15+ Best Moral Stories In Hindi | 2021

इस Blog में आपको 15+ Best Moral Stories In Hindi में पढ़ने को मिलेंगी जो आपने अपने दादा दादी से सुनी होंगी। ये hindi stories बहुत ही प्रेरक है। ऐसे  किस्से तो आपने अपने बचपन मे बहुत सुने होंगे पर ये किस्से कुछ अलग हौ। हमने भी इस ब्लॉग में 15+ Best Moral Stories In Hindi में लिखा है जिसको पढ़कर आपको बहुत ही ज्यादा आनंद मिलेगा और आपका मनोरंजन भी होगा। इसमे कुछ 15+ Best Moral Stories In Hindi दी गयी है। जिसमे आपको नयापन अनुभव होगा। यदि आप पुरानी कहानियाँ पढ़कर बोर हो गए है तो यहाँ पर हम आपको 15+ Best Moral Stories In Hindi दे रहे है जिसको पढ़कर आपको बहुत ही ज्यादा मज़ा आने वाला है।


15+ Best Moral Stories In Hindi
15+ Best Moral Stories In Hindi


कंजूस मित्र | Best Moral Stories In Hindi


श्याम सुंदर नाम का एक नवयुवक रायपुर शहर में रहता था और एक कंपनी में नौकरी करता था । उसके गाँव केे मित्र जब काम के सिलसिले में शहर आते तो उसके घर जरूर आते ।एक बार मनोहर लाल नाम का एक मित्र उसके घर आया ।मित्र को देखकर श्याम भौहें सिकोड़ने लगा । यह सब देखकर उसकी पत्नी ने कारण पूछा। उसने अपनी पत्नी को कहा कि यह मेरा मित्र बहुत ही कंजूस है , जब भी आता मुझसे खूब खर्चे करवाता है ।किन्तु अपने जेब से एक फूटी कौड़ी कभी नहीं निकालता । यह सुनकर उसकी पत्नी ने कहा कि आप फिक्र न करें ,मैं आपको एक उपाय बताती हूँ ।

अब श्याम सुंदर अपने कंजूस मित्र को लेकर शहर भ्रमण के लिए निकल गया । वह मित्र उसकी कंजूसी से तंग आ चुका था । इस बार उस मित्र ने उसे सबक सिखाने का सोचा । वह अपने कंजूस मित्र को बाजार ले गया और कहा आपको जो भी खाने की इच्छा है बता सकते हैं , मैं आपके लिए ले दूंगा । 
वो एक होटल में गए श्याम ने होटल मालिक से पूछा – भोजन कैसा है ? होटल के मालिक ने जवाब दिया मिठाई की तरह स्वादिष्ट है महाशय । मित्र ने कहा तो चलो मिठाई ही लेते हैं । दोनों मिठाई की दुकान पर गए , मित्र ने पूछा – मिठाइयां कैसी है ? मिठाई बेचने वाले ने जवाब दिया – मधु (शहद ) की तरह मीठी है । श्याम ने कहा तो चलो मधु ही ले लेते हैं । श्याम कंजूस मित्र को शहद बेचने वाले के पास ले गया । उसने शहद बेचने वाले से पूछा – शहद कैसा है ? शहद बेचने वाले ने जवाब दिया – जल की तरह शुद्ध है ।

तब श्याम ने मनोहर से कहा – मैं तुम्हें सबसे शुद्ध भोजन दूंगा । उसने कंजूस मित्र को भोजन के स्थान पर पानी से भरे हुए अनेक घड़े प्रदान किए । कंजूस मित्र को अपनी गलती का अहसास हो गया , वह समझ गया कि यह सब उसे सबक सिखाने के लिए किया जा रहा है । उसने हाथ जोड़कर श्याम से माफी मांगी , श्याम ने भी उसे अपनी बाहों में भर लिया । दोनों हँसी – खुशी वापस घर आए । श्याम की पत्नी ने मनोहर के लिए स्वादिष्ट भोजन तैयार किया । भोजन उपरांत वह वापस गांव लौट आया ।इसके बाद उसने अपनी कंजूसी की आदत हमेशा के लिए छोड़ दी ।


लोमड़ी और मोर | Best Moral Stories In Hindi


लोमड़ी और मोर हिंदी कहानी एक बहुत ही मनोरंजक और प्रसिद्ध कहानी है. यह कहानी पंचतंत्र से ली गयी है. एक लोमड़ी जंगल में घूम रही थी. तभी उसने देखा कि एक पेड़ की ऊँची टहनी पर एक सुंदर-सा मोर बैठा है. लोमड़ी ने सोचा कि किस प्रकार इस मोर को अपना आहार बनाया जाए, वह जानती थी कि मोर को मारने के लिए वह पेड़ पर नहीं चढ़ सकती.

तब लोमड़ी ने अपनी चतुराई दिखाते हुए कहा, “तुम इस पेड़ पर क्यों बैठे हो? क्या तुम्हें पता नहीं कि आज हुई जानवरों की सभा में यह निर्णय हुआ है कि कोई भी जानवर या पक्षी किसी दूसरे को शिकार के लिए नहीं मारेगा. ‘बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है’ वाला नियम अब नहीं चलेगा.”

मोर ने नहले पर दहला मारते हुए जबाब दिया, “इसका मतलब तो यह हुआ कि आज से शेर, चीते, भेड़िये आदि सभी हिंसक जीव घास-फूस खाने लगे हैं.”

लोमड़ी थोडा सकपकाई अवश्य, लेकिन वह भी आसानी से पीछा छोड़ने वाली नहीं थी. वह बोली, “हाँ, इसके बारे में तो पड़ताल करनी होगी, अभी, नीचे उतरो. हम दोनों जंगल के राजा के पास चलकर पूछते हैं.”

“वहाँ जाने की कोई जरूरत नहीं” – मोर बोला, “मुझे तुम्हारे कुछ साथी इसी ओर आते दिख रहे हैं.”

“अरे बाप रे, शिकारी कुत्ते!” लोमड़ी भयभीत स्वर में बोली और वहाँ से भागने लगी.

“तुम भाग क्यों रही हो? अभी तुमने ही तो कहा था कि जंगल के सभी प्राणी आपस में मित्रवत रहा करेंगे,” – मोर ने हँसते हुए कहा.

“लेकिन शिकारी कुत्ते शायद उस सभा में मौजूद नहीं थे उन्हें मालूम नहीं होगा.”

कहती हुई लोमड़ी वहाँ से भाग निकली।


बकरी और लोमड़ी की कहानी | Best Moral Stories In Hindi


एक बार एक लोमड़ी जंगल में घूम रही थी कि वो गलती से एक कुएं में जा गिरी. लोमड़ी काफी देर तक इंतज़ार करती रही और कुछ देर बाद एक बकरी वहां से गुज़र रही थी.

लोमड़ी को कुए में देख बकरी ने पूछा “लोमड़ी बहन तुम कुए में क्या कर रही हो?”

चालाक लोमड़ी ने कहा “जंगल में सूखा पड़ने वाला है और मैं कुएं में इसलिए हूँ ताकि ज़्यादा से ज़्यादा पानी पी सकू”

ये देख बकरी ने भी कुएं में छलांग लगा दी और जैसे ही बकरी ने छलांग लगायी, लोमड़ी बकरी के सिर पर अपना पैर रख कुएं से बाहर आ गयी.

