा को समझाया कि राजन राज-कोष में रखा धन आपका नहीं था वह जनता का धन था, आपका धन नहीं लुटा है बल्कि जनता का धन लुटा है। आपने तो इस धन को जनता से छीन कर अपने पास रखा हुआ था। आप कहना क्या चाहते हैं राजपुरोहित जी? – हरि सिंह ने पूछा। महाराज आप भविष्य में सिर्फ उतना ही टैक्स जनता से वसूलें जितना आपके राज्य को चलाने के लिए आवश्यक हो। खजाने में जमा धन पर दुश्मन की नजर रहती है और जनता से टैक्स जबरदस्ती वसूला जाता है इसकी वजह से जनता भी चिंतित रहती है। आपने खजाना भरने के बजाय इस धन से जनता को सुविधाएं उपलब्ध कराई होती तो आपको कभी हार का मुंह ना देखना पड़ता – राजपुरोहित ने राजा को समझाते हुए कहा। अब राजा की समझ में सारी बात अच्छी तरह आ गई।


पौधों का करिश्मा | short stories in hindi with morals


क्राफ्ट विषय में उसने बागवानी लिया था। सबसे अच्छा उसे यही लगा था। बाकी दर्जीगिरी और कताई-बुनाई भी ऐच्छिक विषयों में थे, परंतु दर्जीगिरी के विषय में तो सोचकर ही वह सिहर उठ‌ता था। पहले कपड़े का नाप लो, फिर जो आइटम बनाना है उसके हिसाब से कपड़े की कटाई करो, फिर सिलाई। थोड़ा भी इधर-उधर हुआ कि कपड़े का सत्यनाश हुआ। फिर कौन मशीन में धागा डालता फिरे, पागलों का काम, उससे तो कताई-बुनाई अच्छी है। पोनी ले लो तकली में फंसा दो और घुमा दो। इधर तकली ने फेरे लिए उधर कच्चा सूत तैयार। किंतु इसमें भी परेशानी, तकली के ऊपरी पांइट पर पोनी फंसना बहुत कठिन काम है। अनाड़ी रहे तो सूत बार-बार टूटे। खैर अब तो गांधीजी भी नहीं है काहे का सूत काहे की खादी। रामप्रसाद‌ को बागवानी सबसे अच्छी लगी थी। क्यारी में पौधे ही तो लगाना है। गड्ढा़ खोदा और पौधा रोप दिया और फुरसत। थोड़ा-बहुत पानी-वानी डाल दिया। फिर कौन देखता पौधा सूखा कि बचा। रामप्रसाद को पेड़-पौधों से कभी लगाव नहीं रहा। घर के आंगन में लगे पेड़ उसे बैरियों के समान लगते थे। इच्छा होती कि कुल्हाड़ी उठाकर दे दनादन, सब काट डाले। परंतु मां के कारण यह संभव ही नहीं था। ज‌ब इस संबंध में बात करता, मां की त्योरियां चढ़ जातीं। 'ये तेरे बाप-दादों ने लगाए हैं, तू इन्हें कैसे काट स‌कता है, बुजुर्गों का सम्मान तो करना सीख।' रोज सुबह से ही आंगन में सूखे पत्तों के ढेर देखकर वह बिलबिला उठता पर मां पेड़ों के कारण घर में अंधेरा भी तो होता है, वह मां को मनाने कि कोशिश करता परंतु व‌ही ढाक के तीन पात। बाप‌-दादा मां के लिए किसी ईश्वर से कम नहीं हैं। परीक्षा के दिन आ गए। क्राफ्ट विषय तो प्रायोगिक‌ ही है। प्रयोग की अवधि में ही परीक्षक दो चार प्रश्न पूंछ लेता है। चूंकि उसने बागवानी चुना था, उसे शाला के बगीचे में दस पौधे लगाने का काम दिया गया था। एक लम्बी-सी क्यारी में एक के बाद एक, कतार में‍ पौधे लगाना थे। चार घंटे का समय दिया ग‌या था। गड्ढा़ खोदकर वैज्ञानिक पद्धति से भुरभुरी मिट्टी तैयार‌ करना थी, पौधे लगाना थे और फिर परीक्षक द्वारा उपलब्ध फेंसिंग (ट्री गार्ड) से पौधों को घेर दॆना था। फिर‌ मौखिक प्रश्नों के जबाब इतना-सा ही तो काम था। रामप्रसाद ने गेती और फावड़े की सहायता से दस गड्ढे़ खोद डाले। चाहता तो एक, एक गड्ढा़ खोदकर उनमें पौधे लगाता जाता किंतु उसे पहले दस गड्ढे़ खोदना सुविधाजनक लगा। अब पौधे लगाना है, फिर ट्री गार्ड़ यही सोचकर उसने पहले गड्ढे़ में एक पौधा रोप दिया। खाद मिली हुई मिट्टी से गड्ढा़ पूरा और फिर ट्री गार्ड लगा दिया। एक पौधा तो निपटा यह सोचकर वह आगे के गड्ढे़ के तरफ बढ़ा। दूसरे गड्ढे़ में भी उसनॆ वही प्रक्रिया अपनाई। वह गुनगुनाता हुआ आगे जाने को तैयार‌ हुआ कि उसकी दृष्टि पहले गड्ढे पर चली गई। 