10+ Best Moral Stories In Hindi | 2021

इस Blog में आपको 10+ Best Moral Stories In Hindi में पढ़ने को मिलेंगी जो आपने अपने दादा दादी से सुनी होंगी। ये hindi stories बहुत ही प्रेरक है। ऐसे  किस्से तो आपने अपने बचपन मे बहुत सुने होंगे पर ये किस्से कुछ अलग हौ। हमने भी इस ब्लॉग में 10+ Best Moral Stories In Hindi में लिखा है जिसको पढ़कर आपको बहुत ही ज्यादा आनंद मिलेगा और आपका मनोरंजन भी होगा। इसमे कुछ 10+ Best Moral Stories In Hindi दी गयी है। जिसमे आपको नयापन अनुभव होगा। यदि आप पुरानी कहानियाँ पढ़कर बोर हो गए है तो यहाँ पर हम आपको 10+ Best Moral Stories In Hindi दे रहे है जिसको पढ़कर आपको बहुत ही ज्यादा मज़ा आने वाला है।


10+ Best Moral Stories In Hindi
10+ Best Moral Stories In Hindi


अंधविश्वास


एक गाँव में एक आदमी रहता था| वह आदमी पूरे गाँव में अन्धविश्वासी के नाम से मशहूर था| उसकी पत्नी उससे परेशान हो चुकी थी| जब कभी भी उस आदमी की पत्नी से दूध फेल जाता तो वह घबरा जाता और तुरंत मंदिर में जाकर पाठ करने लगता|

कभी उसकी पत्नी से कोई काँच की चीज टूट जाये तो वह आग बबूला हो जाता| उसके इस व्यवहार के चलते पति–पत्नी में दूरियाँ बनती गईं| पत्नी अपना काम करती और उसका काम उसी को करने देती|

उस आदमी को सफाई बहुत पसंद थी मगर दोनों के बीच दूरियों के कारण घर की सफाई भी नहीं हो पा रही थी क्योंकि पत्नी कहती कि अगर मैंने सफाई की और गलती से कोई काँच की चीज मुझसे टूट गई तो आप तो डाँटोगे ही, इसलिए मैं घर की सफाई नहीं कर सकती|

और आदमी बोलता-जिस घर में आदमी सफाई करे, उस घर में लक्ष्मी और खुशियाँ कभी नहीं आ सकतीं| अब सफाई को लेकर भी दोनों के बीच में खूब बहस होती| आखिर में उस आदमी को काम वाली बाई रखनी पड़ी| मगर काम वाली बाई भी उसके अन्धविश्वास के चलते वहाँ ज़्यादा दिन न रह सकी|

एक दिन उसके घर में चोरी हो गई|

पत्नी के पुलिस को फ़ोन करने को कहने पर वह बोला-“रूको। जब कभी भी घर में कोई बुरा काम हो जाये तो आधे या एक घंटे बाद ही कोई दूसरा काम करना चाहिए|”

पत्नी अपना माथा पकड़कर वहीं बैठ गई| उसकी पत्नी रोज यही सोचती कि कब उसके आदमी का अन्धविश्वास छूटेगा| पर कहते हैं कि भगवान के घर देर है, अंधेर नहीं| एक दिन कुछ ऐसा हुआ कि उस आदमी का सारा अन्धविश्वास दूर हो गया|

हुआ कुछ यूँ कि कुछ दिनों से उस आदमी के घर के पीछे स्थित नारियल के झुरमुट से एक बच्चे की रोने की आवाज आती थी| इससे वह बहुत डर जाता| उसकी पत्नी कहती कि चलो देख के आते हैं कि आखिर क्या है वहाँ पर।

पर वह उसे डाँट कर घर से बाहर निकलने ही नहीं देता| एक दिन वह एक तांत्रिक को अपने घर पे ले आया| तांत्रिक ने घर पे आते ही कहा कि इस घर पे और इसके आस-पास काली शक्तियों का बसेरा है| वह आदमी डर गया|

उसने बोला- “बाबा! अब क्या करें?” बाबा ने कहा कि एक हवन करना पड़ेगा और इसमें 21 हजार रूपये खर्चा होगा| उसकी पत्नी ने उसे रोका पर वह नहीं माना| हवन होने के बाद भी कुछ नहीं हुआ|