बकरी बेचारी लोमड़ी से मदद मांगती रह गयी लेकिन लोमड़ी वहां से चली गयी.


दृढ़ इच्छा शक्ति से पायी सफलता | Best Moral Stories In Hindi


चंदन वन आजकल गुलजार है। फिर भालू की पाठशाला के तो क्या कहने? शेर, हाथी, बारहसिंगा, चीता, गेंडा सभी अपने बच्चों के दाखिले के लिए चले आ रहे थे। बच्चे रंग-बिरंगी पोशाकों में बहुत सुन्दर लग रहे थे।

हाथी की छोटी बेबी' अपुनी' ने बंगाली कुर्ती पहनी थी तो गेंडे का बेटा' गिंडु' रशियन जींस पहनकर अपने आपको धरती का राजकुमार समझ रहा था। शेर के छोकरे' शिरुआ' ने बरमूडा पहनकर सबको चकाचौंध कर दिया था। वह सबको अपने मसल्स दिखाकर यह बताना चाहता था कि वह जंगल के राजा का शहजादा है। उधर चीते के बेटे' चित्तू' ने लखनवी कुरता-पायजामा अपने चिकने बदन पर डाल रखा था। उसे अपने भारतीय होने का गर्व था।

चारों ओर बहार छाई थी। हरे-भरे पेड़, पास में कल-कल, झर-झर करते झरने, पास की पहाड़ी पर बर्फ की चादर स्वर्ग का आभास करा रहे थे। पेड़ों पर चिड़िया चहक रही थीं। कहीं-कहीं तोते टें-टें की आवाज करते हुए एक पेड़ से उड़कर दूसरे पेड़ पर आ-जा रहे थे। कोयल की कूक सारे वातावरण को मोहक और मनोरम बना रही थी।

इसी पहाड़ी की तलहटी में भालू की पाठशाला का चमचमाता हुआ शानदार पट्ट' भाग्योदय जानवर पाठशाला' बच्चों के अभिभावकों को अपनी ओर आकर्षित कर रहा था। अजगर भी अपने 3 बच्चों को लेकर उनके दाखिले के लिए रेंगता चला आ रहा था। सुरक्षा के लिए उसने तीनों को रंगीन रजाई के खोल पहना दिए थे।

सभी जानवर शाला के प्राचार्य से मिलते, अपने बच्चों का साक्षात्कार कराते और कितना अनुदान देना है, इसकी जानकारी लेते और लेखा विभाग में खजांजी के पास जाकर राशि जमा करा देते। बच्चों का दाखिला हो जाता। नर्सरी के लिए 1 लाख, केजी प्रथम के लिए 2 लाख और केजी द्वितीय के लिए 3 लाख रुपए अनुदान सुनिश्चित था। सभी जानवर धनवान थे तथा खुशी-खुशी अनुदान देकर दाखिला करा रहे थे।

कई जानवर अपनी मूंछों पर ताव देकर अपने मित्रों के सामने अपने स्टेटस सिंबल का बखान कर रहे थे। भाग्योदय पाठशाला में दाखिला मिलना सच में गौरव और प्रतिष्ठा की बात थी।

बच्चों का तीक्ष्ण बुद्धि का होना अनियार्य तो था, किंतु थोड़े कम अक्ल लोगों को भी दाखिला मिल जाता था बशर्ते अनुदान की राशि अधिक देने की स्थिति में पालकगण होते तो 2 लाख के बदले 4 लाख देने पर गधे और कमजोर बच्चों के दाखिले पर प्रतिबंध नहीं था, परंतु ये सब बातें बहुत ही गोपनीय रखी जाती थीं।

सुनिश्चित राशि से अतिरिक्त राशि प्राचार्य अपने पास ही रखता था तथा उसके निजी सचिव के अलावा यह बात कोई नहीं जानता था। उसने बच्चों के अभिभावकों को चेतावनी दे रखी थी- 'यदि किसी ने यह बात जाहिर की तो उसके बच्चे को शाला से निकाल दिया जाएगा।'

आम, नीम, पीपल, सागौन और महुए के वृक्षों से ढंकी 2 झरनों के मध्य स्थित यह पाठशाला सच में इन्द्रलोक का आभास कराती थी। इस शाला में दाखिले के लिए जंगल के सभी जानवर लालायित रहते थे किंतु सबको मालूम था कि स्पर्धा बहुत कठिन है। बच्चों के साथ ही उनके मां-बाप से भी कठोर सवाल पूछे जाते थे। > >

कमजोर और निर्धन बच्चे तो शाला का नाम सुनकर ही डर जाते थे। बच्चे कमजोर, ऊपर से गरीब हों, तो उनके लिए तो यह शाला एक सपने की ही तरह थी। उन बेचारों को तो सरकारी स्कूल ही नसीब में थे।' कहां राजा भोज कहां गंगू तेली'/' दूर के अंगूर खट्टे' समझकर बेचारे पास के कूड़े-कचरे से वे संतोष कर लेते थे।

एक गधे का बच्चा' गिद्धू' कई दिनों से भाग्योदय पाठशाला में दाखिले के लिए लालायित था। इसके लिए वह कई दिनों से सपने बुन रहा था। पिछले 2 महीने से दिन-रात परिश्रम कर उसने प्रतिस्पर्धा के लिए तैयारी की थी। उसे पूर्ण विश्वास था कि वह नर्सरी तो क्या, केजी प्रथम और केजी द्वितीय तक की परीक्षा में भी सफल हो सकता है। उसने अपने बापू से कहा था कि मुझे भी भाग्योदय पाठशाला में पढ़ना है। मुझे वहां ले चलो, निश्चित ही मैं प्रतियोगी परीक्षा में सफल हो जाऊंगा।

गधे ने उसे समझाया था-' बेटे वह शाला बुद्धिमान, निपुण और मेधावी लोगों के लिए है, हम ठहरे गधा जाति के प्राणी। हमें वहां कौन पूछेगा? हमें तो वहां की चहारदीवारी में घुसने भी नहीं मिलेगा।'

किंतु बेटा' गिद्धू' तो जिद पर अड़ा था-' पढूंगा तो भाग्योदय में ही पढूंगा अन्यथा नहीं पढूंगा।'

बेचारा निरीह गधा क्या करता? पुत्र-प्रेम में अंधा। बेटे को लेकर वह पहुंच ही गया उस पाठशाला में।

गधे बाप-बेटे को देखकर सभी लोग हंसने लगे। 'लो अब गधे का बेटा भी अपनी शाला में पढ़ेगा।' हाथी की बेबी 'अपुनी' ने तंज कसा- 'अरे कहां से पढ़ेगा'। शेर का बच्चा 'शिरुआ' बोला- 'प्राचार्य इसे यूं ही टरका देगा। इतनी कड़ी स्पर्धा है कि यह गधे का बच्चा एक भी प्रश्न का जवाब सही नहीं दे पाएगा।'

किंतु गधे के बच्चे को अपने ऊपर पूरा विश्वास था। धड़ल्ले से वह प्राचार्य के कमरे में गया और पूछे गए सभी प्रश्नों के सही और सटीक जवाब दे दिए। प्राचार्य अवाक् रह गया। किंतु दाखिले के लिए जब अनुदान देने बात आई तो गधे ने साफ इंकार कर दिया। 1 लाख कहां से देता वह बेचारा गरीब?

