Top 05 Best Stories In Hindi Of 2021

10 Best Stories In Hindi Of 2021


इस Blog में आपको 10 Best Stories In Hindi Of 2021 में पढ़ने को मिलेंगी जो आपने अपने दादा दादी से सुनी होंगी। ये hindi stories बहुत ही प्रेरक है। ऐसे  किस्से तो आपने अपने बचपन मे बहुत सुने होंगे पर ये किस्से कुछ अलग हौ। हमने भी इस ब्लॉग में 10 Best Stories In Hindi Of 2021 में लिखा है जिसको पढ़कर आपको बहुत ही ज्यादा आनंद मिलेगा और आपका मनोरंजन भी होगा। इसमे कुछ 10 Best Stories In Hindi Of 2021 दी गयी है। जिसमे आपको नयापन अनुभव होगा। यदि आप पुरानी कहानियाँ पढ़कर बोर हो गए है तो यहाँ पर हम आपको 10 Best Stories In Hindi Of 2021 दे रहे है जिसको पढ़कर आपको बहुत ही ज्यादा मज़ा आने वाला है।


Top 05 Best Stories In Hindi Of 2021
Top 05 Best Stories In Hindi Of 2021



जैसी करनी वैसी भरनी


Best Stories In Hindi


जापान में ऐसी किंवदंती है कि एक समय एक स्थान पर दो भाई रहते थे। बड़े भाई की बहू कुछ तीखे स्वभाव की थी। इसलिए उनकी माता छोटे भाई के साथ रहा करती थी। छोटा भाई निर्धन था। उसके घर में खाना पीना भी पर्याप्त नहीं होता था। प्रायः छोटा भाई अपनी माता जी को बढ़िया भोजन की तो बात ही छोड़ो, साधारण अन्न भी नहीं दे पाता था। नए साल के प्रथम दिन उसके मन में चावल बनाकर खिलाने की तीव्र इच्छा हुई। ऐसे समय में मैं विवश हूं। बड़े भाई से उधार मांगने के सिवाय मेरे पास कोई साधन नहीं है। यह सोचकर वह बड़े भाई के घर गया।

”भाई साहब! थोड़े समय के लिए कुछ चावल मुझे उधार दीजिए जंगल में जाकर लकड़ियां इकट्ठी कर बेच दूंगा। जब पैसा मुझे मिल जाएगा, तो चावल खरीदकर आपको वापस कर दूंगा।“ छोटे भाई ने नम्रता से मांगा। किंतु बड़ा भाई अत्यंत निर्दयी प्रकृति का था।

”तुमको उधार देने योग्य एक धान भी मेरे पास नहीं है।“ यह कहकर गुस्से से दांत पीसते हुए उसने उसे भगा दिया।

छोटा भाई निराश अवश्य हुआ, पर उसकी मातृ भक्ति में कोई अंतर नहीं आया। वह विवश होकर सुदूर पहाड़ तक जाकर पहाड़ी फूल ही ले आया। उन फूलों को बेचकर उसने चावल खरीदना था।

”पुष्प वाला, पुष्प वाला, फूल-फूल, नए वर्ष के फूल, सुंदर फूल, जो चाहो, खरीदो।“ आवाज लगाकर उसने इधर उधर घूम घूमकर देखा, किंतु असफल रहा। पहले से ही लोगों ने नए साल के लिए फूलों की व्यवस्था कर रख थी। उसकी निराशा का ठिकाना न रहा। वह चलते चलते समुन्द्र तट पर आ गया। लहरें कभी उठतीं, उमड़तीं, ठाठें मारतीं, लहरों की तीव्र आवाज के साथ ऊंची और नीची लहरें आती जातीं, उन लहरों को देखते हुए छोटे भाई के मन में विचार आया, ‘सुदूर पर्वत से ये सब फूल बड़ी मेहनत से उठाकर ले आया था, पर एक भी खरीरदार नहीं आया। अब मैं क्या करूंगा। हां, मैंने सुना है, समुन्द्र के तल में नागराज का महल होता है। वहां से नागराज को पुष्प दान करना ही श्रेयस्कर होगा। नाग प्रसाद में जाकर संभव है, इन फूलों का स्वागत किया जाए। मन में यह सोचकर छोटे भाई ने समुन्द्र में ऊंची लहरों को लक्ष्य कर जितने फूल लेकर आया था, सब समर्पित कर दिए।

”हे नागराज! मेरा पुष्प दान स्वीकार करो।“ यह कहकर ज्यों ही उसने लहरों के बीच फूल फेंके, त्यों ही उन लहरों के भीतर से एक पुरूष प्रकट हुआ। उस पुरूष ने कहा, ”धन्यवाद नौजवान! सही बात कहूं तो नागराज के महल में नूतन वर्ष के लिए फूलों के न होने के कारण हम सब चिंतित थे। आपको सचमुच बहुत बहुत धन्यवाद। इतने सुंदर फूल, इतने अधिक फूलों के लिए मैं किस प्रकार आपका आभार व्यक्त करूं, इसके लिए मेरे पास कोई शब्द नहीं हैं। हां, यदि आप स्वीकार करें तो, मैं धन्यवादार्थ आपको नाग महल में ले चलता हूं। क्या आप मेरे साथ चल सकते हैं?“ यह सुनकर छोटे भाई ने कहा, ”घर में मेरी माता जी हैं। वह मेरी प्रतीक्षा कर रही हैं। मैं नहीं जा सकता।“

मना करने पर भी उस पुरूष ने आग्रह किया, ”नहीं, नहीं! आपको चलना ही पड़ेगा। जहां मैं चलूंगा, वहां मेरे पदचिन्हों के ऊपर चलते आइए, शीघ्र ही हम नाग प्रासाद में पहुंच जाएंगे। वहां के प्रजाजनों से मिलकर आपको भी प्रसन्नता होगी।“