'अरे वहां का पौधा कहां गया, अभी तो लगाया था।' वह दौड़कर उस गड्ढे़ के पास पहुंच गया। पौधा गायब था। कहां गया पौधा, वह चारों ओर घूम गया। आसपास कोई नहीं था। दूसरे साथी दूर-दूर दूसरी क्यारियों में पौधे लगा रहे थे। कोई पशु-पक्षी भी आसपास नहीं था। फिर मजबूत ट्री गार्ड, पौधा कहां गया? वह आश्चर्यचकित था। ठीक है बाद में देखेंगे, यही सोचकर वह दूसरा पौधा लगाने चला गया। जैसे ही वह पौधा लगाकर तीसरे गड्ढे़ की ओर बढ़ा तो दूसरे गड्ढे़ का पौधा भी गायब हो गया। अरे-अरे यह क्या हो रहा है वह बौखला गया। वह जोर-जोर से चिल्लाने लगा 'अरे कौन है यहां, जो मेरे पौधे उखाड़ रहा है। कोई प्रेत है क्या, कोई भूत क्या? आखिर मेरे पौधे क्यों उखाड़ रहा है कोई? 'प्लीज मेरे पौधे वापिस जहां के तहां लगा दो, मेरी परीक्षा है, मैं फेल हो जाऊंगा, मुझ पर दया करो।' वह आसमान की तरफ दोनों हाथ उठाकर रोने लगा। उसने देखा कि बाकी आठ पौधे जो कि पॉलीथिन में रखे थे। वह भी गायब हो गए और आसमान में जाकर अट्टहास करने लगे। दोनों गड्ढ़ों से गायब हुए पौधे भी उनमें शामिल थे। दसों पौधे आसमान में एक गोल घेरा बनाकर घूम रहे थे। 'अब रोता क्यों है?' उनमें से एक पौधा मीठी आवाज में बोला। 'तुझे तो पौधों सॆ नफरत हैं न, तुम अपने आंगन में लगे सारे पेड़ काटना चाहते हो न, बाप-दादा के हाथ के लगाए पेड़ों से तुम्हें जरा-सा भी प्रेम नहीं है, तुमने अपने घर में कभी कोई पौधा नहीं लगाया, फिर‌ यहां पौधे क्यों लगा रहे हो?' 'मुझे परीक्षा में पास होना है, बागवानी मेरे कोर्स में है, आज मेरा प्रेक्टिकल टेस्ट है, मुझे पौधे लगाकर दिखाना है, परीक्षक आते ही होंगे, प्लीज नीचे आ जाओ, नहीं तो मैं फेल हो जाऊंगा। परीक्षक मुझे अनुत्तीर्ण कर देगा, मुझे क्षमा क‌र दो।' रामप्रसद रोये जा रहा था। 'ठीक है हम क्षमा कर देंगे किंतु तुम्हें एक वादा करना होगा।' पौधा बोला। 'हां हां मैं तैयार हूं, बोलो क्या करना हॊगा।' वह सिसकते हुए बोला। 'आज से पेड़-पौधों से नफरत नहीं करोगे, नए पौधे लगाओगे और पेड़ कभी नहीं काटोगे।' 'हां हां पेड़ कभी नहीं काटूंगा, नए नए पौधे लगाऊंगा, सेवा करूंगा, पानी दूंगा, खाद दूंगा। 'प्लीज अब तो.... उसने अपने दोनों कान पकड़ लिए। देखते ही देखते दसों पौधे अपनी पूर्व स्थिति में आ गए। दो पौधे अपने-अपने गड्ढ़ों में लग गए बाकी आठ यथास्थान रखा गए। रामप्रसाद दौड़-दौड़कर पौधे लगाने लगा। तभी उसने देखा कि परीक्षक महोदय चले आ रहे हैं। अब तो वह घबरा गया। उसका धैर्य जबाब देने लगा। तीन ही पौधे तो लग पाए थे। अब तो फेल होना ही है, यह सोचकर उसके हाथ-पैर फूल गए। वह जोर से रोने लगा। अचानक उसने देखा कि उसके पास रखे पौधे दौड़ लगाकर गड्ढ़ों की तरफ जाने लगे। अरे-अरे पौधे अपने आप ही गड्ढ़ों में जाकर रोपित हो गए, मिट्टी ने भी अपने आप उछल-उछल‌कर पौधों के घेरे भर दिए। इधर ट्री गार्डों ने भी दौड़ लगा दी और पौधों के ऊपर यथा स्थान खड़े हो गए। परीक्षक महोदय आ चुके थे। इतना साफ-सुथरा काम देखा तो वे बहुत खुश हुए। नन्हें हाथों का कमाल देखकर उसे शत-प्रतिशत अंक दे दिए। वह बगवानी में अपनी कक्षा में प्रथम घोषित हो गया था। अब राम प्रसाद वृक्षों से बहुत प्यार करता है, पौधे रोपता है, खाद-पानी देता है और उनकी सुरक्षा करता है। पौधे और पेड़ ही उसका संसार है।