प्राचार्य ने तुरंत पलटी मारी- 'तुम्हारा बेटा बहुत कमजोर है, हम उसे दाखिला नहीं दे सकते, गधे कहीं के चले आते दाखिला कराने', ऐसा कहकर प्राचार्य ने उसे कमरे से बाहर भगा दिया। गधा बेचारा निराश हो गया।

परंतु उसका नन्हा-दुलारा हौसले वाला था- 'बोला, बापू कुछ गड़बड़ है। यहां प्राचार्य भालू केवल उन्हीं बच्चों को दाखिला देता है, जो उसे भारी अनुदान देते हैं। परीक्षा, स्पर्धा सब ढकोसला है। देखो बापू, ये सांप और अजगर के बच्चे भी यहां घूम रहे हैं। इनका दाखिला कैसे हो गया? अजगर भी कोई बुद्धिमान होते हैं? खाया-पिया और सो गए आलसी कहीं के। उनके बच्चे तो निरे मूर्ख ही होते होंगे। यही तो इनकी दिनचर्या है।'

उसने आगे कहा- 'मुझे लगता है कि इस शाला में उन्हें ही जगह मिलती है, जो खूब सारा अनुदान देते हैं अथवा जो ताकतवर हैं और अपनी ताकत के दम पर ही बच्चों का दाखिला करा लेते हैं। अजगर और सांप के बच्चों को तो डर के कारण ही भालू ने दाखिला दिया होगा। मैं देखता हूं कि यह प्राचार्य कैसे मुझे भर्ती नहीं करता।'

उसने शाला से बाहर आकर भालू प्राचार्य की मनमानी और तानाशाही की बात सब जानवरों को बताई- 'मैंने सभी प्रश्नों के सही जवाब दिए फिर भी मुझे दाखिला नहीं दिया जबकि अजगर व सांप जैसे गधे बच्चों को दाखिला दिया गया है।'

गधे के बेटे की वेदना सुनकर बंदर, नेवला, सियार, लोमड़ी, गिलहरी सरीखे जानवरों को जोश आ गया।

'कमजोरों पर ऐसा अत्याचार! अब ऐसा नहीं चलेगा' बंदर चिल्लाया। 'हमें इंसाफ चाहिए, अपना हक हम लेकर ही रहेंगे', नेवले ने हुंकार भरी। भालू प्राचार्य की यह हिम्मत! लाखों रुपए लेकर दाखिला देता है और कहता कि हम मेधावी और कुशाग्र बच्चों को ही लेते हैं', लोमड़ी धरती पर अपनी पूंछ पटककर बोली। वह गुस्से के मारे अपनी नाक फुला रही थी- 'इस भालू को तो मैं कुचलकर रख दूंगी। समझता क्या है अपने आपको? यह प्रजातंत्र है।' वह जोरों से चीख रही थी। 'चलो हम अभी भालू की पाठशाला को तहस-नहस कर देते हैं', सियार का भी खून खौल रहा था। 'क्या छोटे जानवरों की कोई इज्जत नहीं है?'

सभी जानवरों ने चिल्ला-चिल्लाकर अपने साथियों को एकत्रित कर लिया और सैकड़ों की तादाद में यह भीड़ नारे लगाती हुई शाला की तरफ कूच कर गई- 'शाला का दोहरा व्यवहार, नहीं चलेगा भ्रष्टाचार', 'शाला को मिटा देंगे, प्राचार्य को हटा देंगे', 'जानवर एकता जिंदाबाद' जैसे नारे सुनकर भालू प्राचार्य घबरा गया। वह कमरे के बाहर आ पाता कि भीड़ दरवाजा ठेलती हुई अंदर घुस गई।

भालू की घिग्गी बांध गई। यह क्या हो गया? इतने कमजोर से जानवर गधे ने मेरी शाला पर हमला करवा दिया। उसने तो सपने में भी यह नहीं सोचा था। वह हाथ जोड़कर खड़ा हो गया और सबसे क्षमा मांगने लगा। कोई दूसरा उपाय भी तो नहीं था|

'श्रीमान प्राचार्यजी, आपकी काली करतूतों का हमें पता चल गया है। आप अमीरों के बच्चों को भारी अनुदान लेकर दाखिला देते हैं। मेधावी, होशियार होना यह दिखावा है। हम आपकी शाला तोड़ने और आपको दंड देने आए हैं', बंदर घुड़ककर बोला। नेवले ने तो वहीं गुस्से के मारे 2-3 सांप के बच्चों को काटकर टुकड़े-टुकड़े कर दिए।

'क्षमा कर दो भाई, हम इस गधे के मेधावी पुत्र 'गिद्धू' को अभी दाखिला दे देते हैं।' प्राचार्य हाथ जोड़कर फिर से खड़ा हो गया।

'इतने से ही काम नहीं चलेगा। तुम्हें सियार, लोमड़ी, गिलहरी, गिरगिट, छिपकली इत्यादि सभी जीवों के बच्चों को शाला में भर्ती करना पड़ेगा बिना किसी अनुदान के', गिरगिट धमकीभरे अंदाज में चिल्लाए जा रहा था।

'ठीक है, हमें आप लोगों की सभी शर्तें मंजूर हैं।' भालू को अपनी गलती का अहसास हो गया था।

अब भाग्योदय पाठशाला सभी के लिए खुली है। अनुदान लेना-देना बिलकुल बंद है। लिखित परीक्षा होती है। जो योग्य होता है उसे शाला में प्रवेश मिल जाता है।


ढ़ोल की पोल | Best Moral Stories In Hindi


ढोल की पोल एक बार एक जंगल के निकट दो राजाओं के बीच घोर युद्ध हुआ। एक जीता दूसरा हारा।

सेनाएं अपने नगरों को लौट गई। बस, सेना का एक ढोल पीछे रह गया। उस ढोल को बजा-बजाकर सेना के साथ गए भांड व चारण रात को वीरता की कहानियां सुनाते थे। युद्ध के बाद एक दिन आंधी आई। आंधी के ज़ोर में वह ढोल लुढकता-पुढकता एक सूखे पेड के पास जाकर टिक गया। उस पेड की सूखी टहनियां ढोल से इस तरह से सट गई थी कि तेज हवा चलते ही ढोल पर टकरा जाती थी और ढमाढम ढमाढम की गुंजायमान आवाज़ होती। एक सियार उस क्षेत्र में घूमता था। उसने ढोल की आवाज़ सुनी। वह बडा भयभीत हुआ। ऐसी अजीब आवाज़ बोलते पहले उसने किसी जानवर को नहीं सुना था। वह सोचने लगा कि यह कैसा जानवर हैं, जो ऐसी जोरदार बोली बोलता हैं ’ढमाढम’। सियार छिपकर ढोल को देखता रहता, यह जानने के लिए कि यह जीव उडने वाला हैं या चार टांगो पर दौडने वाला। एक दिन सियार झाडी के पीछे छुप कर ढोल पर नजर रखे था। तभी पेड से नीचे उतरती हुई एक गिलहरी कूदकर ढोल पर उतरी।