एक दिन उसके घर के पास से राजू निकला जो उन नारियल के पेड़ों से नारियल तोड़ता और उन्हें बाज़ार में बेचता था| वह बहुत परेशान दिख रहा था तो उस आदमी ने उससे कारण पूछा|

राजू बोला- “मेरा मोबाइल नारियल के पेड़ों के पास कहीं गिर गया था, मिल ही नहीं रहा|”

वह आदमी बोला- “राजू! वहाँ मत जाया कर। वहाँ काली शक्तियों का राज है। वहाँ रोज़ एक बच्चे की रोने की आवाज आती है|”

यह सुनकर राजू जोर–जोर से हँसने लगा और बोला- “साब, आप कितने पागल हो। वह आवाज तो मेरे मोबाइल में से आती है। मैंने अपने मोबाइल में बच्चे की रोने की आवाज सेट की है|”

आस पास खड़े लोग भी उस आदमी पर हँसने लगे और उस आदमी की गर्दन शर्म से नीचे झुक गई।



एहसान


एक बहेलिया था। एक बार जंगल में उसने चिड़िया फंसाने के लिए अपना जाल फैलाया। थोड़ी देर बाद ही एक उकाब उसके जाल में फंस गया।

वह उसे घर लाया और उसके पंख काट दिए। अब उकाब उड़ नहीं सकता था, बस उछल उछलकर घर के आस-पास ही घूमता रहता।

उस बहेलिए के घर के पास ही एक शिकारी रहता था। उकाब की यह हालत देखकर उससे सहन नहीं हुआ।

वह बहेलिए के पास गया और कहा-"मित्र, जहां तक मुझे मालूम है, तुम्हारे पास एक उकाब है, जिसके तुमने पंख काट दिए हैं। उकाब तो शिकारी पक्षी है।

छोटे-छोटे जानवर खा कर अपना भरण-पोषण करता है। इसके लिए उसका उड़ना जरूरी है। मगर उसके पंख काटकर तुमने उसे अपंग बना दिया है। फिर भी क्या तुम उसे मुझे बेच दोगे?"

बहेलिए के लिए उकाब कोई काम का पक्षी तो था नहीं, अतः उसने उस शिकारी की बात मान ली और कुछ पैसों के बदले उकाब उसे दे दिया।

शिकारी उकाब को अपने घर ले आया और उसकी दवा-दारू करने लगा। दो माह में उकाब के नए पंख निकल आए। वे पहले जैसे ही बड़े थे। अब वह उड़ सकता था।

जब शिकारी को यह बात समझ में आ गई तो उसने उकाब को खुले आकाश में छोड़ दिया। उकाब ऊंचे आकाश में उड़ गया। शिकारी यह सब देखकर बहुत प्रसन्न हुआ। उकाब भी बहुत प्रसन्न था और शिकारी बहुत कृतज्ञ था।

अपनी कृतज्ञता प्रकट करने के लिए उकाब एक खरगोश मारकर शिकारी के पास लाया।

एक लोमड़ी, जो यह सब देख रही थी,

लोमड़ी उकाब से बोली-"मित्र! जो तुम्हें हानि नहीं पहुंचा सकता उसे प्रसन्न करने से क्या लाभ?"

इसके उत्तर में उकाब ने कहा-"व्यक्ति को हर उस व्यक्ति का एहसान मानना चाहिए, जिसने उसकी सहायता की हो और ऐेसे व्यक्तियों से सावधान रहना चाहिए जो हानि पहुंचा सकते हों।"

शिक्षा/Moral:-व्यक्ति को सदा सहायता करने वाले का कृतज्ञ रहना चाहिए।



बगल में छोरा नगर में ढिंढोरा


एक पंडित जी थे। उनके पास एक मोटी ताजी दुधारू गाय थी। यह गाय किसी ने उन्हें दान में दी थी। गाय के कारण घर में दूध, घी, दही की कमी नहीं होती थी। खा पीकर पंडित जी मोटे तगड़े होते जा रहे थे।

एक शाम की बात है, पंडित जी जैसे ही दूध दुहने गोशाला पहुंचे तो गाय वहां से गायब मिली। खूंटा भी उखड़ा हुआ था। पंडित जी की जान सूख गई।

