Top 10 Best Moral Stories In Hindi | 2021

इस Blog में आपको 10 Moral Stories In Hindi में पढ़ने को मिलेंगी जो आपने अपने दादा दादी से सुनी होंगी। ये hindi stories बहुत ही प्रेरक है। ऐसे  किस्से तो आपने अपने बचपन मे बहुत सुने होंगे पर ये किस्से कुछ अलग हौ। हमने भी इस ब्लॉग में 10 Moral Stories In Hindi में लिखा है जिसको पढ़कर आपको बहुत ही ज्यादा आनंद मिलेगा और आपका मनोरंजन भी होगा। इसमे कुछ 10 Moral Stories In Hindi दी गयी है। जिसमे आपको नयापन अनुभव होगा। यदि आप पुरानी कहानियाँ पढ़कर बोर हो गए है तो यहाँ पर हम आपको 10 Moral Stories In Hindi दे रहे है जिसको पढ़कर आपको बहुत ही ज्यादा मज़ा आने वाला है।


Top 10 Best Moral Stories In Hindi
Top 10 Best Moral Stories In Hindi 


उन्मत्त हाथी को सिखाया सबक | Moral Stories In Hindi


एक बार की बात है, घने जंगल में एक उन्मत्त हाथी ने भारी उत्पात मचा रखा था। वह अपनी ताकत के नशे में चूर होने के कारण किसी को कुछ नहीं समझता था।

एक पेड़ पर एक चिड़िया व चिड़े का छोटा-सा सुखी संसार था। चिड़िया अंडों पर बैठी नन्हे-नन्हे प्यारे बच्चों के निकलने के सुनहरे सपने देखती रहती। एक दिन क्रूर हाथी गरजता, चिंघाड़ता पेडों को तोड़ता-मरोड़ता उसी ओर आया। देखते ही देखते उसने चिड़िया के घोंसले वाला पेड़ भी तोड़ डाला। घोंसला नीचे आ गिरा। अंडे टूट गए और ऊपर से हाथी का पैर उस पर पड़ा।

चिड़िया और चिड़ा चीखने-चिल्लाने के सिवा और कुछ न कर सके। हाथी के जाने के बाद चिड़िया छाती पीट-पीटकर रोने लगी। तभी वहां कठफोड़वी आई। वह चिड़िया की अच्छी मित्र थी। कठफोड़वी ने उनके रोने का कारण पूछा तो चिड़िया ने अपनी सारी कहानी कह डाली। कठफोड़वी बोली- 'इस प्रकार गम में डूबे रहने से कुछ नहीं होगा। उस हाथी को सबक सिखाने के लिए हमें कुछ करना होगा।'

चिड़िया ने निराशा दिखाई- 'हम छोटे-मोटे जीव उस बलशाली हाथी से कैसे टक्कर ले सकते हैं?'

कठफोड़वी ने समझाया- 'एक और एक मिलकर ग्यारह बनते हैं। हम अपनी शक्तियां जोड़ेंगे।

'कैसे?' चिड़िया ने पूछा।

'मेरा एक मित्र भंवरा हैं। हमें उससे सलाह लेना चाहिए।'

चिड़िया और कठफोड़वी भंवरे से मिली। भंवरा गुनगुनाया- 'यह तो बहुत बुरा हुआ। मेरा एक मेंढक मित्र हैं आओ, उससे सहायता मांगे।'

अब तीनों उस सरोवर के किनारे पहुंचे, जहां वह मेंढक रहता था। भंवरे ने सारी समस्या बताई। मेंढक भर्राए स्वर में बोला- 'आप लोग धैर्य से जरा यहीं मेरी प्रतीक्षा करें। मैं गहरे पाने में बैठकर सोचता हूं।'

ऐसा कहकर मेंढक जल में कूद गया। आधे घंटे बाद वह पानी से बाहर आया तो उसकी आंखें चमक रही थी। >

वह बोला- 'दोस्तों! उस हत्यारे हाथी को नष्ट करने की मेरे दिमाग में एक बडी अच्छी योजना आई हैं। उसमें सभी का योगदान होगा।'

मेंढक ने जैसे ही अपनी योजना बताई, सब खुशी से उछल पड़े। योजना सचमुच ही अदभुत थी। मेंढक ने दोबारा बारी-बारी सबको अपना-अपना रोल समझाया।

कुछ ही दूर वह उन्मत्त हाथी तोड़-फोड़ मचाकर व पेट भरकर कोंपलों वाली शाखाएं खाकर मस्ती में खड़ा झूम रहा था। पहला काम भंवरे का था। वह हाथी के कानों के पास जाकर मधुर राग गुंजाने लगा। राग सुनकर हाथी मस्त होकर आंखें बंद करके झूमने लगा।

तभी कठफोड़वी ने अपना काम कर दिखाया। वह आई और अपनी सुई जैसी नुकीली चोंच से उसने तेजी से हाथी की दोनों आंखें बींध डाली। हाथी की आंखें फूट गईं। वह तडपता हुआ अंधा होकर इधर-उधर भागने लगा।

जैसे-जैसे समय बीतता जा रहा था, हाथी का क्रोध बढ़ता जा रहा था। आंखों से नजर न आने के कारण ठोकरों और टक्करों से शरीर जख्मी होता जा रहा था। जख्म उसे और चिल्लाने पर मजबूर कर रहे थे।

चिड़िया कृतज्ञ स्वर में मेंढक से बोली- 'भैया, मैं आजीवन तुम्हारी आभारी रहूंगी। तुमने मेरी इतनी सहायता कर दी।'

