10 Best Stories In Hindi Of 2021

10 Best Stories In Hindi Of 2021


इस Blog में आपको 10 Best Stories In Hindi Of 2021 में पढ़ने को मिलेंगी जो आपने अपने दादा दादी से सुनी होंगी। ये hindi stories बहुत ही प्रेरक है। ऐसे  किस्से तो आपने अपने बचपन मे बहुत सुने होंगे पर ये किस्से कुछ अलग हौ। हमने भी इस ब्लॉग में 10 Best Stories In Hindi Of 2021 में लिखा है जिसको पढ़कर आपको बहुत ही ज्यादा आनंद मिलेगा और आपका मनोरंजन भी होगा। इसमे कुछ 10 Best Stories In Hindi Of 2021 दी गयी है। जिसमे आपको नयापन अनुभव होगा। यदि आप पुरानी कहानियाँ पढ़कर बोर हो गए है तो यहाँ पर हम आपको 10 Best Stories In Hindi Of 2021 दे रहे है जिसको पढ़कर आपको बहुत ही ज्यादा मज़ा आने वाला है।


10 Best Stories In Hindi Of 2021
10 Best Stories In Hindi Of 2021


सत्ता (मिहिर)


वह अपनी काली-सी मनहूस सूरत लिए शहर की गलियों में अक्सर देखा जाता था। अब की गांव की गलियों में भी देखा गया। लोग अखबारों में उसके किस्से बड़े चस्के ले लेकर और चुस्की ले लेकर पढ़ते हैं। वह काली छाया जब शहर की गलियों में दौड़ती थी तो पीछे पीछे लाऊड स्पीकरों के साथ, चुनावी उम्मीदवार भी हलक फाड़ते नज़र आते। गांव में तो जहां इसकी छाया पड़ती है, अच्छे खासे लोग जमीन जायदाद के लिए लड़ मरते हैं। नाम भी कुछ अच्छा सा है- सत्ता। पर ताश के इक्के से कुछ कम नहीं।

अबकी बार इस बीमारी का प्रकोप गांव में कुछ नए ही ढंग से हुआ। न तो ज़मीन जायदाद की बात बीच में आई, न कोई कत्ल हुआ। शुरुआत इसकी कुछ यूं हुई-

एक दबंग छोकरा सारे गांव में लाऊड स्पीकर लिए चिल्लाता जा रहा था, "छोटे मियाँ को वोट देकर सफल बनायें। आपके अपने छोटे मियाँ मिस्त्री।"

पंचायत चुनाव पहली बार गांव में होने जा रहे थे। छोटे मियाँ मिस्त्री की तर्ज पर दो और मिस्त्री हाथ की छैनी-बसूली फेंककर मैदान में कूद पड़े थे। फिर ठेकेदार बिशन सिंह क्यों पीछे रहता ? बात की बात में पूरा गांव ही कूद पड़ा। क्या बच्चा, क्या बूढ़ा - सबकी ज़ुबान पर बस कुछ रटे हुए जुमले थे - "अपने छप्पन मियाँ को भोट दें।" अथवा "अपने रमन भैया को भोट दें।" शुरू में तो इन्हीं दोनों का प्रचार अधिक था। प्रचार की यह भावना तो इतनी बढ़ी की एक साहब सिंह ने तो अपनी भैंसें तक बेचकर पर्चे छपवाए। लाऊड स्पीकरों की तो भरमार ही थी। गांव के एक तंग गलियारे पर जब दो विरोधी गुटों के स्पीकर वाले मिलते तो एक दूसरे के आगे कुछ ज़्यादा ही ज़ोर से अपना जुमला सुनाते और हँसकर पार निकल जाते।

हवा बड़ी तेज़ चल रही थी। पेड़ पत्ते जब तब हिलते तो आंगनों में धूल भर जाती पर प्रचार की हवा तो और तेज़ थी। कुछ लोगों ने ऐसी हवा बांधी 'अबकी बिशन सिंह राजा भएले।' फिर क्या था ? शाम को उसके दरवाजे शराबी-कबाबी नाच उठे। मुफ्त की शराब पर न पीने वाले भी हाथ साफ कर गए। उधर छोटे मियाँ के कान खड़े हो गये। टोपी सीधी कर नाक की सीध में गांव के तालाब वाले हिस्से में गए जहां अधिकतर खेतिहर उसकी अपनी बिरादरी के थे। उनसे कह दिया, "आप लोगन कै खातिर हम खड़े हुए हैं। बिरादरी की नाक रह जाये। अगर अबकी परधान हो गए तो तालाब की मरम्मत करा कर पक्की नालियां बनवाये देंगे।"

तालाब क्या था कि गन्दे पानी का पूरा शमशान ही था, जिसमे आकर गांव भर की सारी गंदगी मोक्ष को प्राप्त होती रहती थी। तालाब का गन्दला पानी बरसातों में रिस रिसकर घरों तक आ जाता था। एक राय न बन पाने के चलते गांव वाले इसका समाधान नही कर पाए थे। बस फिर तो एक मजबूत मुद्दा बन गया। यह सब शहर में देखे गए कुछ नए नुस्खे थे जो शहर से कुछ बेरोजगार युवा साथ लाये थे। ऐसा ही एक था - रमन भैया। उसका पहला मुद्दा था - बेरोजगारी दूर करना। अपनी तो कर न सका। कुछ साल पास के शहर की खाक छान कर अबकी गांव लौट आया था। जब कुछ न मिला तो राजनीति में उतर आया। कहने के लिए उसका शब्दाडंबर भी कुछ कम न था - "मैंने शहरों में बहोत देखा है। कुछ नई धरा वहाँ। यहाँ गांव से जियादा गन्दगी धरी है उहाँ। काम धंधा कुछ-ओ नई मिलता। यहाँ गांव में कुछ और न हो, अपनी जमीन तो है। भूखा तो नहीं मरेगा कोई।"

पर ज़मीन तो गांव में गिने चुने लोगों के पास ही थी। बाकी तो लाल झंडा वाले लोग थे जिनमें नाइ, कुम्हार, लोहार, मिस्त्री आदि शामिल थे। और रही बात शहर घूम कर आने की, तो अभी कुछ अरसा पहले यही बात कही गई होती तो लोगों में मान भी होता, जब इक्का दुक्का लोग ही गाँवों से शहर को जा पाते थे। आज तो कोई घर ऐसा नहीं जहां से एक दो जने दिहाड़ी-मजूरी के लिए पास के शहर न जाते हों।

साइकिल पहले पहल गाँवों में कौतूहल की चीज़ होती थी। जिसके घर साइकिल खड़ी हो तो वो खुद को ज़मींदार से कम नही समझता था। बच्चे गलियों में साइकिल के पीछे दौड़ लगाते, बूढ़े भी रोमांचित हो कभी पास से छू भर आते। पर इन बीते बरसों में तो सब बदल गया। आज बच्चे खुद ही गलियों में साइकिल दौड़ाते मिल जाएंगे। गाँव मे साइकिलें तो हैं पर सड़क नहीं। यह तीसरा चुनावी मुद्दा है। हाईवे से लेकर गांव के बीच स्कूल तक सड़क बनाये जाने का मुद्दा बिशन सिंह ने रखा है। इससे भी तालाब वाले ग्रामीण नाखुश हैं क्योंकि तालाब उस हिस्से में पड़ता है जहाँ सड़क बनाना किसी के मुद्दे में नहीं। इस बात का लाभ उठाया छोटे मियां ने। लोगों के खूब कान भरे", सड़क क्या तालाब पार वालों को ही चाहिए, हमें नहीं ? हम क्या गाय-भइसें हैं जो टौरियों पर चरेंगे ?" गाँव की स्त्रियां हँस देती हैं -' खी!खी !.....टौरियों पर........खी !खी !......गाय-भईसी......'।

अपनी सफलता पर छोटे मियां मिस्त्री मन ही मन मुस्कराता है। और लगे हाथों अपना एजेंडा बता देता है कि अगर जनता-जनार्दन साथ दे तो वो सड़क को स्कूल से आगे मन्दिर तक बनवायेगा। तो, ख्यालों में बनी सड़क तालाब वाले हिस्से तक भी पहुंच गई थी। लालटेन पर निशान पक्का कराकर छोटू मिस्त्री भी चला गया।

इधर गांव में ऐसे भी कुछ लोग थे जिनको अपने काम से ही फुरसत न थी। ऐसों को लोकतंत्र का भागीदार बनाना ज़रा मुश्किल होता है। ये बीड़ा उठाया है अपने रमन भैया ने। सबसे ज़्यादा पोस्टर भी उसी के नाम के छपे हैं। गांव के घर-घर घूमकर सबको बीड़ी का एक-एक बंडल मुफ्त में बाँट रहा है।

बीड़ी - बेरोजगारी की निशानी और रमन भैया का चुनाव-चिन्ह !वह काली, मनहूस छाया एक बार फिर गांव के दौरे पर है। शहर की खिच्च-पिच्च से तंग आकर कुछ दिन हवा पानी बदलने गांव आई है। शहर में उसके कुछ चुने हुए प्रतिनिधि हैं जो वहाँ उसकी कमी खलने नहीं देंगे। अबकी वह ज़रा मूड बदलने गांव आई है।

गांव में फल-सब्जियों के एकमात्र विक्रेता रामसागर का घर ज़रा किनारे की तरफ है। उसे धेला-भर की फुरसत नहीं। गांव से इकट्ठा की गई फल और सब्जियों की टोकरियाँ उसे पास के हाट और मंडी तक पहुंचानी होती है। फिर वहीं पर अपनी एक चलती फिरती दुकान डाल वह फुटकर सब्जियां भी बेचा करता था। गांव वालों की नज़रों में होनहार और मेहनती पर रश्क रखने वालों की भी कमी न थी।

पढ़ा लिखा आठवीं से आगे था नहीं पर व्यवहारिक इतना कि आते-जाते गांव में लोगों से मिलना-जुलना और दूर से ही सलाम-दुआ करना नहीं भूलता था। गांव के लोग वक़्त-ज़रूरत उससे न केवल परामर्श, बल्कि मदद लेने भी अक्सर आते रहते थे। यहाँ तक कि गांव में कहीं कोई बीमार भी पड़ता तो फौरन रामसागर की ड्योढ़ी पर खबर पहुंचती। मरीज को किस अस्पताल में या किस डाक्टर के पास ले जाना है, ये वही तय करता था, बल्कि लेकर भी जाता था। गांव को लौटते वक्त किसी-किसी की ज़रूरत का सामान भी लेता आता था। ऐसी तमाम पर्चियां हर समय उसकी जेब मे पड़ी मिलती थीं जिसमे किसी न किसी ने कोई ज़रूरत का सामान लिख दिया होता था। कमाता भी खूब था पर परिवार बड़ा था सो जिम्मेदारियाँ भी ज़्यादा थीं। फिर फल-सब्जी के व्यापार में अगर मुनाफा था तो घाटा भी जमकर होता था। जब सारे गांव में लहर है तो ऐसे शख्स को कैसे छोड़ दिया जाय ? वह काला साया उसकी ड्योढ़ी पर खड़ा था।

तीन-चार लोग अल-सुबह रामसागर से मिलने पहुंचे। इनमें एक रामदयाल भी था। रामसागर अपने झोट्टे को गाड़ी से बाँध रहा था। रामदयाल काफी समय से रामसागर के घर के चक्कर लगा रहा था। वह रामसागर से रश्क भी रखता था और उसका हुनर सीखना भी चाहता था। रामा-रामी के बाद आखिर उसने काम की बात की, "अब की सहकारी बैंक से मेरे लोन का पता कर आना।"

"मेरी मान रामदयाल, साइकिल की दुकान खोल। तू कहाँ कव्वा (जुगाड़) खरीदने के फेर में पड़ गया। बर्बाद हो जाएगा।" साथ आये एक शख्स ने उसे समझाया।

रामसागर बोला, "बैंक किसकी गारंटी पर लोन देगा तुझे ? न तेरे, ज़मीन न घर। पहले भी बैंक का सचिव मना कर चुका। पर तू कहता है तो अबकी फिर पूछ आऊंगा।"

"पर गारंटी कौन देगा ?"

"तू टीकाराम से बात कर ले। चुनाव का बखत है। इस टेम क्या पता बात बन ही जाए। वो अगर बात करे तो सचिव मना नहीं कर सकता।" रामसागर की ये बात रामदयाल को जँच गई।

"पर उसके कहने पर लोन मिल जाएगा, इस बात की क्या गारंटी ?"

"गारंटी उसकी नहीं तो फिर समझो किसी की नहीं। उसकी ब्लॉक में भी खूब चलती है और बैंक में भी। अबकी प्रधान वही बनेगा, लिखा के ले लो।" दूसरे ने कहा।

"अरे छोड़ो ! टीकाराम का पत्ता कटा समझो। छोटे मियाँ बनेगा या बिशुन सिंह।" रामदयाल कहने लगा।

फिर तो चर्चा का पर्चा ही बदल गया। बस चुनाव और चुनाव। तीसरा शख्स चुप था। रामसागर ने पूछ ही लिया, "तू काहे उदास है रामसुख ?

"सोचता हूँ चचा, तुम ही क्यों खड़े क्यों नहीं हो जाते चुनाव में ? अभी उम्मीदवारी का आखिरी दिन कल है। नाम लिखा क्यों नहीं लेते ?" फिर तो तीनों को जैसे चर्चा का नया मुद्दा ही मिल गया था।

"लड़का ठीक बोलता है।" रामदयाल ने शुरू किया। और फिर एक-एककर तीनों उसमें जोड़ते चले गए। रामसागर की गांव में जो इज्जत है, उसका वास्ता दिया जाने लगा। अपने यहाँ तो वैसे भी बैठे -ठाले लोग बातें बनाने में होशियार ज़्यादा ही होते हैं। घर फूँक तमाशा तो सब देखना चाहते हैं, बशर्ते घर किसी और का हो। रामसागर न नुकुर करते भी सोच में पड़ ही गया।

रामसागर की पत्नी फल-सब्जियों पर पानी छिड़क रही थी। आते जाते इन सब की बातें भी सुन रही थी। पति की मान-मनौव्वल वाली बातों तक तो ठीक था। मन ही मन प्रसन्नता और गर्व से सुनती रही। पर जब लगा पानी सिर के ऊपर से जाने ही वाला है, वो भी कूद पड़ी।

"रहने दो भैया। तुम इन्हें मत फुसलाओ।ये इन चक्करों को नहीं जानते। ठीक ठाक दो जून की रोटी मिल जाती है मजूर आदमी को उसी में खुश रहना चाहिए। "

"फुसलाना कैसा भाभीजी ? वो ही कह रहे हैं जो सच है। रामसागर जैसा नेक आदमी प्रधान होना ही चाहिए। नहीं तो साहब सिंह जैसे घोटालेबाज प्रधान हो जाएंगे। देखते नहीं, चुनाव लड़ने खातिर भैंस भी बेच दी है।"

रामदयाल जानता था कि रामसागर ने अगर ज़िद पकड़ ली तो पीछे नहीं हटेगा। जीत गया तो उसकी भी चाँदी, न भी जीता तो उसके घर से क्या जाएगा ? ड्योढ़ी का साया भी धीरे-धीरे खिसककर आगे बढ़ रहा था।

"रहने दो भैया। ज़्यादा तड़का मत लगाओ। ये तो तुम्हारी बातों में आ भी जाएंगे। मजूर आदमी चार दिन कमाने नहीं जाएगा तो खायेगा क्या ?"