”अच्छा, तो फिर…“ कहकर छोटे भाई ने लहरों के ऊपर पैर रखा। पलक झपकते ही वे नागराज के महल के द्वार पर खड़े थे। सामने सात द्वारपाल खड़े थे, जो भाला, तलवार आदि शस्त्रों से सुसज्जित थे। सभी के शस्त्र चमक रहे थे। महल की छत सोने से बनी थी। छत के ऊपर श्वेत, लाल आदि रंग बिरंगी चिड़ियां खेलने में मगन थीं। अब यह निर्णय हुआ कि नागराज के दर्शन करें। उस पुरूष ने छोटे भाई को समझाया, ”जब नागराज आपसे पूछें कि क्या वरदान चाहिए, तब आप कह देना कि मुझे कुत्ता चाहिए। इस नाग महल में एक अमूल्य कुत्ता रहता है।“

नागराज ने महल में विशेष मछलियों का भोजन तैयार करके छोटे भाई का सत्कार किया। तीन दिन के आतिथ्य में समुन्द्र में उपलब्ध सर्वश्रेष्ठ नाना प्रकार के भव्य भोजन तैयार किए गए। भोज के साथ मधुर समुन्द्र गीत भी लगातार सुनाया जाता रहा। तत्बाद जब स्वदेश जाने का समय आया, नागराज ने पूछा, ”उपहार में क्या चाहिए?“

छोटे भाई ने कहा, ”आपने मुझे बहुत कुछ दे दिया है, फिर भी यदि आप चाहते हैं तो मुझे एक कुत्ता दे दीजिए।“

राजाज्ञानुसार तुरंत राजा के सामने एक कुत्ता ले आया गया।

नागराज ने कहा, ”यह कुत्ता महल में सर्वाधिक मूल्यवान है। कृपया इसे संभाल कर रखें। ध्यान रखिएगा कि प्रतिदिन चार मेजों पर भरपूर भोजन तैयार कर इसे खिलाना जरूरी है। यदि यह आप कर सकें तो अवश्य ही आपके लिए यह बहुत भाग्यशाली सिद्ध होगा।“

छोटे भाई ने वचन दिया, ”स्वीकार है, ऐसा ही करूंगा। आपकी आज्ञानुसार मैं इसे प्रेम से संभाल कर रखूंगा।“

उसने नागराज से विदाई ली और अपने देश की और लक्ष्य कर वापस चल पड़ा। मालूम हुआ कि नागराज के महल में तो वह सिर्फ तीन दिन रहा था, किंतु वास्तव में तीन वर्ष का समय व्यतीत हो चुका था। माता जी के पास खाना तो था नहीं, पड़ोसी लोगों को उनकी देखभाल करनी पड़ी थी। जब नागराज से छोटा भाई कुत्ता लेकर आया, तो पड़ोसियों ने पूछा, ”जब अपने लिए भी खाना पूरा नहीं होता, ऐसी स्थिति में कुत्ता लाकर क्या करोगे?“

छोटे भाई ने कहा, ”आप संयम से कुछ समय देखते रहिएगा।“ वह प्रतिदिन चार मेजों पर यथा संभव भव्य भोज बनाकर कुत्ते को उसी तरह खिलाता था, जिस प्रकार किसी मालिक को खिलाया जाता है। कुत्ते ने खाना खा लिया। खाने के बाद वह पहाड़ पर चला गया। वापस लौटा तो अपने मुख में एक बड़ा सा रीछ पकड़ लाया। जिसे देखकर छोटा भाई व मां हैरानीचकित हो गए। उसका मांस, चमड़ा, दांत, सब कीमती थे। अब उन्हें रोज एक रीछ मिल जाता था। देखते देखते वे धनी बन गए। एक दिन बड़े भाई को मालूम हो गया और वह दौड़ता दौड़ता छोटे भाई के पास आया।

”क्या तुम्हारे पास एक ऐसा कुत्ता है जो रोज एक रीछ लेकर आता है?“ आते ही बड़े भाई ने छोटे भाई से पूछा।

”जी भाई।“ उत्तर मिला।

”यदि ऐसा है तो मैं उस कुत्ते को एक बार ले जाता हूं।“ बड़े भाई ने रौब से कहा।

”नहीं भाई जी, ऐसा नहीं हो सकता। आप मेरे बड़े भाई जरूर हैं, परंतु यह कुत्ता मेरे लिए खजाना है। मेरा कुत्ता सुवर्ण तुल्य है।“

बड़े भाई ने उसकी बात न मानी और बलपूर्वक कुत्ता ले गया। घर जाकर उसने पांच छः मेजों पर विभिन्न प्रकार का खाना बनवाया और उस कुत्ते को खिलाया। उनकी मनोकामना थी कि कुत्ता उनके लिए भी अधिक से अधिक रीछ पकड़कर लाए।

कुत्ते ने सब खाना खत्म कर दिया। वह अपूर्व बलवान बन गया और दूसरे क्षण जैसे ही खाना खत्म हो गया, बड़े भाई के सामने कूद पड़ा। उसने बड़े भाई के माथे पर प्रहार किया और उसका माथा काट डाला।

भोजन में ही कोई कमी रह गई होगी। उसे शायद पसंद नहीं आया होगा। यह सोचकर वह छोटे भाई के पास पूछने गया। चार मेज पर भोजन तैयार होना चाहिए था। यह जानकारी लेकर लौटा और कथनानुसार चार मेजों पर भरपूर खाना रख दिया। इस बार नागराज का कुत्ता अवश्य ही रीछ ले आएगा। मन में यह सोचकर कहा, ‘छोटे भाई ने जैसा बताया, वैसा ही बनाकर खाना रख दिया है। तू जल्दी खा और सीधा पहाड़ पर जा। मैं बड़े रीछ की आशा करता हूं यहां बैठकर।’

कुत्ते ने यूं सिर हिलाया जैसे उसकी बातें समझ गया हो, उसने तुरंत ही खाना खाया। बड़ा भाई कुत्ते की सारी गतिविधियां देख रहा था। अब रीछ पकड़ने जाएगा, मन में सोच रहा था। पर आशा के विपरीत पहाड़ की ओर न जाकर वह जोर से भौंका और बड़े भाई की ओर लपका।