मेढक ने कहा- 'आभार मानने की जरूरत नहीं। मित्र ही मित्रों के काम आते हैं।'

एक तो आंखों में जलन और ऊपर से चिल्लाते-चिंघाडते हाथी का गला सूख गया। उसे तेज प्यास लगने लगी। अब उसे एक ही चीज की तलाश थी, पानी।

मेंढक ने अपने बहुत से बंधु-बांधवों को इकट्ठा किया और उन्हें ले जाकर दूर बहुत बड़े गड्ढे के किनारे बैठकर टर्राने के लिए कहा। सारे मेंढक टर्राने लगे।

मेंढक की टर्राहट सुनकर हाथी के कान खड़े हो गए। वह यह जानता था कि मेंढक जल स्त्रोत के निकट ही वास करते हैं। वह उसी दिशा में चल पड़ा।

टर्राहट और तेज होती जा रही थी। प्यासा हाथी और तेज भागने लगा।

जैसे ही हाथी गड्ढे के निकट पहुंचा, मेढकों ने पूरा जोर लगाकर टर्राना शुरू किया। हाथी आगे बढ़ा और विशाल पत्थर की तरह गड्ढे में गिर पड़ा, जहां उसके प्राण पखेरू उड़ते देर न लगी। इस प्रकार उस अहंकार में डूबे हाथी का अंत हुआ।


बुरे वक्त की जमा पूँजी | Moral Stories In Hindi


एक किसान था। इस बार वह फसल कम होने की व‍जह से चिंतित था। घर में राशन ग्यारह महीने चल सके उतना ही था। बाकी एक महीने का राशन का कहां से इंतजाम होगा। यह चिंता उसे बार-बार सता रही थी।

किसान की बहू का ध्यान जब इस ओर गया तो उसने पूछा ?

पिताजी आजकल आप किसी बात को लेकर चिंतित नजर आ रहे हैं। तब किसान ने अपनी चिंता का कारण बहू को बताया।

किसान की बात सुनकर बहू ने उन्हें आश्वासन दिया कि वह किसी बात की चिंता न करें। उस एक महीने के‍ लिए भी अनाज का इंतजाम हो जाएगा।

जब पूरा वर्ष उनका आराम से निकल गया तब किसान ने पूछा कि आखिर ऐसा कैसे हुआ?

बहू ने कहा- पिताजी जब से आपने मुझे राशन के बारे में बताया तभी से मैं जब भी रसोई के लिए अनाज निकालती उसी में से एक-दो मुट्‍ठी हर रोज वापस कोठी में डाल देती। बस उसी की वजह से बारहवें महीने का इंतजाम हो गया।


गुलशन | Moral Stories In Hindi


उसका नाम था गुलशन। छोटी-सी प्यारी-सी गुड़िया। उम्र कोई 10-11 साल। जैसे गुलशन में फूल महकते हैं और अपनी आभा बिखेरते हैं, वह भी अपने नाम के अनुरूप, अपने गुणों, अपनी योग्यता और अपनी वाणी से अपने घर और आसपास के वातावरण को महकाती रहती थी। उसके अब्बू रहीम खान के प्राण तो जैसे उसी में बसते थे।

गुलशन को खरोंच भी लग जाती तो रहीम खान दर्द से बिलबिला उठते थे। गुलशन पढ़ने- लिखने में तो कुशाग्र बुद्धि थी ही, खेलकूद में भी उतनी ही माहिर थी। अपनी कक्षा में पढ़ाई में प्रथम आती तो खेलकूद विशेषकर दौड़ में वह अपनी श्रेणी के विद्यार्थियों में अक्सर अव्वल‌ आती। दौड़ना उसका प्रिय खेल था। 100 मीटर, 200 मीटर और 500 मीटर की दौड़ में अपने आयु वर्ग के बच्चों में वह हमेशा बाजी मारती थी।

मजे की बात यह थी कि जब वह मैदान‌ में दौड़ती तो उसके अब्बू भी मैदान के बाहर उसके साथ-साथ समानांतर दौड़ते और चिल्लाते जाते 'गुलशन दौड़ो, गुल‌शन दौड़ो'।

मैदान के बाहर अपने अब्बू को अपने साथ दौड़ते हूए देखकर गुलशन का उत्साह जोर मारने लगता और वह सभी प्रतिभागियों को पीछे छोड़कर प्रथम आ जाती थी। अब्बू को भी अपार आनंद मिलता। वह बेटी को हृदय से लगा लेते। उनकी आंखों से आंसुओं की धार बहने लगती।

गुलशन जानती थी कि जितनी तेज वह मैदान में दौड़ती है, उसी गति से अब्बू भी मैदान के बाहर दौड़ते होंगे तभी तो साथ-साथ दौड़ते दिखते हैं। वह कहती, 'अब्बू मत दौड़ा करो इतनी तेज‌, आप थक जाएंगे', परंतु अब्बू को कहां मानना था, 'कहते मैं दौड़ता हूं तभी तो तू दौड़ पाती है।' गुलशन हंस‌ देती।

गुलशन के पड़ोस में मोहन रहता था मोहनलाल गोड़बोले। सीधा-सादा सलोना-सा लड़का, परंतु भगवान ने न जाने किस अपराध का उसे दंड दिया था कि वह एक‌ पैर से विकलांग था। बड़ी मुश्किल से चल पाता था, वह भी बैसाखी के सहारे। गुलशन को उस पर बहुत दया आती थी। उसके वश में होता तो उसका पैर पलभर में ठीक कर देती, परंतु न तो वह डॉक्टर थी, न ही उसके पास इतना पैसा था कि उसकी सहायता कर सके।