उन्होंने सोचा-”हो न हो गाय कहीं निकल भागी है।“ गाय चूंकि उन्हें बहुत प्रिय थी सो वह फौरन ढूंढ़ने निकल पड़े।

थोड़ी दूर पर पंडित जी को एक गाय चरती हुई दिखाई दी। वह खुश हो गए। लेकिन सांझ के झुरमुट में यह नहीं जान पाए कि जिसे वह अपनी गाय समझ बैठे हैं, वह पड़ोसी का मरखना सांड़ है।

उन्होंने लपककर ज्यों ही रस्सी थामी कि सांड़ भड़क उठा। जब तक सारी बात समझ में आती, देर हो चुकी थी। सांड़ हुंकारता हुआ उनके पीछे दौड़ पड़ा। थुलथुल शरीर वाले पंडित जी हांफते हांफते गिरते पड़ते भाग खड़े हुए।

भागते भागते उनका दम निकला जा रहा था और सांड़ था कि हार मानने को तैयार ही नहीं था। आखिरकार एक गड्डा देखकर पंडित जी उसमें धप से कूद गए। सांड़ फिर भी न माना। पीछे पीछे वह भी गड्डे में उतर पड़ा।

पंडित जी फिर भागे। अबकी बार उन्हें भूसे का एक ढेर दिखा, पंडित जी उस पर कूद गए और दम साधकर पड़े रहे। सांड़ ने भूसे के दो एक चक्कर लगाए और थोड़ी देर ठहर कर इधर उधर उन्हें तलाशता रहा, फिर चला गया।

भूसे के ढेर से पंडित जी वापस आए तो उनका रूप बदल चुका था। पूरे शरीर पर भूसा चिपक गया था। वह किसी दूसरे ग्रह के जीव नजर आ रहे थे। तभी उधर से गुजरते हुए एक आदमी की नजर उन पर पड़ी। वह डरकर चीख उठा।

उसकी चीख सुनकर दस बीस आदमी मदद को आ जुटे। अब आगे आगे पंडित जी और पीछे पीछे सारे लोग।

वह चीखते रहे-”भाइयों, मैं हूं पंडित जी….“ पर लोगों ने एक न सुनी।

आखिरकार बचने का एकमात्र उपाय देखकर पंडित जी एक तालाब में कूद पड़े, तन से भूसा छूटा तो लोग हैरान रह गए। जब सारे लोगों को उनकी रामकहानी मालूम हुई तो सारे वापस अपने घरों को लौट गए।

पंडित जी गाय की खोज में हांफते हांफते आगे बढ़े। गांव के बाहर आम के बाग थे। गाय चरती हुई अक्सर उधर चली जाती थी। पंडित जीम न में एक आशा की किरण लिए आगे बढ़े। उन दिनों आम पकने लगे थे। रखवाले बागों में झोंपड़ी बनाकर रखवाली करते थे। जब उन्होंने चुपके चुपके किसी को

बाग में घुसते देखा तो लाठी लेकर शोर मचाते हुए उस और दौड़ पड़े जिस ओर से पंडित जी आ रहे थे। पंडित जी के होश उड़ गए। वह सिर पर पैर रखकर भाग खड़े हुए।

भागते भागते वह एक खेत में पहुंचे। खेत में खरबूजे और ककड़ियां बोई थीं। खेत के रखवाले ने गोल मटोल पंडित जी को देखा तो समझा कोई जानवर घुस आया है। वे लाठियां और जलती मशालें लेकर उनके पीछे लपक लिए। अब पंडित जी का धैर्य टूट गया। इस बार भागे तो सीधा घर जाकर रूके।

उनकी हालत देखकर पंडिताइन ने पूछा-”क्यों जी कहां से आ रहे हो?“

पंडित जी हांफते हुए बोले- ”मैं गाय की खोज में दुबला हो गया और तुम पूछती हो कि कहां से आ रहे हो?“

"गाय की खोज? गाय तो घर के पीछे बंधी है। गौशाला का खूंटा उखड़ गया था। इसलिए मैंने गाय को घर के पीछे ले जाकर बांध दिया था।“