उसने बुरी तरह बड़े भाई का घुटना काट डाला। बड़ा भाई दंग रह गया। उसके गुस्से का ठिकाना न रहा।

”बदतमीज कहीं का।“ वह उत्तेजित स्वर में चीखा, ”अरे उपद्रवी। मैंने तुझे इतना प्यार किया और तूने ही मुझे काट खाया। ठहर तो, अब मैं तुझे मौत के घाट उतराता हूं।“ उसने हाथ में डंडा उठाया और कुत्ते के सिर पर जोरों से प्रहार कर दिया। चोटग्रस्त होकर कुत्ता लगभग मृतप्राय हो गया। ऐसा लगता था, मानो गहन निद्रा में डूब गया हो। उसके मुख पर पूर्ण शांति थी।

पर्याप्त समय व्यतीत होने पर भी कुत्ता वापस न मिलने पर छोटे भाई को बहुत चिंता हुई। अंततः परेशान हो स्वयं बड़े भाई के घर गया।

”भाई, मेरा कुत्ता कहां है, वह कैसा है?“ उसे क्या हुआ?

”क्या हुआ? उस बदमाश कुत्ते की हालत तुझे अभी दिखाता हूं।“ और उसने गुस्से से सारी बात बताई। छोटे भाई की आंखें भर आईं। मरे हुए कुत्ते के लिए वह क्या कर सकता था। वह विवश था। धैर्य के साथ बोला, ”उसका शव पड़ा होगा, वही आप मुझे वापस कर दें।“ उसने मृत कुत्ते को अपने घर के सामने आंगन में दफनाया। उसकी समाधि के पास फूलों के पौधे लगाए और जड़ में पानी दिया। करबद्ध मंत्र पाठ किया। श्रद्धांजलि अर्पित की। दूसरे दिन की बात है कि बगीचे में जहां पर कुत्ता दफनाया था, वहां पर छोटा सा बांस का अंकुर निकल आया। रोज पानी डालना और प्रार्थना करना, उसकी दिनचर्या बन गई थी। दिन ब दिन देखते देखते पौधा बड़ा होता गया। और अंत में सचमुच खूब लंबा सीधा सुंदर बांस बन गया। वह बांस ‘सफल आगमन’ नामक अद्भुत बांस था जो दुनिया में अपूर्व था और देवलोक तक पहुंच जाने की क्षमता रखता था। उसका कद क्रमश बढ़ता गया और अंततः वह देवलोक में पहुंच गया। वह और भी ऊंचा होता गया और उसने देवलोक में स्थित धान्यसगार में छेद कर दिया। अन्न के भण्डार में छेद हो जाने के कारण अन्न गिरने लगा।

एक दिन प्रातः काल छोटा भाई उठकर बाहर आया। उन्होंने आंगन में देखा, कि ‘सफल आगमन’ नाम के बांस के फूल में श्वेत चावल का पहाड़ बना हुआ था। अभी भी लगातार सफेद बर्फ के समान चावलों की वर्षा हो रही थी। इस रहस्यमयी घटना को देखकर और यह सोचकर कि यह सब कुत्ते की देन ही होगी, मन ही मन मृत कुत्ते का स्मरण करते हुए धन्यवादपूर्वक श्रद्धांजलि समर्पित की और देवलोक से बरसते चावलों को नए निर्मित गोदाम में ले गया। चावलों की उस अपार राशि को जापानी भाषा में ‘सेंगोकू’ कहते हैं। सफल आगमन नामक बांस की प्रवृत्ति एक दिन में एक गांठ कद बढ़ जाने की थी। हर एक गांठ बढ़ जाने पर एक एक हजार सेंगोकू चावल की वर्षा होती। हर रोज बगीचे में अन्न का पहाड़ बन जाता। जिसे देखकर छोटा भाई प्रसन्न हो जाता। नित्य प्रति बहुत से श्रमिक चावलों को भण्डार में रखते। आखिर एक दिन यह सारी बात बड़े भाई के कानों तक पहुंच गई। एकदम उसके मन में ईर्ष्या उत्पन्न हुई और छोटे भाई के पास पहुंच गया।

”क्या तुम्हारे पास ‘सफल आगमन’ नाम का कोई बांस है जिससे बहुत सी चावल वर्षा होती है? यह सच्ची बात है क्या?“ उसने मिलते ही छोटे भाई से सवाल किया।

”जी हां भाई साहब! आपने तो मेरे प्रिय कुत्ते को मार दिया था, उसी कुत्ते को मैंने भक्तिपूर्वक जहां दफनाया था, वहां पर बांस उग आया है।“

उत्तर मिलते ही बड़े भाई ने कहा, ”तब तुम एक बार उस मृत कुत्ते को मुझे दे दो। मैं उसे अपने बगीचे में दफनाकर देखता हूं।“ पूर्ववत आग्रहपूर्वक वह मृत कुत्ते का शव मांगकर ले गया और उसे अपने घर में दफनाया। दूसरे दिन उद्यान में देखा कि ‘सफल आगमन’ बांस अपना सिर उठा रहा है। बड़े भाई की खुशी का ठिकाना न रहा। क्रमश वह बांस अपना कद बढ़ा रहा था। अब चावल की वर्षा अवष्यंभावी थी। किंतु विडंबना की बात है कि इस बार सफल आगमन नामक बांस ने देवलोक में स्थित कूड़ेदान में छेद किया। देवलोक का सारा का सारा कूड़ा, कचरा गिरा और कूड़े के ढ़ेर में बड़े भाई का घर दब गया। इसी को तो कहते हैं जैसी करनी वैसी भरनी।