दयालू शेर | short stories in hindi with morals


एक जंगल में एक शेर सो रहा था की अचानक एक चूहा शेर को सोता देखकर उसके उपर आकर खेलने लगा जिसके कारण उछलकूद से शेर की नीद खुल गयी और उसने उस चूहे को पकड़ लिया तो चूहा डर के कापने लगा औ शेर से बोला हे राजन हमे माफ़ कर दो जब कभी आपके ऊपर कोई दुःख आएगा तो मै आपकी सहायता कर दूंगा तो शेर हसते हुए बोला मै सबसे अधिक शक्तिशाली हु मुझे किसी की सहायता की क्या जरूरत, यह कहते हुए उसने चूहे को छोड़ दिया कुछ दिनों बाद वही शेर शिकारी द्वारा फैलाये गये जाल में फास गया और फिर खूब जोर लगाया लेकिन वह जाल से छुटने की अपेक्षा और अधिक फसता चला गया यह सब देखकर पास में ही उस चूहे की नजर शेर पर पड़ी तो उसने शेर की सहायता वाली बात याद दिलाकर अपने नुकीले दातो से जाल काट दिया और फिर शेर जाल से आजाद हो गया इस प्रकार चूहे ने अपने जान की कीमत शेर की जान को बचाकर पूरा किया


हाथी और बन्दर | short stories in hindi with morals


एक हाथी था। उसका मित्र बंदर था। लेकिन एक दिन उन दोनों की मित्रता टूट गई। तो हाथी और बंदर अलग-अलग हो गए। एक दिन बंदर ने हाथी को चिढ़ाया। वह बोला- 'लंबी सूंड सूपा जैसे कान, मोटे-मोटे पैर।' > यह सुनकर हाथी को गुस्सा आया तो वह भी बंदर को चिढ़ाने लगा। इतनी लंबी पूंछ काला, मुंह का बंदर।' यह सुनकर बंदर को भी गुस्सा आया।> उसने हाथी को नाखून गड़ा दिए, तो हाथी ने उसको सूंड से पकड़कर गोल-गोल घुमाकर नदीं में फेंक दिया, तो बंदर चिल्लाने लगा। हाथी मुझे बचाओ-बचाओ। हाथी को दया आ गई और उसे पानी से बाहर निकाल लिया। बंदर ने हाथी से माफी मांगी, मुझे माफ कर दो। हाथी ने बंदर को माफ कर दिया और दोनों फिर से अच्छे से रहने लग गए।