"चार दिन नहीं जायेंगे तो फ़ाक़ा थोड़े ही पड़ जायेगा।" अबकी रामसागर बोला और मानो अपनी ही बात पर हँस दिया।

अगले ही दिन लोगों ने एक ओर से सुना," रामसागर को वोट देकर सफल बनायें। रामसागर भाजी वाले। चुनाव चिन्ह पतंग।" प्रधान पद का वह पंद्रहवाँ प्रत्याशी था।

गांव-गली की दीवारों पर अपने चित्रों को देख वह मन ही मन एक विचित्र अनुभूति से भर गया। काम पर जाने की बजाय चार जने साथ लेकर गाँव भर में समर्थन माँगता विनय की प्रतिमूर्ति बना फिरता था। पर ये विनय उसकी स्वाभाविक विनम्रता से ज़रा हटकर था और उतनी ही हटकर थीं वे निगाहें जो अब उसपर पड़ रही थी। लोग वही थे जिनके दसियों काम उससे पड़ते रहते, पर निगाहें कुछ अलग होतीं। बड़े प्यार से जब वह चुनाव में ख्याल रखने की बात करता तो सामने वाला भी उतने ही प्यार से निवेदन स्वीकार करता। गांव में ऐसे बीसियों घूम रहे थे। रमन तो मन ही मन दाढ़ पीसकर कहता, "अब इसी की कमी थी। खुद तो काम धंधा में कमा रहा है, हमारे जैसों के लिए यहाँ भी रास्ता रोकने चला आया।"

यों तो साल अभी आधा बाकी था, पर नए साल के कैलेंडर बाँटे जा रहे थे। कैलेंडर के नीचे हाथ जोड़े टीकाराम की मुस्कुराती फोटू। कइयों ने फोटो काटकर केवल कलेंडर वाला हिस्सा दीवार पर टांग दिया था।

कच्चे रास्ते पर टीकाराम की जीप आकर खड़ी हुई थी। कीचड़ भरे रास्तों पर सावधानी से पैर निकालकर वह बाहर आया। बस्ती का उसका अपना आदमी रमज़ान अली फौरन सामने आ गया। दो चार लोगों को लेकर गांव की एकमात्र दुकान पर पहुंचे। वहीं उससे कुछ बातें होने लगीं।

"नमस्कार, ठेकेदारजी।" रामसागर ने अपने समर्थकों सहित अभिवादन किया। थोड़ा बहुत कुशल क्षेम के बाद आगे बढ़ गया। रामदयाल कुछ पीछे आ रहा था। टीकाराम ने उसे रोककर पूछा, "रामदयाल, क्या हाल हैं ?"

"किरपा, ठेकेदारजी "

"कुछ तकलीफ तो नहीं ?"

"ज़्यादा कुछ नहीं, बस एक ज़रा सी बात।"

"हाँ, भाई बोलो।"

"बैंक वाले लोन नहीं दे रहे।"

"बस इतनी सी बात ? कल ही सुबह आकर मिलो। हाथ के हाथ काम हो जाएगा।"

रामदयाल देख चुका था, रामसागर के साथ घूमकर कुछ अर्जित नहीं कर सकता था।

"एक बात बताओ।" टीकाराम उसके कान के नजदीक मुँह ले गया-"तालाब वाले इलाके में किसकी हवा है ?"

"इस बख्त तो छोटे मियाँ का जोर है। पर कुछ कह नहीं सकते।"

विदा लेकर रामदयाल चलता बना। शाम के समय उसने रामसागर को नई बात सुझा दी कि अगर रुतबा बनाना हो तो एक जीप किराए पर लेनी होगी। अब तो नुमाइंदे भी काफी थे। सबके मन की सुनी जाती थी। सो अगले दिन जीप भी बुक हो गयी। रामसागर चार दिन से काम पर तो गया नहीं, उल्टे हजारों का खर्चा सिर पर पड़ा, सो अलग।

जब नाम वापस लेने की तारीख आयी तो एक विचित्र बात हुई। चार-पाँच लोगों को छोड़ बाकी सबने नाम वापिस ले लिए और वे सब टीकाराम की जीप में घूमते देखे गए।

"टीकाराम चालबाज़ी पर उतर आया है।" जमन रामसागर को बताने लगा, "तुमसे टक्कर लेने के लिए पैसा पानी की तरह बहाए जा रहा है। पीछे मत हटना। मुकाबला टक्कर का ही होना चाहिए।"

रामदयाल पुराना जुगाड़ खरीद लाया था। उसपर फल सब्जी और सवारी, दोनों ढोने लगा। गांव में वैसे भी सबकी फल-सब्जियाँ खेतों में सूखने लगी थी। सबने उसे थोक में दे दिया। रामदयाल अपने धंधे में जम गया।

चुनाव-प्रचार समाप्त होने तक स्थिति लगभग साफ हो चुकी थी। कुल पाँच प्रत्याशी ही असल मैदान में थे - छोटे मियाँ, बिशुन सिंह, रमन भैया, टीकाराम और रामसागर। इनके अलावा बाकी लोगों की कोई चर्चा भी न करता।

चुनाव का दिन आया और गया। बड़ी शांति के साथ बिना कोई शोरगुल किये प्रत्याशियों की किस्मत डिब्बों में बंद हो गयी। जिससे भी पूछो वोट किसे दिया तो यही सुनने को मिलता कि दे आये जिसको देना था। जवाब देने में महिलाओं का जवाब नहीं। किसे वोट दिया पूछो तो कहती - "जिसे इन्होंने (उनके पति) वोट दिया, उसी को हम भी दे आये। अब मत पूछो।"

इधर सुनने में आया कि रामदयाल वोट देने नहीं गया, उस दिन भी किसी काम से बाहर ही था। पूछने पर बोला-"मेरी औरत गयी तो थी। दोनो जने जाकर क्या करते ?"

वोटों की गिनती का दिन आया। रात भर गिनती चलती रही। सभी प्रमुख उम्मीदवार और उनके एजेंट सुबह से ही डेरा डालकर वहीं पड़े थे। थोड़ी ही देर में रमन भय्या का पत्ता साफ हो गया। बेरोजगारी खत्म। कुछ ही देर में बिशुन सिंह और रामसागर भी टाँय बोल गए। अब केवल टीकाराम और छोटे मियाँ रह गए। काँटे की टक्कर थी। बहुत रात गए दोबारा, तिबारा गिनाकर तब कहीं सुबह तक स्थिति साफ हो सकी। इसी बीच रामसागर पहले तो घुटनों के बल उकड़ूं बैठकर बच्चों की तरह रोया, फिर न जाने कब मौके से खिसककर घर आ गया। जीप सब लोगों को उनके घर छोड़ कर सुबह रामसागर के दरवाजे पर आ लगी।

जब सवेरे सात बजे लोग वापस लौटे तो रात की थकान चेहरों पर साफ दिख रही थी। फैसला हो चुका था। सभी घरों में हलचल मच गई। उसी समय रामदयाल जुगाड़ पर फल-सब्जियां लादकर शहर की ओर जा रहा था। उसने चलते-चलते ही पूछा- "भाई जमन, कौन जीता ?"

जवाब आया -"छोटे मियाँ मिस्त्री।"

"चलो...अब अपने गांव तक सड़क तो बनेगी।" हिचकोले खाते कच्चे रास्तों से जुगाड़ को सरपट ले जाते वह बोला।

सारे गांव की वीरानी एक अकेले रामसागर के घर पर छाई थी। वह अभी तक भी बिस्तर पर औंधे मुँह पड़ा था। जाने सो रहा था या जग रहा था। बाहर बकायेदार तकादे के लिए खड़े थे। किराए की जीप का ड्राइवर भी अपने मालिक के इंतज़ार में बाहर ही खड़ा था।

वह काली मनहूस छाया अबकी चौक में बैठी है। धूप में अलसाती हुई टाँगें फैलाकर। उसने वापसी का इरादा छोड़ दिया है। उसे गांव की आबो-हवा रास आ गयी है।


ख़जाने का श्राप


दीक्षा और रुपेश विश्वविख्यात पुरातत्व वैज्ञानिक हैं..... अब तक उन्हें अनगिनत पुरस्कारों से नवाज़ा जा चुका है..... पुरातत्व विज्ञानं में दिया जाने वाला विश्वविख्यात पुरस्कार भी उन्हें इस साल मिलने वाला है..... आख़िर उनकी मेहनत का फल ही है जो उन्हें इन पुरस्कार के रूप में मिलता है.....

पुरस्कार की घोषणा हुई , और हॉल में बैठे सभी लोगों ने ताली बजा कर उनका स्वागत किया और उन्हें पुरस्कार से सम्मानित किया गया, इसके बाद उनके साथ पुरस्कार पाने वाले सभी वैज्ञानिक जिन्होंने अलग अलग क्षेत्रों में ख़ोज की और कुछ उत्कृष्ट किया , उन्होंने साथ में रात का डिनर किया....


आज दीक्षा और रुपेश को किरबाती द्वीप जाना है , एक ख़जाने की ख़ोज में..... बहुत उत्साहित हैं दोनों ,क्योंकि इस ख़जाने की ख़ोज उनके करियर को नई बुलंदियों पर पहुँचा सकता है , और वो विश्व के पहले वैज्ञानिक बन जायेंगे जिन्होंने किरबाती के ख़जाने का पता लगाया है। दोनों अपना सारा सामान पैक करते है और निकल पड़ते हैं किरबाती द्वीप की ओर..... किरबाती पहुँचने के लिए गाड़ी से उतर कर अब पानी के जहाज़ में बैठना है क्योंकि वो द्वीप महासागर में स्थित

है।

लगभग 1 घंटे के बाद वो पहुंचते हैं किरबाती जहाँ पहले से ही उनकी टीम खुदाई कर रही है..... वह पहुँचने पर उस द्वीप के आदिवासी मुखिया ने दोनों का स्वागत अपनी परंपरा के अनुसार किया ...और उन्हें रात्रि भोज के लिए आमंत्रित किया। रात होने पर आदिवासी मुखिया के रात्रि भोज के लिए जाते है और उस से द्वीप के खजाने के बारे में पूछते हैं......मुखिया उन्हें कड़े शब्दों में समझाता है के वो उस ख़जाने को ढूंढ़ना चोर दे अन्यथा उनको इसका दुष्परिणाम देखने को ज़रूर मिलेगा क्योकि उस खजाने से एक श्राप जुड़ा हुआ है की जो कोई भी उस खजाने तक पहुँच जायेगा उसकी अकाल मृत्यु निश्चित है...... पर दोनों, दीक्षा और रुपेश इस बात धयान न दे कर खुदाई के लिए तैयार हो रहे होते है अगले दिन के लिए। .

अगले दिन ही.... उन्हें कुछ मंदिर,मूर्ति ,बर्तनऔर कुछ आभूषण मिलते है खुदाई में , इस से उनकी उम्मीद बढ़ जाती है की खजाना भी वो ढूंढ निकालेंगे ... और शाम को ही ये समाचार मिलता है के आभूषणों की खुदाई के दौरान ७ बड़े मटके मिले हैं ,पर श्राप के कारण कोई भी उस मटके को हाथ नहीं लगाना चाहता है..... तभी दीक्षा आगे बढ़ती है और मटके को उठाती है और रुपेश भी उसकी मदद करता है ऐसा करने में क्योकि श्राप के कारण कोई भी उस मटके को हाथ नहीं लगाना चाहता।

मटका मिलने के बाद दोनों, दीक्षा और रुपेश दोनों मटके को ले कर अपने टेंट में जाते है के कुछ और टेस्ट के बाद उन्हें इस खजाने की बारे में बहुत सी जानकारी मिल जाएगी....बहुत समय के बाद जब दोनों में से कोई भी उस टेंट से बाहर नहीं आता है तो उनके सहकर्मियों को संदेह होता है के कही उस श्राप की बात निकली। ..सहकर्मी टेंट की तरफ भागते है और टेंट में पहुंच कर जो देखते है वो उसको देख कर सभी की आँखे फटी की फटी रह जाती हैं। के दोनों, दीक्षा और रुपेश मर चुके हैं और मटके का खजाना वहाँ से गायब है..... और आज तक कोई इस रहस्य को नहीं सुलझा पाया की आखिर दोनों की मौत कैसे हुए और वो मटके का ख़ज़ाना कहाँ गया।


मानव भेड़िया


अब मुझे ठीक से तो याद नहीं कि बात कितनी पुरानी हैं, पर जो कुछ हुआ वो एक एक बात आज भी ज़ेहन में अपना घर बनाए बैठी हैं ।

हम चार लोगों ने मिलकर पहाड़ की ठंडी वादियों के नजदीक पिकनिक मनाने की योजना बनाई। यह जगह हमारे शहर से 4 मील की दूरी पर थी। यह जगह हिमालय के नजदीक के जंगलों के पास थी। पहाड़ियों से भरी हुई जगह।

सर्दियों की शुरुआत होने के कारण कम मात्रा में बर्फ पड़ रही थी। उस रात को चांद पूरा निकलने वाला था और हम जानते थे कि इससे वहाँ का दृश्य और भी सुंदर होगा। इस सफर में, मैं ,राजेश, मनोज और विकास शामिल थे। हम लोगों ने कुछ बीयर्स और कुछ नशे की चीजें अपने साथ में ली थी, ताकि हम पूरी रात एन्जॉय कर सकें। तकरीबन रात के 10:00 बज रहे थे, जब हम निकले। जिस जगह हम जा रहे थे। वह एक मनोरंजन की जगह थी, जहां पर लोग मजे कर सकते थे ,कैंप लगा सकते थे और वहां पर पास में एक छोटी सी नदी में नाव चला सकते थे।

उस जगह जाने के लिए हमें मेन रोड को छोड़ना था। सब कुछ सही चल रहा था। चांद की रोशनी इतनी थी जिससे कि रोड और आसपास की चीजें साफ दिखाई दे रही थी। हमने एक जगह पर कार को पार्क किया। राजेश ने सिगरेट जलाई और मेरी ओर बढ़ा दी। हम दोनों आगे वाली सीट पर बैठे थे। मनोज और विकास पीछे वाली सीट पर बैठे हुए थे ,जैसे ही मैं सिगरेट पीने वाला था कि तभी मैंने अपनी कार के सामने लगभग 20 मीटर की दूरी पर किसी चीज को हिलते हुए देखा। पहली बार देखने पर तो वो मुझे एक हिरण के जैसा लगा। मैं सीट में आराम से पसरकर बैठ गया पर तभी मैंने उस चीज को अपनी कार के बाएं और आते हुए देखा। विकास भी यह जान चुका था कि कार के बाएं और कोई चीज तो है। वह बस पूछने ही वाला था कि क्या हो रहा हैं? तभी उसने, उस चीज को गाड़ी के पीछे की ओर जाते हुए देखा।

मुझे याद हैं कि मैंने मुश्किल से ही एक बार सिगरेट पी थी। विकास तो हम चारों में सबसे छोटा था वो अभी 15 वर्ष का ही होगा, वो ना तो स्मोक करता हैं और ना ही कोई ड्रिंक करता हैं और हमें इतना समय भी नहीं हुआ था कि हम यह काम कर सकते थे। हम सब चुपचाप बैठे हुए थे। 

हम दोनों ने कहा-क्या है वो ?

 उन लोगों ने कहा - क्या ?

हम लोगों ने कहा कि-बाहर कोई तो हैं?

वो दोनों हंसने लगे, पर इसके बाद उन्होंने भी उस चीज को कार के दाएं ओर हिलते हुए देखा। उस समय मेरे रोंगटे खड़े हो गए और मुझे किसी अनहोनी के होने की आशंका हुई। वह फिर से हमारी कार के पास से गुजरा पर पहले से काफी ज्यादा पास से। इस समय तक मैं चाहता था कि हम वहां से जल्द से जल्द निकल चलें। हम सब पूरी तरह से डर चुके थे और हम जानना चाहते थे कि वह चीज क्या है?

यह जो भी था एक बार फिर से हमारी कार के चक्कर लगाने लगा, जैसे ही यह हमारे कार के सामने आया। राजेश ने कार की हेडलाइट ऑन कर दी ,पर जैसे ही लाइट उस जगह पर पड़ी, वहां पर कोई नहीं था। कुछ सेकंड पहले तक वह वहीं पर था। जब राजेश ने एक बार फिर से कार की हेडलाइट ऑन की, तो वह फिर से कार के बाएं ओर आ गया। पहले से भी बहुत ज्यादा पास में। 

हम नहीं जानते थे कि वह क्या था? इस समय तक विकास काफी ज्यादा डर चुका था और साथ में, मैं भी। हम सभी राजेश पर चिल्लाये कि हम सबको यहां से निकालो। वह भी हमारी ही तरह डरा हुआ था। 

 उसने गाड़ी को स्टार्ट किया और आगे जाने की बजाय वह गाड़ी को रिवर्स में ले गया ताकि हम पीछे होते हुए उस जगह से मेन रोड पर पहुंच सकें। हम किसी तरह से चलते-फिसलते हुए ऊपर चढ़ते हुए मेन रोड पर आ पहुंचे। हमने सोचा कि अब सब कुछ ठीक हैं पर तभी मैंने अपनी जिंदगी की सबसे डरावनी चीज का अनुभव किया ,जिसे शायद ही मैंने पहले कभी महसूस किया हो।

जैसे ही हम ऊपर चढ़े हमने देखा कि कार की हेडलाइट की रोशनी जहां पर जाकर खत्म हो रही थी उस जगह पर एक जानवर खड़ा था। 

वह उस जगह पर एक ऐसे आदमी की तरह खड़ा था ,जो पूरी तरह से बड़े-बड़े बालों से ढका हुआ हो। तथा बहुत ही डरावना हो। जब उस पर लाइट पड़ी तो वह मुड़ा। अब हम उसको पूरी तरह से देख पा रहे थे, वह मेरी ही आंखों में देख रहा था और कसम से उस समय मेरी दिल की धड़कन बस रुकने ही वाली थी।

उसकी आंखों की जगह गहरे काले गड्ढे थे और उसकी आंखों में दहशत और पागलपन के सिवा और कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। ऐसा बस कुछ सेकंड के लिए ही हुआ था ,कि तभी राजेश ने कार की स्पीड बढ़ायी। वह उसको कार से टक्कर मारना चाहता था। पर वो जानवर वहां से बड़ी ही तेजी से गायब हो गया, मानो जैसे वह पहले कभी वहां था ही नहीं।

 वो हेडलाइट की रोशनी से क्यूँ डरता था।

 यह तो मैं नहीं जानता। पर जितनी तेजी से हो सके हम उतनी तेजी से उस जगह से निकल गए।

 बाहर बहुत ठंड थी और ठंड के इस समय में बाहर न तो कोई आदमी होता हैं और ना ही कोई दुकान खुली होती हैं और दूसरी बात वह इलाका बिल्कुल सुनसान था। और रात के इस समय में वहाँ

 मुश्किल से ही कोई गाड़ी दिखाई देती थी।

 हम नहीं जानते कि वो क्या था और वह कहाँ से आया था ?