दयालू रानी


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जंगल में एक पेड़ पर सुनहरी चिड़िया रहती थी। जब वह गाती थी तो उसकी चोंच से सोने के मोती झरते थे। एक दिन एक चिड़ीमार की नजर उस पर पड़ गई। चिड़िया के मुंह से सोने के मोती झरते देखकर वह खुशी से फूला नहीं समाया। उसने मन ही मन कहा, ‘वाह! वाह! आज तो मेरे भाग्य खुल गए। अगर मैं इस चिड़िया को पकड़ लूं तो यह मुझे रोज सोने के मोती देगी और मैं जल्दी ही धनवान हो जाऊंगा।’

मन में यह ख्याल आते ही चिड़ीमार ने जमीन पर जाल फैलाकर चावल के कुछ दाने बिखेर दिए। सुनहरी चिड़िया दाने चुगने नीचे उतरी और जाल में फंस गई। चिड़ीमार ने उसे पकड़ लिया और अपने घर ले आया।

उस दिन से चिड़ीमार को रोज सोने के कुछ मोती मिलने लगे। देखते ही देखते वह धनवान हो गया।

अब उसके पास धन तो बहुत था, किंतु सम्मान नहीं था। यह बात उसे बेहद परेशान करती रहती थी कि अब भी लोग उसे चिड़ीमार ही कहकर बुलाते थे।

वह सोचता कि ऐसा क्या करूं कि लोग मेरा सम्मान करें। एक दिन उसके दिमाग में एक युक्ति आई। उसने चिड़िया के लिए सोने का एक सुंदर से पिंजरा बनवाया और सोने के पिंजरे सहित वह चिड़िया राजा को भेंट कर दी।

उपहार देते समय उसने राजा से कहा, ”महाराज, यह चिड़िया आपके महल में मधुर गीत गाएगी और रोज आपको सोने के मोती भी देगी।“

यह उपहार पाकर राजा बहुत प्रसन्न हुआ।

उसने चिड़ीमार को दरबार में ऊंचा पद दे दिया।

जल्दी ही राजा के पास ढेर सारे सोने के मोती जमा हो गए। राजा ने सोने के पिंजरे सहित वह चिड़िया अपनी प्रिय रानी को दे दी। रानी ने पिंजरे का दरवाजा खोलकर चिड़िया को आजाद कर दिया और सोने का पिंजरा शाही सुनार को देकर कहा, ”इस सोने के पिंजरे से मेरे लिए सुंदर-सुंदर गहने बना दो।“

आजाद होकर चिड़िया बोली- ”रानी मां! तुम धन्य हो जो तुमने मुझे आजाद किया। तुम्हारे दिल में अपार दया है और लालच भी नहीं है। मुझे कैद में रहना बुरा लगता था।“

कहकर वह जंगल में उड़ गई।

अब वह रोज रानी का गुणगान करती।


अधजल गगरी छलकत जाए


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एक बार एक किसान को पास के एक दूसरे गांव में जाना पड़ा। गांव पहुंचने के लिए एक नदी पार करना आवष्यक था। समस्या तब उत्पन्न हुई, जब वह नदी के किनारे पहुंचा। किसान को तैरना नहीं आता था। वहां नावें भी नहीं थी। सो उसके पास एक ही रास्ता था कि वह नदी उन्हीं स्थानों से पैदल पार करे, जहां पानी की गहराई बहुत कम थी। मगर उसके सामने एक दूसरी समस्या यह थी कि उसे यह नहीं मालूम था कि नदी में किस स्थान पर पानी की गहराई कम है। 

तभी उसके गांव का एक दूसरा आदमी वहां आ गया। जब उसने किसान को किसी गहरे सोच में खोए हुए देखा तो उत्सुकतावश पूछ बैठा- ”मित्र, आखिर समस्या क्या है? बहुत दुखी दिखाई दे रहे हो। क्या मैं तुम्हारी कुछ मदद कर सकता हूं?“ 

किसान ने उसे अपनी समस्या बताई। उसे सुनकर वह आदमी हंसा और कहने लगा- ”मित्र, यह तो बहुत सरल है। तुम इतने दुखी क्यों होते हो। देखो, जिस स्थान पर नदी गहरी है, वहां का जल शांत होगा। इसके विपरीत उथला पानी हमेशा शोर करने वाला होगा।“ वह आदमी दोबारा हंसा और कहने लगा- ”यह सार्वभौम सत्य है! क्या तुमने कभी यह कहावत नहीं सुनी, अधजल गगरी छलकत जाए, भरी गगरिया चुपके जाए।“ 

निष्कर्ष- गुणवान व्यक्ति सरल गम्भीर रहते हैं।


बासुंरी वाला


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एक गांव में चूहों का आतंक छाया हुआ था। हजारों चूहे थे उस गांव में। उनकी तादाद इतनी अधिक थी कि आसपास के गांव वाले उस गांव को चूहों वाला गांव कहकर पुकारते थे।

उस गांव में ऐसी कोई जगह नहीं थी, जहां चूहे न हों। घर में, दुकान में, गोदाम में, खेतों में, खलिहानों में हर जगह चूहे ही चूहे भरे पड़े थे।

ये चूहे ढेरों अनाज खा जाते थे। घर का सामान, कपड़े, कागज पत्र सब कुछ कुतर डालते।

पूरे गांव में चूहों का उत्पात मचा हुआ था। यहां तक कि मासूम बच्चों का कोमल शरीर तक भी ये कुतन लेते थे। चूहों के कारण गांव के लोगों को काफी नुकसान उठाना पड़ रहा था। गांव वाले किसी भी कीमत पर इन चूहों से छुटकारा पाना चाहते थे। इसलिए वह कई बार सभा भी कर चुके थे और कई बार बाहर से शिकारियों को बुला चुके थे, मगर शिकारी भला चूहों को कैसे पकड़ते। चूहे खतरा भांपते ही बिलों में घुस जाते।

कई बार गांव में बिल्लियां लाकर छोड़ी गईं तो गांव में मौजूद कुत्तों के डर से वे स्वयं भाग गईं।