पंडिताइन की बात सुनकर पंडित जी ने सिर पीट लिया।



किसी कार्य को करने का अंजाम


एक कंजूस महिला की यह आदत थी कि जैसे ही मुर्गे ने भोर में बांग लगाई- ‘कुंकडू-कूं और उसने अपनी नौकरानियों को उनके बिस्तरों से उठाना शुरू कर दिया।

नौकरानियां जवान मगर काहिल थी। उन्हें इस तरह अपनी मालकिन द्वारा गहरी नींद से उठाया जाना बिल्कुल पंसद नहीं था। वे चाहती थीं कि किसी प्रकार इस समस्या का हल निकल आए।

वह मुर्गा उनके लिए सबसे अधिक चिंता का विषय था। चाहे गरमी हो या बरसात, जाड़ा हो या बसन्त, बेरोकटोक सूर्य की निर्मल किरणें धरती पर पड़ते ही वह बांग देना शुरू कर देता था।

उसकी बांग की आवाज सुनकर वह कंजूस महिला खुद तो उठ ही जाती, साथ ही गहरी नींद सोती हुई अपनी नौकरानियों को भी उठा देती।

”यह सब उस मुर्गे के कारण होता है। उसकी वजह से ही हमारी नींद में खलल पड़ती है। हमारी इस समस्या का हल यही है कि हम उस मुर्गे को ही जान से मार दें।“ उनमें से एक नौकरानी ने अपनी राय दी।

उसकी बात सुनकर सभी नौकरानियां काफी खुश हुई। उन्होंने मुर्गे को मारने की एक योजना भी बनाई।

एक दिन मौका पाकर उन्होंने मुर्गे को पकड़ा और एकांत में ले जाकर उसकी गरदन ऐंठ कर उसे जान से मार दिया।

अब वे सभी यह सोचकर प्रसन्न थीं कि न तो मुर्गा भोर में बांग देगा और न ही मालकिन उठकर उन्हें जगाएगी। इस प्रकार उन्हें सुबह देर तक सोए रहने का अवसर प्राप्त हो जाएगा।

मगर उन्हें निराशा ही हाथ लगी। अब मालकिन के पास चूंकि सही समय जानने का कोई साधन नहीं था, इसलिए वह सूर्य निकलने के बहुत पहले या कभी कभी आधी रात को ही उठ बैठती और साथ ही अपनी नौकरानियों को भी उठा देती।

नौकरानियों ने अपनी समस्या के हल के लिए मुर्गे को जान से मारा था, मगर हाय रे भाग्य! इससे उनकी समस्या बजाय घटने के और बढ़ गई।

शिक्षा/Moral:-किसी कार्य को करने से पहले उसका अंजाम पहले सोचो।



लोमड़ी और बकरी


एक समय की बात है, एक लोमड़ी घूमते-घूमते एक कुएं के पास पहुंच गई। कुएं की जगत नहीं थी। उधर, लोमड़ी ने भी इस और ध्यान नहीं दिया। परिणाम यह हुआ कि बेचारी लोमड़ी कुएं में गिर गई।

कुआं अधिक गहरा तो नहीं था, परंतु फिर भी लोमड़ी के लिए उससे बाहर निकलना सम्भव नहीं था। लोमड़ी अपनी पूरी शक्ति लगाकर कुएं से बाहर आने के लिए उछल रही थी, परंतु उसे सफलता नहीं मिल रही थी। अंत में लोमड़ी थक गई और निराश होकर एकटक ऊपर देखने लगी कि शायद उसे कोई सहायता मिल जाए।

लोमड़ी का भाग्य देखिए, तभी कुएं के पास से एक बकरी गुजरी। उसके कुएं के भीतर झांका तो लोमड़ी को वहां देखकर हैरान रह गई।

बकरी बोली- "नमस्ते, लोमड़ी जी! आप यह कुएं में क्या कर रही हो?"

लोमड़ी ने उत्तर दिया- "नमस्ते, बकरी जी! मुझे यहां कुएं में बहुत मजा आ रहा है।"

बकरी बोली- अच्छा! बहुत प्रसन्नता हुई यह जानकर। "आखिर बात क्या है?"