मोहन कहता कि बड़ा होकर मैं भी गुलशन के समान दौड़ में शामिल होऊंगा और प्रथम आऊंगा। गुल‌शन उसका हौसला बढ़ाती।


कहने लगा- 'दीदी, आज मैं भी आपके साथ दौड़ने चलूंगा। मुझे भी ले चलो।'

घर से निकलते ही मोहन का यह व्यवधान गुलशन को न जाने क्यों अच्छा नहीं लगा।

'जा-जा लंगड़े, तू मेरे साथ क्या दौड़ेगा?' गुलशन ने उसे झिड़क दिया और आगे बढ़ गई।

अब्बू तो पहले ही आगे जा चुके थे। मोहन अवाक् रह गया था। गुलशन से उसे ऐसी उम्मीद बिलकुल नहीं थी।

गुलशन अपने ट्रैक में बिलकुल तैयार खड़ी थी। अब्बू हमेशा की तरह मैदान के बाहर सीमा पर दौड़ने को तैयार थे। जैसे ही सीटी बजी, गुलशन दौड़ पड़ी। उधर रहीम खान भी दौड़े, उसी पुरानी 'गुलशन दौड़ो' की आवाज के साथ। 500 मीटर की दौड़ थी।

गुलशन बहुत तेज दौड़ रही थी। तेज और, तेज और। अब्बू उसकी बराबरी से उसके साथ- साथ दौड़ रहे थे। दोनों एक-दूसरे की प्रेरणा थे, एक-दूसरे का उत्साह थे और एक-दूसरे का विश्वास थे।

अचानक ऐसा लगा, जैसे गुलशन के पैरों में ब्रेक लगने लगे हों। जैसे रेलगाड़ी धीरे-धीरे चूं चूं चें चें की आवाज के साथ रुक जाती है, गुलशन भी रुकने लगी। अरे-अरे? यह क्या हो रहा है? वह मन ही मन बुदबुदाई। अरे-अरेयह क्या? उसके पैरों ने बिलकुल ही जवाब दे दिया और आगे बढ़ने से पूरी तरह से इंकार कर दिया। वह वहीं खड़ी रह गई।

अब्बू चिल्ला रहे थे, 'गुलशन दौड़ो, गुलशन दौड़ो'। आगे बढ़ते हुए वे भी वहीं रुक गए। 'क्या हुआ गुलशन?' वे जोरों से चिल्लाए।

'अब्बू मेरे पैर आगे नहीं बढ़ रहे हैं, अब्बू मैं पराजित हो गई', वह जोर से चीख उठी।

एक-एक करके सभी प्रतिभागी उससे आगे निकल गए।

'या अल्लाह, यह क्या हुआ? मेरे पैर आगे क्यों नहीं बढ़ रहे', वह वहीं खड़े होकर रोने लगी। पैर तो जैसे किसी ने जंजीर से बांध दिए थे।

उसकी आंखों में मोहनलाल गोड़बोले का चेहरा घूम गया। 'जा-जा लंगड़े, तू मेरे साथ क्या दौड़ेगा?' उसके स्वयं के शब्द कानों में बैंड-बाजों की तरह बजने लगे। तो क्या मोहन की बद दुआओं का असर? नहीं-नहीं ऐसा नहीं हो सकता। फिर क्या हुआ? उसका सिर चकराने लगा।

मोहन की परवशता पर वह कभी नहीं हंसी, उसे सदा प्रोत्साहित किया, पर उस दिन? 'दीदी मैं भी आपके साथ दौड़ने चलूंगा' यही तो कहा था बेचारे ने। और उसने कैसा घुड़क दिया था, 'नहीं-नहीं'।

उसकी आत्मा चीख उठी। करनी का फल ही उसे मिला था। निरंतर प्रथम आने वाली वह संपूर्ण दौड़ भी नहीं दौड़ सकी।

'निर्बल‌ को न सताइए, जाकी जाकि मोटी हाय' उसे किसी कवि की पंक्तियां स्मरण‌ हो आईं।

'अब कभी भी अपंग-लाचार को ठेस नहीं पहुंचाऊंगी' यह सोचते-सोचते वह मैदान से बाहर आ गई और अपने अब्बू से लिपटकर‌ रो पड़ी।


मगरमच्छ का विवाह | Moral Stories In Hindi


बहुत पहले की बात है .एक गुफा में एक मगरमच्छ और एक कछुआ रहा करते थे. एक दिन मगरमच्छ बोला- ‘चलो भाई कछुए, आज मछलियाँ पकड़ने का जी कर रहा है.’

कछुए ने बाहर झांका और बोला- “हाँ, बात तो ठीक है, चलो चलें. दिन भी बढिया हैं.”

मगरमच्छ बोला- “तब चलो, उसी गंजे आदमी के तालाब में चलें. उसके तालाब में बढिया-बढिया मछलियाँ हैं .”

कछुआ बोला – “न बाबा न, वह बहुत क्रूर है. कहीं उसने पकड़ लिया तो कचूमर निकाल देगा.”

मगरमच्छ झूठ बोला – “अरे नहीं, वह तो मेरा मित्र है. उस दिन भी मुझसे कह रहा था कि उसके तालाब में इतनी मछलियाँ हैं जिन्हें बेचारा खा ही नहीं सकता. वह तो मछलियाँ खाने में हमारी सहायता चाहता है.”

कछुआ मान गया, बोला, ‘अगर ऐसी बात है तो चलो, वहीं चलें.’