बेचारे गांव वाले थक-हारकर बैठ गए और उन्होंने सब कुछ ईश्वर पर छोड़ दिया।

एक दिन जैसे ईश्वर ने उनकी सुन ली। उस दिन एक बांसुरी वाला गांव में आया।

उसने देखा कि गांव के लोग चूहों से ग्रस्त हैं। उसने गांव वालों से कहा, ”मैं गांव के सारे चूहों को खत्म कर दूंगा। पर इसके बदले तुम लोगों को मुझे हजार स्वर्ण मुद्राएं देनी होंगी।“

गांव वालों ने बांसुरी वाले को हजार स्वर्ण मुद्राएं देना स्वीकार कर लिया।

मामला तय होते ही बांसुरी वाला मधुर स्वर में बांसुरी बजाने लगा। बांसुरी की आवाज सुनकर सभी चूहे घरों, दुकानों, गोदामों तथा खेत-खलिहानों से निकलकर दौड़-दौड़कर बाहर आने लगे और बांसुरी की आवाज सुनकर नाचने लगे।

बांसुरी वाला बांसुरी बजाते-बजाते नदी की ओर चल पड़ा।

चूहे भी नाचते-नाचते उसके पीछे चल दिए।

वह नदी के पानी में उतर गया। उसके पीछे-पीछे चूहे भी पानी में उतर गए।

इस तरह सारे चूहे पानी में डूबकर मर गए। इसके बाद बांसुरी वाला गांव में लौटा। उसने गांव वालों से अपना पारिश्रमिक मांगा। पर गांव वालों ने पैसे देने से इन्कार कर दिया। उन्होंने सोचा कि चूहों से मुक्ति तो मिल ही गई है, अब व्यर्थ में हजार स्वर्ण मुद्राएं क्यों दी जाएं।

उनके इन्कार करने पर बांसुरी वाले को बहुत क्रोध आया। उसने तुरन्त उन्हें सबक सिखाने का निर्णय कर लिया।

उनसे बिना कुछ कहे वह मधुर स्वर में बांसुरी बजाने लगा। इस बार बांसुरी की धुन उस धुन से बिल्कुल अलग थी जो उसने चूहों के लिए बजाई थी।

बांसुरी की आवाज सुनकर गांव के सारे बच्चे उसके करीब आ गए और मस्त होकर नाचने लगे।

बांसुरी वाला बांसुरी बजाता रहा और बच्चे मस्ती में नाचते रहे।

बहुत देर तक ये तमाशा चलता रहा। गांव के लोग उत्सुकता से वह तमाशा देखते रहे। फिर, एकाएक ही बांसुरी वाला गांव से बाहर की तरफ चल दिया। बच्चे भी उसके पीछे चल दिए।

अब गांव वाले चौंके। अब उनकी समझ में आया कि क्या होने जा रहा है।

यह बांसुरी वाला तो उनके बच्चों को भी ले जाकर नदी में डुबो देगा।

यह ख्याल मन में आते ही वे दौड़कर गए और बांसुरी वाले के कदमों में गिर पड़े। बोले- ”हमें माफ कर दो और हमारे बच्चों को छोड़ दो। हम तुम्हें दो हजार स्वर्ण मुद्राएं देने को तैयार हैं।“

”नहीं। अब मैं दस हजार स्वर्ण मुद्राएं लूंगा। तुम जैसे बेईमानों के लिए यही दण्ड उचित है।“

इस बार गांव वालों ने चुपचाप दस हजार स्वर्ण मुद्राएं देकर अपने बच्चों को बचाया।


नाश की जड़ अहंकार


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एक समय की घटना है, एक बूढ़े आदमी ने अपनी बहुत सी सम्पति अपने पुत्र के नाम कर दी। उसने अपनी वसीयत में लिखा कि उसकी सारी सम्पति उसके मरने के बाद उसके पुत्र की हो जाएगी। और वसीयत करने के कुछ दिन बाद ही उसकी मृत्यु हो गई।

सम्पति इतनी अधिक थी कि उसका पुत्र और आगे आने वाली सात पुश्तें तक भी आराम से बैठे-बैठे बिना कोई काम-धंधा किए खा-पी सकता था। मगर उसका पुत्र अभी भी संतुष्ट नहीं था, वह अधिक से अधिक धन कमाना चाहता था। इसलिए उसने अपनी सभी अचल सम्पति बेच दी और भिन्न-भिन्न वस्तुओं की खरीद-फरोख्त कर उनका व्यापार करना आरंभ कर दिया।

भाग्यवश वह बहुत कम समय में अत्यधिक सफल हुआ तथा शीघ्र ही पहले से अधिक धनवान हो गया। उसने इतना अधिक इकटृा कर लिया कि दूसरे व्यापारी उससे ईर्ष्या करने लगे। कभी-कभी दूसरे व्यापारी या उसके मित्र उससे सफलता का रहस्य पूछते तो वह कहता- ”मैं इसलिए उन्नति कर रहा हूं कि मैं अपने धंधे को समझता हूं और कठारे परिश्रम करता हूं। मैं अपने ग्राहकों को भी खुश रखना जानता हूं।“

चूंकि उसने सचमुच व्यापार में तरक्की की थी, इसलिए उसके मित्र और अन्य व्यापारी उसकी शेखीबाजी को सच मानते थे। अपनी इस कामयाबी के कारण उसमें बड़ा ही अहंकार आ गया था। मगर उसे फिर भी अपने धन से संतुष्टि नहीं थी, वह अभी भी बहुत सा धन कमाना चाहता था। उसने व्यापार में अपने हाथ-पैर फैलाने आरंभ कर दिए। आरंभ में तो उसे व्यापार में लाभ हुआ। मगर उसका अहंकार इतना बढ़ गया था कि भाग्य की देवी उससे अप्रसन्न हो गई। उसे व्यापार में घाटा होने लगा।