लोमड़ी बड़ी चतुरता से बोली- "यहां की घास अत्यन्त स्वादिष्ट है।"

बकरी आश्चर्य से बोली- "मगर तुम कब से घास खाने लगी हो?

”तुम्हारा कहना ठीक है। मैं घास नहीं खाती, मगर यहां की घास इतनी स्वादिष्ट है कि एक बार खा लेने के बाद बार बार घास ही खाने को जी करता है। तुम भी क्यों नहीं आ जाती हो?“

बकरी के मुंह में पानी भर आया- धन्यवाद!"बकरी कहने लगी मैं भी थोड़ी घास खाऊंगी।“

अगले ही क्षण बकरी कुएं में कूद गई। मगर जैसे ही बकरी कुएं के भीतर पहुंची लोमड़ी बकरी की पीठ पर चढ़कर ऊपर उछली और कुएं से बाहर निकल गई।

”वाह! बकरी जी। अब आप जी भर कर घास खाइए, मैं तो चली।“

इस प्रकार वह चतुर लोमड़ी बकरी का सहारा लेकर खुद तो कुएं से बाहर आ गई लेकिन बकरी को कुएं में छोड़ दिया।

शिक्षा/Moral:-हर किसी पर आंख मूंदकर विश्वास न करो।



मेंढक और साँड़


यह किसी तालाब के किनारे की घटना है। एम मेंढ़क का बच्चा पहली बार पानी से बाहर आया। तालाब के कुछ दूर पर भीमकाय सांड़ घास चर रहा था।

मेंढ़क के बच्चे ने तो कभी भी इतना भयानक एवं भीमकाय जानवर नहीं देखा था। बेचारा समझ नहीं पर रहा था कि यह है क्या?

वह उल्टे पैरों भय से कांपता हुआ घर आया। घर पहुंच कर अपनी मां से लिपट गया और हांफता-हांफता हुआ कहने लगा- ”मां, मैने अभी अभी तालाब से बाहर एक बहुत बड़ा जानवर देखा है।“

मां ने बच्चे को गोद में झुलाते हुए पूछा- "कैसा था देखने में वह जानवर?

मेंढ़क का बच्चा बोला- "उसका वजन बताना तो मेरे लिए कठिन है, मगर समझ लो कि उसके चार पैर लम्बे-लम्बे थे। एक पूंछ थी, दो बड़ी-बड़ी आंखें। सिर से दो नुकीली भाले जैसी दो चीजें निकली पड़ी थी।

मेंढ़क की मां ने भी कभी तालाब से बाहर कदम नहीं रखा था, इसलिए वह भी ठीक से समझ नहीं पा रही थी कि आखिर वह कौन से जानवर हो सकता है? उसे यह सुनकर कुछ अपमान भी महसूस हुआ कि उसका बेटा उसके आकार को उससे भी बड़ा बता रहा है, जबकि वह अपने से बड़ा किसी को समझती ही नहीं थी। इसलिए उसने जोर से सांस खींचीऔर...

अपना शरीर फुलाते हुए बोली- ”क्या इतना बड़ा था," जितनी मैं हूं?

मेंढ़क का बच्चा कांपते हुए चिल्लाया- अरे नहीं मां, वह तो तुमसे बहुत अधिक बड़ा था। इस बार मेंढ़क की मां ने अपने फेफड़ों में ढेर सारी हवा भरी...

और आशा भरे स्वर में बोली- ”अब देखो! क्या अब भी वह मुझसे बड़ा लगता था?“

मेंढ़क का बच्चा बोला- "नहीं मां, तुम तो उसके आगे कुछ भी नहीं हो।

मेंढ़क की मां ने ये सुनते ही- उसकी मां के लिए यह बात एक चुनौती बन गई। वह अपने फेफड़ों में जबरदस्ती हवा भर कर फूलने का प्रयत्न करने लगी, मगर आखिर वह कितना फूलती।

एक समय आया जब उसका पेट किसी गुब्बारे की भांति फट गया।

शिक्षा/Moral:-घमंडी व्यक्ति का सिर सदैव नीचा होता है।



नांद में कुत्ता


यह किसी तालाब के किनारे की घटना है। एम मेंढ़क का बच्चा पहली बार पानी से बाहर आया। तालाब के कुछ दूर पर भीमकाय सांड़ घास चर रहा था।

मेंढ़क के बच्चे ने तो कभी भी इतना भयानक एवं भीमकाय जानवर नहीं देखा था। बेचारा समझ नहीं पर रहा था कि यह है क्या?