खैर जैसे तैसे हम अपने पिकनिक वाले स्थान पर पहुँच गए। 

&nbsnbsp;हमने अपना कैंप लगाया और एन्जॉय करने लगे, बियर की बोतल खोली और ठंडी रात में आग के आगे बैठकर बियर का मजा लेने लगे, विकास ने भी आज बियर की बोतल लेकर अपनी पहली बियर कुछ इस तरह पी जैसे वो अपने बड़े होने का सबूत दे रहा हो, हम मौज मस्ती करते रहे और बाते करते रहे, तभी दूर से कोई आता हुआ दिखाई दिया, हम घबरा गए कही, वो ही जानवर फिर से तो नहीं आ गया, हम ये सोचने लगे हुए थे, पर कुछ देर बाद हमें साफ साफ दिखने लगा वो हमारे काफी नजदीक आ चुका था। 

हमने देखा कि एक नौजवान ठंड में कांपते हुए हमारे नजदीक आ रहा था ।

 उसने हम से कहा कि मैं कुछ देर के लिए यहाँ आग के पास बैठ सकता हूं, मुझे बहुत ठंड लग रही हैं। हमने उसे अपने पास बिठाया और पीने के लिए एक बियर की बोतल दी, उसने हमारा आग्रह स्वीकार किया और फिर हम बाते करने लगे ।

उसने बताया कि वो इसी तरह नई नई जगह पर जाता रहता हैं और पर्वतों तथा जंगलों में घूमकर नई नई जड़ी बूटियों की खोज करता रहता हैं, आज उसे यहाँ ज्यादा देर हो गई ठंड भी बढ़ चुकी थी और मैं साथियों से भी बिछड़ चुका हु, अगर मैं थोड़ी देर में वापस नहीं लौटा तो वो मुझे जरूर ढूंढने आएंगे, तब तक मैं आप लोगों के साथ समय बिता लेता हूं ।

हमने कहा, क्यों नहीं, हमें भी एक नए व्यक्ति की बाते सुनने को मिलेगी, कब से चारों की बातें सुन सुनकर परेशान हो चुके थे ।

 फिर उसने पूछा आप लोग इतनी रात को क्या कर रहे हो यहाँ, क्या आप लोगों को नहीं पता कि यहाँ एक मानव-भेड़ियाँ घूमता रहता हैं ।

हम सब हंसने लगे और कहने लगे ऐसा कुछ नहीं होता हैं । सब किस्से कहानियों में होता हैं ।

उसने कहा मजाक नहीं हैं ये, मैं जानता हूं एक सच्ची कहानी की कैसे एक खूनी दरिंदा मानव भेड़ियाँ, एक खूनी भेड़ियाँ ना रहा और कैसे भेड़िया मानव को एक लड़की से सच्चा प्यार हो गया और वह उसके लिए कुछ भी करने को तैयार हो गया?

हम बोले चलो सुनाओ वो कहानी हमारा भी वक्त गुजर जाएगा । 

उसने कहानी सुनानी शुरू की-----

मेरी यह कहानी हैं एक भेड़िया की जो अपने अस्तित्व के लिए लड़ रहा हैं। वह कभी जीतता हैं तो कभी हारता हैं लेकिन कभी हिम्मत नहीं छोड़ता हैं। यह भेड़िया मनुष्यों की तरह जीवन व्यतीत करता हैं क्योंकि यह मनुष्य का भी रूप ले सकता हैं। लेकिन सच में यह पहले ऐसा नहीं था, उसे तो ऐसा एक घटना ने ऐसा कर दिया। जो मैं आपको बताने जा रहा हूं।

 बहुत समय पहले की बात हैं कि लकड़हारा था। वह जंगल में जाकर लकड़ियां लाता था और अपना खाना बनाता था। एक बार उसे जंगल में रात हो गई, वह डरने लगा कि कहीं कोई जंगली जानवर उसे काट ना ले। वह हिम्मत करके अपना काम करता रहा। लेकिन एक भेड़िया उसे बहुत दूर से घूर रहा था। वह उसका मांस खाना चाहता था। जब लकड़हारा जाने लगा तो भेड़िया ने पीछे से उस पर हमला कर दिया। 

लकड़हारा पहले ही सतर्क हो गया था क्योंकि उसने भी भेड़िया को देख लिया था। उसने बचने की कोशिश की लेकिन वह नहीं बच पाया, भेड़िया ने उसकी गर्दन पर घाव कर दिया। फिर भी उसने हिम्मत दिखाई और वहां से बचकर भाग गया। घर जाकर उसने दवाई ली और कुछ दिनों में वह बिल्कुल ठीक हो गया। वह फिर से अपनी दिनचर्या में लग गया।

लेकिन वह भयानक रात आ ही गयी जो सब कुछ बदलने वाली थी। वह रात पूर्णिमा की रात थी। सुबह से ही उस लकड़हारे का मन किसी काम में नहीं लग रहा था ।उसे आभास हो गया था कि अब कुछ घटित होने वाला है।

 जब रात्रि के 12 बजे, तब उसका शरीर बिल्कुल सुन्न पड़ गया उसके शरीर का आकार बढ़ने लगा और देखते ही देखते वह एक विशालकाय भेड़िया बन गया। पूरे शरीर पर बाल उग आए, हाथ पाँव भयानक नुकीले नाखूनो से भर आये, आंखें हरी रंग की बन गयी, दांत भयंकर मांसाहारी जानवर की तरह बन गए वह पूरी तरीके से मानव भेड़ियाँ में बदल चुका था । 

अब वह शहर की तरफ भागा। उसने सबसे पहले एक

नौजवान को अपना शिकार बनाया जो सड़क पर जा रहा था। फिर वह जंगल में चला गया। अब हर रात वह भेड़िया बनने लगा, उसे भी इसमें मज़ा आने लगा और वह शिकार करने लगा।

धीरे धीरे पूरे शहर में दहशत फैल गई, और सभी लोग घर में छिपकर रहने लगे। सभी ने रात में घूमना बन्द कर दिया।

ये सिलसिला ऐसे ही चलता रहा ।

एक रात को एक बहुत ही सुंदर लड़की अपने घर की बालकनी में खड़ी हुई पूर्णिमा के चांद को निहार रही थी और अपने ख्यालों में गुम कुछ सोच रही थी, तभी उसको ये आभास हुआ कि जैसे कोई उसे छुपकर देख रहा है, वो पीछे मुड़कर देखने ही वाली थी कि उसकी माँ ने अंदर से आवाज दी रोहिणी अंदर आ जाओ खाना नहीं खाना हैं क्या ?

 वह तुरंत भाग के अंदर चली गई, और खाना खा कर सो गई । कुछ देर बाद उसे सोते हुए एक सपना आया, सपने में उसने देखा की वह अपने घर के पास वाले एक जंगल में और वह जंगल में टहल रही हैं आगे उसे दिखा की कहीं दूर एक पेड़ के पास कुछ अजीब सी आवाज आ रही हैं, उसने ध्यान से देखा तो उसे वहां एक जानवर की पूंछ दिखाई दे रही थी वह समझ नहीं पा रही थी कि यह किस जानवर की हैं।

शायद किसी कुत्ते की या भेड़िए की उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था, अजीब अजीब सी आवाजें भी सुनाई दे रही थी । 

वह उस पेड़ के नजदीक गई और उसने देखा वहां पर एक सुंदर युवक हरे रंग की आंखों वाला उसके सामने खड़ा है वह उसे देख कर चौंक गई और पूछने लगी कि तुम इस जंगल में क्या कर रहे हो ? कहां रहते हो ? वह नौजवान कुछ जवाब दे पाता इससे पहले ही घड़ी ने अलार्म की आवाज बजानी शुरू कर दी और रोहिणी की नींद टूट गई उसने घड़ी में समय देखा और उठकर जल्दी जल्दी कॉलेज के लिए तैयार हो गई। 

 जब वह कॉलेज पहुंची तो वहां पर एक दो अध्यापक के अलावा अन्य कोई अध्यापक मौजूद नहीं था। इसलिए उसके सभी क्लासेस खाली ही जा रही थी।

तो वह पार्क में एक बेंच पर अकेली बैठकर रात वाले सपने के बारे में सोचने लगे तभी उसे एहसास हुआ कि जैसे कोई उसके पास आकर खड़ा हो गया हैं। उसने अपना सिर ऊपर करके देखा तो वह अचंभित रह गई, उसके सामने वही हरी आंख वाला लड़का खड़ा था। जिसको उसने सपने में देखा था।

लड़की ने उससे पूछा कि तुम कौन हो, यहां क्या कर रहे हो ?

 लड़के ने जवाब दिया की मेरा नाम आकाश हैं, मैं इस शहर में नया आया हूं। आज ही इस कॉलेज में एडमिशन लिया हैं मेरा कोई दोस्त नहीं है। तुम्हें यहां अकेले बैठा देखा तो सोचा की तुमसे बातें कर लू, फिर रोहिणी ने पूछा तुम कौन सी कक्षा में पढ़ते हो?

 आकाश ने जवाब दिया की मैं बी. कॉम. फर्स्ट ईयर का छात्र हूं रोहिणी झट से बोली, अरे मैं भी तो उसी क्लास में पढ़ती हूं फिर दोनों बातें करते रहे और कॉलेज की छुट्टी के बाद दोनों अपने अपने घर चले गए।

 अब वह दोनों रोज कॉलेज में मिलते और रोज बातें करते यह सिलसिला काफी दिनों तक ऐसे ही चलता रहा ।

धीरे धीरे दोनों एक दूजे के काफी नजदीक आ चुके थे अब दोनों एक दूसरे को बहुत प्यार करने लगे थे ।

एक दिन रोहिणी अपने घर पर अकेली बैठी हुई बोर हो रही थी, उसने सोचा क्यों ना थोड़ी देर बाहर जंगल की ओर घूम कर आ जाऊँ और वह जंगल की ओर घूमने निकल गई।

थोड़ी दूर आगे चलकर उसने देखा कि कोई उसे काफी देर से टकटकी बांधे हुए देखे जा रहा है उसे लगा की जैसे कोई भेड़िया उसे घूर रहा है और उस पर हमला करने वाला हैं, परंतु वह भेड़िया सिर्फ उसे देखे जा रहा था और अपनी जगह से हिल भी नहीं रहा था। रोहिणी कुछ समझ नहीं पाई और वो काफी डर चुकी थी। डर के मारे उसकी कँपकँपी छूटने लगी थी और वह भागते भागते अपने घर पहुंची डरी सहमी सी वह अपने बिस्तर में जाकर लेट गई थोड़ी देर बाद उसकी मां ने उसको आवाज़ लगाई, परन्तु रोहिणी अभी भी डर से कांप रही थी, जब मां को रोहिणी का कोई भी उत्तर नहीं मिला तो माँ उसके कमरे में गई और उससे पूछा कि क्या हुआ बेटा?

माँ देख चुकी थी कि वह डरी हुई है, रोहिणी माँ के गले लगी और जोर जोर से रोने लगी रोते-रोते उसने बताया कि मां हमारे पास वाले जंगल में बहुत ही भयानक भेड़ियाँ है, बड़ी मुश्किल से अपनी जान बचाकर आई हूं आज, माँ ने बोला तू घबरा मत मैं अभी वन विभाग को फोन करके भेड़िए के बारे में बताती हूं, वो उसको पकड़ कर ले जाएंगे या इसे कहीं और घने जंगल में दूर छोड़ आएंगे फिर रोहिणी आंखें बंद करके सो गई।

कुछ देर बाद माँ रोहिणी को जगाने आई, उठ जा बेटा देख तेरा कोई कॉलेज वाला दोस्त मिलने आया है।

रोहिणी ने बाहर आकर देखा तो सामने उसके आकाश खड़ा था।

आकाश में उससे से कहा चलो आओ आज हम कहीं बाहर घूमने चलते हैं, रोहिणी ने कुछ पल सोचा और सोचा चलो आकाश के साथ घूम कर आती हूँ, शायद मेरा मन हल्का हो जाए और मेरा मूड भी ठीक हो जाए ।

 फिर वह दोनों बाहर चले गए चलते चलते रोहिणी ने आकाश से पूछा कि हम कहां जा रहे हैं । आकाश ने बोला आज मैं तुम्हें अपने घर ले जा रहा हूं और वहां मैं तुम्हें अपने परिवार वालों से मिलवाऊंगा ।

 फिर वह दोनों बातें करते हुए आगे चलते रहे, आकाश उसे जंगल की तरफ ले जा रहा था। रोहिणी ने कहा यह कहां ले जा रहे हो इस रास्ते पर तो भयानक जंगल आता है। आकाश ने बोला कि मेरा घर इस तरफ ही है ।

मैं यहीं रहता हूं, फिर वह दोनों आगे चलते गए । फिर आकाश एक बड़ी सी गुफा के सामने आकर रुक गया।

 रोहिणी उसको देख कर बोली यह कहां ले आए यह तो किसी जानवर की गुफा लगती हैं और तब आकाश ने बोला मैं यहीं रहता हूं तुम अंदर तो चलो।

फिर आकाश और रोहिणी उसमें अंदर चले गए। अंदर जाने के बाद आकाश में अपने परिवार वालों को आवाज लगाई । बोला कि देखो मैं किसे लाया हूं मिलवाने के लिए, थोड़ी देर में वहां से भेड़ियों के गुर्राने की आवाजें आने लगी और दो भेड़िए बाहर निकल कर आए उन्हें देखकर रोहिणी डरने लगी।

डरते डरते बोली आकाश यह दोनों कौन है? मुझे बहुत डर लग रहा ।

आकाश ने कहा डरो नहीं यह मेरे माता-पिता है और फिर वह दोनों तुरंत ही मनुष्य रूप में रोहिणी के सामने आ गए ।

यह सब देखकर रोहिणी बहुत घबरा रही थी, कुछ बोल नही पा रही थी।

 आकाश ने रोहिणी से कहा मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूं और मैं तुम्हें अपनी पत्नी बनाना चाहता हूं इसलिए मैं तुम्हें आज अपने माता-पिता से मिलवाने लाया हूं।

यह सुनकर रोहिणी दंग रह गई और बोली कि मैं जानवरों से शादी नहीं कर सकती मुझे जानवर बिल्कुल पसंद नहीं है।

तुम जानवर हो तुम्हारे माता-पिता भी जानवर है ।

यह कहकर रोहिणी वहां से चली गई।

 यह सब सुनकर आकाश के माता-पिता को बहुत गुस्सा आया और वह भेड़िए रूप में वापस आ गए और गुस्से में गुर्राते हुए रोहिणी के पीछे भागे ।

आकाश समझ चुका था कि उसके माता पिता रोहिणी को जीवित नहीं छोड़ेंगे, आकाश भी उनके पीछे भागा लेकिन जब तक आकाश वहाँ पहुँचा तब तक उन्होंने रोहिणी को मार दिया था ।

 रोहिणी को अपने सामने मरा हुआ देख आकाश बहुत दुखी हुआ, वो खुद को इस सब का जिम्मेदार मानने लगा, और फिर उसने अपनी शक्ति से खुद की बलि देकर रोहिणी को जीवित कर दिया ।

 थोड़ी देर बाद जब रोहिणी को होश आया तो उसने देखा कि उसके हाथ में एक कागज का टुकड़ा हैं ।