हलकी-सी ढम की आवाज़ भी हुई। गिलहरी ढोल पर बैठी दाना कुतरती रही। सियार बडबडाया 'ओह! तो यह कोई हिंसक जीव नहीं हैं। मुझे भी डरना नहीं चाहिए।' सियार फूंक-फूंककर क़दम रखता ढोल के निकट गया। उसे सूंघा। ढोल का उसे न कहीं सिर नजर आया और न पैर। तभी हवा के झुंके से टहनियां ढोल से टकराईं। ढम की आवाज़ हुई और सियार उछलकर पीछे जा गिरा। 'अब समझ आया।' सियार उढने की कोशिश करता हुआ बोला 'यह तो बाहर का खोल हैं। जीव इस खोल के अंदर हैं। आवाज़ बता रही हैं कि जो कोई जीव इस खोल के भीतर रहता हैं, वह मोटा-ताजा होना चाहिए। चर्बी से भरा शरीर। तभी ये ढम=ढम की जोरदार बोली बोलता हैं।' अपनी मांद में घुसते ही सियार बोला 'ओ सियारी! दावत खाने के लिए तैयार हो जा। एक मोटे-ताजे शिकार का पता लगाकर आया हूं।' सियारी पूछने लगी 'तुम उसे मारकर क्यों नहीं लाए?' सियार ने उसे झिडकी दी 'क्योंकि मैं तेरी तरह मूर्ख नहीं हूं। वह एक खोल के भीतर छिपा बैठा हैं। खोल ऐसा हैं कि उसमें दो तरफ सूखी चमडी के दरवाज़े हैं।मैं एक तरफ से हाथ डाल उसे पकडने की कोशिश करता तो वह दूसरे दरवाज़े से न भाग जाता?' चांद निकलने पर दोनों ढोल की ओर गए। जब वह् निकट पहुंच ही रहे थे कि फिर हवा से टहनियां ढोल पर टकराईं और ढम-ढम की आवाज़ निकली। सियार सियारी के कान में बोला 'सुनी उसकी आवाज?

जरा सोच जिसकी आवाज़ ऐसी गहरी हैं, वह खुद कितना मोटा ताजा होगा।' दोनों ढोल को सीधा कर उसके दोनों ओर बैठे और लगे दांतो से ढोल के दोनों चमडी वाले भाग के किनारे फाडने। जैसे ही चमडियां कटने लगी, सियार बोला 'होशियार रहना। एक साथ हाथ अंदर डाल शिकार को दबोचना हैं।' दोनों ने ‘हूं’ की आवाज़ के साथ हाथ ढोल के भीतर डाले और अंदर टटोलने लगे। अदंर कुछ नहीं था। एक दूसरे के हाथ ही पकड में आए। दोंनो चिल्लाए 'हैं! यहां तो कुछ नहीं हैं।' और वे माथा पीटकर रह गए। सीखः- शेखी मारने वाले ढोल की तरह ही अंदर से खोखले होते हैं।


एकता में बल है | Best Moral Stories In Hindi


एक धर्म सिंह नाम का किसान था। उसके चार बेटे थे।

वे बहुत मेहनती और ईमानदार थे। बस अगर कोई बुरी बात थी तो यह कि उनका आपस में झगड़ा ही होता रहता था। वे किसी बात पर आपस में सहमत नहीं होते थे। यह सब देख उनका पिता धर्म सिंह बहुत दुखी होता था।

एक बार किसान धर्म सिंह बहुत बीमार पड़ गया। अब उसे यह चिन्ता सताने लगी कि अगर उसे कुछ हो गया तो उसके बेटों का क्या होगा। तभी उसे एक तरकीब सूझी। उसने बहुत सी लकड़ियां इकट्ठी की और उनका एक गट्ठर बनाया।

किसान ने अपने बेटों को बुलाया और उन्हें बारी-बारी से वो गट्ठर तोड़ने को दिया। कोई भी उसे नहीं तोड़ सका। उसके बाद किसान ने उस गट्ठर को खोल कर सबको एक एक लकड़ी दी और तोड़ने को कहा। इस बार सबने झट से अपनी-अपनी लकड़ी तोड़ दी।

तब किसान ने सब को समझाया – ” देखो ! जब मैने तुम सब को यह गट्ठर तोड़ने को दिया तो कोई भी इसे तोड़ नहीं पाया। लेकिन जैसे ही उसे अलग करके एक-एक लकड़ी दी तो उसे सब ने आसानी से तोड़ दिया। ऐसे ही अगर तुम सब मिल कर रहोगे तो हर मुसीबत का मुकाबला कर सकते हो, जो अलग-अलग रह कर नहीं कर सकते।

यह बात किसान के चारों बेटों की समझ में आ गई और फिर सब मिल जुल कर रहने लगे। किसान भी बहुत खुश हुआ।


कुँए का मेंढक | Best Moral Stories In Hindi


एक कुएँ में एक मेंढक रहता था. एक बार समुद्र का एक मेंढक कुएँ में आ पहुँचा तो कुएँ के मेंढक ने उसका हालचाल, अता-पता पूछा. जब उसे ज्ञात हुआ कि वह मेंढक समुद्र में रहता है और समुद्र बहुत बड़ा होता है तो उसने अपने कुएँ के पानी में एक छोटा-सा चक्कर लगाकर उस समुद्र के मेंढक से पूछा कि क्या समुद्र इतना बड़ा होता है ? कुएँ के मेंढक ने तो कभी समुद्र देखा ही नहीं था. समुद्र के मेंढक ने उसे बताया कि इससे भी बड़ा होता है.

कुएँ का मेंढक चक्कर बड़ा करता गया और अन्त में उसने कुएँ की दीवार के सहारे-सहारे आखिरी चक्कर लगाकर पूछा- ‘क्या इतना बड़ा है तेरा समुद्र ?’ इस पर समुद्र के मेंढक ने कहा – ‘इससे भी बहुत बड़ा.’ अब तो कुएँ के मेंढक को क्रोध् ही आ गया. कुएँ के अतिरिक्त उसने बाहर की दुनिया तो देखी ही नहीं थी. उसने कह दिया – ‘जा तू झूठ बोलता है. कुएँ से बड़ा कुछ होता ही नहीं. समुद्र भी कुछ नहीं होता है, तू बकता है.’

आज जीवन में पग-पग पर हमें ऐसे कुएँ के मेंढक मिल जायेंगे, जो केवल यही मानकर बैठे हैं कि जितना वे जानते हैं, उसी का नाम ज्ञान है, उसके इधर – उधर और बाहर कुछ भी ज्ञान नहीं है. कुएँ का मेंढक यहाँ सीमित ज्ञान का प्रतीक है जबकि समुद्र से आया मेंढक ज्ञान की विशालता और गहराई का प्रतीक है. जितना अध्ययन होगा उतना अपने अज्ञान का आभास होगा. यह भी सत्य है कि सागर की भाँति ज्ञान की भी कोई सीमा नहीं है. अपने ज्ञानी होने के अज्ञानमय भ्रम को यदि तोड़ना हो तो अधिक से अधिक अध्ययन करना आवश्यक है. जितना अधिक अध्ययन किया जाएगा, भ्रम टूटेगा और ऐसा आभास होगा कि अभी तो बहुत कुछ जानना और पढ़ना शेष है।