दन्त परी | short stories in hindi with morals


घर का सारा काम निबटा कर मैं लेटी ही थी कि मेरी बेटी मुनमुन रोती चिल्लाती मेरे कमरे में भागी आयी। मैं भी हड़बड़ा कर उठी और उसे गोद में उठा सीने से चिपका कर पुछा ” क्या हुआ मुनमुन, रो क्यों रही हो।” उसको चुप कराने के चक्कर में ये भी न देखा कि उसके मुँह से खून निकल रहा था। मैं पहले तो घबरा गयी, लेकिन अपनी घबराहट छुपाते हुए उसे मुँह खोलने को कहा। मुँह खुलते ही चैन की सांस ली और थोड़ा मुस्कराते हुए उसे समझाया ” अरे, पगली कुछ नहीं हुआ। सिर्फ दूध का दाँत टूट गया है, कुछ दिनों में दूसरा और बहुत ही मजबूत दाँत निकल आएगा।” मगर मुनमुन थी कि रोए ही जा रही थी ” मेरा आगे का दाँत टूट गया, अब सब मुझे चिढ़ाएँगे।” उसकी बात भी सही थी, बच्चों को तो बस एक बहाना भर चाहिए किसी को चिढ़ाने का। उनका दिन तो उस मस्ती में ही गुजर जाता है। कोई द्वेष नहीं, कोई खराब मंशा नहीं बस जी भर कर हँसने का मौका मिल जाता है। उसे चुप करवाने के लिए मैंने उसे (दन्त पारी) के बारे में भी बताया। ” देखो, अब तुम इस दाँत को धो कर अपने तकिये के नीचे रख कर सो जाओ। जब सुबह उठोगी तो दन्त परी तुम्हे एक गिफ्ट देगी।” बस फिर क्या था, गिफ्ट मिलने के सोच ने ही उसका रोना बंद कर दिया। दिन में ना जाने कितनो बार उसने पूछा ” मुम्मा,(दन्त पारी) मुझे क्या गिफ्ट देंगी।” और में हँसते हुए उसे इंतज़ार करने को कह देती। अगली सुबह मुनमुन जल्दी से उठी और दौड़ी हुई मेरे पास आयी ” मुम्मा, (दन्त पारी) मेरे लिए क्या गिफ्ट लायी।” और मैंने उसे गिफ्ट को तकिये के नीचे ढूंढ़ने को कहा। इतना सुनते ही तेजी से भागी अपने कमरे की तरफ और तकिया उठा के देखा तो वहाँ 100 रूपए का नोट पड़ा था। मायूस सी हो बोली ” मुम्मा, यहाँ तो कोई भी गिफ्ट नहीं है, बस एक नोट पड़ा है।” तब मैंने उसके हाथ में 100 रूपए का नोट दे समझाया कि अब वह इन 100 रुपयों से अपनी मन पसंद गिफ्ट खरीद सकती है। मायूस चेहरे पर एकदम से ख़ुशी की लहर दौड़ पड़ी। शाम को उसे बाजार ले जाकर मैंने उसकी मन पसंद गिफ्ट उसे ले दिया। लेकिन झेलना तो था ही मुनमुन को। मैंने उसे समझाया ” देखो मुनमुन, तुम शायद भूल गयी हो कि तुमने भी अपने साथियों के साथ मिल किसी और के दाँत टूटने का मजाक बनाया होगा। आज तुम्हारी बारी है मजाक बनने की तो इसमें तुम्हे बुरा नहीं मानना चाहिए।” यही तो है बचपन की मस्ती, खेलो कूदो और हँसते हँसाते एक दुसरे के साथ मिलजुल कर रहो। इन छोटी बातों को चिढ़ाना नहीं बल्कि सब तरफ हँसी बिखेरने की तरह समझो। याद रखो, ये बचपन के पल दुबारा लौट के नहीं आते। बस इसी तरह ख़ुशी ख़ुशी तुम भी उस हँसी में शामिल हो जाओ।

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