 उसने उसे खोला और पढ़ा तो उसमें लिखा था कि रोहिणी मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूं, इसलिए मैं अपने प्राणों की आहुति देकर तुम्हारा जीवन लौटा रहा हूं, अब तुम इस शहर में मत रहना यहाँ से कही दूर जाकर रहना और अब मैं तुम्हें कभी नहीं मिल पाऊंगा । फिर उसने देखा कि वही पास ही में एक भेड़ियाँ है जिसमें अब प्राण नहीं बचे थे। वो समझ गई ये आकाश ही हैं ।

 रोहिणी थोड़ा विचलित हुई उसकी आंखें नम हुई पर वो सब कुछ भुलाकर अपने घर चली गई ।

कुछ दिनों बाद रोहिणी की माता जी का ट्रांसफर हो गया अब रोहिणी अपनी माताजी के साथ एक नए शहर में थी ।

उधर आकाश के माता पिता को भी अपने किये पर पछतावा हो रहा था कि उन्होंने अपने बेटे को खो दिया । इसलिए उन्होंने पूर्णिमा की रात का इन्तेजार किया इस दिन भेडियो की शक्तियाँ बहुत अधिक बढ़ जाती हैं और कुछ रूहानी शक्ति भी उन्हें मिलती हैं, इसी का फायदा उठाकर उन्होंने अपने बेटे आकाश को फिर से जीवित कर दिया ।

आकाश जीवित तो हुआ परंतु रोहिणी को अभी भी नहीं भुला पा रहा था । एक दिन उसने अपनी शक्ति का प्रयोग करके देखा कि रोहिणी कहाँ पर हैं, तो उसे पता चला कि वो एक नए शहर में हैं और फिलहाल एक नौकर की तलाश में हैं ।

आकाश ने अपना वेश बदला और रोहिणी के घर नौकर का काम करने के लिए उसके घर गया, उसकी माँ ने उसे अपने यहाँ नौकरी दे दी ।

क्योंकि उसने वेश बदला हुआ था तो रोहिणी उसको पहचान नहीं पाई ।

अब आकाश रोज रोहिणी को देखा करता और उसके प्यार को महसूस करता परंतु कुछ कह नहीं पाता, रोहिणी की माँ सुबह ही अपने ऑफिस चली जाती और शाम को घर वापस आती । तब तक रोहिणी अकेली रहती ।

एक दिन पड़ोस के आवारा लड़के रोहिणी के घर में घुस गए और लगे उसको छेड़ने, आकाश से ये सहन नहीं हुआ और अपने असली रूप में आकर सबको उठाकर बाहर फेंक दिया । रोहिणी ने तुरंत आकाश को पहचान लिया और डरती डरती बोली कि तुम तो मर चुके थे फिर यहाँ कैसे ?

आकाश ने उसको सारी बात बता दी । और बोला कि अब मुझे यहाँ से जाने के लिए मत कहना, मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूं, मैं बस तुम्हारे पास रहना चाहता हूँ, तुम्हारे बिना नहीं रहा जाता हैं, मैं तुम्हें तंग नहीं करूँगा, मुझे यही रहने दो, रोज तुम्हें देख लूँगा तो दिल को तसल्ली मिलती रहेगी ।

रोहिणी उसकी बातों से पिघल गई क्योंकि अंदर ही अंदर प्यार तो वो भी बहुत करती थी उसको पर उसका वो भेड़ियाँ वाला रूप उससे डरती थी और बोली ठीक हैं, तुम यहाँ रह सकते हो ।

 ऐसे दिन बीतते गए, आकाश घर का सारा काम करता रहता और रोहिणी को प्यार भरी नजरों से देखता रहता पर कुछ कहता नहीं ।

रोहिणी को भी उसके होने से सुरक्षा का भाव महसूस होता । एक दिन उसकी माँ ने बताया कि ऑफिस के काम से मैं कल 3, 4 दिन के लिए बाहर जा रही हूं पर क्या करूँ तेरी चिंता सता रही इस तरह तुझे अकेली छोड़ कर कैसे जाऊँ ।

रोहिणी बोली माँ घबराओ नहीं मेरी सुरक्षा के लिए हमारा ये नौकर हैं ना, मैंने तुम्हें बताया नहीं एक दिन कुछ आवारा लड़के घर में घुस आए थे तब इसने ही उनको बाहर उठाकर फेंका था और मेरी जान बचाई थी ।

ठीक है बेटी अब में निश्चिंत होकर जा सकती हूं, माँ बोली ।

 अगले दिन माँ ऑफिस के काम से दूसरे शहर चली गई ।

रोहिणी काफी दिन से आकाश से कुछ बात करना चाहती थी, रात में उसने आकाश को बुलाया और बोली कि आकाश प्यार तो मैं भी तुमसे बहुत करती हूँ मैं तुमसे शादी भी करना चाहती हूँ लेकिन अगर तुम ये भेड़ियाँ का रूप धारण करना छोड़ दो तो और हमेशा के लिए मनुष्य रूप में ही रहो तभी ।

आकाश ने रोहिणी को समझाया कि मैं भी यही चाहता हूँ, परंतु हमें एक श्राप मिला हुआ है, पूर्णिमा की रात को 12 बजे से लेकर 3 बजे तक हमें भेड़ियाँ का रूप अपने आप ही लेना पड़ता है इसको हम रोक नहीं सकते हैं । तुम ऐसा कर सकती हो कि 12 बजने से कुछ देर पहले ही मुझे एक रूम में बंद कर देना 3 बजे के बाद खोल देना ।

रोहिणी ने कुछ देर सोचा और कहा कि हां ये तो हो सकता है पर पहले तुम एक वचन दो की अगर तुमने किसी मनुष्य को मारा या खाया तो तुम्हें उसका प्रायश्चित करना होगा ।

आकाश ने पूछा कैसा प्रायश्चित ?

 रोहिणी बोली कि फिर तुम अपने हाथों से मुझे मार डालोगे और मुझे कभी वापस लाने की कोशिश भी नहीं करोगे ।

आकाश कुछ पल के लिए सहम सा गया और उसने रोहिणी को वचन दे दिया ये जानते हुए की उस पर जो श्राप हैं वो उससे बच नहीं सकता और एक छोटी सी भूल उसे रोहिणी का हत्यारा बना देगी ।

 कुछ देर बाद आकाश में धीरे धीरे परिवर्तन शुरू हो गए उसके शरीर पर बाल आने लग गए, उसने रोहिणी को कहा कि मुझे तुरंत कमरे में बंद कर दो, रोहिणी समझ गई की आज तो पूर्णिमा की रात है और 12 बजने में कुछ मिनट शेष है, उसने तुरंत ही आकाश को एक कमरे में बंद कर दिया ।

 कुछ ही देर में, दरवाजे की घंटी बजती हैं, रोहिणी सोचती हैं कि रात के 12 बजे कौन हो सकता हैं ,

 वो दरवाजा खोलती हैं तो देखती हैं कि वही उस दिन वाले आवारा लड़के हैं । वो रोहिणी को धक्का देते हुए घर में घुस जाते हैं, और कहते हैं कि तुम अपने आप को बहुत खूबसूरत समझती हो ना पर अब तुम खूबसूरत नहीं रहोगी और उसको जमीन पर पटक कर बालो से घसीटते है,

लातों से वार करने लगते हैं।

रोहिणी मदद के लिए चिल्लाने लगती हैं, आकाश कमरे में ये सब सुन रहा होता हैं और गुस्से में और भी खूंखार हो चुका होता हैं, वो बाहर आना चाहता हैं पर रोहिणी को दिया वचन उसको रोक रहा हैं ।

बहुत रोकने के बाद भी वो खुद को रोक नहीं पाता और दरवाजा तोड़कर बाहर आ जाता हैं, रोहिणी लहूलुहान फर्श पर पड़ी हुई हैं, आकाश रोहिणी के सामने जाकर हाथ जोड़कर उससे अपने वचन को वापस लेने की विनती करता हैं, परंतु तब तक रोहिणी बेहोशी में अपनी आंखें बंद कर चुकी होती हैं।

रोहिणी कि आंखें बंद देख आकाश बहुत ही भयंकर तरह से गर्जना करता हैं और उन लड़कों पर टूट पड़ता हैं । और थोड़ी ही देर में वो सबको टुकड़े टुकड़े करके मार डालता हैं ।

 अब उसे लगता हैं कि उसने रोहिणी को दिया वचन तोड़ दिया हैं अब उसको प्रायश्चित करना होगा, लेकिन वो अभी रोहिणी के पास नहीं जाना चाहता हैं, क्योंकि वो भेड़ियाँ मानव के रूप में हैं और यह रूप रोहिणी को भी नुकसान पहुँचा सकता है, लेकिन तब तक रोहिणी होश में आ जाती हैं, वह आकाश को समझाती हैं , पर आकाश को रोहिणी का वचन तोड़ने का बहुत गहरा आघात लग चुका था, उसे लगता हैं कि वो रोहिणी को दिए वचन को निभा नहीं पाया उसने अपने प्यार का भरोसा तोड़ दिया हैं, रोहिणी उसे समझाने का प्रयास करती हैं वो कहती हैं कि इसमें तुम्हारी कोई गलती नहीं हैं वो कुछ नहीं समझता जोर जोर से रोने लगता हैं और प्रायश्चित करने के लिए अपने ही हाथों से रोहिणी को मार डालता हैं ।

 और फिर बहुत ही भयंकर रूप से चांद को देखकर रोने लगता है उसकी आवाज सुनकर सभी जानवर रोने लगते हैं पूरा शहर उसकी गर्जना से थर्राने लगता हैं और फिर वो कही दूर जंगल में चला जाता हैं और फिर कभी किसी को नज़र नहीं आता हैं ।

कहते हैं कि वो अभी भी रोहिणी की यादों में भटक रहा हैं और अब भी खुद को ही दोषी मानता हैं। पूर्णिमा की रात को वो खुद को कैद कर लेता हैं । अब उसने मनुष्य का भक्षण छोड़ दिया हैं।

और इतनी कहानी सुनाने के बाद वह व्यक्ति रुक जाता है, चांद की और देखता हैं और कहता है कि रात बहुत हो चुकी हैं, शायद मेरे साथी मुझे ढूंढ रहे होंगे मुझे चलना होगा ।

फिर मैंने घड़ी की ओर देखा, 12 बजने में कुछ ही मिनट बाकी थे आधी रात होने वाली थी, इसलिए मैंने उससे कहा हमारे साथ यहीं रुक जाओ सुबह चले जाना ।

वो हमें देखकर मुसकुराया और अपनी हरी होती हुई आंखों से हमारी ओर देखते देखते जोरदार छलांग लगाकर वहाँ से गायब हो गया। 

और उसके इस तरह जाते ही मेरे दिमाग में केवल एक ही शब्द याद आता है मानव-भेड़िया (वेयर वुल्फ )।

उस जगह पर बहुत सी ऐसी ही मानव-भेड़िये को देखे जाने वाली घटनाये हुई हैं ।

और सच बताऊँ तो अब मैं उस जगह पर कभी नहीं जाना चाहता हूँ।


कमरा नंबर 1046


2 जनवरी 1.20 मिनट पर डाउनटाउन कैंसास सिटी में एक शख्स ने होटल का एक कमरा बुक करवाया।  

सामान के नाम पर उसके पास एक कंघी और टूथब्रश के अलावा कुछ और नहीं था। उसने सबसे ऊपरी मंजिल का कोने वाला कमरा चुना। उसने अपना पूरा नाम रोनाल्ड टी ओवन लिखवाया था। कमरा लेने के बाद वह कभी-कभार ही वहां दिखा था। होटल के स्टाफ को यह बात कुछ अजीब तो लगी,  लेकिन वे किसी मामले में ज्यादा तवज्जो नहीं देना चाहते थे, क्योंकि अक्सर शहर से बाहर के लोग और व्यापारी रात बिताने के ही लिए कमरे लेते थे। 

छठे रोज उसका कमरा खून से नहा गया, जैसा कि होटल के स्टाफ ने पुलिस को बताया। पुलिस उसकी मौत से पहले की उसकी गतिविधियों, उसके व्यवहार के बारे में पूछताछ कर रही थी। 

मेरी स्ट्रॉन्ग जो कमरे की सफाई कर्मचारी थी, उसने बताया कि जब वह कमरा नंबर 1046 के सामने पहुंची तो उसने पाया कि कमरा अंदर से बंद था। उसके दरवाजा खटखटाने पर ओवन ने उसे कुछ देर बाद आने को कहा। कुछ देर बाद दोबारा जब वह गई तो कमरे में बिल्कुल अंधेरा था, पर्दे खिंचे हुए थे, केवल टेबल लैंप से ही मद्धिम सी रोशनी आ रही थी। ओवन ने उसे हिदायत दी कि वह कमरा लॉक न करे, क्योंकि उससे मिलने कोई आ रहा था, यह कहकर वह खुद कमरे से बाहर चला गया था। 

चार घंटे बाद जब मेरी धुले हुए तौलिए रखने कमरा नंबर 1046 पहुंची, तब भी दरवाजा लॉक नहीं था। कमरे में घुसने पर उसने देखा ओवन पूरे कपड़ों में बिस्तर पर लेटा था, शायद सो रहा था। बगल की छोटी टेबल पर एक कागज का टुकड़ा रखा था जिस पर लिखा था, "डोन, मैं 15 मिनट में लौटूंगा, इंतज़ार करना। " .”

दूसरी सुबह जब फिर वह सफाई करने कमरा नंबर 1046 पहुंची तो देखा कि दरवाज़ा बाहर से बंद था। ऐसा तब होता है जब कमरे में कोई न हो। उसने अंदाज लगाया कि ओवन कमरे में नहीं है, उसने मास्टर की से दरवाजा खोला, खोलते ही वह चौंक गई, क्योंकि ओवन अंदर अंधेरे में एक कोने में कुर्सी पर बैठा हुआ था। वह सफाई कर रही थी कि फोन की घंटी बजी, ओवन ने फोन उठाया। "नहीं, डॉन, मुझे भूख नहीं है, मैने अभी -अभी नाश्ता किया है, मुझे भूख नहीं है। "उसने झल्लाहट से कहा। 

फोन रखने के बाद उसने मेरी से उसके काम के बारे में, होटल के बारे में पूछा और कहा कि बाकी होटल खासकर पास वाला होटल बहुत महंगा है। 

मेरी ने उसके सवालों के जवाब जल्दी- जल्दी दिए और काम खत्म करके बाहर निकली, वह काफी घबरा गई थी, समझ नहीं पा रही थी कि उसका दरवाजा बाहर से कैसे बंद था, जरूर किसी ने उसे उसके कमरे में बंद किया था। 

बाद में जब वह साफ धुले तौलिए रखने लौटी, तो उसे कमरे के अंदर से दो आवाजें सुनाई पड़ीं। उसने दरवाजा खटखटाया और कहा कि वह तौलिए लाई है। "यहां काफी तौलिए हैं, जाओ"अंदर से एक भारी ओर तेज आवाज आई। 

मेरी ने सुबह सारे तौलिए हटा दिए थे और अंदर एक भी तौलिया नहीं था, यह बात वह जानती थी, मगर वह बिना कुछ कहे लौट आई।  

उसी दोपहर दो और मेहमानों की आमद ने कमरा नंबर 1046 के राज़ को और भी पेचीदा बना दिया। उनमें से एक थी जीन ओवन। उसका रोनाल्ड से कोई रिश्ता नहीं था। वह अपने मित्र से मिलने आती रहती थी, जो कमरा नंबर1048 में ठहरा था। वह रात यहीं गुजारना चाहती थी। उसे कमरा नंबर 1048 की चाबी दे दी गई। यह रोनाल्ड के कमरे से एक कमरा छोड़ कर था। मेरी ने पुलिस को बताया कि देर रात उसके कमरे से ऊंची -ऊंची तेज आवाजें आ रही थीं। 

"मैने सोचा, मैं डेस्क क्लर्क को सूचित कर दूं, मगर..