मुकरा | Best Moral Stories In Hindi


लूंगा-लूंगा-लूंगा, कम से कम पांच सौ के ही लूंगा।' मुकरा ने तो जैसे जिद ही पकड़ ली थी। सुबह से ही वह पांच सौ रुपए की मांग कर रहा था। रामरती परेशान थी। पांच सौ रुपए मुकरा पटाखों में फूंके, वह इसके लिए बिलकुल तैयार नहीं थी।

खींचतान के मुश्किल से साढ़े चार-पांच हजार रुपए ही तो घर में आ पाते हैं। उसका पति उमेसा और वे दिनभर जी-तोड़ परिश्रम करते हैं, तब कहीं गुजारे के लायक कमा पाते हैं और यह मुकरा ऊंह कुछ समझता ही नहीं।

रामरती बड़बड़ा रही थी। इत‌नी-सी कमाई में मुकरा की पढ़ाई, दूध पीती छोटी-सी बुधिया का खर्च और फिर खाने-पीने, राशन-पानी का खर्च। कैसे जिंदगी की गाड़ी चल रही थी, यह वही जानती थी। सुबह से शाम तक पांच-सात घरों में खटती रहती, झाड़ू-पोंछा करती, बर्तन मांझती तब कहीं जाकर पहली तारीख को ढाई-तीन हजार रुपए ही ला पाती।

उमेसा का क्या है, कभी डेढ़ हजार तो कभी दो हजार, इतना ही तो लाता है। ठेकेदार के पास मजदूरी करता है। ईंट-गारे का काम है, रोज तो होता नहीं, मिल गया तो ठीक नहीं तो जय सियाराम। कहीं भी बैठकर उमेसा बीड़ी धोंकने लगता है। उसका खुद भी तो कोई ठिकाना नहीं होता। कभी कोई घर छूट जाता तो दूसरा देखना पड़ता। खैर, गाड़ी तो चल ही रही थी।

आज वह दो घरों से कुछ रुपए दिवाली खर्च के लिए एडवांस ले आई थी। कुछ लोग होते हैं, जो दूसरों का दुख-दर्द समझते हैं और यदा-कदा सहायता कर देते हैं। मिसेस चड्ढा और मिसेस गवली ने महीने की पगार, महीना समाप्त होने के पांच दिन पहले ही दे दी थी। दिवाली तेईस तारीख को पड़‌ गई थी। आठ सौ रुपए में पूजा का सामान, प्रसाद, मिठाई, फल-फूल लाएं या कि मुकरा को फूंकने को दे दें।

मुकरा का असली नाम मुकुंदीलाल था, किंतु मुख सुख की चाहत ने उसे मुकरा बना दिया था। अभावों में रहते हुए भी रामरती ने बच्चों की परवरिश में कोई भी कमी नहीं आने दी थी। मुकरा सातवीं में हिन्दी माध्यम के स्कूल में पढ़ रहा था। सरकार से किताबों और साइकल की व्यवस्था हो जाने से वह बेफिक्र थी।

मिड डे मील में उसे शाला में ही खाना मिल जाता था। चूंकि मुकरा पढ़ने में भी होशियार था अत: उसे सौ रुपए महीने की छात्रवृत्ति भी मिल रही थी। आज दिवाली होने के कारण उसकी और उमेसा दोनों की छुट्टी थी। वह तो खैर घर मालकिनों को बताकर आई थी कि वह दिवाली के दिन काम पर नहीं आएगी।

मालकिनें नागा करने के कभी भी पैसे नहीं काटती थीं किंतु उमेसा काम नहीं तो पैसा भी नहीं। बाजार जाने का प्रोग्राम बन गया था। दिवाली का सामान तो लाना ही था। दीये, तेल, बत्तियां, केले, मिठाई, लक्ष्मीजी की फोटो और नारियल, फल-फूलों में ही पांच-छह सौ रुपए लग जाएंगे। पूजा का सामान तो आ ही जाएगा, परंतु इस मुकरा का क्या करें, जो सुबह से अड़ा है कि पांच सौ ही लूंगा।

'बेटा पांच सौ तो बहुत होते हैं अपनी हैसियत नहीं है इतनी। फिर पटाखे चलाने का मतलब रुपए फूंकना ही है', रामरती उसे समझा रही थी।

'अम्मा पांच सौ से बिलकुल कम न‌हीं लूंगा। इतनी महंगाई में पांच सौ में आता क्या है? दस अनार और दस रस्सी बम ही तीन सौ रुपए में आएंगे। फिर चकरी, फुल‌झड़ी दीवाल फोड़ पांच सौ भी कम पड़ जाएंगे।'

'परंतु बेटे'

'मैं कुछ नहीं सुनूंगा। सुन्नी एक हजार के लाया है। टंटू अपने बापू के साथ बाजार जा रहा है, कह रहा था अपने बापू से दो हजार के खरीदवाऊंगा।'

'पर बेटा वे लोग पैसे वाले हैं, सुन्नी का बाप तहसील ऑफिस में बाबू है। टंटू के बाप की दारू की दुकान है। ये लोग तो कितने भी रुपए खर्च क‌र सकते हैं, फूंक सकते हैं पर'

'नहीं-नहीं बिलकुल भी नहीं, मुझे अभी पांच सौ रुपए दे दो।'

'मैं खुद ही बाजार चला जाऊंगा और पटाखे लूंगा अपनी मर्जी के, बिलकुल सौ टंच।' मुकरा के सिर पर‌ तो पटाखों का भूत सवार था।

'ठीक है' रामरती ने उसके सामने एक पांच सौ का नोट फेंक दिया था और गुस्से में फनफनाती हुई भीतर किचन में चली गई थी।

मुकरा ने वह नोट उठाया और बाजार चल दिया विजयी मुद्रा में। जैसे मां और बेटे के बीच लड़े गए पानीपत के युद्ध में बेटा जीत गया हो। उसे अब कौन समझाए कि ऐसी पानीपत की लड़ाइयों में माताओं को हारने में कितना आनंद आता है अन्यथा माताओं को कौन हरा सकता है? मां तो मां ही होती है। उसकी ममता बेटों की जिद के आगे अक्सर हथियार डाल देती है।

धीरे-धीरे शाम धरती पर उतर आई। मां का गुस्सा कपूर की तरह थोड़ी देर में ही उड़ गया। आखिर बच्चा ही तो है, मन की उमंगें हिलोर लेती रहती हैं। किसी मित्र को कुछ नया करते देखता है तो उसकी भी इच्छा वैसा ही करने की हो उठती है। मां प्रतीक्षा में थी कि मुकरा आते ही कहेगा- 'देखो मां इतने सारे पटाखे! अनार, चकरी, फुलझड़ी, दीवाल फोड़.रामबाण पांच सौ रुपए में इतने सारे।'

परंतु रात होने को आई और वह आया ही नहीं, तब रामरती को चिंता हुई कि कहां गया होगा? इतनी देर तो वह कहीं रुकता ही नहीं। उमेसा भी परेशान हो गया, जो अभी-अभी बाजार से पूजा का सामान लेकर आया था। उसे बाजार में भी मुकरा कहीं नजर नहीं आया था। हे भगवान! क्या हुआ लड़के को, सोचते-सोचते उमेसा उल्टे पांव लौट गया। मुकरा के दोस्तों के घर जा-जाकर पूछने लगा। उसके एक दोस्त ने बताया कि उसे राम बाबू कक्का के साथ अस्पताल जाते देखा था।