पहली घटना तब हुई, जबकि माल से भरा उसका समुन्द्री जहाज डाकूओं ने लूट लिया। दूसरी घटना में माल से लदा जहाज अरब सागर में डूब गया। उसके भाग्य में कुछ न कुछ अपशुगन उत्पन्न हो गया था। तीसरी घटना ने उसे बिल्कुल ही उखाड़ फेंका। वह दर-दर का भिखारी बन गया। उसका सारा व्यापार चौपट हो गया।

उसकी यह दुर्दशा देखकर उसके मित्रों ने पूछा-”भाई, तुम्हारी यह दुर्दशा आखिर कैसे हुई?“

इस पर उसने अपने भाग्य को कोसा और कहा- ”क्या बताऊं, किस्मत ने साथ नहीं दिया।“

भाग्य की देवी उसकी बात सुनका अप्रसन्न हो गई। वह साक्षात उसके सामने प्रकट होकर बोली – ”तुम सचमुच बहुत अकृतज्ञ हो। जब तक तुम सफलता की सीढि़यां चढ़ते रहे, तब तक तुम उसका सारा श्रेय खुद लेते रहे, मगर जैसे ही हालात खराब हुए, तुमने भाग्य को धिक्कारना आरम्भ कर दिया। याद रखो मनुष्य की अकृतघ्नता तथा उसका अहंकार ही उसे ले डूबता है।“

निष्कर्ष- अहंकार से व्यक्ति का सर्वनाश हो जाता है।


भेड़िया आया भेड़िया आया


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किसी गांव में एक चरवाहा बालक रहता था। उसे गांवभर की भेड़ें चराने की जिम्मेदारी सौंपी गई। वह भेड़ों को प्रतिदिन पहाड़ी पर स्थित चरागाह में ले जाता और उन्हें चरने के लिए छोड़ देता।

चरवाहा बालक अपने कार्य को भली प्रकार कर रहा था। मगर एक ही जगह उन सभी जानी पहचानी भेड़ों को प्रतिदिन ले जाकर चराते-चराते बेचारा ऊब सा गया। उसने सोचा कि क्यों न दिल बहलाने के लिए कुछ हंसी मजाक किया जाए। बस, लगा जोर जोर से डरी हुई आवाज में चिल्लाने- ”भेडि़या आया! भेडि़या आया। बचाओ….बचाओ। भेडि़या भेड़ों को खा रहा है।“

गांव वाले खेतों में काम कर रहे थे। उन्होंने चरवाहे की डरी हुई आवाजें सुनीं तो जो भी उनके हाथ में आया, वह लेकर भेडि़ये को मारने के लिए पहाड़ी की ओर दौड़ पड़े।

परंतु वहां पहुंचकर उन्होंने देखा कि भेड़ें तो आराम से चर रही थी और चरवाहा बालक हंस रहा था। ”कहां है भेडि़या?“ गांव वाले क्रोध में बोले। मगर चरवाहा हंसता ही रहा।

दूसरे दिन चरवाहा भेड़ों को चराने पहाड़ी वाले मैदान में ले गया। मगर जब वह एक पेड़ के नीचे बैठा अपनी बांसुरी बजा रहा था, तभी उसे गुर्राने की सी आवाजें सुनाई दीं। उसने सिर उठाकर देखा तो कुछ दूर पर सचमुच एक बड़ा सा भयानक भेडि़या गुर्राता हुआ भेड़ों की ओर बढ़ रहा था।

भेड़ों ने एक खूंखार भेडि़ए को अपनी ओर बढ़ते देखा तो मिमियाकर इधर-उधर भागने लगीं।

चरवाहा बालक भयभीत हो गया। लगा जोर जोर से चिल्लाने- ”भेडि़या आया! भेडि़या आय। बचाओ….बचाओ।“

इस बार वह बहुत डरा हुआ था। चिल्ला-चिल्ला कर सहायता की पुकार कर रहा था। वह कांप रहा था और गांव की ओर आशा भरी नजरों से देख रहा था। मगर गांव वालों ने सोचा कि चरवाहा बालक मजाक कर रहा होगा। वे नहीं आए।

भेडि़ए ने भी चरवाहे बालक को भय से कांपते देख तो समझ गया कि अब कोई नहीं है, जो उसका मुकाबला कर सके। बस फिर क्या था, भेडि़ए ने एक भेड़ की गरदन पकड़ी और देखते ही देखते उसे लेकर भाग गया। भेड़ें बुरी तरह मिमियाती और छटपटाती रहीं।

चरवाहा बालक रोता हुआ गांव वालों के पास आया और दर्दभरी कहानी सुनाई। वह अपने किए पर बुरी तरह पछता रहा था। चरवाहे बालक के माता-पिता तथा गांव वालों ने उसे खूब डांटा। बालक ने भी अपने मूर्खतापूर्ण कार्यों के लिए क्षमा मांगी और वादा किया कि भविष्य में वह ऐसा मजाक नहीं करेगा।

शिक्षा – झूठे व्यक्ति की सच्ची बात पर भी विश्वास न करो।


ईश्वर से धोखा


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एक बार एक चालाक आदमी भूख से बेहाल इधर-उधर भोजन की तलाश में घूम रहा था। अंत में जब उसे भोजन प्राप्त नहीं हुआ तो निराश होकर ईश्वर के सामने घुटने टेक दिए- ”हे ईश्वर, मुझ पर दया करो। अगर तुम मुझे एक सौ खजूर दोग तो मैं आधे तुम्हारी सेवा में अर्पित कर दूंगा।“

जब उसने नेत्र खोले तो सचमुच उसके आगे खजूरों का ढेर लगा हुआ था। वह आदमी बहुत प्रसन्न हुआ और खजूरों की गिनती करने लगा। पूरे पचास थे। उसने सभी खजूर पेट भर खा लिए और बोला- ”हे ईश्वर! मुझे नहीं मालूम था कि तुमने अपने हिस्से के खजूर पहले ही रख लिए हैं। तुम तो हिसाब-किताब में बड़े पक्के हो।“