अब दोनों साथ होकर उसे गंजे आदमी के तालाब की ओर गए और तालाब में घुसकर मछलियाँ पकड़-पकड़कर खाने लगे. वहाँ मछलियाँ इतनी अधिक और इतनी बड़ी-बड़ी थीं कि मगरमच्छ खूब खुश हुआ और किलकारियाँ मार-मारकर पानी में नाचने लगा.

कछुए ने मना किया, बोला- ‘चुप रहो, तुम तो अपने शोर से सारी मछलियाँ भी भगा दोगे.’

लेकिन मगरमच्छ कहां मानने वाला था, बोला – “अरे,घबराओ मत, यहाँ तो इतनी मछलियाँ हैं कि चाहे जितना शोर कर लो, कहीं जाने की नहीं.’ और फिर पानी में वह उछल-कूद मचाने लगा.

इस शोर को उस तालाब के मालिक ने भी सुन लिया. उसने सोचा, कोई मेरी मछलियाँ पकड़ रहा है. चलकर उसकी मरम्मत करनी चाहिए.

यह सोचकर वह आया और छिपकर देखने लगा. इतने में कछुआ, मगरमच्छ दोनों ने एक-एक बड़ी मछली पकड़ी और पानी के बाहर किनारे पर ले आए. वह गंजा आदमी उनके पीछे दौड़ा. मगरमच्छ तो आगे निकल गया, पर बेचारा कछुआ पीछे रह गया और पकड़ा गया. उस आदमी ने एक मजबूत रस्सी लेकर कछुए को बाँधा और घर ले जाकर नीचे ही एक खंभे के साथ बाँध दिया.

जाते हुए वह आदमी कहता गया- “बच्चू आज रात तो तुम यहीं आराम करो, कल तुम्हारा भोजन बनाऊंगा.”

धीरे-धीरे मगरमच्छ भी वहाँ पहुँचा और कछुए को बंधा देखकर हँस पड़ा. बोला – “कहो भाई, कैसी बीत रही है? इतने मोटे रस्से को क्यों थामे हुए हो ?”

कछुए ने उत्तर दिया –“ मैं उस गंजे आदमी का कैदी हूँ.”

मगरमच्छ हँसकर बोला- “अच्छा वह तो देख रहा हूँ, लेकिन तुमसे ऐसी क्या गलती हो गई जो तुम्हें कैदी बनाया गया है?”

कछुआ बोला- “इस आदमी के एक सुंदर बेटी है. वह मेरा विवाह उससे करना चाहता है. जब एक उसकी बात न मानूँ, वह मुझे छोड़ेगा नहीं.”

बेचारे मगरमच्छ के मुँह में पानी भर आया उसने कई बार प्रयत्न किया था कि उसका विवाह हो जाए, लेकिन उसे देखते ही सब लडकियाँ भाग जाती थीं.

विवाह के लालच में वह यह भी भूल गया कि उसी के झूठ बोलने के कारण तो कछुए को कैदी बनना पड़ा है. बोला- “भाई कछुए, तुम तो जानते ही हो कि मैं कब से विवाह के लिए इच्छुक हूँ. क्यों नहीं मेरा विवाह उस लड़की से करवा देते?”

कछुआ मन-ही-मन अपनी चालाकी पर खुश हुआ और बोला- “अरे तो इसमें क्या कठिनाई है? तुम मेरी रस्सी खोल दो, मैं इसे तुम्हारी कमर में अभी बाँध दूंगा. तुम शोर शुरू कर देना. कहना- “मैं अभी विवाह कर लूँगा, मैं अभी उससे विवाह कर लूँगा. वह आदमी आ जाएगा और विवाह करवा देगा.”

मगरमच्छ ने वैसा ही किया. बंध जाने पर उसने शोर करना शुरू कर दिया. वह बार-बार इसी बात को दुहराने लगा –“मैं अभी उससे विवाह कर लूँगा.”

जब गंजे आदमी ने शोर सुना तब खूंटी पर से अपनी तलवार ले आया. जब उसने देखा कि कछुए के स्थान पर एक भारी मगरमच्छ बंधा हुआ है तब वह आश्चर्यचकित रह गया, लेकिन, थोड़ी देर में ही उसका आश्चर्य प्रसन्नता में बदल गया. वह खुश होकर बोला- “वाह, मजा आ गया! बहुत दिन हो गए हैं मुझे मगरमच्छ खाए. मगरमच्छ को फौरन ही पकाया जाए. भगवान ने घर बैठे मेरे मन की बात जान ली.”

इधर मगरमच्छ शोर किए जा रहा था- “मैं अभी विवाह कर लूँगा” —- इससे पूर्व कि वह गंजा आदमी तलवार का वार करता, मगरमच्छ ने दूर से आते हुए कछुए का स्वर सुना. कछुआ कह रहा था- “अपने मित्र से झूठ बोलने का यही फल मिलना चाहिए.”