'क्या अस्पताल? क्या हुआ था मुकरा को?' उमेसा बौखला-सा गया।

'उसे कुछ नहीं हुआ। राम बाबू कक्का के सिर से जरूर खून बह रहा था।'

दोस्त के मुंह से यह सुनकर उमेसा की जान में जान आई। दौड़ा-दौड़ा वह अस्पताल जा पहुंचा। ढूंढता-खोजता वह उस कमरे में पहुंच ही गया, जहां राम बाबू कक्का पलंग पर पड़े थे और मुकरा बगल में एक स्टूल पर बैठा था। राम‌बाबू के सिर पर पट्टी बंधी थी और वे कराह रहे थे।

'क्या हुआ मुकरा? इनको क्या हुआ? तुम यहां कैसे आए?' उमेसा जैसे उस पर टूट पड़ा। इतने सारे प्रश्न एकसाथ सुनकर मुकरा से तत्काल कोई जबाब देते नहीं बना। थोड़ी देर वह चुप रहा फिर उसने बताया कि कक्का रास्ते में चक्कर खाकर गिर पड़े थे। सिर एक पत्थर में टकराने से खून बह रहा था और वह उन्हें अस्पताल ले आया था। राम बाबू कक्का फफककर रोने लगे थे और मुकरा के सिर पर हाथ फेरने लगे थे।

क्या हुआ राम बाबू, सब ठीक तो है, अब अच्छे हो न? उमेसा ने सहानुभुति दर्शाते हुए पूछा।

'बिलकुल ठीक हूं भैया, तुम्हारा बेटा तॊ साक्षात कृष्ण का अवतार है। यह न होता तो आज मैं सड़क पर ही मर जाता। मुझे यह यहां तक ले आया और भरती कराया। सब दवाइयां अपने पैसे से ले आया।' राम बाबू अभी भी कराह रहे थे।

'तू तो पटाखे लेने के लिए बाजार गया था, पटाखे नहीं लिए क्या?' उमेसा ने पूछा।

'नहीं बापू नहीं लिए कक्का की दवाई में।'

'तू तो जिद कर रहा था पटाखों की, अब क्या करेगा?'

'नहीं बापू मुझे नहीं चाहिए पटाखे, कक्का ठीक हो गए, मुझे तो बहुत अच्छा लगा। पटाखे तो जलकर राख ही होने थे।'

उमेसा को लगा कि मुकरा अपनी उम्र से बहुत ज्यादा बड़ा हो गया है। उसने बेटे को गले से लगा लिया। राम बाबू कक्का के आंसुओं की धार और तेज हो गई थी।


मोर और कौवा | Best Moral Stories In Hindi


एक दिन कौए ने जंगल में मोरों की बहुत- सी पूंछें बिखरी पड़ी देखीं. 

वह अत्यंत प्रसन्न होकर कहने लगा- वाह भगवान! बड़ी कृपा की आपने, जो मेरी पुकार सुन ली. मैं अभी इन पूंछों से अच्छा खासा मोर बन जाता हूं. इसके बाद कौए ने मोरों की पूंछें अपनी पूंछ के आसपास लगा ली. फिर वह नया रूप देखकर बोला- अब तो मैं मोरों से भी सुंदर हो गया हूं. अब उन्हीं के पास चलकर उनके साथ आनंद मनाता हूं. वह बड़े अभिमान से मोरों के सामने पहुंचा. उसे देखते ही मोरों ने ठहाका लगाया. एक मोर ने कहा- जरा देखो इस दुष्ट कौए को. यह हमारी फेंकी हुई पूंछें लगाकर मोर बनने चला है. लगाओ बदमाश को चोंचों व पंजों से कस-कसकर ठोकरें. यह सुनते ही सभी मोर कौए पर टूट पड़े और मार-मारकर उसे अधमरा कर दिया.

कौआ भागा-भागा अन्य कौए के पास जाकर मोरों की शिकायत करने लगा तो एक बुजुर्ग कौआ बोला- सुनते हो इस अधम की बातें. यह हमारा उपहास करता था और मोर बनने के लिए बावला रहता था. इसे इतना भी ज्ञान नहीं कि जो प्राणी अपनी जाति से संतुष्ट नहीं रहता, वह हर जगह अपमान पाता है. आज यह मोरों से पिटने के बाद हमसे मिलने आया है. लगाओ इस धोखेबाज को.

इतना सुनते ही सभी कौओं ने मिलकर उसकी अच्छी धुलाई की।


नकलची बन्दर | Best Moral Stories In Hindi


एक बार एक टोपी बेचने वाला अपनी ढेर सारी टोपियो को लेकर बेचने जा रहा था रास्ते में एक पेड़ के नीचे बैठ गया और थकान की वजह से उसे नीद आ गयी और सो गया इतने में उस पेड़ पर रहने वाले बन्दर उसकी ढेर सारी टोपिया उठा ले गये और सबने पेड़ पर चारो तरफ टोपिया फैला दी इतने में उस टोपीवाले की नीद खल गयी तो उसने देखा की सब बंदरो ने उसके टोपिया लेकर चले गये है तो वह उनसे टोपिया मागने के लिए डराने लगा लेकिन इससे बन्दर और चिड जाते और सभी बन्दर वैसा ही करते जैसा की टोपीवाला करता तो उसने गुस्से में अपने सर की टोपी निकाल कर फेक दी तो ऐसा देखकर उन बंदरो ने नकल करके सारे टोपी नीचे फेक दिए जिससे टोपीवाला अपने सारी टोपिया फिर से पा गया।


शेर और लकड़बग्घे | Best Moral Stories In Hindi


वो एक नौजवान शेर था जिसने अभी -अभी शिकार करना शुरू किया था । पर अनुभव न होने के कारण वो अभी तक एक भी शिकार नहीं कर पाया था । हर एक असफल प्रयास के बाद वो उदास हो जाता , और ऊपर से आस -पास घूम रहे लकड़बघ्घे भी उसकी खिल्ली उड़ा कर खूब मजे लेते ।

शेरा गुस्से में उनपर दहाड़ता पर वे ढीठ कहाँ डरने वाले थे , ऐसा करने पर वे और जोर -जोर से हँसते ।

शेर और

“उन पर ध्यान मत दो ” , समूह के बाकी शेर सलाह देते ।

“कैसे ध्यान न दूँ ? हर बार जब मैं कसी जानवर का शिकार करने जाता हूँ तो इन लकड़बग्घों की आवाज़ दिमाग में घूमती रहती है “ , शेरा बोला।

शेरा का दिल छोटा होता जा रहा था , वो मन ही मन अपने को एक असफल शिकारी के तौर पर देखने लगा और आगे से शिकार का प्रयास न करने की सोचने लगा।

ये बात शेरा की माँ , जो दल के सबसे सफल शिकारियों में से थी को अच्छी तरह से समझ आ रही थी । एक रात माँ ने शेरा को बुलाया और बोली ,” तुम परेशान मत हो , हम सभी इस दौर से गुजरे हैं , एक समय था जब मैं छोटे से छोटा शिकार भी नहीं कर पाती थी और तब ये लकड़बग्घे मुझपर बहुत हँसते थे । तब मैंने ये सीखा , “ अगर तुम हार मान लेते हो और शिकार करना छोड़ देते हो तो जीत लकड़बग्घों की होती है । लेकिन अगर तुम प्रयास करते रहते हो और खुद में सुधार लाते रहते हो … सीखते रहते हो तो एक दिन तुम महान शिकारी बन जाते हो और फिर ये लकड़बग्घे कभी तुम पर नहीं हंस पाते ।”