इतना कहकर वह चालाक आदमी वहां से चलता बना।

निष्कर्ष- चालाक व्यक्ति अपने तर्क से ईश्वर को भी धोखा दे देता है।


लालची भाई


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प्राचीन काल की बात है। एक गांव में दो भाई रहते थे। बड़े भाई के पास बहुत सा धन था, परंतु छोटा भाई गरीब था। एक बार जब लोग नये साल कीखुशियांमना रहे थे, तो छोटे भाई के पास खाने को भी कुछ न था। वह बड़े भाई के घर गया और उसने उससे एक सेर चावल उधार मांगा। परन्तु बड़े भाई ने साफ इनकार कर दिया। जब छोटा भाई उसके घर से उदास लौट रहा था तो मार्ग में एक बूढ़ा मिला। बूढ़े के पास लकडि़यों का एक भारी गट्ठा था। बूढ़े ने उससे पूछा- ”तुम इतने उदास क्यों हो! कौन सी मुसीबत तुम पर आ पड़ी है?“

छोटे भाई ने अपनी दुख भरी कहानी उसे सुनाई।

बूढ़े ने उसे दिलासा देते हुए कहा- ”यदि तुम लकड़ियों का यह गट्ठा मेरे घर तक पहुंचा दो तो मैं तुम्हें ऐसी चीज दूंगा जिसकी सहायता से तुम धनी हो जाओगे।“

छोटे भाई ने फौरन लकडि़यों का गट्ठा उठाकर अपने सिर पर रख लिया और फिर उसके पीछे-पीछे चल पड़ा।

घर पहुंच कर बूढ़े ने उसे एक मालपुआ दिया और कहा- ”तुम इसे लेकर मंदिर के पीछे, वन में चले जाओ। वहां तुम्हें एक गुफा दिखाई देगी, जिसमें बहुत से बौने रहते हैं। मालपुआ उनका मनपसंद भोजन है। वे किसी भी मूल्य पर इसे पाना चाहेंगे। तुम उनसे धन मत मांगना। कहना कि मुझे पत्थर की एक चक्की दे दो। जब तुम चक्की ले आओगे तो उसकी विशेषता मैं तुम्हें बतलाऊंगा।“

छोटा भाई मंदिर की ओर चल पड़ा। थोड़ी ही देर में वह वन में जा पहुंचा। उसने देखा कि मंदिर से थोड़ी ही दूर एक गुफा से बहुत से बौने बाहर निकलते हैं और फिर उसी गुफा में चले जाते हैं।

उस समय वे वृक्ष के नीचे के एक बड़े टहने को खींचकर गुफा के अन्दर ले जाने की कोशिश कर रहे थे। परंतु उनके लिए यह बहुत ही मुश्किल काम था।

छोटा भाई उन बौनों से जाकर बोला, ”लाओ इस टहने को मैं ले चलता हूं।“ जब वह टहने को कंधे पर उठाए हुए गुफा के पास पहुंचा तो उसके कान में एक धीमी आवाज पड़ी, ”मुझे बचाओ!“

छोटे भाई ने घबराकर इधर-उधर देखा। उसके पांव के नीचे एक बौना पिस रहा था। छोटे भाई ने झटपट उस बौने को उठा लिया। असल में वह बौनों का राजकुमार था।

बौने राजकुमार ने छोटे भाई के एक हाथ में मालपुए को देख लिया। वह बोला, ”भाई! यह मालपुआ मुझे दे दो। आपकी बड़ी दया होगी। इसके बदले में मैं आपको बहुत से हीरे-जवाहरात दूंगा।“ छोटे भाई को बूढ़े की बात स्मरण थी। उसने मालपुआ बौने राजकुमार को दे दिया तथा उसके बदले पत्थर की एक चक्की देने के लिए कहा। बौनों के राजा ने अपने पुत्र की प्रसन्नता के लिए चक्की देना स्वीकार कर लिया।

जब छोटा भाई चक्की लेकर चलने लगा तो बौनों के राजा ने कहा, ”देखो, इसे मामूली चक्की मत समझना। यह हमारे राज्य की सबसे मूल्यवान वस्तु है। इस चक्की को दायीं ओर घुमाने से तुम जो वस्तु मांगोगे मिल जाएगी और जब तक तुम इसे फिर से बायीं ओर नहीं घुमाओगे, वह चीज निकलती ही रहेगी।“

अब छोटा भाई पत्थर की चक्की लेकर घर आया। उसकी पत्नी भूखी-प्यासी बैठी पति की प्रतीक्षा कर रही थी। वह उसे पत्थर की चक्की उठाए आते देखकर निराश हो गई। परंतु पति ने आते ही कहा कि- ”शीघ्र ही अन्दर जाकर एक कपड़ा बिछा दो।“

उसकी पत्नी ने कमरे के भीतर जाकर एक सफेद कपड़ा बिछा दिया। छोटे भाई ने चक्की को उस पर रखा और फौरन दायीं ओर घुमाते हुए कहा- ”चावल निकालो।“

कहने की देर थी कि चावलों का ढेर लग गया। फिर उसने मछली मांगी तो मछलियां मिल गई। उसके बाद उसने एक-एक करके आवश्यकता की सभी चीजें मांगी, जो उसे मिलती गई।

छोटा भाई सोचने लगा कि अब मैं तो धनाढ्य हो गया हूं। मुझे एक महल में रहना चाहिए। उसने चक्की को दायीं ओर घुमाकर पहले एक सुन्दर महल तैयार करवाया और फिर उसे बढि़या सामान से सजवाया। वह बड़े ठाठबाट से रहने लगा। एक दिन उसने अपने पड़ोसियों तथा मित्रों को दावत दी और नये साल का त्योहारा बड़ी धूमधाम से मनाया।