बन्दरो की कहानी | Moral Stories In Hindi


बहुत समय पहले चन्द्रकान्त नाम का एक राजा था। राजा के बेटों को बन्दरों के साथ खेलना बहुत अच्छा लगता था। पास के जंगलों से राजमहल में बन्दर आ जाते थे और राजकुमार बहुत अच्छी अच्छी चीजें उन बन्दरों को खाने के लिए दिया करते थे। इस तरह से बन्दरों को भी रोज राजमहल में जाना बहुत अच्छा लगता था। सारे बन्दर खा खा कर खूब मोटे हो गए थे। बन्दरों के झुंड का सरदार सबसे बूढ़ा बन्दर था जो कि बहुत बुद्धिमान था।

राजमहल में भेड़ों का एक तबेला भी था। राजकुमार तथा राजमहल में रहने वाले बाकी बच्चे भेड़ों के साथ भी खेलते थे। बच्चे भेड़ों के ऊपर चढ़ जाते और उनकी सवारी करते। भेड़ों का झुंड बहुत पेटू और खाऊ था, भेडों को जब भी मौका मिलता वो रसोईघर में घुस जातीं और वहाँ रखी चीजें लपालप खाने लगतीं। रसोइये भेड़ों से तंग आ कर कोई भी चीज फेंक कर मार देते थे। कभी चिमटा कभी बेलन या कोई लकड़ी वगैरह रसोइये भेड़ों को भगाने के लिए फेंक कर मार देते थे।

भेड़ों और रसोईयों के बीच की लड़ाई देखकर बन्दरों के सरदार के मन में विचार आया कि इस लड़ाई से बन्दरों को भी कभी न कभी नुकसान पहुंच सकता है। हो सकता है कि कभी कोई रसोइया जलती हुई लकड़ी किसी भेड़ को फेंक कर मारे और भेड़ के बड़े बड़े बालों में इससे आग लग जाए, आग लगने पर भेड़ भागती हुई यदि घुड़साल में पहुंच गई तो घुड़साल में भी आग लग जाएगी और कुछ घोड़े भी जल सकते हैं, जलने के कारण राजा के घोड़ों को छाले भी पड़ सकते हैं। फिर बन्दर को याद आया कि बड़े बड़े वैद्यों ने बताया है कि घोड़ो के बदन पर जलने से जो छाले पड़ते हैं उनका इलाज बंदरों की चर्बी से किया जाता है। बन्दर की चर्बी घोड़े के छालों पर मलने से छाले ठीक हो जाते हैं और दर्द भी दूर हो जाता है। बन्दर ने सोचा कि अपने इतने अच्छे घोड़ों के इलाज के लिए राजा सब बन्दरों को मरवा कर उनकी चर्बी निकलवा लेगा क्योंकि घोड़ों की तुलना में बन्दरों की कीमत तो कुछ भी नहीं है।

बूढ़े बन्दर को लग रहा था कि ऐसा कभी न कभी जरूर हो सकता है, सभी बन्दरों की रक्षा करना मेरा कर्तव्य है। यह सोच कर बूढ़े बन्दर ने सभी बन्दरों को एक जगह पर इकठ्ठा किया और बताया कि – “देखो तुम खाने के लालच में महल में जाते हो लेकिन इस समय भेड़ों और रसोईयों के बीच हालात ठीक नहीं हैं। मेरी समझ से यह बहुत खतरनाक स्थिति है। हमें लड़ाई झगड़ो से दूर रहना चाहिए। इसलिये मैंने यह फैसला किया है कि अब हम में से कोई भी राजमहल में नही जाएगा।” यह सुनकर सारे बन्दर हंसने लगे और बूढ़े बन्दर से बोले – “दादाजी लगता है कि उम्र ज्यादा होने के कारण आपका दिमाग़ भी अब बूढ़ा होता जा रहा है इसलिए आप ऐसी बेकार की बातें कर रहे हैं। हम आपकी बात मान कर जंगल में क्यों जाएं। जंगल में हमें फीके, खट्टे और कड़वे फल खा कर गुजारा करना पड़ेगा जबकि यहाँ पर राजकुमार हमें इतनी अच्छी अच्छी चीजें खाने को देते हैं।”

ये बातें सुन कर बूढ़े बन्दर की आँखों में आँसू आ गए। उसने कहा – “अरे मूर्खों तुम समझ नहीं पा रहे हो। तुम्हारी ये राजमहल की दावत ज्यादा दिन नही चलने वाली, ये अच्छे अच्छे खाने ही तुम्हारी जान के दुश्मन बन जाएंगे। मैं अपनी आँखों के आगे ये सब होते हुए नही देख सकता। जो बन्दर मेरे साथ आना चाहे वो जंगल में चल सकता है।” लेकिन किसी भी बन्दर ने बूढ़े बन्दर की बात नहीं मानी। बूढ़ा बन्दर अकेला ही जंगल चला गया।

थोड़े दिनों के बाद वही बात हुई जिसका बूढ़े बन्दर को डर था। एक भेड़ राजमहल के रसोई घर में घुस गई और राजा के लिए बनाए गए स्वादिष्ट पकवान खाने लगी। रसोइये ने जैसे ही भेड़ को देखा उसे बहुत तेज गुस्सा आ गया और गुस्से में उसने चूल्हे में से एक जलती हुई लकड़ी निकाली और भेड़ की पीठ पर दे मारी। भेड़ की ऊन ने तुरंत आग पकड़ ली। भेड़ दर्द और घबराहट में इधर उधर दौड़ते हुए घोड़ों के तबेले में पहुँच गई और वहाँ पड़े घास फूस में भी आग लग गई। देखते ही देखते आग पूरे तबेले में फैल गई। कुछ घोड़े आग में जल कर मर गए। राजमहल के कर्मचारियों ने बड़ी मुश्किल से काफी सारे घोड़ों को जलने से बचा लिया लेकिन उनमें से कई घोड़े बुरी तरह घायल थे, जलने से उनके शरीर पर जगह जगह छाले पड़ गए और घाव हो गए थे।