फिर मैने नहीं किया, "मेरी ने बताया। 

 इसके अलावा, उस रात वहां एक पेशेवर औरत भी थी, जो अक्सर पैसे देकर रातों को बुलाई जाती थी। उसने बताया कि उसे कमरा नंबर 1026 में बुलाया था मगर वहां तो कोई था नहीं, वह कुछ इंतज़ार करने के बाद लौट गई थी। " 

अब इन दोनों औरतों के बयानों से ही कमरा नंबर 1046 के गेस्ट की किस्मत तय होनी थी।  

दूसरे दिन बेलब्वॉय को टेलीफोन ऑपरेटर का फोन आया, "सुनो, कमरा नंबर 1046 का टेलीफोन 10 मिनट से हुक से हटा हुआ है, उन्हें बताओ की ठीक से रख दें। "बेलबोय जब चेक करने ओवन के कमरे की ओर गया तो देखा कि कमरा बंद है और, "डोंट डिस्टर्ब"की प्लेट कुण्डी से लटक रही है। उसने दरवाजा खटखटाया। 

अंदर सेओवन ने कहा, "अंदर आ जाओ। "

 बेलब्वॉय ने दरवाजे की नोब घुमाई, वह नहीं खुला, "सर, आपका दरवाजा अंदर से बंद है, कृपया खोलें", उसे कोई उत्तर नहीं मिला। बेलब्वॉय ने दोबारा दरवाजा खटखटाया और इस बार चिल्लाकर कहा कि फोन को रिसीवर पर रख दें। उसने सोचा शायद ओवन ने ज्यादा पी ली थी और फोन हुक से गिर गया होगा। 

डेढ़ घंटे के बाद दोबारा टेलीफोन ऑपरेटर ने फोन मिलाकर बेलब्वाय को बताया कि अभी भी कमरा नंबर 1046 का फोन हुक पर नहीं था। 

इस बार बेलब्वाय मास्टर की लेकर ओवन के कमरे में दाखिल हुआ। उसने देखा कि वह बिस्तर पर औंधा पड़ा था, शायद ज्यादा नशे में था, उसने फोन को रिसीवर पर रखा और दरवाजा बंद करके लौट आया। इस बात की सूचना उसने मैनेजर को दी थी। 

एक घंटे बाद टेलीफोन ऑपरेटर की ओर से फिर सूचना मिली कि फोन को फिर से हुक से हटा दिया गया है, वैसे इस बीच कहीं बातचीत नहीं हुई थी।  

इस बार बेलब्वाय ने जो देखा, उसके होश उड़ गए। ओवन अपना सिर पकड़ एक कोने में गिरा पड़ा था, उसके सिर और हाथों में चाकू के अनेक घाव थे, चादर, तौलिया खून से सना हुआ था, दीवारें खून से रंगी हुई थीं। कमरे में खून ही खून था। बेलब्वॉय ने फौरन पुलिस को सूचना दी। पुलिस उसे अस्पताल ले गई। पाया गया कि उसे बहुत यातना दी गई थी। उसके, पैर, हाथ, गर्दन को किसी तार से जकड़ दिया गया था, उसकी छाती पर कई वार किए गए थे। उसका फेफड़ा पंक्चर हो गया था और खोपड़ी टूट गई थी। अस्पताल पहुंचने के कुछ ही देर बाद उसकी मौत हो गई। डॉक्टरों नेउसकी मौत का जो समय बताया वह बेलब्वाय के

 पहली बार उसके कमरे में जाने के काफी पहले का समय था। फोन रिसीवर से शायद तब गिरा होगा, जब उसने मदद के लिए उसे उठाने की कोशिश की होगी। 

कमरे में कोई कपड़े नहीं थे। कुछ भी ऐसा नहीं था जिसे ओवन के साथ जोड़ा जा सकता। होटल के साबुन और टूथपेस्ट भी गायब थे। किंतु हत्या का कोई भी हथियार मौजूद नहीं था केवल टेलीफोन के रिसीवर पर कुछ फिंगरप्रिंट थे, जो कभी भी पहचाने नहीं जा सके, कि किसके थे। तफ्तीश में यह भी सामने आया कि रोनाल्ड टी ओवन नाम का कोई शख्स यू एस में कहीं नहीं रहता था। लोगों से भी अपील की गई कि अगर वे कुछ भी उस शख्स के बारे में जानते थे, तो मदद के लिए आगे आएं, मगर नतीजा कुछ नहीं निकला। 

पास के उस होटल से जिसके बारे में उसने जिक्र किया था कि बहुत मंहगा था, कुछ दिनों बाद एक खबर मिली कि उस हुलिए का आदमी 1 जनवरी को एक दिन के लिए युगीन के स्कॉट के नाम से रुका था। इस नाम की खोजबीन का नतीजा भी सिफर निकला। इस नाम का कोई आदमी रिकॉर्ड में नहीं था। 

अगले कई महीनों में बहुत से लोगों ने उसकी शिनाख्त की कोशिश की मगर किसी से भी कोई ठोस सबूत नहीं मिले। आखिर में उसके अंतिम संस्कार का फैसला लिया गया। उस मौके पर कुछ गुलदस्ते मिले जिन में से एक पर लिखा था, " सदा के लिए प्यार - लूसी। " 

एक साल और बीत गया। इस बार किसी मिली नाम की एक महिला ने दावा किया कि वह उसकी मां थी। उसका बेटा कई वर्षों से गायब था। उसका नाम आर्टेमिस जी ट्री था। वह कैंसास सिटी के दूसरे हिस्से में रहती थी। कोई और सबूत न होने के कारण पुलिस ने उसकी बात को मान लिया। 

आज तक यह केस सुलझ नहीं पाया है। हर साल नए सुराग मिलने पर केस को खोला जाता है, मगर ऐसा लगता है कि केस नंबर 1046 का रहस्य कभी नहीं सुलझेगा। हत्यारे आज़ाद घूमते रहेंगे।


कल फिर आना


राजेश बहुत दिनों से किसी उधेड़बुन में था। वह किसी निर्णय पर पहुंच पाता उससे पहले उसके फ़ोन की घंटी बजे उठी, लेकिन उसके ध्यान उस ओर नहीं था । तभी अचानक एक अजनबी हाथ के स्पर्श ने उसे छूकर उसकी कश्मकश को कुछ कम करते हुए, जेब में रखे मोबाइल फ़ोन की बजती हुई घंटी की तरफ उसके ध्यान दिलाकर उसको चौंका सा दिया। उसने जेब से फ़ोन निकाला, उसकी स्क्रीन पर रिया का कॉल आ रहा था..... "तुम कहाँ हो राजे मैं कब से फोन कर रही हूं,तुम बात क्यों नहीं कर रहे हो? क्या कोई परेशानी है....। "


इतना सुनकर राजेश ने फोन काट दिया । 


वो फिर एक तरफ जाकर कहीं किसी कोने की तलाश करने लगा, जहाँ कोई उसको परेशान न कर सके । उसको मेट्रो के गेट नंबर 4 पर स्वयं को महफ़ूज़ पाया, कुछ देर उदास बैठा रहा । अचानक एक तेज़ हवा के झोंके ने उसके माथे की सलवटों को चमकाते पसीने को एक ठंडक ओर ताज़गी भरे एहसास में बदल दिया। वो यह सब महसूस ही कर रहा था तभी एक पहचानी आवाज़ ने फिर उसको चौंका दिया, "ऐ सी की ताज़ा हवा है लोग इसकी ठंडक के लिए ही यहाँ बैठते है। "


उसने वो आवाज़ पहले कहाँ सुनी है इसका सही अंदाज़ लगा पाना राजेश के लिए मुश्किल था फिर भी उसने हिम्मत करके पूछ ही लिया, " क्या मैं आपको जानता हूं?"


उस अजनबी ने अपना परिचय कुछ दिलचस्प अंदाज़ से देते हुए कहा, " जी बिल्कुल, अभी थोड़ी देर पहले आप किसी बेख्याली में ग़ुम थे ओर आपका फोन तेज़ी से रिंग कर रहा था । तब मैंने ही आपको बताया था उस फोन के लिए...... मुआफ़ कीजियेगा मेरा आपको हैरान या परेशान करने का इरादा नहीं था, मैं अमीर हूं जेब से नहीं सिर्फ नाम से साहिब !"


यह सुनकर राजेश मुस्कुरा दिया यह कहते हुए और मुझे गरीब कहते है... मेरा मतलब राजेश शर्मा....। 


"चलिए गरीब जी हमारा नाम आपके चेहरे पर मुस्कान तो लाने में मददगार साबित हुआ अब इस नाम से हमें कोई शिक़वा नहीं । " वो मुस्कुराहट कुछ देर के लिए ही सही। दोनों एक दूसरे के बारे में बात करते है राजेश अपने बारे में बताता है वो एक सेल्स एक्सक्यूटिव है जो एक इन्सुरेंस कम्पनी में काम करता है और अक़्सर यही से होकर गुज़रता है.। आज किसी ने उसके पर्स पर हाथ साफ कर दिया, आज सुबह से ही उसकी ऐसी तैसी हुई पड़ी है। ऑफिस में सीनियर से झड़प हो गई, क्लाइंट ने बुलाकर डील कैंसिल कर दी और इस चक्कर में उसकी गर्लफ्रेंड जो की थियटर में फ़िल्म देखने के लिए उसके इंतज़ार कर रही थी उसके फोन बार बार आ रहे थे । फ़िल्म की टिकिट काग़ज़ पैसे सब पर्स में था.। अब उसके पास घर जाने का भी किराया नहीं था। 


अमीर, राजेश की सारी बात बड़े गौर और दिलचस्पी के साथ सुन रहा था वो समझा गया उसे एक दोस्त की मदद की दरक़ार है। उसने अपने सभी जेब टटोल लिए लेकिन कुल मिलाकर 250 से ज़्यादा रूपये वो नहीं जुटा सका । 


राजेश अमीर के बारे में जान गया था कि अमीर उसकी मदद करना चाहता है लेकिन उसने मना कर दिया। अमीर के कहने पर राजेश ने रिया को कॉल कर सारी बात कह डाली और न आ पाने की मज़बूरी भी। थोड़ी देर बाद रिया ने राजेश को 2000/रूपये उसके मोबाइल पर ट्रांसफर कर दिए । वो खुद ऑटो करके घर चली गई। राजेश ने अमीर को धन्यवाद दिया लेकिन अमीर ने राजेश को चाय पर उसके घर चलने के लिए मना लिया।

 

अमीर एक पेंटर था उसके हाथ पेंट ब्रश पकड़ते ही खुदबखुद हरक़त में आ जाते थे । उसके घर पहुँच कर ही राजेश को उसकी कला को परखने का मौक़ा मिला । दोनों में चाय पर खूब बातें हुई । अचानकर राजेश को नींद आने लगी और वो वहीँ उसके सोफे पर बैठे बैठे सो गया। 


जब राजेश की आंख खुली तो उसने खुद को अमीर के बेड पर अचेत और बिना कपड़ो के निर्वस्त्र पाया । पास ही उसकी एक न्यूड पेंटिंग के साथ कुछ रंगों की कलाकारी को आखरी ज़ामा पहनाने की कोशिश में जुटा अमीर प्यार से उसको निहार रहा था। वो राजेश की न्यूड तस्वीर पर हाथ फेरते हुए कहता है। तुम्हारे साथ कम समय में एक अटूट संबंध बन गया है, तुम्हें उस संबंध का वास्ता है । तुम कल फिर आना। 

राजेश मूक बधिर बना एकटक उसको घूरता रहता है।


विश्वासघात


कहानी - विश्वासघात आज रातभर बारिश होती रही थी।राहुल नींद की एक झपकी भी ना ले सका था। नींद उसकी आँखों से कोसों दूर थी। राहुल को पुरानी बातें याद आ रही थी। उसे खुद पर भी बहुत गुस्सा आ रहा था, आखिर क्यों उसने अमन को अपने घर में रहने की इजाज़त दी। दरअसल वो वक़्त ही ऐसा था की दोस्ती के चलते राहुल ने कभी अमन के बारे में इतना नहीं सोचा। राहुल हमेशा अमन को अपने भाई जैसा मानता था। राहुल को याद आ रहा है जब वो और रीना एक साथ M।B।A करते थे और एक ही क्लास में थे। 

दोनों के कोर्स से लेकर सीट तक सबकुछ एकसाथ था। साथ-साथ उठते, बैठते, पढ़ते कब वो दोनों एक-दूसरे की तरफ खिंचते चले गए पता ही नहीं चला।अमन कॉलेज में राहुल और रीना के जूनियर MBA बैच में आया था। अमन अपने बैच का सबसे स्मार्ट लड़का माना जाता था। उसका व्यक्तित्व, उसकी ड्रेसिंग सेंस, उसका हेल्पिंग नेचर। उसकी ये सभी खासियत उसे औरों से अलग बनाती थी। राहुल जब पहली बार अमन से मिला था तो वो भी अमन से काफ़ी प्रभावित हो गया था।कॉलेज में कैंपस प्लेसमेंट का समय आ गया था। राहुल ने एक MNC कंपनी का इंटरव्यू क्रैक कर लिया और रीना ने इंडियन कंपनी में HR सेल में अच्छी जॉब पायी। MBA पूरा हो चुका था और राहुल और रीना अपनी-अपनी जॉब ज्वाइन कर चुके थे। दोनों के घर से शादी का दबाव आने लगा था तो उन्होंने अपने पेरेंट्स से बात करके उन दोनों की शादी के लिए मना लिया। सीनियर्स की शादी में जूनियर बैच का न्योता तो होना ही था। 

और यहाँ से अमन पूरी तरह राहुल और रीना की ज़िन्दगी में दाखिल हो गया। उसने ना केवल शादी में शरीकी दी बल्कि शादी के सारे काम खुद ही संभाल लिए जिसमें शॉपिंग लेकर जाने से लेकर, कैटरिंग अरेंजमेंट, होटल बुकिंग, डेकोरेशन आदि तक। राहुल और रीना को कोई भी जरुरत होती वो दोनों बेहिचक अमन को बता देते और अमन उनके काम को तभी पूरा कर देता। इस तरह शादी बहुत अच्छे से हो गयी और एक साल गुजर गया। अब कैंपस प्लेसमेंट की बारी अमन के बैच की थी। अमन ने रीना वाली कंपनी का इंटरव्यू क्रैक किया और सेलेक्ट हो गया। अब पहली समस्या जो अमन के साथ आयी वो इस शहर में रहने की थी।अमन की सारी फैमिली बैंगलोर में थी। 

अब तक कॉलेज था तो हॉस्टल से काम चल रहा था। लेकिन जब तक प्रोबेशन पीरियड है तब तक अमन को मुंबई में ही कहीं रहने का इंतज़ाम खुद करना था। और ऐसे समय में उसे अपने सीनियर राहुल की मदद लेना उचित लगा। अमन जाकर राहुल से मिला। राहुल ने अमन की बात पूरी होने से पहले ही अपना फ़ैसला सुना दिया "अमन तुम कल ही मेरे फ्लैट पर शिफ्ट हो जाओ। अब से तुम हमारे साथ ही रहोगे। हमारे फ्लैट में दो रूम खाली पड़े रहते हैं। तुमको जो पसंद हो उसमें ही रह लेना। रीना ने भी राहुल की बात का पूरा समर्थन किया अमन की रहने की परेशानी का समाधान हो चुका था।अमन और रीना का ऑफिस एक ही बिल्डिंग में था तो उनका ऑफिस आना-जाना भी एकसाथ हो गया था। 

इस दौरान राहुल को प्रमोशन मिल गया था तो उसकी कंपनी उसे विदेशी क्लाइंट्स से डील करने भेजती रहती थी।राहुल अपने काम की वजय से बहुत व्यस्त रहने लगा था। शायद यही वो कमजोर कड़ी थी जिसके चलते रीना और अमन करीब आ रहे थे। राहुल जब भी घर आता रीना उससे ज़्यादा बातचीत नहीं करती थी। एक तरह का अबोला उनके बीच में जगह ले चुका था। राहुल इसकी कोई खास वजय नहीं ढूंढ पा रहा था। राहुल को लगा कि वो काम कि वज़ह से रीना को आजकल ज़्यादा समय नहीं दे पा रहा इसलिए रीना के व्यवहार में बदलाव आ गया है। लेकिन राहुल ने प्लान बनाया कि उनकी मैरिज एनिवर्सरी पर वह रीना को एक सप्ताह के लिए कहीं घुमाने ले जाएगा। 

मैरिज एनिवर्सरी के प्लान का राहुल ने रीना से कोई भी ज़िक्र नहीं किया क्योंकि वो रीना को सरप्राइज देना चाहता था।और 21 नवंबर का वो दिन आ गया जब राहुल और रीना एक-दूसरे के हुए थ।राहुल बिना कोई इनफार्मेशन दिए अपने फ्लैट पर पहुँचा।राहुल ने दूसरी चाबी से दरवाज़ा खोला और दबे पाँव बिना आवाज़ किए अंदर दाखिल हुआ।उसने अपना सामान रखा और हाथ में फूलों का गुलदस्ता लेकर(जो वो रीना को देने के लिए खास खुद बनवाकर अपने साथ लाया था ) अपने बैडरूम की तरफ बढ़ा यह सोचकर की रीना वहीं पर होगी। राहुल से खिड़की से झाँक कर देखा और तभी पीछे मुड़ लिया। उसे अपनी आँखों देखी पर विश्वास नहीं हो रहा था। राहुल के सामने जैसे कोई चलचित्र चल रहा था।कितना भरोसा था उसे अमन पर। वो कभी सोच भी नहीं सकता था की रीना उसको धोखा देगी।अमन और रीना को ऐसी हालत में देखकर अब राहुल के लिए और कुछ कहने-सुनने की कोई जरुरत नहीं रह गयी थी। 