वह उल्टे पैरों भय से कांपता हुआ घर आया। घर पहुंच कर अपनी मां से लिपट गया और हांफता-हांफता हुआ कहने लगा- ”मां, मैने अभी अभी तालाब से बाहर एक बहुत बड़ा जानवर देखा है।“

मां ने बच्चे को गोद में झुलाते हुए पूछा- "कैसा था देखने में वह जानवर?

मेंढ़क का बच्चा बोला- "उसका वजन बताना तो मेरे लिए कठिन है, मगर समझ लो कि उसके चार पैर लम्बे-लम्बे थे। एक पूंछ थी, दो बड़ी-बड़ी आंखें। सिर से दो नुकीली भाले जैसी दो चीजें निकली पड़ी थी।

मेंढ़क की मां ने भी कभी तालाब से बाहर कदम नहीं रखा था, इसलिए वह भी ठीक से समझ नहीं पा रही थी कि आखिर वह कौन से जानवर हो सकता है? उसे यह सुनकर कुछ अपमान भी महसूस हुआ कि उसका बेटा उसके आकार को उससे भी बड़ा बता रहा है, जबकि वह अपने से बड़ा किसी को समझती ही नहीं थी। इसलिए उसने जोर से सांस खींचीऔर...

अपना शरीर फुलाते हुए बोली- ”क्या इतना बड़ा था," जितनी मैं हूं?

मेंढ़क का बच्चा कांपते हुए चिल्लाया- अरे नहीं मां, वह तो तुमसे बहुत अधिक बड़ा था। इस बार मेंढ़क की मां ने अपने फेफड़ों में ढेर सारी हवा भरी...

और आशा भरे स्वर में बोली- ”अब देखो! क्या अब भी वह मुझसे बड़ा लगता था?“

मेंढ़क का बच्चा बोला- "नहीं मां, तुम तो उसके आगे कुछ भी नहीं हो।

मेंढ़क की मां ने ये सुनते ही- उसकी मां के लिए यह बात एक चुनौती बन गई। वह अपने फेफड़ों में जबरदस्ती हवा भर कर फूलने का प्रयत्न करने लगी, मगर आखिर वह कितना फूलती।

एक समय आया जब उसका पेट किसी गुब्बारे की भांति फट गया।

शिक्षा/Moral:-घमंडी व्यक्ति का सिर सदैव नीचा होता है।



शिकारी खुद शिकार बना


एक बार एक शिकारी किसी घने जंगल से होकर गुजर रहा था। उसके पास बंदूक भी थी।

जब वह जंगल के भीतर गया तो उसने पेड़ की एक डाल पर एक कबूतर बैठा देखा।

शिकारी ने- अपनी बंदूक से कबूतर का निशाना लिया और बंदूक का घोड़ा दबाने ही वाला था कि कहीं पीछे से एक सांप आया और उसे डस लिया।

सांप की वजह से- शिकारी अपने शिकार पर गोली नहीं चला सका और नीचे गिर पड़ा। सांप के विष का प्रभाव इतना तेज था कि उसका शरीर नीला पड़ने लगा। वह जमीन पर लोटने लगा। उसके मुंह से झाग निकलने लगे।

मरते समय शिकारी ने सोचा- ‘सांप ने मेरे साथ वही किया, जो मैं उस मासूम कबूतर के साथ करना चाहता था।’

शिक्षा/Moral:-दूसरों का बुरा करने वाला स्वयं भी विपत्ति में फंसता है।



एक गलत इच्छा


एक बार एक मधुमक्खी ने एक बरतन में शहद इकटृा किया और ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए उनके समक्ष प्रस्तुत किया।

ईश्वर उस भेंट से बहुत प्रसन्न हुए और मधुमक्खी से बोले कि वह जो चाहे इच्छा करे, उसे पूरा किया जाएगा।