राजा अपने घोड़ों को इस हालत में देखकर बहुत दुःखी हुआ, उसने अपने पशु चिकित्सक को आदेश दिया कि किसी भी तरह घोड़ों को जल्द से जल्द ठीक किया जाए। पशु चिकित्सक ने राजा को बताया कि महाराज यदि बन्दरों की चर्बी घोड़ों के घाव पर लगाई जाए तो घोड़े बहुत तेजी से ठीक हो जाएंगे। राजा ने तुरंत सैनिकों को बन्दरों को मार कर उनकी चर्बी निकालने का आदेश दे दिया। सैनिकों ने चारों ओर जाल बिछा कर बीच में ताजे मीठे फल और कुछ स्वादिष्ट पकवान रख दिये। इतने सारे स्वादिष्ट फल और पकवान देख कर बन्दरों के मुँह में पानी आगया और वो एकदम उन्हें खाने के लिए टूट पड़े। तभी सैनिकों ने जाल खींच दिया और सारे बन्दर उसमें फंस गए। फिर उन बन्दरों को मार डाला गया और उनकी चर्बी घोड़ों के इलाज के लिए निकाल ली गई।

बूढ़े बन्दर को जब यह बात पता लगी तो वो यह दुःख बर्दाश्त नहीं कर पाया और सदमें में चल गया, कुछ ही दिनों में उसने भी प्राण त्याग दिये।


चिड़िया का साहस | Moral Stories In Hindi


बच्चों ये एक चिड़िया की कहानी है जिसने अपने सहस और बुद्धिमानी से छोटे बड़े सब जानवरों और पक्षियों को इकठ्ठा कर एक भयंकर दुविधा का सामना किया।

एक बड़े से घने जंगल में आग लग गयी तो सभी जानवर भागने लगे। पूरे जंगल में हरबड़ी सी मच गयी। सब अपनी जान बचा जंगल छोड़ भागने लगे।

तभी एक नन्ही से चिड़िया ने यह सब देखा तो हैरान रह गयी कि आग तो कोई बुझा नहीं रहा बस सब भाग रहे हैं। वो फ़ौरन पास की नदी पर गयी और अपनी छोटी सी चोंच में पानी भर लायी और जलती आग पर फ़ेंक दिया। इसी तरह उसने ना जाने कितने चक्कर लगाए। बार बार वो जाती अपनी चोंच को पानी से भर्ती और आग पर फ़ेंक देती।

यह सब कुछ और जानवर भी देख रहे थे। वो सब चिड़िया पर हँस रहे थे और कह रहे थे

” चिड़िया रानी, तुम्हारे इस चोंच भर पानी से आग नहीं भुझेगी, तुम तो अपनी जान बचा भाग लो।”
तब चिड़िया ने जवाब दिया “अरे, भाग तो मैं भी सकती हूँ तुम डरपोक जानवरों की तरह, पर मैं तो आग बुझाने की कोशिश करती रहूँगी अपना जंगल बचाने के लिए।”

चिड़िया की बात सुन सब का सर शर्म से झुक गया। तब सब ने मिल कर भागते हुए और जानवरों और पक्षियों को रोक कर समझाया।

और फिर सब ने मिल कर नदी के पानी से जंगल में लगी आग पर काबू पा लिया।


दसवाँ प्रयास | Moral Stories In Hindi


कनु बार-बार ध्यान हटाने की कोशिश कर रही थी। नजर दीवार से हटाकर टेबल पर रखी किताब पर एकाग्र करने का प्रयास कर रही थी किंतु न जाने कौन-सी अज्ञात शक्ति उसे दीवार पर देखने को विवश कर देती थी। वह बार-बार वहीं देखने लगती। दीवार पर था क्या? एक घिनौनी-सी छिपकली एक निरीह पतंगे के शिकार को तत्पर।

पतंगा फुदर-फुदर उड़ता और दीवार पर बैठ जाता। घात लगाए बैठी छिपकली उस पर हमला करती किंतु इसके पहले कि वह पतंगे को मुंह में समेटे, वह झांसा देकर थोड़ी दूर जाकर उसी दीवार पर बैठ जाता। छिपकली अर्जुन के तीर की भांति फिर लपकती किंतु पतंगा बाजीगर-सा फिर झांसा दे जाता दे और उड़कर दीवार के दूसरे कोने में जा बैठता।

'अब तो गया काम से' कनु चीखी। बिलकुल छिपकली के मुंह का ग्रास बनने ही वाला था वह वीर बहादुर पतंगा। पलभर को लगा कि वह गया काल के गाल में, परंतु बच गया साला। उसे गब्बरसिंह का 'शोले' वाला डायलॉग याद आ गया। पतंगा फिर घिस्सा दे गया। बेचारी छिपकली! चार प्रयास बिलकुल बेकार गए। सफलता से बहुत दूर, परंतु आशा अभी भी बाकी थी। कितने भागोगे बेटे, छिपकली सोच रही थी।

वह भी तो प्रयास ही कर रही थी बरसों से, परंतु सफलता से कोसों दूर थी। जाया हर बार बाजी मार जाती थी। जाया और वह पहली कक्षा से ही साथ में पढ़ रही हैं। पक्की सहेलियां भी हैं। एक ही बेंच पर साथ में ही बैठती हैं और लंच भी साथ में ही लेती हैं व एक-दूसरे से शेयर करती हैं। किंतु प्रतिस्पर्धा की दीवार जो पहली कक्षा से खड़ी हुई, वह अब तक बरकरार है, यथावत है।