राहुल दबे पैर ही फ्लैट से वापिस निकल गया। बाहर आकर कुछ दूर चला और एक कॉफी शॉप तक पहुँच गया। राहुल ने एक कॉफी आर्डर की और रीना को फ़ोन करने लगा "हैलो रीना।।। कैसी हो ? " "अच्छी हूँ।।। अच्छा सुनो कब तक आओगे ? " "यही बताने के लिए फ़ोन किया है।। मैं थोड़ा लेट हो गया था तो घंटे तक पहुँच जाऊंगा। तुमने आज का कोई प्लान बनाया है क्या " "मैंने तो नहीं लेकिन अमन ने बनाया हुआ है। बाहर डिनर का" "रीना।। मेरी तबियत कुछ ठीक नहीं है। शायद मैं नहीं जा पाउँगा। कुछ घर पर ही बना लेना हल्का-फुल्का" "अगर तुम्हारी तबियत ठीक नहीं है तो कैंसिल कर देंगे। चलो तुम घर आ जाओ फिर बात करते हैं " फ़ोन रख कर राहुल किसी सोच में डूब गया। उसकी ध्यान किसी की आवाज़ से टुटा "सर आपकी कॉफी " "ओह।।यहाँ रख दो।

थैंक यू " राहुल के दिमाग़ में एकसाथ कई रील चल रही थी। उसे समझ नहीं आ रहा था की कैसे वो रीना से सम्बन्ध ख़त्म करने की बात शुरू करे। राहुल ने अपनी कॉफी ख़त्म की और पेमेंट करके कैफ़े से बाहर आ गया। और सामने पड़ी खाली बेंच पर बैठ गया। कुछ देर ख़ामोशी से बैठा रहा। करीब पंद्रह से बीस मिनट बाद टूटे से मन से उठा और अपने सामान के साथ वापिस अपने फ्लैट की तरफ चल दिया।फ्लैट पर पहुँच कर उसने बैल रिंग की। हालांकि उसके पास फ्लैट की दूसरी चाबी थी और वो खुद से दरवाज़ा खोल सकता था लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। रीना ने मुस्कुराते हुए दरवाज़ा खोला "आओ।। बड़ी देर करदी आने में " "हाँ। ट्रैफिक जाम की वजह से थोड़ा समय लग गया। वैसे भी मुझे जल्दी नहीं थी " "मैंने तो समझा था मेरे लिए कोई गिफ्ट लाओगे, कोई बूके वगैरह। " "हाँ।। वो समय नहीं मिल पाया खरीदने का " "कोई बात नहीं।। मैं तो वैसे ही कह रही थी। जाने दो"। 

अमन राहुल के पास आया "राहुल भाई हैप्पी मैरिज एनिवर्सरी " "थैंक यूं अमन कैसे हो ? " "अच्छा हूँ।। चलो ना पार्टी करते हैं। " "नहीं अमन मेरी कुछ तबियत ठीक नहीं है। मैं थक गया हूँ और रेस्ट करना चाहता हूँ। तुम चाहो तो अपनी भाभी को ले जाओ" तभी रीना बोल पड़ी "नहीं नहीं आपके बिना मैं कहीं नहीं जाने वाली। वैसे भी मैरिज एनिवर्सरी हम दोनों की है तो हम दोनों को ही जाना चाहिए " "ऐसा कुछ नहीं है। ये सब तो कहने की बात है। " खाना खाकर राहुल अपने बेड पर लेट गया। रीना और अमन कॉमन रूम में टीवी देख रहे थे। 

रीना कुछ देर बाद आयी और राहुल के साथ लेट गयी। रीना को लगा राहुल सो चुका है जबकि वो ये नहीं जानती थी कि राहुल किसी अंतरद्वन्द से गुजर रहा है। अगले दिन सुबह रीना और अमन अपने ऑफिस के लिए निकल चुके थे और राहुल फ्लैट पर अकेला था। राहुल का मन बिल्कुल नहीं लग रहा था। राहुल ने कुछ देर टीवी प्रोग्राम देखा, फ़ोन पर मेल चैक करने लगा। और दिन के समय सो गया। शाम के समय रीना ने चाय के साथ राहुल को जगाया।"उठो राहुल।। कल से देख रही हूँ कुछ अलग से लग रहे हो। कोई प्रॉब्लम है तो बता दो। 

क्या काम का बहुत ज़्यादा प्रेशर है आजकल तुमपर " "नहीं रीना ऐसी कोई बात नहीं।।। अरे हाँ मैं तुमको बताना भूल गया था मुझे आज रात न्यूयॉर्क के लिए निकलना है। क्लाइंट के साथ अर्जेंट मीटिंग है। " "ठीक है। मैं तुम्हारा बैग पैक कर देती हूँ और खाना बना देती हूँ। थोड़ा समय से ही निकलना ताकि ट्रैफिक जाम ना मिले " राहुल को ताजुब्ब हुआ कि उसके बाहर जाने की बात पर रीना हमेशा कहती थी कि उसके लिए राहुल के पास समय नहीं है। लेकिन आज रीना ने ऐसा कुछ भी नहीं कहा।शायद रीना भी राहुल से अलग होने का मन बना चुकी है। राहुल न्यूयोर्क में था। उसे शाम चार बजे एक मेल नोटिफिकेशन आयी। राहुल ने चैक किया तो देखा रीना की थी। 

रीना ने मेल में ज्यादा कुछ नहीं लिखा था। उसने सिर्फ इतना लिखा था कि राहुल मेरे लिए तुम्हारे साथ रहना मुश्किल हो रहा है। और अब मैं तलाक चाहती हूँ। डाइवोर्स पेपर तुम्हें दो दिन में मिल जायेंगे।राहुल को रीना की मेल पढ़कर जरा भी सदमा या झटका नहीं लगा वो तो जैसे खुद यही चाह रहा था। राहुल ने लैपटॉप बंद किया और बैग उठाकर एयरपोर्ट के लिए निकल लिया। मुंबई में सुबह से ही बहुत बारिश हो रही थी। रात के करीब नौ बजे राहुल अपने फ्लैट पर पहुँच गया था। वहाँ कोई नहीं था। अमन भी अपना सामान ले जा चुका था। रीना के कपडे और अन्य सामान भी गायब थे। राहुल ने कपडे चेंज किए और ऑनलाइन खाना आर्डर किया। और खाना खाकर राहुल लेट गया। राहुल को कोई मलाल नहीं था लेकिन वो ये नहीं समझ पा रहा था कि उसके साथ बड़ा विश्वासघात किसने किया था। रीना ने या अमन ने।


आत्मरक्षा


शाम के छ: बज रहे थे । नीतू ट्यूशन जाने के लिए तैयार हो रही थी । नीतू की माँ शालिनी अब तक ऑफिस से लौट आया करती थी लेकिन शायद आज कुछ काम मे उलझ गई थी इसलिए देर हो रही थी ।


नीतू ने अपनी माँ को कॉल लगाया ।

"हेलो मम्मा , आप कंहा हो इतनी देर तक ?" नीतू ने फ़ोन पर पूछा । 

"हां बेटा आज थोड़ी देर हो जाएगी तुम घर लॉक करके चले जाओ अपने ट्यूशन । मैं थोड़ी देर में घर के लिए निकलूंगी ।"

शालिनी ने जबाब दिया । 


ठीक है । कह कर नीतू ने कॉल काट दिया ।

और अपना बैग , मोबाइल लेकर नीतू ने दरवाजा बंद किया और ताला लगा कर अपनी साईकल लेकर चल दी । 


नीतू एक कॉलेज स्टूडेंट थी जिसकी उम्र 17 साल थी । नीतू के पिता अब दुनिया मे नही थे । घर मे अगर कोई था तो नीतू और नीतू की माँ शालिनी । शालिनी एक आफिस में जॉब करती थी । पति के जाने के बाद अपनी और अपनी बेटी की जरूरतों को पूरा करने की जिम्मेदारी शालिनी पर ही थी । 12वी क्लास पास शालिनी ने किसी तरह से खुद के लायक एक जॉब हासिल कर ली थी और पिछले 2 साल से एक आफिस में काम कर रही थी । 3साल पहले पति एक सड़क दुर्घटना में जान गवा बैठे तब से शालिनी ने ही खुद को भी और नीतू को भी संभाला । उसे मालूम था कि यदि वो काम नही करेगी तो उसका और नीतू का पेट नही चलेगा । अब उसकी सिर्फ इतनी ही चाह थी कि नीतू की पढ़ाई हो जाने के बाद उसे अपने पैरों पर खड़े कर दे और फिर किसी सही लड़के से उसकी शादी कर दे और खुद चिंतामुक्त हो जाएगी । 


शालिनी ने अपना आफिस का काम खत्म कर लिया और घर जाने को हुई । आज थोड़ी देर हुई शालिनी को आफिस से निकलने में क्योंकि आज काम थोड़ा ज्यादा था । शालिनी ने ऑटो रुकवाया और उसमें सवार हो गयी । शाम ढल चुकी थी । शर्दी का मौसम शुरू हो चुका था इसलिए अब शाम भी जल्दी होने लगी थी । रास्ते भर में शालिनी ने गौर किया ऑटो वाला उसे बार बार देख रहा था आईने के जरिये । शालिनी को उसकी नज़रे भा नही रही थी । रास्ते मे एक एक कर बाकी सवारियां उतरते गए अब शालिनी अकेली रह गयी थी । ऑटो वाला उसे बीच बीच मे आईने से देख लिया करता था । शालिनी की उम्र लगभग 40 की थी । सिर के सामने वाले 2-3 लटो में थोड़ी सफेदी वक्त और उम्र के साथ दस्तक दे चुके थे । रंगत गोरा । आंखों के नीचे हल्की जाईया जरूर थी जो वक्त के मार ने डाल दिए थे मगर उसकी शारीरिकता अब भी ठीक ठाक थी । एक शादीसुदा औरत पर भी लोग अपनी इक्छाओ को नज़रे में पिरोकर तीर की भांति छोड़ते है तो बिना पति के औरत पर तो हर दूसरे मर्द की आह टिक जाती है । और यदि दिखने में अगर थोड़ी सी भी मांसल हो तो फिर उम्र और लिहाज़ मायने नही रहता । आखिरकार ऑटो शालिनी के मंज़िल तक आ पहुंची । 

शालिनी ने अपने पर्स से रुपये निकाले और उसे थमा दिया । वो एक बार फिर आंखे गहरी कर शालिनी को एक टक देखा और ऑटो बढ़ा लिया ।। शालिनी अब पैदल अपने घर की और चल दी ।शालिनी घर पहुंच गयी । दरवाजे का ताला खोल अंदर चली गयी ।। 


रात के 8बज चुके था । शालिनी ने अपना घर का सारा काम निपटा लिया था । इतने में उसकी फ़ोन बज उठी । नीतू का कॉल था । नीतू बताती है कि उसे आने में थोड़ी सी देर और लगेगी क्यों कि उसे अपने फ्रेंड के बर्थडे पार्टी पे भी जाना था उसके फ्रेंड्स बहुत ज़िद कर रहे थे। शालिनी ने पहले मना किया लेकिन नीतू के बार बार प्लीज कहने पर आखिरकार शालिनी ने उसकी बात मान ली । मगर ज्यादा देर न करने की हिदायत दी । जल्दी घर लौट आना इतना कह कर शालिनी ने फ़ोन रख दिया ।


शालिनी ने टी वी चालू किया और अपना मन बहलाने की कोशिश करने लगी । थकी हुई शालिनी की आंख टी वी देखते देखते कब लग गई उसे पता ही नही चला । थोड़ी देर बाद शालिनी अचानक एक बुरे सपने की वजह से आंखे खोल उठ बैठी । 


शालिनी ने एक बुरा सपना देखा जिसमे नीतू के साथ कुछ बुरा हो रहा था । कुछ लड़के उसे घेरे हुए थे और वो माँ माँ पुकार रही थी।  

शालिनी इधर उधर देखती है और फिर एक तसल्ली भरी सांस छोड़ती है " एक बुरा सपना था " । 

टी वी अब भी चालू था ।


उसने घड़ी की तरफ देखा । 10 बजकर 15 मिनेट। 

" है भगवान ये लड़की अभी तक नही आयी ।" शालिनी गुस्से और फिक्र दोनो के मिश्रित स्वर में खुद से बोली । शालिनी ने अपना फ़ोन लेकर नीतू का नंबर डायल किया । सामने से नीतू का मोबाइल स्विच ऑफ आ रहा था । उसने दुबारा कोशिश किया और जबाब फिर वही ।

"कभी भी नीतू का मोबाइल स्विच ऑफ नही आता है आज पहली बार कॉल करने पर स्विच ऑफ आ रहा है । " शालिनी अपने मन में सोचने लगी ।


शालिनी ने नीतू के ट्यूशन मास्टर को कॉल किया ।

"हेलो, सर । मैं नीतू की माँ बोल रही हूँ । नीतू अब तक घर नही आई है क्या नीतू अब भी वंही है ?" शालिनी ने पूछा।


"शालिनी जी, नीतू तो ट्यूशन खत्म होते ही चली गयी थी । 8 बजे जैसे ही उसकी क्लास खत्म हुई वो और बाकी सारे चले गए थे । अब तक तो उसे घर पहुंच जाना चाहिए था ।" मास्टर ने कहा ।

शालिनी को याद आया कि नीतू ने कॉल कर उसे बताया था कि उसके फ्रेंड की बर्थडे पार्टी है । 

"ओह शायद वो अपने दोस्तो के साथ होगी । उसने बताया था कि उसे बर्थडे पार्टी में जाना है । मैं भूल गयी थी । माफ कीजिये सर मैने ख़ामोखा कॉल कर आपको तकलीफ दिया । " शालिनी ने कहा । 


"नही .. नही कोई बात नही । ठीक है रखता हूँ ।" मास्टर ने कॉल काट दिया । 


शालिनी ने एक बार फिर नीतू को कॉल किया मगर अब भी उसका फोन बंद आ रहा था ।


अब शालिनी का जी घबराने लगा ये सोच कर की वो इतनी देर कंहा रह गयी ..? इतनी देर पार्टी क्यों !! या कंही कोई मुसीबत में न फस गयी हो ? और फिर ये बूरा सपना .. है भगवान ।



शालिनी याद करने की कोशिश करती है कि नीतू ने फ्रेंड की बर्थडे पार्टी की बात कही थी मगर किस फ्रेंड का बर्थडे ये तो शालिनी ने पूछा ही नही था और हड़बड़ी में नीतू ने बताया भी नही था । 


" अब क्या करूँ किसको कॉल कर के पता करु ? " शालिनी परेशान होकर खुद में बुदबुदाई । 

फिर वो उसके एक - दो फ्रेंड्स जिनका नंबर शालिनी के पास था उनको कॉल कर नीतू के बारे में पूछी । 


हेलो , मेघा बेटा । क्या नीतू तेरे साथ है क्या ?