मधुमक्खी यह सुनकर बहुत प्रसन्न हुई और बोली- ”हे सर्वशक्तिमान ईश्वर, यदि आप सचमुच मुझसे प्रसन्न हैं तो मुझे यह वरदान दें कि मैं जिसे भी डंक मारूं, वह दर्द से तड़प उठे।

ईश्वर यह सुनकर बहुत क्रोधित हुए- ”क्या इसके अतिरिक्त तुम्हारी अन्य कोई इच्छा नहीं है। ठीक है, मैंने वादा किया है कि तुम्हारी इच्छा पूरी करूंगा, परंतु एक शर्त है।

मधुमक्खी से ईश्वर ने फिर कहा- वह यह कि तुम जिसे डंक मारोगी उसे तो बहुत दर्द होगा, परंतु तुम भी तुरंत मर जाओगी।"

दूसरे ही क्षण ईश्वर वहां से चले गए।

शिक्षा/Moral:-जो दूसरों का बुरा चाहते हैं, उनका भी बुरा ही होता है।



हिरन का बच्चा और बारहसिंघा


एक दिन एक हिरन का बच्चा तथा एक बारहसिंगा दोनों किसी जंगल में एक साथ चर रहे थे। अचानक शिकारी कुत्तों का एक झुंड उनसे कुछ दूरी पर गुजरा।

बारहसिंगा तुरंत झाडि़यों के पीछे छिप गया और हिरन के बच्चे से भी ऐसा ही करने लिए कहा। जब शिकारी कुत्ते चले गए तो....

हिरन के बच्चे ने बहुत भोलेपन से कहा- ”चाचा, आखिर तुम इनसे इतने भयभीत क्यों थे?

अगर तुम उनसे लड़ने भी लगो तो तुम्हारे पराजित हो जाने की संभावनाएं बहुत कम हैं। ईश्वर की दया से तुम्हारे सींग नुकील हैं। तुम्हारे लम्बे-लम्बे पैर हैं।

चाहो तो दौड़ में उन्हें पछाड़ सकते हो। तुम्हारा शरीर भी कई गुना बड़ा है। फिर भी तुम इतने भयभीत हो।“

बारहसिंगे ने हिरन के बच्चे की बात ध्यान से सुनी और बोला- ”देखो लड़के, जो तुम कह रहे हो, वह बिल्कुल सच है। मैं भी ऐसा ही सोचता हूं,

बारहसिंगा ने फिर कहा- मगर सत्य तो यह है कि हममें से जब भी कोई इन शिकारी कुत्तों के चुगंल में फंसा है, वह कभी जीवित नहीं बचा है।

यही वह भय है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी चला आया है। पीढि़यों पुराना यह भय हमारी नसों में भर गया है, हमारी प्रतिक्रियाओं में प्रतिबिम्ब्ति होता है।

यही कारण है कि इन जंगली जानवरों के सामने आते ही हम होशियार हो जाते हैं और अपने बचाव का प्रयत्न करते हैं।"

शिक्षा/Moral:- कई बार हम शक्तिशाली होकर भी भयभीत रहते हैं, ऐसा आनुवंशिकता के कारण होता है।



गलती को स्वीकार करो


महात्मा गाँधी और खान अब्दुल गफ्फार खान एक ही जेल में कैद थे. यद्यपि देशी-विदेशी जेलर गाँधी जी का बहुत सम्मान करते थे, किन्तु गाँधी जी भी जेल के नियमो और अनुशासन का सख्ती से पालन करते थे. जेलर के आने पर गाँधी जी उनके सम्मान में उठकर खड़े हो जाते थे.

खान अब्दुल गफ्फार खान, जिन्हें सीमान्त गाँधी कहा जाता था, को गाँधी जी का यह तौर-तरीका नापसंद था. उनका कहना था की जो सरकार इस देश पर गलत ढंग से हुकूमत कर रही है, हम भला उसे और उसके संस्थाओ को मान्यता क्यों दे.