पढ़ाई में दोनों नेक-टू-नेक थीं, तो खेलकूद में भी पलड़ा बराबरी पर रहता। किंतु जब परीक्षा आती तो जाया बाजी मार ले जाती। जाया फर्स्ट आती तो कनु सेकंड। अंकों का अंतर बमुश्किल दो या तीन का होता।

चौथी कक्षा तक यही क्रम चला। जाया फर्स्ट कनु सेकंड। कनु बहुत कोशिश करती, पढ़ाई में दिन-रात एक कर देती किंतु जाया ने तो जैसे फर्स्ट आने के लिए ही धरती पर जन्म लिया था। चौथी के बाद तो वह लगभग निराशा के आगोश में ही चली गई थी।

पांचवीं की अंतिम परीक्षा में तो वह तीसरे क्रम पर खिसक गई थी। कहते हैं कि आशा से आसमान टंगा है, परंतु जब आशा ही टूट जाए तो आसमान भरभराकर गिरने लगता है।

एक बार पतंगा फिर बैठा थोड़ी दूर उलटी दिशा में। छिपकली ने पलटी मारी और निशाना साधने लगी। अबकी बार गांडीव से निकला तीर मछली की आंख फोड़कर ही रहेगा। जैसे कोई योगी दीपक की लौ को देख रहा हो एकटक, छिपकली की भी वही दशा थी।

कनु फिर अतीत में डूब गई। छठी कक्षा में वह भी इसी तरह ध्यानस्थ हुई थी। केवल पढ़ाई और पढ़ाई पर, किंतु श्रम का फल व्यर्थ भी होता है, यह उसने उस वक्त जाना था। जाया से पार पाना संभव नहीं हो सका था। कनु सेकंड ही आ सकी थी। आठवीं कक्षा में वह तीसरे क्रम पर आ गई थी। दूसरे क्रम पर नर्गिस थी। वह तीसरे क्रम पर उफ! उसने जोर से टेबल पर मुक्का मार दिया था और दर्द से बिलबिला उठी थी।

इधर दीवार पर पतंगा छिपकली के नौ हमले बचा चुका था। ये पतंगे भी कितने बेवकूफ होते हैं, वह बुदबुदाई। जब मालूम है कि छिपकली बार-बार हमला कर रही है तो क्यों उसी दीवार मरने के लिए फुदक रहा है। कहीं और क्यों नहीं चला जाता? मैं जब डॉक्टर बनूंगी तो जरूर पतंगों के मस्तिष्क पर शोध करूंगी। शिकारी के सामने बार-बार जाना जिसके हाथ में बंदूक हो, मूर्खता है कि नहीं? वह सोचने लगी। वो मारा! आखिरकार इस बार पतंगाजी छिपकली के शिकार बन ही गए। दसवें प्रयास में आखिर सफलता हाथ लग ही गई।'

वह बड़बड़ाई। तो क्या मैं टेंथ अटेंप्ट में सफल नहीं हो सकती। नौवीं कक्षा में उसके और जाया के बीच मात्र 1 अंक का फासला था, जाया को 480 और उसे 479 अंक मिले थे। छिपकली को टेंथ अटेंप्ट में सफलता मिल सकती है तो उसे? उसे क्यों नहीं?

उसे विवेकानंद याद आ गए- 'उठो और चल पड़ो और चलते रहो, जब तक कि मंजिल न मिल जाए।' और वह चल पड़ी थी। दसवीं कक्षा दसवां प्रयास! उसे प्रथम आना ही है। जाया को पीछे रहना ही होगा। अब तक आगे थी वह, पर अब नहीं, बिलकुल नहीं।

अब तो कनु का समय है। परिणाम आ रहा था कम्प्यूटर पर। टेंथ अटेंप्ट! दसवां प्रयास! छिपकली पतंगे को लील रही है, अर्जुन का तीर मछली की आंख में धंस गया है और कनु सचमुच जाया को पार कर चुकी थी। अपने विषय जीवशास्त्र में वह सर्वश्रेष्ठ घोषित हुई थी। शहर ही नहीं, सारे प्रांत में प्रथम थी वह।

प्रयास केवल प्रयास और विश्वास, वह जंग जीत गई थी। कनु घर आई और उस दीवार को जहां छिपकली ने पतंगे को लपका था, नमन किया और मुस्कराने लगी।


शेर का आसन | Moral Stories In Hindi


शेर जंगल का राजा होता है। वह अपने जंगल में सब को डरा कर रहता है। शेर भयंकर और बलशाली होता है। एक दिन शहर का राजा जंगल में घूमने गया। शेर ने देखा राजा हाथी पर आसन लगा कर बैठा है। शेर के मन में भी हाथी पर आसन लगाकर बैठने का उपाय सुझा। शेर ने जंगल के सभी जानवरों को बताया और आदेश दिया कि हाथी पर एक आसन लगाया जाए। बस क्या था झट से आसन लग गया। शेर उछलकर हाथी पर लगे आसन मैं जा बैठा। हाथी जैसे ही आगे की ओर चलता है , आसन हिल जाता है और शेर नीचे धड़ाम से गिर जाता है। शेर की टांग टूट गई शेर खड़ा होकर कहने लगा – ‘ पैदल चलना ही ठीक रहता है।'


राजा के सौ चेहरे | Moral Stories In Hindi


एक राजा, चला था लेने जायजा। अपनी प्रजा के बारे में हमेशा वह सोचता था, उन्हें कोई दुख न हो यह देखता था। रास्ते में वह मिला एक किसान से, जो चल रहा था धीरे-धीरे मारे थकान के।

राजा ने उससे पूछा 'तुम कितना कमाते हो, रोज कितना बचा पाते हो?'