"नही आंटी । नीतू मेरे साथ नही है । मैं तो आज नीतू से मिली भी नही । आज मेरी तबियत ठीक नही थी इसलिए मैं ट्यूशन नही गयी थी । " नीतू की दोस्त मेघा ने कहा । 


मेघा ने आगे पूछा , " क्यों क्या बात है आन्टी ? नीतू ठीक तो है न ? " 


" पता नही । ट्यूशन गयी थी । घर लौटने में देर हो जाएगी किसी फ्रेंड के बर्थडे पार्टी में जाना है ऐसा बोली थी । " शालिनी का गला रुंधने लगा था । 


" बर्थडे पार्टी । ओ हां । आज सुबह जब नीतू से मेरी कॉल पे बात हुई थी तब उसने मुझे बताया था कि शाम में विक्रम की बर्थडे पार्टी है । उसने मुझसे भी जिद किया था पार्टी में चलने की मगर मेरी तबियत ठीक नही है इसलिए मैंने माना कर दिया। " मेघा ने बताया । 


" बेटा , मुझे विक्रम का नंबर दो मैं उसे कॉल कर के पूछती हूँ " शालिनी ने कहा ।


मेघा मायूस होकर बोली , "सॉरी आन्टी , मेरे पास विक्रम का नंबर नही है । असल मे विक्रम और मेरी कोई खास दोस्ती नही है ।" 


ये सुनकर शालिनी की टेंशन बढ़ गयी । 


मेघा आगे बोली , " मुझे ठीक से तो नही लेकिन बस इतना पता है कि विक्रम जमीना पार्क के पास कुंडली रोड में जो कॉलोनी सब है शायद वही कंही रहता है ।" 


शालिनी अब थोड़ी सी शांत हुई । उसने मेघा को विक्रम के बारे में बताने के लिए धन्यवाद दिया और फ़ोन रख दिया । 


शालिनी अपने नाइट ड्रेस में ही ऊपर से एक शॉल लपेट घर से निकली । दरवाजे को लॉक किया और नीतू की तलाश में चल दी । इस वक़्त कोई ऑटो मिलना सम्भव नही था । इसलिए वो पैदल ही चलने लगी । रास्ते मे बड़ी मुश्किल से ही कोई आता जाता दिख रहा था । इक्का दुक्का कोई बाइक आ जा रही थी । गली कोचों में कुत्तों की झुंड ही घूम रहे थे ।


शालिनी मेघा के द्वारा बताए पते की और जाने तो लगी थी मगर शालिनी को खुद भी इस पते के बारे में कोई पक्की जानकारी नही थी । रात में ऐसे भी सड़के अनजान सी लगने लगती है । इस सर्दी के मौसम की मार के वजह से सड़कों पे ठंड के अलावा दूर दूर तक अब कोई नही दिख रहा था ।नीतू का मोबाइल अब भी स्विच ऑफ ही आ रहा था । 


शालिनी नीतू की तलाश में न जाने कंहा तक निकल आई थी । समझ नही आ रहा था वो सही रास्ते पर है या गलत । चलते चलते शालिनी एक सुनसान इलाके में जा पहुंची थी जंहा कोई नही था सिर्फ खामोशी और एक लंबी - चौड़ी सड़क जो सीधे काफी दूर तक फैली हुई थी । सड़क के किनारों में खम्बे गड़े थे मगर काफी दूर दूर । उस सड़क पे शालिनी डरती सहमती तेज़ रफ्तार में चली जा रही थी । इतने में सामने से उसे एक लाल रंग की वैन आती हुई दिखाई पड़ी । वैन आयी और काफी रफ्तार से बगल से निकल गयी । शालिनी बस तेज़ कदमो से चली जा रही थी । कुछ दूर चलने के बाद शालिनी को फिर से वही वैन दुबारा सामने से आती दिखी लेकिन इस बार वैन कुछ दूरी पर आकर रुक गयी । ये देख कर शालिनी के कदम भी रुक गए । वैन की हेडलाइट जल भुझ जल भुझ रही थी । शालिनी सहम गयी । उसके माथे पर इस ठंड में भी डर की बूंदे उभर आई । शालिनी धीमे धीमे अपने कदमो को पीछे लेने लगी । वैन अब फिर से शालिनी की और बढ़ने लगी । इधर शालिनी की धड़कन तेज़ हो गयी । वैन को अपनी और आता देख शालिनी पीछे मुड़ कर भागने लगी और पीछे वैन दौड़ी चली आ रही थी । काफी दूर तक वैन ने पीछा किया । शालिनी पहले से ही थकी हुई थी इतने में उसके कदम लड़खड़ा गए और वो जमीन पर गिर गयी । शालिनी हाफ रही थी । 


वैन उसके नजदीक आ कर रुकी । उसमे से दो लड़के बाहर निकले । वो दोनो ज़मीन पर गिरी शालिनी की तरह बढ़े । 


" अरे भाई ये तो कोई 40-45 की आंटी लग रही है.. इसमे मज़ा आएगा क्या ?? " एक ने शालिनी को अपनी आंखों से आंकते हुए अपने पार्टनर से बोला । 

" अरे बिल्कुल आएगा । इतनी लडकिया पे** है किसी औरत या आंटी का मौका नही मिला था । ऊपर वाले ने वो भी दे दिया । आज इसे भी जवानी याद दिला देंगे । " दोनो बदमास आपस में फुसफुसा रहे थे और उनके चेहरे पर शैतानी मुस्कान थी । दोनो एक ही सिगरेट को आपस में बदल कर गुस्त लगते हुए बोले । फिर सिगरेट को निचोड़ कर ज़मीन पे फेका और अपने पैरों तले कुचल दिया ।


शालिनी की सांसे अभी भी फूली हुई थी । वो अब भी गहरी सांसे भर रही थी । उन दोनों ने शालिनी को पकड़ लिया । शालिनी अपने आप को छुड़ाने की कोशिश कर रही थी । 

"छोड़ो मुझे जाने दो .. मेरे साथ ऐसा मत करो ।"शालिनी उनसे गुहार करने लगी । 


"अरे कैसे छोड़ दे । तुम तो हमारा प्रसाद हो तुमको खाए बिना कैसे छोड़ दे पता है कई दिन हो गए थे प्रशाद खाए । " दोनो बदमाश हवस भरी बाते करने लगे ।


" भाई जल्दी से इसे वैन में डालते है चलो । कंही कोई देख न ले । फिर उस पीछे वाले खाली मैदान में जाकर इसको खाएंगे ।। " उन दोनों में से एक ने अपने पार्टनर को बोला । इन दोनों में कितनी नीचता भरी पड़ी थी । एक 40 वर्षीय महिला को खाने अर्थात बलात्कार करने की बाते कर रहे थे । 


शालिनी अपनी पूरी ताकत लगा कर खुद को छुड़ाने की कोशिश करने लगी । एक ने उसके मुह को दबाए रखा था और दूसरा उसे उसके दोनो टांगो को उठा कर ले जाने को था । शालिनी को समझ मे आ गया था कि उसे अपनी इज़्ज़त खुद ही बचानी पड़ेगी इससे पहले कि वो दोनों शालिनी को जबदस्ती वैन में डाल कर कंही ले जाये उसे कुछ करना पड़ेगा वरना आज बहुत बड़ा अनर्थ हो जाएगा उसके साथ । 

शालिनी के जेहन में एक बात चल रही थी । वो बात जो बचपन मे उससे उसके पिता ने कही थी ।


"मैं हमेशा तुम्हारे साथ नही रहूंगा तुम्हे बचाने के लिए । 

कोई तुम्हे बचाने आएगा ऐसी उम्मीद रखने से अच्छा है तुम खुद अपनी रक्षा करना सीखो.. और जो तुम्हे अपना शिकार बनाने की कोशिश करे उनपे प्रहार करो । "


शालिनी के पास मोबाइल था वो चालाकी से नज़रे बचा कर अपने हाथो को पीछे रख मोबाइल के बैक कवर को खोलने लगी जिसके नीचे एक 3इंच की छोटी सी मगर बहुत ही तेज़ धार वाला चाकू था । जो वो अपनी सेफ्टी के लिए हमेशा से उसमे रखी रहती थी । और आज उसी हथियार को इस्तेमाल में लाना था । 


इससे पहले की वो लोग शालिनी को वैन में डाल पाते शालिनी ने पूरा जोर लगा कर अपने पैरों को झटक दिया और अपनी लात से उस सामने वाले लड़के को पीछे गिरा दिया । उसके पीछे खड़ा बदमाश जिसने शालिनी के मुह को दबाए हथेली से दबाए रखा था शालिनी ने उस चाकू से उसी हाथ पर जोर से वार किया जिससे वो पीछे हो गया और  

फिर शालिनी तेज़ रफ़्तार में अपने पीछे मुड़ी और उस चाकू से उसके गले को रेत दिया । लेकिन इससे वो मरा नही बस दर्द में चिल्लाने लगा । लेकिन शालिनी ने हिम्मत बनाये रखा और सीधे उसके गर्दन पर चाकू से वार किया और लगातार घोपने लगी । एक ही जगह पर चाकू को लगातार घोपे जा रही थी । जिससे ये बदमाश लगभग मर ही चुका था । 


इतने में पीछे गिरा हुआ बदमाश आकर शालिनी को मारने लगा । दोनो में बिड़त हो गयी। उस बदमाश ने शालिनी पर हाथ उठाया । जिससे शालिनी जमीन पर गिर गयी । उसके हाथ से चाकू भी गिर गया । 


" साली तूने मेरे दोस्त को मारा , अब मैं तुम्हे जिंदा नही छोडूंगा " वो दूसरा बदमाश चिल्लाता हुआ शालिनी की तरफ आया और उसका गला दबाकर मारने की कोशिश करने लगा । वो उसके ऊपर चढ़कर गला दबाने लगा । शालिनी की सांसे उखाड़ने लगी थी । उसने अपने पंजो को उसके मुह पर गड़ा दिया । उसकी आंख पर प्रहार किया जिससे वो बदमाश झिटक कर पीछे उठ खड़ा हुआ । 

शालिनी खासते हुए उठी और उस बदमाश के मैन पॉइंट पर जोर से लात मारी जिससे बदमाश अपने घुटनों पर आ गया । शालिनी ने जमीन पर से चाकू को उठाया और उस बदमाश के चेहरे पर फिर से वार किया । वो चिल्लाकर पीछे गिरने लगा और पीछे हटने लगा । 


क्यों क्या हुआ ? खाना चाहते थे न मुझे ? आओ खाओ !! आओ!! साले हराम** !! 

वहसी दरिंदे !!

शालिनी जोर जोर से चीखने लगी थी । उसके अंदर मा दुर्गा आ गयी थी मानो । शालिनी ने इधर उधर देखा रोड के किनारे कुछ पत्थर पड़े थे । शालिनी ने उसमे से एक भारी पत्थर उठाया और उसे उस बदमाश के चेहरे पर दे मारी । 


पहला वाला तो पहले ही दम तोड़ चुका था दूसरा बदमाश भी वंही दम तोड़ दिया ।। 

इस के बाद माहौल फिर से शांत हो गया । शालिनी भारी सांसे भर रही थी । शालिनी के हाथो में से खून रिस रहे थे । उसके होंठ के कोने से खून बह रहा था । बाल भिखरे हुए थे । शालिनी खुद को बचाने में कामयाब हो गयी थी । 


शालिनी ने बदमासो का कत्ल कर दिया था लेकिन वो जानती थी ये सब उसने अपनी इज़्ज़त और जान बचाने के लिए आत्मरक्षा में किया था । 

लेकिन फिर भी इस घटना से शालिनी की आखों में से आंसुओ की धार निकलने लगी थी । वो वंही सड़क पर बैठ हुकरते हुए रोने लगी ।


इतने में उसका मोबाइल बज उठा जो जमीन में कही गिरा हुआ था । शालिनी ने आवाज़ सुनते ही मोबाइल को ढूढ कर उसे उठाया । कॉल उठाने पर सामने से नीतू की आवाज़ सुनाई पड़ी । 


" हेलो .. मम्मा । सॉरी मम्मा । मेरा फोन बंद हो गया था । मैं कॉल कर नही पाई । टाइम का पता ही नही चला और इतनी देर हो गयी । आप कंहा हो ? मैं घर पर हूँ । मुझे विक्रम और उसके दोस्तों ने घर ड्राप कर दिया है । "


नीतू की इस बात से शालिनी ने आखिरकार चैन भरी सांस ली । उसकी आँखों से अब भी आंसू बह रहे थे । 


" क्या हुआ मम्मा .. आप रो क्यों रही हो ? 

मैं ठीक हूँ मम्मा .. आप किधर हो जल्दी घर आ जाओ प्लीज मम्मा ।। "

नीतू ने कहा । 


शालिनी ने खुद को संभाला । 

" हां , बेटा । मैं ठीक हूं । मैं आ रही हूँ तुरंत ।" शालिनी ने इतना कह फ़ोन काट दिया । 


शालिनी वंहा से उठी । जमीन पर गिरी उसकी शॉल को उसने उठाया । अपनी चाकू को उठाया । अपने आप को थोड़ा ठीक किया , अपने होंठ से रिस कर खून ने जो छाप छोड़ा था उसे साफ किया और शॉल ओढ़ कर वंहा से तेज़ कदमो से घर की तरफ चल दी ।। एक युद्ध लड़ी थी आज शालिनी अपने इज़्ज़त के खातिर अपने जान के खातिर । 


घर पहुंच कर माँ बेटी ने एक दूसरे को गले लगा लिया ।

आखिरकार शालिनी को अब राहत मिली । 


शालिनी की हालत को देख नीतू ने परेशान हो कर पूछा तो उसने सबके सामने सच बताना सही नही समझा और एक बहाना बना दी कि रास्ते मे गिर गयी थी इसलिए चोट आ गयी । 


" सॉरी मम्मा .. वेरी सॉरी । मेरी वजह से आप कितनी परेशान हो गयी । " नीतू ने शर्मिंदगी जाहिर की । 

विक्रम और बाकी दोस्त जो नीतू को घर तक छोड़ने आए थे वो गुड नाईट कहकर चले गए । 


अगली सुबह लोकल न्यूज़ पेपर में एक ख़बर छपी थी ।

" एरो द्राम रोड पर 2 युवक की लाश मिली है किसी ने इनको जान से मार दिया । किसने और क्यों इसका कोई पता नही चल पाया न ही कोई सबूत मिल पाया कि खूनी कौन था । "


शालिनी ये खबर पढ़ रही थी और फिर सोचने लगी । अगर मैने अपने आप को नही बचाया होता तो आज खबर कुछ और ही होती कि " एक 40 वर्षीय महिला सड़क पर पड़ी मिली जिसका बलात्कार कर बदमाशो ने उसे सड़क पर फेंक दिया "।


इतने में नीतू आयी और शालिनी के कांधे पर हाथ रख दी । 

शालिनी अचानक से चौक उठी । 

अरे क्या हुआ मम्मा ..? मैं हूं ।। 

नीतू ने कहा । 

नही कुछ नही ..। शालिनी अपने आप को शांत कर बोली।


क्या सोच रही थी ? नीतू ने पूछा । 

इस पर शालिनी ने कहा , " मैंने तुम्हारे लिए एक अच्छी सी कोच खोज ली है जो तुम्हे सेल्फ सेफ्टी यानी आत्मरक्षा की शिक्षा देंगी । हर एक लड़की को आज इस शिक्षा की शक्त जरूरत है ताकि वो अपने ऊपर आये मुसीबत से खुद की रक्षा करने में सक्षम हो सके ।  

एक बात याद रखना बेटा , " कोई तुम्हे बचाने आएगा ऐसी उम्मीद रखने से अच्छा है तुम खुद अपनी रक्षा करना सीखो.. और जो तुम्हे अपना शिकार बनाने की कोशिश करे उनपे प्रहार करो । " यही आत्मरक्षा है ।। 



आप ठीक कहती हो मम्मा । मैं ये शिक्षा जरूर लूँगी ।। नीतू खुशी खुशी मान गयी ।।


दानव देश


सुबह की बारिश से पूरा विल सिटी धुला-धुला सा हो गया था। दोपहर की चमकीली धूप की वजह से बहुत से लोग पूरे दिन सड़कों पर रहे, लेकिन शाम होते-होते पूरा शहर फिर से शीत लहर की चपेट में था। शाम के सात बजते-बजते कोहरे की एक मोटी परत ने पूरे शहर को अपनी आगोश में ले लिया था। मुश्किल से चार फिट की विजिबिलिटी थी, ऐसे में बिल्ली और कानू, किलर डुओ के नाम से जाने वाले सुपारी किलर अपनी कार में बैठे विल सिटी के कर्नल दर्रे पर जैक का इंतजार कर रहे थे।

"दीदी जिस आदमी ने आपकी रक्षा उन दरिंदे पुलिस वालो से की थी उसे मारा जाना जरूरी क्यों है।" कानू से उसके दिमाग में देर से उठ रहे सवाल को अपने से तीन मिनट बड़ी जुड़वा बहन बिल्ली से पूछा।

"तुझे पता है उस अकेले आदमी ने अब तक कितने लोगों को मारा है ?" बिल्ली ने कोहरा चादर को अपनी आँखों से बेधने का प्रयास करते हुए कानू के सवाल का जवाब न देते हुए उसी से सवाल किया।

"अनगिनत। लेकिन ये मेरे सवाल का जवाब नहीं है, उस दोपहर उन दरिंदे पुलिस वालो ने मेरी टांग में गोली मार दी थी और तुम्हारी आबरू लूटने पर उतारू थे, ऐसे टाइम उस इंसान ने न केवल तुम्हारी इज्जत बचाई थी बल्कि हम दोनों की जान भी बचाई थी, ऐसे में उस आदमी की जान लेना क्यों जरूरी है ? कानू ने थोड़ी नाराजगी के साथ पूछा।