छोटे भाई के यह ठाठबाट देखकर बड़ा भाई सोचने लगा कि कल तो यह गरीब था, आज इतना धनी कैसे बन गया, इसमें जरूर कोई रहस्य है। एक दिन वह छिपकर उसके घर के अन्दर चला गया। वह किवाड़ की ओट में खड़ा हो गया। उसने क्या देखा कि छोटा भाई एक चक्की को घुमा कर मिठाई के टोकरे के टोकरे भरता जा रहा था। यह देखकर बड़ा भाई हैरान हो गया। वह वहां से चुपचुाप वापस चला आया। घर आकर वह उस चक्की को हथियाने का उपाय सोचने लगा।

एक रात जब सब लोग सो रहे थे, तो बड़ा भाई चोरों की भांति दबे पांव छोटे भाई के घर में घुस गया और उसने पत्थर की चक्की उठाकर घर की राह ली।

बड़े भाई ने सोचा कि अब मैं टापू में जाकर रहूंगा और इस चक्की की सहायता से लखपति बन जाऊंगा यह सोचकर वह समुन्द्र के किनारे आया और चक्की साथ लेकर एक नौका में जा बैठा। घर से चलते समय उसने सब जरूरी चीजें साथ ले ली थीं, परंतु नमक लाना भूल गया था। नौका पर बैठते ही उसने पहला काम यह किया कि नमक पाने के लिए चक्की को घुमाना आरंभ किया। वह ‘नमक निकल नमक निकल’ की रट लगाने लगा।

कहने की देर थी कि नमक निकलना आरंभ हो गया। अब बड़े भाई को चक्की को रोकने का उपाय मालूम नहीं था, चक्की चलती गई, चलती गई। नाव में नमक का ढेर लग गया। बड़ा भाई चक्की समेत सागर में डूब गया।

सयाने लोग कहते हैं कि चक्की अब भी लगातार घूम रही है और उससे नमक निरन्तर निकल रहा है। यही कारण है कि सागर का जल खारा है।


एक गलत इच्छा


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एक बार एक मधुमक्खी ने एक बरतन में शहद इकटृा किया और ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए उनके समक्ष प्रस्तुत किया। ईश्वर उस भेंट से बहुत प्रसन्न हुए और मधुमक्खी से बोले कि वह जो चाहे इच्छा करे, उसे पूरा किया जाएगा।

मधुमक्खी यह सुनकर बहुत प्रसन्न हुई और बोली- ”हे सर्वशक्तिमान ईश्वर, यदि आप सचमुच मुझसे प्रसन्न हैं तो मुझे यह वरदान दें कि मैं जिसे भी डंक मारूं, वह दर्द से तड़प उठे।“

ईश्वर यह सुनकर बहुत क्रोधित हुए- ”क्या इसके अतिरिक्त तुम्हारी अन्य कोई इच्छा नहीं है। ठीक है, मैंने वादा किया है कि तुम्हारी इच्छा पूरी करूंगा, परंतु एक शर्त है। वह यह कि तुम जिसे डंक मारोगी उसे तो बहुत दर्द होगा, परंतु तुम भी तुरंत मर जाओगी।“

दूसरे ही क्षण ईश्वर वहां से चले गए।

निष्कर्ष- जो दूसरों का बुरा चाहते हैं, उनका भी बुरा ही होता है।


कामचोर गधा


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एक व्यापारी के पास एक गधा था। वह रोज सुबह अपने गधे पर नमक की बोरियां व अन्य सामान लादकर आसपास के कस्बों में बेचने जाया करता था।

वहां तक जाने के लिए उसे कई छोटी-छोटी नदियां और नाले पार करने पड़ते थे।

एक दिन नदी पार करते समय गधा अचानक पुल से फिसलकर पानी में गिर पड़ा। इससे गधे की पीठ पर लदा हुआ ढेर सारा नमक पानी में घुल गया। व्यापारी ने जैसे-तैसे उसे बाहर निकाला। फिर देखा कि कहीं गधे को चोट तो नहीं लगी। मगर गधा सही सलामत था।

अब गधे का बोझ काफी हलका हो गया।

बोझ हलका होते ही गधा बहुत खुश हुआ।

नमक का व्यापारी गधे को लेकर घर वापस लौट आया। अब वह जाकर भी क्या करता, माल तो पानी में बह गया था।

फलस्वरूप उस दिन गधे को अच्छा आराम मिल गया।

अब तो गधे ने सोचा कि रोज ऐसे ही किया करूंगा।

दूसरे दिन वह व्यापारी फिर गधे पर नमक की बोरियां लादकर बेचने निकला।

उस दिन फिर नदी पार करते समय गधा जानबूझकर पानी में गिर पड़ा। उसकी पीठ का बोझ इस बार भी हलका हो गया। व्यापारी उस दिन भी गधे को लेकर घर वापस लौट आया।

पर आज व्यापारी ने साफ-साफ देखा था कि गधा जान-बूझकर पानी में गिरा था। उसे गधे पर बहुत गुस्सा आया। मगर गधा अपनी कामयाबी पर बहुत इतराया।

अगले दिन व्यापारी ने गधे की पीठ पर रूई केगट्ठा लाद दिए। गधा बहुत खुश हुआ। उसने सोचा कि आज तो पहले ही कम बोझ है। जब मैं पानी में गिरने का नाटक करूंगा तो कुछ बोझ और हल्का हो जाएगा। यही सोचकर वह खुशी-खुशी चल दिया।

नदी आते ही वह पानी में गिर गया। पर इस बार उल्टा ही हुआ। व्यापारी ने उसे जल्दी से बाहर नहीं निकाला।

फलस्वरूप रूई के गट्टों ने खूब पानी सोखा और बोझ पहले से कई गुना बढ़ गया। पानी से बाहर आने में गधे को बहुत परिश्रम करना पड़ा। अब उससे चला भी न जा रहा था। मालिक तो पहले ही जला बैठा था क्योंकि उसने उसका काफी नमक पानी में बहा दिया था। जब गधे से न चला गया तो उसने डंडे से उसकी खूब पिटाई की।

उस दिन के बाद से गधे ने पानी में गिरने की आदत छोड़ दी।

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