किसान ने दिया उत्तर, 'हुजूर रोज चार आने भर!'

'इन सिक्कों में चल जाता है खर्च?' राजा हैरान थे इतनी कम कमाई पर।

'एक मेरे लिए, एक आभार के लिए, एक मैं लौटाता हूं और एक उधार पर लगाता हूं।'

राजा चकराया, पूरी बात ठीक तरह समझाने को सुझाया।

'एक भाग मैं अपने ऊपर लगाता हूं, एक भाग आभार के लिए यानी पत्नी को देता हूं यानी घर का सारा काम उसी के दम पर ही तो चलता है। एक मैं लौटाता हूं, इसका मतलब अपने बुजुर्ग माता-पिता के पैरों में चढ़ाता हूं जिन्होंने मुझे इस काबिल बनाया, रोजी-रोटी कमाना सिखाया। एक उधार पर लगाता हूं यानी अपने बच्चों पर खर्च कर डालता हूं, जिनमें मुझे मेरा भविष्य नजर आता है।'

'तुमने कितनी अच्छी पहेली बुझाई, मान गए भाई! पर इस उत्तर को रखना राज, जब तक कि मेरा चेहरा देख न लो सौ बार!'

किसान बोला- 'हां, मैं बिल्कुल इसे राज रखूंगा, आपका कहा करूंगा।'

उसी दिन शाम को राजा ने पहेली दरबारियों के सामने रखी, सुनकर उनकी सिट्टी-पिट्टी गुम हुई। राजा ने कहा यह एक किसान का जवाब है, तुम तो दरबारी हो तुम सबकी तो बुद्धि नायाब है। कोई जवाब नहीं दे सका, पर एक दरबारी ने हिम्मत जुटाकर कहा।

'महाराज अगर मुझे समय मिले 24 घंटे का, तो मैं जवाब ढूंढकर ला दूंगा आपकी पहेली का।'

दरबारी किसान को ढूंढ़ने निकल पड़ा, आखिर किसान उसे मिल ही गया खेत में खड़ा। पहले तो किसान ने किया इंकार, फिर मान गया देखकर थैली भर सिक्कों की चमकार। दरबारी लौट आया और दे दिया राजा को सही जवाब, राजा समझ गए कि तोड़ा है किसान ने उसका विश्वास।

राजा ने किसान को बुलवाया और भरोसा तोड़ने का कारण उगलवाया।

'याद करो मैंने क्या कहा था? मेरा चेहरा सौ बार देखे बिना नहीं देना जवाब, क्या तुम भूल गए जनाब?'

'नहीं-नहीं महाराज मैंने अपना वादा पूरी तरह से निभाया है, सौ सिक्कों पर आपका अंकित चेहरा देखकर ही जवाब बताया है।'

राजा को उसकी बात एक बार फिर से भाई, थैली भर मुहरें किसान ने फिर से पाई।


मुन्ना हाथी | Moral Stories In Hindi


मुन्ना हाथी का कारोबार सारे जंगल में फैला था। सारे पेड़-पौधों पर उसका एकछत्र अधिकार था। जहां भी उसकी तबीयत होती वहां जाकर पेड़ों की डालें तोड़ता, पत्ते चबाता और पेड़ हिला डालता। किसकी मजाल कि उसे रोके। जंगल में शेर ही उसकी बराबरी का जानवर था किंतु उसे पेड़-पौधों से क्या लेना-देना? उसे जानवरों के मांस से मतलब था।

मुन्ना खूब पत्ते खाता, घूमता और मौज करता। एक दिन जंगल के रास्ते से कारों का काफिला निकला। रंग-बिरंगी कारें देखकर मुन्ना का भी मूड हो गया कि वह भी कार में घूमे, हॉर्न बजाकर लोगों को सड़क से दूर हटाए और सर्र से कट मारकर आगे निकल जाए। दौड़कर वह टिल्लुमल के शोरूम में जा पहुंचा और टिल्लुमल से अच्छी-सी कार दिखाने को कहा। टिल्लु चकरा गया। अब हाथी के लायक कार कहां से लाए।

बोला- 'भैया तुम्हारे लायक कार कहां मिलेगी? इतनी बड़ी कार तो कोई कंपनी नहीं बनाती।'

परंतु मुन्नाभाई ने तो जैसे जिद ही पकड़ ली कि कार लेकर ही जाएंगे।

'अरे भाई, तुम्हारे लायक कार कंपनी को अलग से आदेश देकर बनवाना पड़ेगी', टिल्लुमल ने समझाना चाहा।

'तो बनवाओ, इसमें क्या परेशानी है?' मुन्ना झल्लाकर बोला।

'बहुत बड़ी कार बनेगी।'

'तो बनने दो, तुम्हें क्या कष्ट है', मुन्ना चीखा।

'जब कार चलेगी तो जंगल के बहुत से पेड़ काटना पड़ेंगे।'

'क्यों क्यों काटना पड़ेंगे पेड़?'

'कार इतनी बड़ी होगी तो पेड़ तो काटना ही पड़ेंगे मुन्ना भैया', टिल्लु ने समझाना चाहा।

'क्या पेड़ काटना ठीक होगा अपने जरा से शौक के लिए?'

'अरे टिल्लुमलजी, कार के लिए पेड़ काटना! अपनी मौज-मस्ती के लिए जंगल काटे, यह मुझे स्वीकार नहीं है। जंगल ही तो जीवन है, ऐसा कहकर वह जंगल वापस चला गया।

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