"वो आदमी खुद एक दरिंदा है उस आदमी की वजह से आज ना जाने कितने बच्चे अनाथ है और न जाने कितनी विधवाएं है। उसका जिन्दा रहना किसी भी हाल में जायज नहीं है।" बिल्ली ने शांति से जवाब दिया।

"तुम्हारी याददाश्त सही नहीं है लगता है तुम्हें पता नहीं है कि जैक ने आज तक किसी मासूम इंसान को नहीं मारा है, जितने लोग उसने मारे है वो इस समाज के लिए खतरा थे। उनके मरने से ना जाने कितने लोग सुरक्षित हुए है न जाने कितनी लड़कियों औरतो की आबरू बची है।" कानू यंत्रचालित सा बोला।

"इसका मतलब यही हुआ न की वो ही तय करेगा की कौन गुनहगार है और कौन बेगुनाह, वो खुद ही जज और जल्लाद है। ऐसे दुनियां नहीं चलती है, इस मुल्क में एक कानून है, एक व्यवस्था है और सबको उसे मानना पड़ता है।" बिल्ली ने सतर्कता से कोहरे से गुजरने वाले हर वाहन की और देखते हुए कहा।

"हम जैसे भाड़े के कातिलों के मुंह से ये बाते अच्छी नहीं लगती है, वो तो अपने जनून में गुंडे-बदमाशों का सफाया करता रहा है लेकिन हम तो पैसे के लिए किसी की भी जान ले लेते है।" कानू ने उसकी बातों से असहमत होते हुए कहा।

"ये कॉन्ट्रैक्ट कितने का है ?" बिल्ली ने मुस्तैदी से सड़क पर निगाह रखते हुए पूछा।

"पांच करोड़ का" कानू बोला।

"और सब पैसा एडवांस में मिल चुका है, और ऐसे कॉन्ट्रैक्ट को डिच करने का मतलब है खुद की मौत का सामान इकठ्ठा करना। जिसने हमें कॉन्ट्रैक्ट दिया है वो हमे जानता है उसे हमारा खुद का कॉन्ट्रैक्ट देने में देर नहीं लगेगी। और उस दिन तुम खुद होशियार रहते तो उन पुलिस वालो को मार कर मेरी भी रक्षा करते और उस दानव जैक को भी मार डालते।" बिल्ली ने चिड़चिड़ाहट के साथ कहा।

"हमारे पास बहुत पैसा है, अब हम इस काम से रिटायर क्यों नहीं हो जाते, हमें अब कंही दूर जाकर सकून की जिंदगी जीने की कोशिश करनी चाहिए।" कानू खुद के अंदर भर आई निराशा से पराजित होते हुए बोला।

"मेरे भाई निराशा मृत्यु के समान है, तू निराश मत हो इस जैक का खात्मा मै खुद करुँगी। ये दानव देश है मेरे भाई आज हम है कल हमे मारकर कोई हमारी जगह ले लेगा लेकिन ये पागल जैक जीने का हक़दार नहीं है।" बिल्ली ने दूर से आती जैक की कार को देखते हुए कहा।

"वो आ गया है।" कानू बोला।

"पता है मुझे, चल जा अब अपना काम कर।" बिल्ली ने एक पैकेट कानू के हाथ पर रखते हुए कहा।

कानू सतर्कता से आगे बढ़ा, उसने देखा कर्नल दर्रे के पास सारा ट्रैफिक एक कारवां के रूप में एकत्र हो चुका था और थोड़ी देर बाद जैक इस कारवां की अगुवाई करते हुए दर्रे में चला जायेगा ताकि कोई लुटेरा इस कारवां को लूट ना सके। सारी रात यही सिलसिला चलने वाला था। उसने देखा जैक दूर एक चाय की दुकान पर खड़ा चाय पी रहा था। उसने ख़ामोशी से एक छोटा सा पावरफुल प्लास्टिक बम जैक की जीप से चिपका दिया और टहलते हुए वापस अपनी कार में बिल्ली के पास आ बैठा।

"आज जैक ख़त्म। " कानू ने पूछा।

"कोशिश तो यही है बाकी देखते है क्या होता है।" बिल्ली अपने हाथ में बम का रिमोट लेते हुए बोली।

उनकी उम्मीद से जल्दी जैक वापिस आया और अपनी जीप में जा बैठा। बिल्ली ने सतर्कता से देखते हुए रिमोट का स्विच दबा दिया। लेकिन तभी जैक की जीप दनदनाती हुई उनकी तरफ आई और उनके बगल से गुजरते हुए उनसे २०० मीटर दूर खाई में जा घुसी और एक जोर के धमाके से पूरा दर्रा थर्रा उठा।

"मर गया जैक।" कानू ने आश्चर्य के साथ पूछा।

"कह नहीं सकती।" बिल्ली दूर से आते हुए साये को देखते बोली।

"वो तो जैक हैबच गया।" कानू जैक को अपनी और आते हुए देख कर बोला।

"तुम लोग दर्रे की तरफ जा रहे हो ? होशियारी से जानामै साथ चलता लेकिन किसी ने मेरी जीप को विस्फोट से समाप्त कर दिया। विस्फोट तो यहीं हो जाता लेकिन मै जीप को उस खाई में गिरा आया।"

तभी बहुत से पुलिस वाले और दर्रे पर खड़े वाहनों के ड्राइवर दौड़ते हुए आये और जैक के फ़टे कपड़ों और जख्मों को देख कर चिंतित हालत में उसे वहां से दूर ले गए।

"फर्क देखा दीदी तुमने खुद में और उस आदमी मेंतुम उसकी जान लेने यहाँ आई हो और उसे तुम्हारी जान की फिक्र हो रही है।" कानू ने घृणा के साथ कहा।

"भाई इसकी तरह हम भी नियति के हाथ की कठपुतलियां है ये अपना किरदार अदा कर रहा है, हमे अभी अपना किरदार अदा करना है। आज ये फिर बच गया चल फिर किसी और दिन मरेंगे इसे।" बिल्ली अपनी आँखों के आंसू उँगली की पोर पर लेकर दूर छिटकते हुए बोली।"


अंधेरा


उसकी खूबसूरती उसकी दुश्मन बन गई थी, उस दिन उसके पिता और भाइयो ने उस दरिंदे को सिर्फ उसके साथ छेड़खानी करने से ही तो रोका था, लेकिन उन दरिंदो ने खुले आम तलवारों से काट डाला था उन्हें।

वो रोती रही थी-कोई तो बचा ले उसके पिता और वीरन को। लेकिन कोई भी बलशाली नहीं आया था उनकी रक्षा को। खुली सड़क पर दम तोडा था तीनो ने, पिता और भाइयो की लाड़ली उनकी लहूलुहान लाशो पर रोती रही थी जब तक पुलिस लाशो को लेकर न गई।

हत्यारे गिरफ्तार हुए पर जल्द जमानत पर बाहर आ गए, सबूत न होने पर एक हफ्ते पहले रिहा भी हो गए थे वो सातो।

पिता और भाई तो चले गए थे दुनिया से लेकिन पीछे छोड़ गए थे अर्धविक्षिप माँ और १० साल की मासूम बहन और विपन्नता। पढाई के साथ घर चलाने के लिए इवनिंग कोचिंग क्लासेज़ में मैथ की ट्यूटर की नौकरी दे दी थी उसके पिता के परिचित कोचिंग मालिक ने।

घर से पाँच किलोमीटर कोचिंग पढ़ाने वो सीधे कॉलेज से ही चली जाती थी। कोचिंग क्लासेज़ ख़त्म होती रात को नौ बजे और घर तक आते-आते १० बज जाते थे उसे।

हमेशा सीधी सड़क से घर जाने वाली वो आजकल इस अंधेरी गली से गुजरने लगी थी वो, कबाड़ी बाजार से खरीदा भद्दा सा काला ओवरकोट पहन कर। ३०० मीटर लम्बी अंधेरी गली का अंधेरा उसे निगल जाना चाहता था, वो पापी भी तो इन्ही गलियों में बसते है। कल उनमे से एक ने उसे रात को आते देख भी लिया था।

सर्दी की स्याह रात, आज फिर उसने उस अंधेरी गली में कदम रखा, दस कदम चलते ही उसे एहसास हो गया की सात कद्दावर गली के अलग-अलग हिस्सों से निकल कर उसके पीछे हो लिए थे। उसने अपने चलने की गति बढ़ा दी और लगभग दौड़ने लगी लेकिन पीछे आते लोगों के जूतों की आवाज लग रहा था की वो गली पार नहीं कर सकेगी, लेकिन उसने अपनी दौड़ने की गति कम ना की।

"रुक जा बुलबुल, ज्यादा ना उड़ आज तो तेरे पंख काटने है।" - एक कर्कश आवाज उसके कानों में गूँज उठी और उसकी आँखों में अजब सी चमक जाग उठी। दौड़ते-दौड़ते उसका हाथ अपनी गर्दन के पीछे गया और गले में बंधी जंजीर से लटकती कुल्हाड़ी उसके हाथ में आ गई। वो तेजी से रुकी और कुल्हाड़ी को जोर से अपने पीछे दौड़ते कदमो की दिशा में घुमाया। दौड़ते कद्दावर इस अप्रत्याशित हमले के लिए तैयार न थे और आगे दौड़ते चार कद्दावर कुल्हाड़ी के धारदार फल की जद में गए। उनके धड़ कुहाड़ी से कट गए थे वो चीख कर जमीन पर गिरकर तड़फने लगे। उनके अंजाम से जड़ हुए तीन कद्दावरों का भी यही हाल हुआ।

अंधेरे में देखने में अभ्यस्त हो चुकी उसकी आँखों ने उन सातों की गर्दनों को धड़ से अलग किया और कुल्हाड़ी को उन्ही के कपड़ो से साफ़ कर पुनः उसी जंजीर में टांग लिया। शोरगुल की आवाज़ से कुछ अंधेरे में डूबे मकानों के दरवाजे खुलने लगे थे लेकिन तब तक वो अंधेरी गली से निकल उजालेवाली गली में आ चुकी थी। उसके जिस्म के काले ओवरकोट पर खून के दाग नजर नहीं आ रहे थे। आज अंधेरा उसे न निगल सका, आज उसी ने अंधेरे को निगल लिया था।


जग्गा जासूस - द भूत मिस्ट्री


बचपन से ही जग्गा को जासूसी करने का बड़ा शौक था.वह था भी बहुत होशियार और चालाक जब भी कोई परेशानी होती थी तो सब जग्गा की मदद से उसे सुलझाते थे. सब उसे जगा जासुस कहते थे और धीरे-धीरे जग्गा ने अपनी एक प्राइवेट जासूस का आफिस खोल लिया.

एक दिन सुबह के समय जग्गा अखबार पढ़ते पढ़ते चाय पी रहा था. तभी जग्गा की बुआ गंगावती का फोन आता है. जो पास के एक कस्बे सोनपुर में रहती हैं. 

जग्गा- अरे बुआ कैसी हो? तबीयत तो ठीक है आपकी। बताइए कैसे फोन किया।

बुआ- बेटा तुम्हे एक परेशानी बताना चाह रही थी। हमारे कस्बे में एक ही स्कूल है और आजकल वहां बहुत गड़बड़ चल रही हैं। सभी ने अपने बच्चों को स्कुल भेजना बंद कर दिया है। तुम्हें अगर परेशानी ना हो तो यहां आओ। और मामले की तफ्तीश कर के देखो

जग्गा तुरंत रवाना हो जाते हैं। वहां पहुंचते-पहुंचते शाम हो जाती हैं।जग्गा सीधे बुआ के घर पहुंचते हैं

बुआ- कुछ दिनों से स्कूल में बच्चों को भुत दिखते हैं और बच्चे बीमार भी हो रहे हैं। हमें तो इस बात पर यकीन नहीं लेकिन बाकी गांव वाले यही सोचते हैं। तुम कुछ कर सको तो बहुत अच्छा होता।

जग्गा गांव के मुखिया के घर जाकर उनसे भी बात करते हैं।

मुखिया- मैं भी बहुत परेशान हूं। इस स्कूल को एक बड़ी समाज सेवी संस्था सरकार से गोद लेने वाली हैं। वह और ज्यादा अच्छी शिक्षा बच्चों को दे पाएगी। लेकिन ऐसे बच्चे स्कूल छोड़ते रहे तो पता नहीं यह संभव कैसे हो पाएगा

जग्गा- तो यह बात है

तभी जग्गा दीवार पर एक तस्वीर देखता है।

जग्गा- यह किसकी तस्वीर है ?

सरपंच- समीर मेरा भतीजा नाटक में काम करता है मुखिया बताते हैं कि उनका भतीजा नाटकों के लिए कॉस्ट्यूम भी किराए पर देता है 

दूसरे दिन गोपीचंद सुबह सुबह ही तफ्तीश के लिए स्कूल पहुंच जाते हैं स्कुल के आसपास की जगहों का निरीक्षण करते हैं तभी चौक उठते हैं और ध्यान से जमीन पर झुककर कर देखने लगते हैं। और स्कूल के सभी कमरे को भी देखते हैं।

थोड़ी देर बाद बच्चों और स्कूल स्टाफ का आना शुरू हो जाता है।

जग्गा- बच्चों और स्कूल टीचर से बात करते हैं उन्हें मामला गंभीर लगता है तो वे अपने असिस्टेंट गीता और सुभाष को भी वहां पहुंचने को कहते हैं 

तभी जग्गा की नजर स्कूल के गेट पर खड़े खोमचे वाले पर पड़ी जो खाने-पीने का सामान बेचता था और बच्चो की भीड़ इकट्ठे थी। वे भी वहां जाते हैं और खोमचे वाले से बातचीत करते हैं और उनसे कुछ खरीदते हैं।

जग्गा कपने असिस्टेंट सुभाष को खोमचे वाले से खरीदा खाने का सामान देकर कहीं भेज देते हैं उसके बाद गीता को लेकर अचानक ही मुखिया के बेटे समीर के कॉस्ट्यूम शॉप देखने के लिए निकल पड़ते हैं।

वहां पहुंचकर वह पूरी दुकान को और कपड़ों को अच्छे से देखते हैं उसके बाद समीर से बोलते हैं- तुम्हारी शाप दो सचमुच बहुत अच्छी है लेकिन लगता है कि तुम्हारे यहां आने वाले लोगों को सफेद कपड़े कुछ ज्यादा ही पसंद है।

समीर- यह तो एक नाटक के लिए। 

तब जग्गा बोलें- कम से कम इन्हें साफ तो करवा दो देखो तो इनमें से कई पर कितनी मिट्टी लगी हुई है लगता है अभी अभी उपयोग में आए हैं.

जग्गा और उसके असिस्टेंट गीता वापस गांव आ जाते हैं तभी सुभाष भी आकर खाने के सामान की रिपोर्ट के बारे में बताते हैं 

तब जग्गा मुखिया जी से कहते हैं- सरपंच जी गांव के स्कूल में जो भी कुछ घट रहा है उसका जिम्मेदार आपका भतीजा है। समीर स्कूल में भूत बनकर बच्चों को डराता है। मैं अचानक उसकी दुकान पर चला गया था जहां मुझे कुछ सफेद लबादे दिखे जो गंदे भी थे उन पर लाल मिट्टी लगी थी जैसी स्कूल में है यहां तक कि स्कूल में इन लोगों ने छुपकर आने जाने के लिए सुरंग भी खोद रखी है। 

सरपंच- आप क्या कह रहे हैं जग्गा सर ? ऐसा कैसे हो सकता है ? समीर !

तब सीमा बोली स्कूल के बाहर बैठा खोमचे वाला भी उसका साथी हैं वह खाने के सामान में एक दवाई मिला देता था जिसे बच्चों की तबीयत खराब होने लगती थी

तब उसकी बुआ बोली-लेकिन जग्गा, यह ऐसा कर क्यों रहा है।

तब जग्गा बोले- एक बड़ी प्राइवेट कंपनी स्कूल को खरीदना चाहती है क्योंकि पूरे कस्बे में एक ही है और इससे वे बहुत फायदा कमा सकते हैं। लेकिन जब उस समाज सेवी संस्था के उस स्कूल को गोद लेने के बारे में उन्हें पता चला तो उन्होंने सोचा क्यों ना स्कूल को उस संस्था के हाथों में जाने से रोका जाए और इसके लिए समीर को उन्होंने रुपयों के लालच लालच दिया और उनसे यह काम करवाया।

उसके बाद फिर क्या था पुलिस को उनकी सच्चाई का पता चल गया और उन्होंने समीर और उनके साथियों को गिरफ्तार कर लिया और जग्गा और उसके असिस्टेंट सीमा और सुभाष का धन्यवाद किया।

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