गाँधी जी का कहना था की हम जहाँ भी हो हमें वहां के अनुशासन का पालन करना चाहिए. एक दिन सीमान्त गाँधी ने महात्मा गाँधी पर सीधे आरोप लगाते हुए कहा की ‘आप जेलर’ का सम्मान इसलिए करते है क्योंकि वह आपको नियम से अधिक सुविधाएँ देता है. उदाहरण के लिए हम लोगो को तो हिन्दी या अंग्रेजी का अख़बार मिलता है, लेकिन आपको गुजराती पत्र-पत्रिकाएँ भी मिलती है. आप इसलिए जेलर के अहसानमंद हो गये है. दुसरे दिन से गाँधी जी ने केवल एक ही अख़बार लिया और शेष साहित्य लेने से इंकार कर दिया.

एक महीना बीत गया. गाँधी जी जेलर के प्रति वही सम्मान प्रदर्शित करते रहे जो वे पहले किया करते थे. यह तौर-तरीका भला सीमांत गाँधी की नजर से कैसे चूक सकता था. उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ, वे गाँधी जी के पास जाकर माफ़ी मांगने लगे. गाँधी जी ने हंसकर उन्हें गले लगा लिया. दुसरे दिन से सीमांत गाँधी के तेवर भी बदल गये और वे भी जेलर के आगमन पर उसके सम्मान में उठकर खड़े होने लगे.

शिक्षा/Story:- दोस्तों यह कहानी हमें यह बताती है कि व्यक्ति को अपनी गलती स्वीकार करने में कभी भी नहीं हिचकिचाना चाहिए और हर किसी का सम्मान करना चाहिए. हमें महात्मा गाँधी जी के जीवन से यह जरुर सीख लेनी चाहिए की हमें हर व्यक्ति का सम्मान करना चाहिए भले वह इंसान हमारा सम्बन्धी हो या नहीं।



आलस्य का त्याग करें


एक बड़े शहर में एक घर में तीन भाई रहते थे. यूँ तो तीनो साथ रहते थे, लेकिन तीनो को एक – दूसरे के सुख-दुःख से कोई लेना-देना नहीं था. तीनो अपनी ही दुनिया में खोये रहते थे, उन्हें किसी और की परवाह नहीं थी. अचानक एक दिन आधी रात को छोटे भाई का बच्चा जग गया और जोर-जोर से रोने लगा. उसने सिर में बहुत तेज दर्द होने की शिकायत की.

रात काफी हो जाने के कारण दवा की सारी दुकाने बंद हो चुकी थी. घर में भी कोई दवा नहीं थी. उस बच्चे के माता-पिता दोनों ने अपने तरीके से उसे खूब बहलाने और चुप कराने का प्रयास किया पर उनका यह सारा प्रयास बेकार गया. वह अभी भी रोने में लगा था. सभी भाई बच्चे की आवाज सुनकर उठ गये लेकिन कोई भी उसकी मदद के लिए आगे नहीं आया.

तीनो भाइयो के घर के सामने एक झोपड़ी थी. उसमे एक अधेड़ उम्र की महिला थकी – मंदी सो रही थी. अचानक उसे बच्चे की रोने की आवाज सुनाई दी. परन्तु उसे भी आँखे खोलनी की इच्छा नहीं हो रही थी, लेकिन उसने सोचा अगर बच्चे को दर्द से राहत मिल जाती है तो सभी लोग चैन से सो सकेंगे. उसने तुरंत आलस्य त्याग कर बच्चे की माँ को आवाज लगाई – ठण्ड लगने के कारण बच्चा रो रहा है. यह ले जाओ काढ़ा. इसे पीते ही उसे सिर दर्द से आराम मिल जायेगा.

बुढ़िया की आवाज सुनकर बच्चे की माँ उस बुढ़िया के पास गई और झिझकते हुए वहां से काढ़ा ले गई और अपने बच्चे को पिला दिया. काढ़ा पीने के कुछ ही पलों बाद बच्चे को दर्द से राहत मिल गई और बच्चे के साथ – साथ सभी लोग चैन से सो गये.

शिक्षा/Moral:- इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है कि आलस्य त्यागकर ही किसी दूसरे की मदद की जा सकती है. यह ज़िन्दगी बहुत छोटी है हमें इसे आलस्य में नहीं गुजारना चाहिए बल्कि इस जीवन का सदुपयोग करना चाहिए साथ ही हमें परोपकार के गुण को भूलना नहीं चाहिए जब कभी भी परोपकार करने का मौका मिले तो हमें खुद से जो भी सहायता हो सके वह करनी चाहिए।

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