समय बीतता गया और कुछ ही महीनो में शेरा एक शानदार शिकारी बन कर उभरा , और एक दिन उन्ही लकड़बग्घों में से एक उसके हाथ लग गया ।

“ म्म्म् मुझे मत मारना … मुझे माफ़ कर दो जाने; मुझे जाने दो ”, लकड़बग्घा गिड़गिड़ाया।

“ मैं तुम्हे नहीं मारूंगा , बस मैं तुम्हे और तुम्हारे जैसे आलोचकों को एक सन्देश देना चाहता हूँ । तुम्हारा खिल्ली उड़ाना मुझे नहीं रोक पाया , उसने बस मुझे और उत्तेजित किया कि मैं एक अच्छा शिकारी बनूँ … खिल्ली उड़ाने से तुम्हे कुछ नहीं मिला पर आज मैं इस जंगल पर राज करता हूँ । जाओ मैं तुम्हारी जान बख्शता हूँ … जाओ बता दो अपने धूर्त साथियों को कि कल वे जिसका मजाक उड़ाते थे आज वही उनका राजा है ।”


खरगोश और कछुआ | Best Moral Stories In Hindi


जंगल में दो दोस्त रहते थे, खरगोश और कछुआ। दोनों एक साथ घूमते फिरते। कहीं भी जाना होता तो खरगोश तो उछल – कूद कर झट से पहुँच जाता और कछुआ धीरे – धीरे चलते चलते काफी देर से पहुँचता।

यह सब देख कर खरगोश और दूसरे जानवर कछुए का खूब मज़ाक उड़ाते। यह सब कछुए को बहुत बुरा लगता। कछुए ने सोचा कि क्यों न कुछ ऐसा किया जाए कि सब जानवर उसकी भी इज्जत करने लग जाएँ।

कछुए ने रेस प्रतियोगिता के लिए खरगोश को चैलेंज दिया। पहले तो खरगोश व दूसरे जानवर खूब हँसे लेकिन बाद मे जब खरगोश इस रेस के लिए तैयार हो गया तो सब हैरान हो गए।

जंगल में एक तालाब था। उसी तालाब पर पहुँचने की शर्त लगी की जो पहले वहाँ पहुचेगा उसे इनाम मिलेगा। रेस शुरु हुई। खरगोश तो उछलते कूदते आधे रास्ते तक पहुँच गया। उसने देखा कि कछुआ तो कहीं दूर दूर तक दिखाई नहीं दे रहा। खरगोश ने सोचा ” चलो थोड़ी देर आराम कर लेता हूँ। फिर भाग कर कछुए से पहले तालाब तक पहुँच जाऊँगा। इस तरह खरगोश एक पेड़ की छाया में लेट गया और उसे नींद आ गई।

थोड़ी देर बाद जब कछुआ पेड़ तक पहुँचा तो उसने खरगोश को सोते हुए देखा। लेकिन वो रुका नहीं। इस तरह धीरे – धीरे कछुआ तालाब तक पहुँच गया।

शाम हो गयी जब खरगोश की नींद खुली तो उसको लगा कि कछुआ तो अभी रास्ते में ही होगा। खरगोश कूदते – कूदते तालाब तक पहुँचा, तो उसने क्या देखा – अरे ! यह कैसे हुआ।

कछुआ तो पहले से वहाँ बैठा था। इस तरह कछुआ रेस जीत गया। उसे इनाम भी मिला और फिर कभी किसी ने उसकी धीमी चाल को लेकर मज़ाक नहीं बनाया।


वफादारी का पुरुस्कार | Best Moral Stories In Hindi


लाला पीतांबरलाल धरमपुरा रियासत के दीवान थे। पचास गांव की इस छोटी-सी रियासत के राजा शिवपालसिंह एक कर्तव्यनिष्ठ, दयालु और प्रजा के हित में काम करने वाले धर्म प्रिय राजा थे।

दीवान पीतांबर लालजी का रियासत में बहुत सम्मान था क्योंकि वे न्याय प्रिय और जनता के सुख-दुख में सदा सहायता करने के लिए तत्पर रहने वाले व्यक्ति थे। अंग्रेजों का राज्य था, किंतु इस रियासत के सभी मामले राजा शिवपाल की ओर से नियुक्त दीवान पीतांबर लालजी ही निपटाते थे।

इसके लिए जिलाधीश के कार्यालय में एक कुर्सी अलग से रखी रहती थी, जहां दीवान साहब नियमित रूप से सप्ताह में तीन दिन बैठकर मामलों पर फैसले लेते थे। राज्य का हर काम दीवानजी की सलाह पर ही होता था।

एक दिन देर रात्रि में राजा के दूत ने दीवान साहब को सूचित किया कि वे दूसरे दिन बड़े तड़के ही उठकर पड़ोस के राज्य की ओर प्रस्थान कर वहां के राजा की पुत्री के विवाह में शामिल हों। चूंकि वहां पहुंचते-पहुंचते शाम हो जाएगी इसलिए सुबह चार बजे निकलना ही होगा।

लाला साहब ने हुक्म की तामील की और भोर चार बजे उठकर अपनी बग्गी तैयार कराई और अपने दो सुरक्षा सैनिकों को लेकर चल पड़े। मंजिल दूर थी इस कारण पहुंचते-पहुंचते शाम हो गई। थोड़ा-सा विश्राम करने के बाद दीवान साहब विवाह स्थल पर जा पहुंचे।

विवाह कार्यक्रम आरंभ हो चुका था और दूसरे राज्यों के राजा अथवा उनके प्रतिनिधी अपने साथ लाए उपहार राजकुमारी को दे रहे थे। कोई स्वर्ण आभूषण लाया था, तो कोई हीरों का हार लाया था, कोई थाल भरकर स्वर्ण मुद्राएं लिए कतार में खड़े थे, तो कई राजा विदेशी घोड़े अथवा रथ जैसे बहुमूल्य उपहार लेकर आए थे।

तभी दीवान पीतांबरलाल की बारी आ गई। दीवान साहब परेशान हो गए क्योंकि वे इस तरह की तैयारी से नहीं आए थॆ। राजा साहब की तरफ से विवाह में जाने की जो सूचना उन्हें मिली थी वह रात्रि को बहुत देर से मिली थी, राजा साहब से उपहार के संबंध में कोई सलाह-मश्वरा भी नहीं ले सके थे, न ही राजा साहब ने ऐसा कोई संदेश भेजा था। वह केवल रास्ते में होने वाले व्यय के हिसाब से थोड़ा बहुत धन तो रखे थे परंतु इतना नहीं कि विवाह के उपहार में दिया जा सके।

अचानक बिना किसी झिझक के उन्होंने अपनी रियासत के दो गांव उपहार में देने की घोषणा कर दी। दूसरे राज दरबारी कानाफूसी करने, इतनी छोटी-सी रियासत ने दो पूरे गांव उपहार में दे दिए। कहीं यह दीवान पागल तो नहीं हो गया है।

खैर दूसरे दिन दीवान साहब वापिस धरमपुरा प्रस्थान कर गए। रास्ते भर सोचते रहे की राजा साहब अवश्य ही नाराज होंगे कि उनसे बिना पूछे दो गांव उपहार में दे आया। भगवान को स्मरण करते करते वे घर पहुंच गए।

वैसे उन्हें इस बात की आशंका थी कि राजा साहब जरूर क्रोधित होंगे, कुल पचास गांव में से दो गांव उपहार में देना मूर्खता ही तो थी। दूसरे दिन वे दरबार में उपस्थित हुए। राजा साहब ने पूछा- कहिए दीवान साहब, कैसा रहा विवाह समारोह, अरे आप कुछ उदास दिख रहे हैं, क्या बात है? - राजा साहब ने उनके चेहरे कॊ भांप कर पूछा।

'महाराज एक बहुत बड़ी भूल हो गई।' दीवान जी ने डरते-डरते कहा।

'ऐसी क्या भूल हो गई जो हमारे चतुर दीवान जी के चेहरे पर हवाइयां उड़ रहीं हैं।'

'महाराज मैं विवाह में गया तो आपसे सलाह-मश्वरा भी नहीं कर पाया था कि वहां उपहार में क्या देना है।'

'अरे फिर आपने क्या किया?' राजा को अपनी भूल का अहसास हुआ।

'महाराज गुस्ताखी माफ हो, मैंने अपनी रियासत के दो गांव उपहार में दे दिए। इज्जत का सवाल था……..।’

‘वाह लाला साहब आपने तो मेरी नाक बचा ली, राजपूती शान क्या होती है आपसे अच्छा और कौन जान सकता है।'

- राजा साहब ने खुद उठकर दीवानजी को गले लगा लिया। 'दो गांव तो क्या आप पांच गांव भी दे आते तो मुझे दुख न होता।' ऐसा कहकर राजा साहब ने एक गांव की कर बसूली की संपूर्ण आय प्रति माह दीवान जी को देने की घोषणा कर दी। आखिर उन्हें वफादारी और अपनी आन-बान-शान को बचाने का पुरस्कार मिलना ही था।


चूहा और सूरज | Best Moral Stories In Hindi


एक बार एक छोटा लड़का जो बर्फ से ढकी पहाड़ी पर रहता था । 1 दिन के लिए नीचे मैदान में आया मैदान में बहुत गर्मी थी । लड़के ने सुंदर फरो का गर्म कोट पहना था । सूरज की गर्मी के कारण उसका ठंड भाग गया । उसने अपना गर्म कोट उतार कर फेंक दिया किन्तु कुछ ही देर में उसका शरीर पसीने से तरबतर हो गया ।

उसे सूरज पर बड़ा गुस्सा आया । सूरज का कोई उपयोग नहीं है ,लड़के ने सोचा । वह लड़का बहुत क्रोधित हुआ तथा उसने सूरज को दंड देने का फैसला किया । वह एक तांत्रिक के पास गया और उसे एक जाल बनाने को कहा । अगली सुबह वह पहाड़ी की चोटी पर गया और जैसे ही सूरज ऊपर आया उसने उसे जाल में पकड़ लिया । उस दिन सूर्य उदय नहीं हुआ और जानवर अपने भोजन के लिए नहीं जा सके, उन्होंने देखा कि सूरज जाल में फंसा है ।

तब उन्होंने चूहे को मना बुझा कर जाल काटने भेजा और उस समय चूहा बहुत बड़ा होता था । चूहे ने जाल को अपनी तेज दाँतो से काट दिया और सूरज को आजाद किया । सभी जानवर खुश हो गए लेकिन चूहा सूरज की गर्मी के कारण बहुत छोटा हो गया । यही कारण है कि चूहा अब भी बहुत छोटा है ।


कौवा उड़ रहा है | Best Moral Stories In Hindi


'एक उल्लू था एक दिन उसकी बोलती बंद हो गई। वह एक डॉक्टर के यहां चेक कराने गया।

डॉक्टर ने कहा की तुम्हारे गले में फेरनजाइटिस हो गया है। दवा खाने के बाद जब उसे लाभ नहीं हुआ तो फिर वह डॉक्टर के पास गया। डॉक्टर बोला- अब तुम्हें लेरनजाइटिस हो गया है…। उल्लू फिर से दवा खाता है किंतु इस बार भी उसे कोई लाभ नहीं होता है तो वह फिर डॉक्टर के पास जाकर उसे डांट पिलाता है।

डॉक्टर कहता- सॉरी! जब इन दवाइयों का कोई असर नहीं हुआ है, तो जरूर टांसलाईटिस हुआ होगा। ऐसे करते-करते कहानी समाप्त होने को आती है, इसके पहले ही दादीजी सो जातीं हैं। रुद्र भाई को मजबूरी में सो जाना पड़ता है। आखिर थक-हार कर दूसरे दिन दादी रुद्र को सलाह देती हैं कि अब दादा जी से कहानियां सुनो, उन्हें बहुत-सी कहानियां आतीं हैं।

अब दादाजी की डयूटी लग जाती कहानियों की। यूं तो सत्तर पार हो चुके दादाजी का दिमागी कोटा किसी मालगोदाम की तरह भरापूरा रहा है। एक बार में पच्चीस-तीस कहानियां तक सुना डालते किंतु इसके बाद क्या करें, दादाजी सोने लगते परंतु रुद्र भैया को क्या कहें, एक और दादाजी बस.... फिर नहीं कहूंगा की रट लगाते।

परेशान दादाजी बोले ठीक है तो सुनो 'एक कौआ था, उसको प्यास लगी, पानी की तलाश में वह आकाश में निकल पड़ा कि कहीं पानी दिखे तो नीचे जाकर प्यास‌ बुझाएं। कौआ उड़ता रहा... कौआ उड़ता रहा...., कौआ उड़ता रहा….

'आगे क्या हुआ दादाजी?' - रुद्र ने पूछा।

'कौआ उड़ रहा है, अभी उसको पानी कहीं नहीं दिखा है।'

'मगर कब तक उड़ता रहेगा?'

'जब तक पानी नहीं मिलेगा।'

'मगर कब पानी मिलेगा?'

‘देखो अब कब मिलता है, इस साल पानी कम गिरा है न‌, धरती पर पानी बहुत कम है तो कौए को दिख भी नहीं रहा है।' 'अरे यार दादाजी तो मैं सोता हूं जब पानी मिल जाए तो मुझे बता देना।'

'ठीक है।'

दूसरे दिन रुद्र ने उठते ही पूछा- 'दादाजी, कौए को पानी मिला?'

'नहीं मिला बेटा, अभी तक नहीं मिला।'

'अरे यार'

रात को सोने के पहले- वो दादाजी कहानी, 'कौए का क्या हुआ ' रुद्र भैया ने गुहार लगाई।

'अभी तो उड़ रहा है रुद्र भाई पानी नहीं मिला है।'

अब रुद्र भैया कहानी नहीं सुनते यह जरूर पूछते हैं कौए का क्या हुआ दादाजी।

'अभी उड़ रहा है' - दादाजी का यही जबाब होता।

आजकल‌ रुद्र भाई अपने पापा-मम्मी के साथ दूसरे शहर में हैं। हर दिन उनका फोन आता है- 'दादाजी कौए का क्या हुआ?

'अभी तो उड़ रहा है भाई' - दादाजी वही जबाब होता।

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